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अगर हम 2030 तक प्राकृतिक दुनिया के 30% को संरक्षित नहीं करते, तो रहने लायक नहीं बचेगी दुनिया
हमें मानव इतिहास के सबसे बड़े विलुप्तिकरण के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा। लेकिन अगर हम कुछ आपात कदम उठाते हैं, तो इसका हल निकल सकता है।
लेनॉर्ड लोकी
25 May 2021
अगर हम 2030 तक प्राकृतिक दुनिया के 30% को संरक्षित नहीं करते, तो रहने लायक नहीं बचेगी दुनिया

प्राकृतिक दुनिया संकटग्रस्त है और इसके लिए हम ज़िम्मेदार हैं। हम छठवें विलुप्तिकरण के बीच में है। यह मानव इतिहास में प्रजातियों का सबसे बड़ा नुकसान है। बहुत सारी प्रजातियां पूरी तरह विलुप्त होने की कगार पर हैं। मीठे जल की 33% प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। वहीं 40% उभयचर, 84% बड़े स्तनधारी, 33% भित्तियां बनाने वाली प्रवाल और 33% ओक के पेड़ भी ख़त्म होने की स्थिति में हैं। गैंडों और हाथियों का इतना शिकार हो रहा है कि 2034 तक उनकी प्रजाति विलुप्त हो सकती है। मैक्सिको की कैलिफोर्निया खाड़ी में गैरकानूनी मछली के जाले लगाकर शिकार करने, कीटनाशकों और सिंचाई से कम से कम 10 स्थानीय बीमारियां फैली हैं। हमारे जीवनकाल में ही 1,30,000 पौधों की प्रजातियां खत्म हो सकती हैं। कुलमिलाकर पूरी पृथ्वी के 28 फ़ीसदी विकसित पौधे और जानवरों की प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।

हाल के सालों में प्रजातियों की संख्या में तेजी से कमी आई है; हमारे ग्रह की 60 फ़ीसदी वन्यजीव आबादी पिछले 50 सालों में ख़त्म हो चुकी है। वैज्ञानिक चेतावनी देते हुए कहते हैं कि आने वाले दशकों में अगर हमने सही कदम नहीं उठाए, तो 10 लाख से ज़्यादा प्रजातियां पृथ्वी से हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं।

हमारे खाने, कपड़े और दवाइयों के लिए हमारी पृथ्वी की साथी चीजों का बहुत ज़्यादा शोषण हो रहा है। ज़्यादा शिकार हो रहा है, ज़्यादा कृषि की जा रही है। फिर जिन लोगों को हम मारते नहीं हैं, उनका रहवास स्थल, हमारे शहरों, खेतों की जगह बनाने और मानव समाज के लिए ईंधन, खनिज, लकड़ी और दूसरे संसाधन निकालने में नष्ट हो रहा है। फिर जिस आवास को हम ख़त्म नहीं करते, उसे हम कीटनाशकों, प्लास्टिक, कार्बन डॉइऑक्साइड, रसायनों जैसे ज़हरीले पदार्थों से प्रदूषित कर देते हैं। हम लोग अपने प्रकाश और शोरगुल से भी वन्यजीवों के आवासों को प्रदूषित कर रहे हैं। वैज्ञानिकों को डर है कि अभी और भी बदतर स्थिति आनी बाकी है। "इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर" चेतावनी देते हुए कहती है कि जैसे-जैसे इंसानी आबादी बढ़ती जाएगी, वैश्विक विलुप्ति का संकट गहराता जाएगा। पॉपुलेशन रिफ्रेंस ब्यूरों के मुताबिक 2050 तक दुनिया की आबादी 9.9 अरब हो जाएगी। यह मौजूदा 7.9 अरब लोगों से 25 फ़ीसदी ज़्यादा है। स्वाभाविक है कि दूसरी प्रजातियां तब विलुप्त हो जाएँगी।

जैव विविधता सिर्फ़ अच्छा महसूस करने के लिए जरूरी नहीं है। यह स्वास्थ्य और हमारे ग्रह के पर्यावरणतंत्र को बनाए रखने के लिए भी जरूरी है। यही पर्यावरणतंत्र इंसानी स्वास्थ्य के लिए जरूरी होता है। अरबों लोगों को आजीविका और दवाइयां उपलब्ध कराने के साथ-साथ जैव विविधता पृथ्वी के बुनियादी तत्वों, जैसे- साफ़ पानी, साफ़ हवा और फ़सलों के परागण के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरकता, अपशिष्ट निम्नीकरण और प्राकृतिक संकटों से उबरने के लिए भी जरूरी है।

