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भारत
राजनीति
वेलफेयर बोर्ड के पास जमा ₹4,000 करोड़, मगर निर्माण मज़दूरों को नहीं मिल रहा लाभ
इस क्षेत्र की अनौपचारिक प्रकृति के कारण कंस्ट्रक्शन के काम से जुड़े मज़दूरों में वित्तीय सुरक्षा का अभाव है।
श्रुति एमडी
27 Oct 2021
Translated by महेश कुमार
निर्माण मज़दूरों को नहीं मिल रहा लाभ

तमिलनाडु की कंस्ट्रक्शन वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (CWFI) ने 20 अक्टूबर को राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शनों के जरिए, पेंशन को 1,000 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये करने, कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के मामले में परिवार को 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दिए जाने और पर्याप्त दुर्घटना कवर की मांग की है।  

निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड (सीडब्ल्यूडब्ल्यूबी) ने मौद्रिक लाभों की एक सूची का मसौदा सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर तैयार किया था और 2019 में राज्य सरकार को प्रस्ताव के तौर पर भेजा था। निर्माण श्रमिक इस बात से नाराज हैं कि न तो पूर्व अन्नाद्रमुक सरकार और न ही सत्तारूढ़ द्रमुक गठबंधन ने बोर्ड के प्रस्ताव पर ध्यान दिया है। वर्तमान में मिल रहे सभी लाभों को मामूली बताते हुए श्रमिकों ने कहा कि क्षेत्र की अनौपचारिक प्रकृति के कारण उनके पास वित्तीय सुरक्षा नहीं है और इसलिए वे पर्याप्त सहायता की मांग कर रहे हैं। 

श्रमिकों की मांग

राज्य सरकार को संबोधित करते हुए, कंस्ट्रक्शन वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (CWFI) ने कल्याण बोर्ड के सुझावों के अनुरूप मांगों का एक चार्टर जारी किया है। 60 वर्ष से अधिक आयु और राज्य सरकार के साथ पंजीकृत कोई भी व्यक्ति 1,000 रुपये की पेंशन का हकदार है। इस बाबत कंस्ट्रक्शन वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (CWFI) ने पेंशन राशि को बढ़ाकर 3,000 रुपये करने की मांग की है। फेडरेशन ने 55 वर्ष या उससे अधिक की महिला निर्माण श्रमिकों की पेंशन और मृत निर्माण श्रमिकों की पत्नियों के लिए उनकी मृत्यु के दिन से विधवा पेंशन की भी मांग की है।

बोर्ड द्वारा प्रस्तावित और यूनियन द्वारा की गई मांगों में, निर्माण श्रमिकों के बच्चों की कक्षा I से आगे की शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना और उनकी पत्नियों को मातृत्व लाभ देना कुछ अन्य मौद्रिक संबंधित मांग शामिल थी। उन्होंने दिवाली से पहले त्योहार संबंधित बोनस की भी मांग की है।

श्रमिकों ने सीडब्ल्यूडब्ल्यूबी में पंजीकरण की प्रक्रिया को आसान बनाने की भी मांग की है। यूनियन का कहना है कि "ओटीपी और आधार को अनिवार्य बनाना निरस्त किया जाना चाहिए," सीडब्ल्यूएफआई पैम्फलेट में ऑफ़लाइन पंजीकरण जारी रखने पर जोर दिया गया है।

राज्य सरकार क्यों हिचकिचा रही है?

