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किसानों के विरोध से भारतीय विपक्ष को क्या लाभ हासिल हो सकता है?
किसानों ने अपने विरोध करने के नैतिक अधिकार को स्थापित कर लिया है - ऐसे में वर्तमान शासन बहुसंख्यकवाद को थोपने की जुगत में जुट सकता है।
अजय गुदावर्ती
15 Dec 2020
किसानों के विरोध से भारतीय विपक्ष को क्या लाभ हासिल हो सकता है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैशाचिक शासनकाल के छह वर्षों की अवधि के दौरान अनेकों विरोध प्रदर्शन फूटे थे, इनमें वे शामिल हैं जिन्हें छात्रों द्वारा आयोजित नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 और दलितों के प्रश्नों को लेकर विरोध प्रदर्शन शामिल थे। इन प्रत्येक विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ वर्तमान शासन द्वारा बेहद आक्रामक काउंटर-नैरेटिव को चलाया गया। उदहारण के लिए छात्रों की तुलना देश-द्रोहियों, सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों की तुलना “जिहादियों” और भीमा-कोरेगाँव में दलितों को माओवादी करार दिया गया।

यह निश्चित कर पाना बेहद मुश्किल है कि क्या ये काउंटर-नैरेटिव नागरिकों को समझा पाने में कामयाब रहे या नहीं, लेकिन यह लोगों के बीच में संदेह और चिंता के बीज बोने और विरोध में शामिल लोगों की नैतिक वैधता को सीमित करने में सफल रहा, जिससे कि वे अपनी स्वयं की तात्कालिक समस्याओं से परे जाकर प्रतिनिधित्व नहीं कर पाने की स्थिति में नहीं रह पाए। लेकिन अब यह पहली बार है, जब किसानों के विरोध ने मोदी शासन के खिलाफ हालात को पूरी तरह से उलट कर रख दिया है। शासन ने एक बार फिर से अपनी उसी पुरानी चाल को दोहराने की कोशिश करते हुए किसानों पर खालिस्तानी होने का लेबल चिपकाने की कोशिश की, लेकिन किसानों के शांत और स्थिरचित्त होकर अपनी मांगों पर अड़े रहने से इससे शायद ही कोई लाभ हासिल हुआ हो। किसान न सिर्फ अपने तात्कालिक दुश्चिंता के तौर पर नए कृषि कानूनों को निरस्त किये जाने की माँग कर रहे हैं, बल्कि वे कॉर्पोरेट समर्थक “विकास” के मॉडल के विपरीत दिशा में नीतियों को चलाने के समर्थक हैं, जिसे बड़ी बेशर्मी के साथ अमल में लाया जा रहा था। आज जिन दुश्चिंताओं में घिरे हुए हैं, उनमें किसानों की माँगों से कहीं अधिक चिंता शासन के इरादे को लेकर बनी हुई है।

किसानों द्वारा विरोध करने के जो तरीके अपनाए गए हैं उनमें राजनीतिक बंदियों, छात्रों, शिक्षा पर बढ़ती लागत और विरोध प्रदर्शनों को सख्ती से कुचलने के लिए निर्मित आम माहौल को लेकर उनकी चिंता के इजहार ने उनके नैतिक सच्चाई को बल देने का काम किया है। ऐसे में उनका यह विरोध, राजनीतिक कम और खुद के जीवन-निर्वाह को लेकर कहीं ज्यादा नजर आता है: यह भोजन की बुनियादी जरूरत से उभरकर निकलता देखा जा सकता है, जो समाज के सभी वर्गों को प्रभावित करता है। भारत में दशकों से चल रहे कृषि संकट को देखते हुए, यह संभावना भी प्रतीत नहीं होती है कि किसानों के पास अपनी वास्तविक मांगों के अलावा भी कोई “छुपा” मकसद हो सकता है। इसके अलावा किसानों के पास अपने ग्रामीण जड़ों से जुड़े होने के कारण तुलनात्मक तौर पर उन लोगों से कहीं ज्यादा नैतिक बल है, जो हाई-टेक तरीकों को अपनाने की बातें करते हैं। इन कारकों के संयोजन ने मोदी शासन के तहत जारी शासन की वास्तविक कलई को उघाड़कर रख देने का काम किया है।

