NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
पुस्तकें
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
लैटिन अमेरिका
विशेष : पाब्लो नेरुदा को फिर से पढ़ते हुए
नेरुदा को दिख रहा था कि जो शक्तियां न्याय व जनतंत्र के विरोध में हैं उनके पास लफंगे, मसखरे, जोकर, पिस्तौल लिए आतंकवादी और नकली धर्मगुरु हर तरह के लोग थे...।
वैभव सिंह
24 Feb 2019
Pablo Neruda
Image Courtesy : Paris Review

भारत में खासतौर पर हिंदी भाषा में चिली के स्पेनिश भाषा के महत्त्वपूर्ण कवि और नोबल पुरस्कार से सम्मानित पाब्लो नेरुदा के प्रति विशिष्ट आदर और प्यार भरा रवैया रहा है। नेरुदा कई बार भारत भी आए और उन्होंने भारत से जुड़ी स्मृतियों के बारे में लिखा। जब स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था, तब भी उन्होंने 1918 के कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लिया और देश के प्रमुख नेताओं से मुलाकात की। नेरुदा की अविवादित लोकप्रियता की वजह यह भी रही कि प्रगतिशील आंदोलन के कारण हिंदी साहित्य जगत में ‘इंटरनेशनलिज्म’ का भी विकास हुआ और नेरुदा जैसे कवियों की रचनाएं तरह-तरह से उत्पीड़त तीसरी दुनिया के देशों की आवाज के रूप में देखी जाने लगीं। उनकी कविताएं चिली के मजदूर नेता सार्वजनिक रूप से पढ़ते थे और दुनिया के अन्य गुरिल्ला आंदोलनों तक उसका विस्तार था। उनका साहित्य ‘थर्ड वर्ल्ड लिटरेचर’ के रूप में पहचाने जाने वाले उस अकादमिक फैशन से नहीं निकला है जो पश्चिमी विश्वविद्यालयों के रास्ते दुनिया भर में फैलता है। नेरुदा के संस्मरण की पुस्तक ‘आई कन्फेस, आई हैव लिव्ड’, जो 1974 में नेरुदा की मृत्यु के वर्ष ही प्रकाशित हुई थी, भी उऩके संघर्षों और जीवन को कविता की तरह प्रस्तुत करने में समर्थ प्रतीत होते हैं। इसका रोचक और मधुर काव्यात्मक अनुगूंजों से भरा अनुवाद कर्ण सिंह चौहान ने किया है। नेरुदा की मौत आज भी केवल उन्हें बेपहनाह प्यार करने वाले चिली के लोगों के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए गुत्थी बनी हुई है। माना जाता है कि कैंसर से उनकी मृत्यु हुई थी पर क्रूर सैनिक शासनों के द्वारा की गई अनगिनत हत्याओं के इतिहास को देखते हुए यह भी माना जाता है कि जनरल आगोस्तो पिनोचे के शासन द्वारा उनकी हत्या करा दी गई हो। इसीलिए 2013 में एक अदालत ने यह आदेश दिया कि नेरुदा की हड्डियों को फिर से ताबूत से निकाला जाए और मौत के कारणों का पता करने के लिए दुनिया की सर्वोत्तम प्रयोगशालाओं की सहायता ली जाए।