क्रिटिकल इकोसिस्टम पार्टनरशिप फंड में संचार निदेशक जूली शॉ कहती हैं, "चाहे अमेजॉन के जंगलों में कोई गांव हो या बीजिंग जैसा कोई बड़ा शहर, इंसान हमेशा पर्यावरणतंत्र द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं पर निर्भर रहता है।" क्रिटिकल इकोसिस्टम पार्टनरशिप फंड, फ्रेंच डिवेल्पमेंट एजेंसी, कंजर्वेशन इंटरनेशनल, यूरोपीय संघ, ग्लोबल एनवॉयरनमेंट फेसिलिटी, जापान सरकार और विश्व बैंक का साझा उपक्रम है। शॉ कहती हैं, "जैव विविधता कम होने से कमज़ोर हुआ पर्यावरणतंत्र इंसान के लिए जरूरी सेवाओं को बमुश्किल ही पूरा कर पाएगा। खासकर तब, जब इंसानी आबादी लगातार बढ़ रही है।"

जैव विविधता का बड़ा आर्थिक फायदा भी है। 3 दशक पहले 193 देशों द्वारा हस्ताक्षरित संधि, जैव विविधता पर अधिसमय (CBD) बताती है, "वैश्विक अर्थव्यवस्था का कम से कम 40 फ़ीसदी हिस्सा और गरीबों की जरूरत का 80 फ़ीसदी हिस्सा जैव संसाधनों से उपलब्ध होता है।"

द गार्डियन के पर्यावरण संपादक डेमियन कैरिंगटन लिखते हैं कि "पर्यावरण सेवाओं की कीमत का अनुमान खरबों डॉलर में है। यह वैश्विक जीडीपी का दोगुना है। यूरोप में जैव विविधता का जितना नुकसान हुआ है, वह पूरे महाद्वीप की अर्थव्यवस्था को हर साल कुल जीडीपी के 3 फ़ीसदी (546 मिलियन डॉलर) का नुकसान पहुंचाता है।"

तो लगातार ख़त्म होती प्रजातियों को बचाने और दुनिया की जैव विविधता की सुरक्षा करने के लिए क्या किया जाना चाहिए? अप्रैल 2019 में 19 ख्यात वैज्ञानिकों के एक समूह ने जब "ग्लोबल डील फॉर नेचर" (GDN) प्रकाशित किया, तो उन्होंने इसी सवाल का जवाब दिया। GDN में एक "निश्चित समय में जैव विविधता और पृथ्वी पर जीवन की बहुतायत को बचाने" की योजना थी। जब GDN को पेरिस मौसम समझौते के साथ जोड़ा गया, तो इसका मक़सद "भयावह तरीके से नुकसानदेह मौसम परिवर्तन से बचना, प्रजातियों का संरक्षण और अनिवार्य पर्यावरणीय सेवाओं को सुरक्षित रखना" बताया गया। GDN के लक्ष्य- "ज़्यादा जीने लायक पर्यावरणतंत्र की सुरक्षा" को हासिल करने के लिए "30X30" प्रस्ताव बनाया गया। मतलब पृथ्वी के 30 फ़ीसदी हिस्से को 2030 तक उसकी प्राकृतिक अवस्था में संरक्षित रखना है। यह विचार अब आगे बढ़ चुका है, इसमें 50 देश शामिल हैं। इनका नेतृत्व कोस्टारिका, फ्रांस और ब्रिटेन कर रहे हैं।

कोस्टारिका की पर्यावरण मंत्री एंड्रिया मेजा कहती हैं, "पृथ्वी के 30 फ़ीसदी हिस्से को संरक्षित रखने से निश्चित तौर पर हमारे नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता बढ़ेगी और इससे हमें कार्बन रहित, निष्पक्ष और धैर्यवान समाज का निर्माण करने में मदद मिलेगी।" वह आगे कहती हैं, "प्रकृति का उपचार और उसे पुरानी स्थिति में दोबारा लाने से ही मानव का कल्याण निश्चित हो सकता है, इससे लाखों हरित नौकरियां पैद होंगी और 2030 का एजेंडा पूरा होगा।"

गैर सरकारी संगठन भी इस मुद्दे पर सजग हुए हैं। वाशिंगटन डीसी स्थित एक निजी सेवार्थ संगठन WYSS फाउंडेशन ने नेशनल जियोग्राफिक के साथ मिलकर WYSS कैंपेन फॉर नेचर चलाने का ऐलान किया है। 1 अरब डॉलर के निवेश वाले इस कैंपेन से तमाम देशों, समुदायों और स्थानीय लोगों की मदद की जाएगी। ताकि 30X30 के लक्ष्यों को पाने में मदद मिले। कैंपेन ने एक सार्वजनिक याचिका शुरू की है, जिसमें उन पर्यावरण तंत्रों को बचाने की कार्रवाई शुरू करने की अपील की गई है, जो मानवीय विस्तार से अभी तक पूरी तरह बर्बाद नहीं हुए हैं। कैंपेन कहता है, "2030 तक पूरी पृथ्वी के 30 फ़ीसदी हिस्से का संरक्षण एक महत्वकांक्षी, पर हासिल किए जा सकने लायक लक्ष्य है। इसे हासिल करने के लिए सभी देशों को इस लक्ष्य को मान्यता देनी होगी और इसमें सहयोग करना होगा। स्थानीय लोगों के अधिकारों को सम्मान दिया जाना चाहिए और संरक्षण के प्रयासों को पूरी तरह वित्तपोषित किया जाना चाहिए।"

