NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
वीवीपीएटी, तथाकथित आईएसआई समिति और वास्तविक दुनिया का गणित
अगर 21 विपक्षी दल वीवीपीएटी पर्चियों की गिनती करने के लिए कह रहे हैं, तो चुनाव आयोग के पास पर्याप्त कारण मौजूद हैं कि वह पर्चियों की गिनती करने की आवश्यकता को स्वीकार करे।
प्रबीर पुरकायस्थ
08 Apr 2019
Translated by महेश कुमार
वीवीपीएटी, तथाकथित आईएसआई समिति और वास्तविक दुनिया का गणित

सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में ईवीएम के साथ वीवीपीएटी के मिलान के विषय पर सुनवाई कर रहा है ताकि तय किया जा सके कि आख़िर कितने वीवीपीएटी पेपर की गिनती की जानी चाहिए। प्रमुख याचिका दायर करने वालों में विपक्ष की 21 पार्टियाँ शामिल हैं जो वीवीपैट मिलान के साथ 50 प्रतिशत की गिनती की मांग कर रही हैं। न्यायालय की अंतिम सुनवाई वाले दिन, चुनाव आयोग ने वीवीपैट प्रभाग के प्रभारी उप चुनाव आयुक्त सुदीप जैन के ज़रिये न्यायालय को एक रिपोर्ट सौंपी है। इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (आईएसआई) नामक इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 479 बेतरतीब (रैंडम) ढंग से चुने गए बूथों में 99.99 प्रतिशत स्तर का मिलान किया गया है जिसमें किसी भी गड़बड़ी की कोई गुंजाइश से इंकार किया गया है। यह देखते हुए कि चुनाव आयोग संसदीय चुनावों में 479 में नहीं बल्कि उससे अधिक बूथों की गणना करता है, यह निष्कर्ष निकालना कि एक विधानसभा में ईवीएम की गिनती से वीवीपीएटी पेपर के मिलान से चुनाव की अखंडता स्थापित हो जाएगी यह पर्याप्त नहीं है।

इससे पहले कि हम आईएसआई के प्रोफ़ेसरों द्वारा किए गए गणित में जाएँ, आईएसआई समिति की निष्पक्षता की जांच करना महत्वपूर्ण है। क्या इसे गणित पर निष्पक्ष दृष्टिकोण सुनिश्चित करने के लिए स्थापित किया गया था? चुनाव आयोग ने क्या पहले से ही निर्णय लिया हुआ था? अब यह संकेत मिल रहा है कि यह "समिति" सुदीप जैन द्वारा स्थापित की गई थी – वह भी एक पत्र लिखकर, पत्र आईएसआई के निदेशक को नहीं, बल्कि प्रो. भट को लिखा गया जो दिल्ली इकाई के प्रमुख हैं, पत्र "आयोग के साथ जुड़ने का निमंत्रण देते हुए ऊपर वर्णित मुद्दों को हल करने की दिशा में सहयोग करने के लिए कहता है ..."। इस पत्र में कहीं भी आईएसआई को आईएसआई समिति बनाने के लिए नहीं कहा; इसने मुद्दे की जांच में चुनाव आयोग का सहयोग करने के लिए आईएसआई के दिल्ली केंद्र के प्रमुख प्रोफ़ेसर भट से सवाल किया।

एक आरटीआई रिपोर्ट (इस लेख के साथ संलग्न है) से पता चलता है कि आईएसआई को मिला यह पत्र प्रो. भट को संबोधित है, लेकिन आईएसआई के पास “समिति” के गठन करने के लिए उठाए गए किसी भी क़दम का कोई भी रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफ़मे में सुदीप जैन ने दावा किया है। आईएसआई बाहरी काम के लिए एक प्रक्रिया से चलता है (संलग्न) कि ज़ाहिर है, इसका पालन नहीं किया गया था। तथाकथित आईएसआई रिपोर्ट में, या अधिक सही ढंग से कहें तो भट समिति की रिपोर्ट को सुदीप जैन ने अदालत में अपने हलफ़नामे के ज़रिये प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस समिति में, चेन्नई गणित संस्थान (सीएमआई) के राजीव ए करंदीकर और केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) के ओंकार प्रसाद घोष को भट समिति में शामिल किया गया था - प्रारंभ में, चुनाव आयोग को भट के पत्र के अनुसार, राजीव ए करंदिकर को चुनाव आयोग के साथ चर्चा के बाद समिति में शामिल किया गया था। फिर, इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि आईएसआई इस प्रक्रिया में कैसे शामिल हुआ। बाद में, ओंकार प्रसाद घोष को राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन द्वारा भट समिति में नामित किया गया था। फिर, इसका कोई उल्लेख नहीं है कि किसने एनएसएसओ को भट समिति के लिए सदस्य नामित करने के लिए कहा – प्रो. भट, चुनाव आयोग या आईएसआई ने। निकाय की संरचना दर्शाती है यह फ़ैसला चुनाव आयुक्तों ने और प्रो. भट ने बिना आईएसआई को शामिल किए निजी निर्णय के तौर पर लिया था। तब तो निकाय को एक निजी समिति के रूप में माना जाना चाहिए जो आईएसआई की विश्वसनीयता का गला घोट रही है। यदि