नेरुदा ने अपनी पुस्तक में चिले के जंगलों, झरनों और ऊंचे पर्वतों के बीच भटकते बाल जीवन से लेकर अपनी मृत्यु के वर्ष तक देश की राजनीतिक घटनाओं का उल्लेख किया है। चिले की प्रकृति उनकी कविताओं में खून की तरह बहती रही है और इस प्रकृति से खासतौर पर उसके जंगलों से उनका प्रेम ही उनसे कहलवा देता है- ‘जो चिले के जंगल में नहीं गया, वह इस पृथ्वी को समझता ही नहीं है।’ वह उस जंगल की तितलियों, पक्षियों, झरनों, सुनहरे गुबरैलों, मकड़ों और नींबुओं की समूची प्राकृतिक दृश्यावली के लिए अपनी मुग्धता को अपने कवि जीवन का स्रोत मानते रहे और जंगलों की चुप्पी से बाहर निकलकर दुनिया में घूमने लगे तो भी उसी प्रकृति के बहुत सारे रहस्यात्मक रूपों की स्मृति को भीतर बसाए रखा। खुद के बचपन को याद करते हुए उन्होंने अपने को शर्मीला बच्चा बताया जिसकी लड़कियों के सामने घिग्घी बंध जाती थी और दूसरों की पत्नियों के सामने पड़ने से भी उसमें घबराहट होती थी। लेकिन पुस्तकों के प्रति प्रेम ऐसा था कि उन्हीं के शब्दों में- ‘मैं शुतुरमुर्ग की तरह बिना फर्क किए सब कुछ को गटक जाता।’ अपने भाग्य को उन्होंने बड़ा मध्यम दर्जे का बताया है जिसमें एक ओर पसली पर घूंसा पड़ता तो दूसरी ओर से अचानक कोई फूलों की डलिया थमा देता। लातिन अमेरिकी देशों में कवियों को विदेश में काउंसलर और राजदूत बनाने की परंपरा रही है और कवि रूप में ख्याति फैलने के बाद उन्हें भी बर्मा, श्रीलंका, स्पेन और फ्रांस आदि देशों में सरकारी पदों पर नियुक्ति मिलती रही और वे दुनिया भर में घूमते रहे। उनका आवारा घुमंतू जीवन भी उनकी कविताओं के लिए सहायक हुआ और उनकी कविताओं में लातिन अमेरिका के जीवन के साथ-साथ भिन्न देशों की प्रकृति और आंदोलन के चित्रण भी इसी कारण बड़े स्तर पर मिलते हैं। जैसे कि उनकी प्रसिद्ध कविता ‘माचू पिच्चू के शिखर’ पेरु की यात्रा के दौरान देखे गए खंडहरो और प्रकृति के आधार पर रची गई। दुनिया भर में फैली उथलपुथल और सामाजिक आंदोलनों को भी निकट से देखने के कारण उन्हें संसार में कविता की बदलती भूमिका के प्रति भी नए सिरे से सोचने का अवसर मिला। वह लिख रहे थे- ‘यह हमारे युग का सौभाग्य रहा है कि युद्धों, क्रांतियों और बड़े सामाजिक परिवर्तनों वाले समय में कविता को नए-नए अकल्पनीय क्षेत्रों का उद्घाटन करने का अवसर मिला है। आम आदमी को भी उससे मुठभेड़ करनी पड़ी कि या तो वह उसे व्यक्तिगत रूप से अथवा सामूहिक रूप से सराहे या उसकी निंदा करे।’ नेरुदा ने कवि के तौर पर निरंतर निजीपन या वैयक्तिकता का अतिक्रमण किया और उन्हें इस बात का फख्र भी रहा कि सब्जी मंडी के मजदूरों के बीच, चौराहों, गलियों और फैक्टरियों में भी उन्हें कविता सुनाने के लिए बुलाया गया। अक्सर ही लोगों की हिचकियों, हल्के रुदन और लयपूर्ण तालियों के बीच भीगी आंखें लिए उनसे विदाई लेनी पड़ी और इन अनुभवों के बाद उन्हें कहना पड़ा- ‘आग और बर्फ की इन कसौटियों के बीच क्या कोई कवि फिर वैसा रह सकता है।’ नेरुदा के मन में अपनी कविता को लेकर बहुत गलतफहमियां तो नहीं थीं पर जब उन्होंने अपनी ही कविताओं को लातिन अमेरिका के जंगलों में लड़ रहे गोरिल्ला छापामारों या किसी खान मजदूर के हाथों में देखा तो उन्हें कविता की शक्तिशाली प्रासंगिकता के बारे में विश्वास पैदा होने लगा।