सेंटर फॉर बॉयोलॉजिकल डाइवर्सिटी के मुताबिक़, "अमेरिका ने CBD पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लेकिन राष्ट्रपति बाइडेन जैव विविधता के विलुप्तिकरण को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर एकतरफा कार्रवाई भी कर सकते हैं।" एरिजोना के टकसन में संरक्षण का काम करने वाले इस गैरलाभकारी संगठन ने एक सार्वजनिक याचिका चलाई है, जिसमें जैव विविधता की विलुप्ति को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का अहम और ताकतवर कदम उठाने की मांग की गई है। समूह का कहना है कि ऐसा करने से अमेरिका और विश्व में पशुओं और पौधों का नुकसान रोकने के लिए अहम राष्ट्रपति की शक्तियां खुल जाएंगी।"

बाइडेन की घोषणा से हजारों प्रजातियों के संरक्षण के लिए जरूरी अमेरिका के संघीय संसाधन उपलब्ध हो जाएंगे। इन प्रजातियों में मोनार्क तितली, पूर्वी गोफर कछुआ और उत्तरी धब्बेदार उल्लू भी शामिल हैं, जो अब भी "एंडेंजर्ड स्पेशीज़ एक्ट" के तहत सुरक्षा मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं। इन कदमों के तहत सभी संघीय एजेंसियों को वन्यजीव शोषण के क्षेत्र में मोड़ना, संघीय ज़मीन पर मौजूद संकटग्रस्त वन्यजीव रहवास का संरक्षण और अमेरिका के आर्थिक प्रभाव का इस्तेमाल कर दुनियाभर में वन्यजीव रहवास क्षेत्र का निजी क्षेत्र द्वारा की जाने वाली जंगलों की कटाई और पर्यावरणीय नुकसान से बचाव शामिल है।

अच्छी बात यह रही कि 30X30 दृष्टिकोण को वास्तविकता बनाने पर कई देशों का ध्यान है। जब अक्टूबर में चीन में CBD में शामिल पक्षों का 15वां सम्मेलन होगा, तो संभावना है कि प्रतिनिधि वहां एक मजबूत बहुपक्षीय प्रतबिद्धता पारित करवा पाएंगे। इसमें वैश्विक ढांचे के मौजूदा "शून्य मसौदे" के संरक्षण कार्यों में 30X30 की योजना को लक्ष्य बनवाना है।

सेंटर फॉर बॉयोलॉजिकल डॉइवर्सिटी में वरिष्ठ वैज्ञानिक टिएरा करी कहती हैं, "हर घंटे एक प्रजाति विलुप्त हो रही है, लेकिन विलुप्त होने की इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है। हम निवेश और राजनीतिक इच्छाशक्ति के ज़रिए इसे रोक सकते हैं। हमें बहानेबाजी बंद करनी होगी और पृथ्वी पर जिंदगी को बचाने के लिए बड़े नीतिगत कदम उठाने होंगे।"

रेनॉर्ड लोकी, इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट में राइटिंग फैलो हैं, जहां वे "Earth | Food | Life" के संपादक और मुख्य संवाददाता के तौर पर अपनी सेवाएं देते हैं। इससे पहले लोकी आल्टरनेट में पर्यावरण, खाद्यान्न और पशु अधिकार संपादक रह चुके हैं। लोकी, CSR (कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिल्टी) और सतत विकास पर काम करते हुए जस्टमीन्स/3BL में रिपोर्टर भी रह चुके हैं। लोकी को फिल्टबाय द्वारा चयनित, उन 50 स्वास्थ्य और पर्यावरण पत्रकारों में शामिल किया गया था, 2016 में जिनको पढ़ा जा सकता था। लोकी का काम, यस मैगजीन, सेलॉन, ट्रुथआउट, बिलमोयर्स.कॉम, काउंटरपंच, इकोवॉच और ट्रुथडिग के साथ-साथ अन्य जगह प्रकाशित हो चुका है।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

If We Don’t Protect 30% of the Natural World by 2030, Earth May Be Unfit for Life

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