इस प्रक्रिया को एक वैध प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो आईएसआई का कोई भी प्रोफ़ेसर आईएसआई के प्रमुख का हवाला दिए बिना, आईएसआई समिति का गठन कर सकता है, जो इसके निदेशक हैं; और आईएसआई के भीतर किसी भी अनुमोदित प्रक्रिया के संदर्भ के बिना भी ऐसा कर सकता है।
रिपोर्ट के साथ दूसरा मुद्दा यह है कि निश्चित रूप से, यह गणित है। कई मुद्दे हैं, लेकिन प्रमुख मुद्दा यह है कि रिपोर्ट का मानना है कि पूरा चुनाव एक चुनाव है न कि विभिन्न संसदीय सीटों के लिए चुनाव। यदि यह एक चुनाव है, तो बूथ के रैंडम चयन की प्रक्रिया प्रत्येक विधानसभा में एक बूथ नहीं हो सकती है, बल्कि हर विधानसभा के सभी 479 बूथों का मिलान करने के लिए सभी बूथों का रैंडम चयन होना चाहिए। वैसे भी किसी भी मामले में आप देखें तो भारत का चुनाव राष्ट्रपति चुनाव नहीं है, इसलिए इसे एक घटना नहीं माना जा सकता है; यह वास्तव में 543 निर्वाचन क्षेत्रों में से प्रत्येक में अपने अलग-अलग उम्मीदवारों और अलग पार्टियों का एक स्वतंत्र चुनाव है। 7 सप्ताह की प्रक्रिया में लगभग 543 स्वतंत्र चुनाव के आयोजन होते हैं, सभी में 543 अलग-अलग उम्मीदवारों का चुनाव होता है।

अगर हम भट समिति की कार्यप्रणाली को सही मानते हैं – सिवाए 542 को अलग-अलग कार्यक्रम मानने के – हर सीट के लिए जो संख्या चाहिए यहाँ तक कि भट समिति की विधि के अनुसार, वह काफ़ी ऊँची संख्या होगी।
भट समिति की रिपोर्ट के साथ अन्य गंभीर समस्या यह है कि इसने यह भी ध्यान नहीं रखा कि सीट के आधार पर चुनाव एकतरफ़ा भी हो सकते हैं। इसलिए ई.वी.एम. साथ वीवीपीएटी की पर्चियों का मिलान करना बहुत अधिक ज़रूरी है, उदाहरण के लिए दो शीर्ष उम्मीदवारों के बीच का अंतर सौ वोट के क़रीब होता है जबकि लोकसभा क्षेत्र में ये अंतर लाख तक का हो सकता है। अमेरिका में, मतपत्रों को कंप्यूटर द्वारा वैकल्पिक रूप से स्कैन किया जाता है और उनका मिलान भी किया जाता है, यदि चुनाव लड़ाई क़रीब है तो मतपत्रों की मैन्युअल गिनती भी होती है।
गणितज्ञों के साथ समस्या ये है कि- वे वास्तविक दुनिया से प्रभावित नहीं हैं – उन्हें "प्लेटोनिक ब्रह्मांड"  से आगे कुछ समझ नहीं आता है - जो एक गणितीय स्थान है जिसका वास्तविक दुनिया से कोई लेना देना नहीं है। वे ऐसी दुनिया में रहते हैं जिस दुनिया का हमारे जैसे प्राणियों से कोई नाता नहीं है। और जब तक हम राजनीति की दुनिया को इसका हिस्सा नहीं बनाते, ये गणितीय अभ्यास वीडियो गेम के बराबर होगा।
विख्यात सुरक्षा विशेषज्ञ ब्रूस शेनियर (चुनाव उम्मीदवार, 20 अप्रैल, 2018, (https://www.schneier.com) ने इस समस्या के बारे में अच्छी तरह से बताया है:
“चुनाव दो उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। पहला, और स्पष्ट उद्देश्य, विजेता को सही ढंग से चुनना है। लेकिन दूसरा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है: हारने वाले को समझाना कि वह चुनाव क्यों हारा है। चुंकि काफ़ी हद तक चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता और जांच (ऑडिट) योग्य नहीं है, यह अपने उस दूसरे उद्देश्य में विफ़ल रहती है।"
चुनावों की अखंडता और निष्पक्षता को साबित करने के लिए और चुनावों के प्रति लोगों में विश्वास पैदा करने के लिए वीवीपीएटी का मिलान करना अति आवश्यक है। अगर 21 विपक्षी दल वीवीपीएटी पर्चियों के मिलान के लिए कह रहे हैं, तो चुनाव आयोग के पास पर्याप्त कारण है कि वह पर्चियों के मिलान करने की आवश्यकता को स्वीकार करे। लेकिन चुनाव जिस झूठी प्रतिष्ठा का गाना गा रहा है और प्रतिकूल परिस्थितियों में जिस तरह का अभिनय कर रहा है उससे चुनाव आयोग की साख दांव पर लग गयी है। चुनावों के संबंध में चुनाव आयोग को केंद्रीय बिंदु पर सोचना चाहिए: न्याय करना ही पर्याप्त नहीं है, लेकिन न्याय होते हुए दिखाई भी देना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न है।