अपने संस्मरण में उन्होंने क्यूबा की क्रांति में लड़ने वाले चेग्वेरा से मुलाकात का बेहद भावपूर्ण वर्णन किया है। देश की राजधानी हवाना में आधी रात में एक बजे हुई इस मुलाकात में चे को उन्होंने फौजी वेश, बूट और पिस्तौल के साथ देखा जो बात करते समय दफ्तर की खिड़की से बाहर देख रहे थे जहां सड़क पर संभावित अमेरिकी हमले के कारण रेत की बोरियां बिखरी हुई थीं। चे ने युद्धों का विरोध किया था पर बेहद आक्रोशपूर्ण लहजे में यह भी कहा कि एक बार युद्ध शुरू होने पर हम उसके बिना नहीं रह सकते हैं। हम हमेशा उसकी ओर जाना चाहते हैं। धीरे बोलने वाले चे को उन्होंने ऐसे व्यक्ति के रूप में पाया जिनसे आराम से बैठकर बात की जा सकती थी। छोटे वाक्यों और हल्की हंसी के साथ वे बातचीत करते थे। पर सबसे आश्चर्यजनक पल उनके लिए वह था जब चे ने उनके कविता संकलन कैंटो जनरल की प्रशंसा की और यह भी बताया कि रात में वह गुरिल्लाओं के बीच उसका पाठ करते हैं। यह सुनना किसी कवि के लिए सबसे उत्तेजक और गर्व से भरा क्षण हो सकता है। नेरुदा ने लिखा- ‘जब चे ने मेरी किताब कैंटो जनरल की तारीफ की तो मैं बहुत खुश हुआ। उन्होंने बताया कि वह रात में अपने गुरिल्लाओं के बीच उसका पाठ करते हैं। अब सालों बाद यह सोचकर मैं कांप जाता हूं कि मरते समय उनके पास मेरी कविताएं थीं। रेजिस द्रेबे ने मुझे बताया कि बोलविया के पर्वतों में उनके थैले में दो ही किताबें होती थीं- एक गणित की किताब और दूसरी कैंटो जनरल।’

नेरुदा की जीवनशैली में खास तरह का घुमंतूपन और खुलापन शामिल था। वह खुद को खुश मानने वाले और खुश रहने का अधिकार रखने वाले कवि के रूप में देखते थे। अक्सर ही उन्होंने उन आलोचकों का उपहास उड़ाया है जो मानते थे कि नेरुदा को अच्छी कविता लिखने के लिए यातना सहनी चाहिए। ऐसे लोगों की हिदायतों का मजाक उड़ाते हुए ही वह मजाकिया अंदाज में कहते थे कि इस हिसाब से तो पेट का दर्द और किडनी के रोग से ज्यादा महान कविता पैदा होनी चाहिए। नेरुदा लिखते हैं- ‘हम कवियों को खुश रहने का पूरा अधिकार है जब तक कि हम अपने देश के लोगों से प्रतिबद्ध हैं और उनकी खुशी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।’