कांग्रेस पार्टी के “सूट-बूट की सरकार” के नारे के बाद किसानों का “सरकार की असली मज़बूरी-अडानी, अंबानी, जमाखोरी” का नारा प्रमाणिक प्रतीत होता है, और लोकप्रिय जनभावनाओं को अपने में समेटने के बेहद करीब प्रतीत होता है। यह उनके नैतिक बल के कारण ही है कि, किसान करीब-करीब अपमानजनक मुद्रा में मोदी के नेतृत्व की आलोचना करने और इसके प्रति अपने असम्मान को सीधे तौर पर व्यक्त करने में समर्थ साबित हो रहे हैं। 

किसानों ने मोदी के पुतले का दहन करते हुए उन्हें अपने वाजिब हकों की उपेक्षा करने का दोषी ठहराया है। किसान जिस प्रकार से इन नए कृषि कानूनों को देखते हैं, उसमें सरकार द्वारा नए कानूनों के पक्ष में दिए जा रहे तर्कों, कि किस प्रकार से ये किसानों के हित में हैं, किसानों ने इस तर्क को मानने से इंकार कर दिया है। यह नैरेटिव कई अन्य नैरेटिव एवं नारों को समझने की कुंजी साबित हो सकती है, जिन्हें वर्तमान शासन ने स्थापित कर रखा है। कोई यह तर्क रख सकता है कि मोदी शासन वर्तमान में गंभीर वैधता के संकट से गुजर रहा है और यहाँ तक कि विपक्षी दलों ने भी किसानों के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की हिम्मत जुटा ली है और उन्होंने  सड़कों पर उतारकर वर्तमान शासन के खिलाफ संयुक्त संघर्ष की घोषणा करने का साहस दिखाया है। इन पार्टियों द्वारा नागरिकों को साहस दिए जाने के बजाय, ये नागरिक-किसान हैं जो विपक्षी दलों को विश्वसनीयता प्रदान करने में मदद पहुँचा रहे हैं।

जहाँ एक तरफ सरकार की वैधता के ह्रास के चलते विपक्ष एवं नए नैरेटिव के लिए रिक्त स्थान बन रहा है, वहीँ दूसरी ओर वर्तमान शासन के बहुसंख्यकवादी चरित्र को देखते हुए यह अशुभ संभावनाओं का भी मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इसमें एक ऐसे शासन का मॉडल उभरकर सामने आ सकता है जिसे किसी भी प्रकार की वैधता या सहमति और लोकप्रियता के दावे की परवाह नहीं रह जाती। 

वर्तमान शासन एक ऐसे राज्य के मॉडल को अपना सकती है जो समाज से खुद को काटकर रख सकती है, और अपने घोषित उद्देश्यों को लागू करने - जिसे कि वह अभी तक लागू कर रही थी, के बजाय – यह नीचे से उपर के दृष्टिकोण को अपना सकती है। अपने साथ विभिन्न वर्गों को शामिल करने के लिए यह एक ऐसे तरीके की तरफ बढ़ सकती है, जो वैधता को बनाए रखने का प्रश्न को अधिक खुले और आक्रामक मुद्रा में ख़ारिज कर सकने में समर्थ है। वर्तमान शासन के संकट की प्रकृति कहीं ज्यादा गहरी और काफी हद तक भिन्न है, यहाँ तक कि फासीवादी नाज़ी शासनकाल से भी।