कंस्ट्रक्शन वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया का कहना है कि हालांकि सीडब्ल्यूडब्ल्यूबी के पास 4,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है, लेकिन राज्य सरकार फिर भी उसके प्रस्तावों को स्वीकार नहीं कर रही है।

यह पूछे जाने पर कि सरकार श्रमिकों को मांगी गई मदद प्रदान करने में संकोच क्यों कर रही है, तो राज्य के सीडब्ल्यूएफआई के अध्यक्ष पेरुमल ने न्यूज़क्लिक को बताया कि, "सुप्रीम कोर्ट के निर्देश ने निर्माण श्रमिकों के प्रति समग्र मौद्रिक लाभ बढ़ाने को अनिवार्य बना दिया है। राज्य सरकार ने बोर्ड के पास धन की उपलब्धता के बावजूद अदालत के आदेश को लागू नहीं किया है।

मौद्रिक लाभ की अपनी मांग का समर्थन करते हुए, पेरुमल ने कहा कि, “श्रमिक, बोर्ड से वित्तीय सहायता की मांग कर रहे हैं, जिसके पास सेस यानि उपकार फंड है, और उसे किसी सरकारी खजाने से नहीं दिया जाना है। सरकार कल्याण बोर्ड के धन का इस्तेमाल अन्य उद्देश्यों के लिए नहीं कर सकती है।”

भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार और सेवा की शर्तों के विनियमन) अधिनियम और भवन और अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम 1996 में निर्माण श्रमिकों के सामने आने वाले मुद्दों को हल करने के लिए उक्त कानून या अधिनियम को लागू किया गया था। ये अधिनियम प्रत्येक राज्य में एक निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड की स्थापना को अनिवार्य बनाते  है जिसमें श्रमिकों, नियोक्ताओं और सरकार के प्रतिनिधित्व शामिल होते हैं।

निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड (सीडब्ल्यूडब्ल्यूबी) को राज्य के सभी निर्माण श्रमिकों को पंजीकृत करना चाहिए और विभिन्न योजनाओं, उपायों या सुविधाओं के माध्यम से उनके कल्याण को बढ़ावा देना चाहिए। हालांकि, बोर्ड राज्य सरकार के सामने अपने खुद के प्रस्तावों को आगे बढ़ाने में असमर्थ रहा है।

सीडब्ल्यूएफआई के राज्य स्तरीय नेता नटराजन ने बताया कि, 'सरकार इस बात से चिंतित है कि अगर निर्माण श्रमिकों को उक्त मदद मुहैया करा दी जाती है तो अन्य सेक्टर भी इस किस्म मांगें उठाएंगे।

वित्तीय सुरक्षा की ज़रूरत 

राज्यव्यापी आंदोलन के दो दिनों के भीतर, तमिलनाडु सरकार ने कक्षा 6 के बाद पढ़ाई करने वाले छात्रों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का आदेश जारी कर दिया है, हालांकि मांग कक्षा 1 की पढ़ाई के बाद मदद देने की थी।

पेरुमल ने कहा कि, 'कर्नाटक तमिलनाडु से बेहतर काम कर रहा है। निर्माण श्रमिकों के बच्चों को उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए दसियों हजार रुपये प्रदान किए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि निर्माण श्रमिकों को वित्तीय सहायता कल्याण बोर्डों द्वारा दी जानी चाहिए न कि सरकारी फंड से। पड़ोसी पांडिचेरी, कर्नाटक और केरल अपने निर्माण श्रमिकों को त्योहार बोनस और बेहतर धन प्रदान करते हैं और उनके बच्चों की शिक्षा के लिए अधिक वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं। तमिलनाडु को ऐसा करने से कौन रोकता है?”

पेरुमल ने कहा, कल्याण बोर्ड "निर्माण श्रमिकों की सुरक्षा का एकमात्र तंत्र है, जो अनौपचारिक क्षेत्र में मवेशियों की तरह धकियाए जाते हैं, इसलिए सरकार को हमारी मांगों को लागू करना चाहिए।"

नटराजन ने कहा कि चूंकि निर्माण में अत्यधिक श्रम शामिल है, इसलिए श्रमिकों का स्वास्थ्य सेवानिवृत्ति से बहुत पहले ही बुरी तरह प्रभावित होता है। ये मौद्रिक लाभ उनके लिए आशा की एकमात्र किरण हैं।”

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