नेरुदा ने भारत की स्वतंत्रता के बाद नेहरू से मुलाकात और उस मुलाकात से संबंधित कटु अनुभवों को भी उल्लेख किया है। 1950 में वह विश्वशांति के एक मिशन पर पेरिस से भारत आए थे जहां उन्हें हल्का सा भी अंदाजा न था कि उनके साथ कैसा बुरा बर्ताव होने वाला है। काफी बुरे अनुभव उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। भारत पहुंचते ही कस्टम अधिकारियों ने बड़े ही अशालीन तरीकों से उऩकी तालाशी ली। उनका पासपोर्ट, डायरी, पत्र और जूतों को लपेटने वाला अखबार तक जब्त कर लिया। उन्होंने किसी तरह चिलियन धैर्य से अपने को संभाला। नेहरू से जब दफ्तर में भेंट हुई तो वह बिना किसी मुस्कान के भावशून्य ढंग से मिले और ठंडी आंखों से घूरते रहे। आगे नेरुदा ने जवाहर लाल नेहरू के बारे में लिखा- ‘मुझे अचानक लगा कि मेरी उपस्थिति उनमें खास तरह की वितृष्णा जगा रही है। यह भी मुझे लगा कि पीतवर्ण का यह आदमी जरूर किसी बुरे शारीरिक, राजनीतिक या मानसिक अनुभव से गुजर रहा है। उन्हें देखकर लगता था कि उनमें ऊंचा होने, शक्तिशाली होने का गुमान था। ऐसा सख्त आदमी जो केवल आदेश देने का आदी है लेकिन नेता होने के गुण से वंचित है। मुझे याद आया कि उनके पिता पंडित मोतीलाल नेहरू एक मालदार जमींदार थे और उन्होंने न केवल अपनी राजनीतिक सूझबूझ से कांग्रेस आंदोलन की मदद की थी बल्कि धन से भी। मैंने सोचा कि मेरे सामने बैठा आदमी शायद फिर से अपनी जमींदारी की भूमिका में आ गया है और मुझे हिकारत से देख रहा है जैसे जमींदार अपने नंगे पांव किसान को देखता है।’ नेहरू के ठंडे और तटस्थ व्यवहार से नेरुदा इतने आहत हुए कि उन्होंने तत्काल भारत से चले जाने का निर्णय लिया। ताजमहल देखने की अपनी इच्छा को भी उन्होंने त्याग दिया और तुरंत हवाई अड्डे की ओर चल दिए।

नेरुदा के लेखन व जीवन, दोनों में ही यात्रीपन का भाव है। जितनी भी अन्य चीजों पर वे चर्चा करते हैं जैसे साहित्य, राजनीति, प्रकृति और संस्कृति सभी के बारे में उन्होंने यात्रा-वृत्तांत की शैली में लिखा है। दुनियाभर में घूमते या घूमकर लौटते नेरुदा को यह भी लगता था कि मनुष्य यदि एक स्थान पर न रहकर बहिर्गमन करता रहे तो उससे कुंठाएं भी पैदा होती हैं। यात्राएं रोमांचक होती हैं लेकिन लौटना अपने देश और प्रांत में चाहिए। नेरुदा भी चिले लौटते हैं और दुनिया में भटकने के संघर्षों से स्वयं को मुक्त करके चिले के संघर्षों में ही हिस्सा लेने लगते हैं। उनकी आंखों के सामने चिले को लूटा जा रहा है और उसकी खनिज संपदा के लिए पूरे देश को गुलाम बनाने की तैयारी चलती रहती है। उनके मित्र राष्ट्रपति अलांदे की हत्या कर दी गई क्योंकि उसने तांबे की संपदा का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। नेरुदा को दिख रहा था कि जो शक्तियां न्याय व जनतंत्र के विरोध में हैं उनके पास लफंगे, मसखरे, जोकर, पिस्तौल लिए आतंकवादी और नकली धर्मगुरु हर तरह के लोग थे। उनकी ताकत के आगे स्वप्नदर्शी लोगों का अंत लगभग निश्चित था। संस्मरणों की उनकी यह पुस्तक 1973 में अलांदे की हत्या के प्रकरण के साथ समाप्त होती है और उस हत्या के कुछ ही दिन बाद नेरुदा की भी रहस्यमय स्थितियों में मौत हो गई थी। नेरुदा के ये संस्मरण एक गतिशील और गहरी काव्यात्मक प्रतिभा वाले इंसान द्वारा पूरी बीसवीं सदी की उथलपुथल भरी दुनिया की तस्वीर हमारे आगे प्रस्तुत कर देते हैं। कहीं-कहीं यह अवश्य लगता है कि नेरुदा अपने अहं को मुख्य रूप से संतुष्ट कर रहे हैं और संपर्क में आने वालों की संपूर्ण छवि को सामने लाने के स्थान सुविधा के मुताबिक उनकी एकांगी तस्वीर पेश कर रहे हैं। यह भी लगता है कि वे राजनयिक वाली प्रतिभा का इस्तेमाल कर कवि और कविता के बारे में कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास से निराधार बातें कह रहे हैं। केवल उन आलोचकों का स्मरण कर रहे हैं जिन्होंने उनके बारे प्रशंसापूर्ण समीक्षाएं लिखीं और अन्य सभी के बारे में निराशा से भरे हुए हैं। इन सीमाओं के बावजूद संस्मरणों की यह पुस्तक नेरुदा जैसे कवि की रचना प्रक्रिया और दुनिया से बहुस्तरीय जुड़ाव से हमारा परिचय कराती हैं। नेरुदा के ही शब्दों में कहें तो- ‘मैंने अपनी कविता सभी के बीच रख दी है और उसके कारण मुझे लहूलुहान होना पड़ा है। उसकी यातना और गौरव दोनों का ही एहसास किया है।’