Indian Statistical Institute - RTI response by Newsclick on Scribd

Indian Statistical Institute - Office Order D.O./2016/382 by Newsclick on Scribd

vvpat
EVMs and VVPATs
election commission
Bhat Committee
Supreme Court
Indian Statistical Institute

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • Women Hold Up More Than Half the Sky
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    महिलाएँ आधे से ज़्यादा आसमान की मालिक हैं
    19 Oct 2021
    हाल ही में जारी हुए श्रम बल सर्वेक्षण पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 73.2% महिला श्रमिक कृषि क्षेत्र में काम करती हैं; वे किसान हैं, खेत मज़दूर हैं और कारीगर हैं।
  • Vinayak Damodar Savarkar
    डॉ. राजू पाण्डेय
    बहस: क्या स्वाधीनता संग्राम को गति देने के लिए सावरकर जेल से बाहर आना चाहते थे?
    19 Oct 2021
    बार-बार यह संकेत मिलता है कि क्षमादान हेतु लिखी गई याचिकाओं में जो कुछ सावरकर ने लिखा था वह शायद किसी रणनीति का हिस्सा नहीं था अपितु इन माफ़ीनामों में लिखी बातों पर उन्होंने लगभग अक्षरशः अमल भी किया।
  • Pulses
    शंभूनाथ शुक्ल
    ‘अच्छे दिन’ की तलाश में, थाली से लापता हुई ‘दाल’
    19 Oct 2021
    बारिश के चलते अचानक सब्ज़ियों के दाम बढ़ गए हैं। हर वर्ष जाड़ा शुरू होते ही सब्ज़ियों के दाम गिरने लगते थे किंतु इस वर्ष प्याज़ और टमाटर अस्सी रुपए पार कर गए हैं। खाने के तेल और दालें पहले से ही…
  • migrant worker
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की हत्या के ख़िलाफ़ 20 अक्टूबर को बिहार में विरोध प्रदर्शन
    19 Oct 2021
    "अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद घाटी की स्थिति और खराब हुई है। इससे अविश्वास का माहौल कायम हुआ है, इसलिए इन हत्याओं की जिम्मेवारी सीधे केंद्र सरकार की बनती है।”
  • Non local laborers waiting for train inside railwaysation Nowgam
    अनीस ज़रगर
    कश्मीर में हुई हत्याओं की वजह से दहशत का माहौल, प्रवासी श्रमिक कर रहे हैं पलायन
    19 Oct 2021
    30 से अधिक हत्याओं की रिपोर्ट के चलते अक्टूबर का महीना सबसे ख़राब गुज़रा है, जिसमें 12 नागरिकों की हत्या शामिल हैं, जिनमें से कम से कम 11 को आतंकवादियों ने क़रीबी टारगेट के तौर पर मारा है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License