(लेखक हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक हैं।)

poet
poem
people's poet
Pablo Neruda
Chile
Chilean poet-diplomat and politician
Literature and society

Related Stories

स्मृति शेष: वह हारनेवाले कवि नहीं थे

मंगलेश डबराल नहीं रहे

सरकारी कार्यक्रम में सीएए विरोधी कविता पढ़ने के मामले में कवि और पत्रकार गिरफ़्तार

चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए...

गोरख पाण्डेय : रौशनी के औजारों के जीवंत शिल्पी

“तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले, अब तक कहाँ छिपे थे भाई...”

फ़हमीदा की ‘वसीयत’- “मुझे कोई सनद न देना दीनदारी की…”

"ज़र्द पत्तों का बन, अब मेरा देस है…"

इस ‘खोटे’ समय में एक ‘खरे’ कवि का जाना...


बाकी खबरें

  • Gauri Lankesh pansare
    डॉ मेघा पानसरे
    वे दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी या गौरी लंकेश को ख़ामोश नहीं कर सकते
    17 Feb 2022
    दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी को चाहे गोलियों से मार दिया गया हो, मगर उनके शब्द और उनके विचारों को कभी ख़ामोश नहीं किया जा सकता।
  • union budget
    टिकेंदर सिंह पंवार
    5,000 कस्बों और शहरों की समस्याओं का समाधान करने में केंद्रीय बजट फेल
    17 Feb 2022
    केंद्र सरकार लोगों को राहत देने की बजाय शहरीकरण के पिछले मॉडल को ही जारी रखना चाहती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में आज फिर 30 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 541 मरीज़ों की मौत
    17 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 30,757 नए मामले सामने आए है | देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 27 लाख 54 हज़ार 315 हो गयी है।
  • yogi
    एम.ओबैद
    यूपी चुनावः बिजली बिल माफ़ करने की घोषणा करने वाली BJP का, 5 साल का रिपोर्ट कार्ड कुछ और ही कहता है
    17 Feb 2022
    "पूरे देश में सबसे ज्यादा महंगी बिजली उत्तर प्रदेश की है। पिछले महीने मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) ने 50 प्रतिशत बिजली बिल कम करने का वादा किया था लेकिन अभी तक कुछ नहीं किया। ये बीजेपी के चुनावी वादे…
  • punjab
    रवि कौशल
    पंजाब चुनाव : पुलवामा के बाद भारत-पाक व्यापार के ठप हो जाने के संकट से जूझ रहे सीमावर्ती शहर  
    17 Feb 2022
    स्थानीय लोगों का कहना है कि पाकिस्तान के साथ व्यापार के ठप पड़ जाने से अमृतसर, गुरदासपुर और तरनतारन जैसे उन शहरों में बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी पैदा हो गयी है, जहां पहले हज़ारों कामगार,बतौर ट्रक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License