हिटलर के नेतृत्व में नाज़ियों को जर्मन जनता  का तकरीबन पूर्ण समर्थन और लोकप्रियता हासिल थी। जर्मन वासी इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्हें जो जख्म हासिल हुए थे, उसके प्रति हिटलर की प्रतिक्रिया वाजिब थी। युद्ध में हिटलर को हार का मुहँ देखना पड़ा था, लेकिन अपने खात्मे तक उसे राजनीतिक तौर पर समाप्त नहीं किया जा सका था। इसमें आंशिक तथ्य यह है कि नाज़ी सिर्फ सत्ता पर कब्जा जमाने के उद्देश्य को लेकर ही नहीं चल रहे थे, बल्कि उन्होंने अपमान का बदला लेने का लक्ष्य भी रखा हुआ था। कुछ संकोच के साथ इस तथ्य को स्वीकारना होगा कि नाज़ी अपने अजेंडा को लेकर कहीं अधिक प्रामाणिक साबित हुए थे और वार्सा संधि का बदला लेने के प्रति उनकी “प्रतिबद्धता” को लेकर उन्हें लोकप्रिय समर्थन हासिल था। भारत में मौजूदा शासन इसके काफी हद तक विपरीत है, जोकि अपने आप में विध्वंशवादी है और इसके पास अपनी कोई बुनियादी प्रतिबद्धता नहीं है, जिसको लेकर कोई इन्हें प्रामाणिक कह सके। इसकी महत्वाकांक्षा करीब-करीब पूर्ण नियंत्रण को हासिल करने और लंबे समय तक सत्ता में बने रहने को लेकर है, लेकिन नाज़ी शासन के समान इसके पास लोकप्रियता और विश्वसनीयता इन दोनों का ही घोर अभाव है। वर्तमान शासन लगातार एक के बाद एक समाज के विभिन्न वर्गों के विरुद्ध खुद को खड़ा करता जा रहा है। एक छोटे से उन्मादी समूह के बीच में इसने अपने समर्थन को बरकरार रखा है, जिन्हें सचमुच में ऐतिहासिक घाव का अहसास बना हुआ है और जो अपने जीवन में गहरे नैराश्यपूर्ण दृष्टिकोण से पीड़ित हैं। इस तातकालिक घेरे से परे मोदी के पास किसी भी प्रकार की निर्विवाद लोकप्रियता हासिल नहीं है, और थोड़ी-बहुत जो कुछ भी थी, वह निरंतर कम होती जा रही है, जोकि किसानों के विरोध के चलते अब अपनी चरम सीमा तक पहुँच चुकी है।  

जब नैतिक सहमति में गिरावट का दौर शुरू होता है तो शासन के पास खुद की वैधता के लिए दमनकारी तौर-तरीकों को ही अख्तियार करने का ही चारा बचता है, जिसमें लोकप्रिय सहमति और नैतिक वैधता के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। यह स्पष्ट तौर पर एक अशुभ संकेत है जोकि वर्तमान में जारी विरोध प्रदर्शनों के परिणामस्वरूप उपजी है। निश्चित तौर पर धारा 370 को निरस्त करने और मंदिर निर्माण को लेकर चलाए गए आन्दोलन से जो वैधता हासिल कर लेने की बात कही गई थी, उसे स्पष्टतया खूब बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था, और नागरिकों की सहज बुद्धि को बेहद कम करके आँका गया था। इस बात की उम्मीद नहीं दिखती है कि मोदी हालात के अनुसार खुद को ढालने की सोचें। बहुसंख्यकवादी शासक की प्रवित्तियों के अनुरूप वे जबरदस्ती खुद की लोकप्रियता का दावा करते रहेंगे और प्रदर्शनकारियों की वैधता की अवहेलना करते रहने का क्रम जारी रहने की संभावना है। मुद्दे के मूल में राज-काज चलाने का मॉडल है जिसे कुछ अपवाद के साथ चलाया जाता रहेगा। जब इसे बहुसंख्यकवाद के चश्मे से देखा जाता है तो यह एक वैध तरीके से शासन चलाने का मॉडल नजर आता है। 

बहुसंख्यकवाद के मॉडल को आवश्यक तौर पर गैर-संस्थागत प्रारूपों की आवश्यकता पड़ती है। यह मॉडल अपनेआप में वैध जान पड़ता है जब इसे एक हद तक सहमति हासिल होती है। लेकिन जब यह सहमति को खोना शुरू करने लगता है, तो ऐसे में बहुसंख्यकवादी शासक अपने कदम वापस खींचने की स्थिति में नहीं रह जाता। क्योंकि ऐसा करने से उसके और भी अधिक गैर-वैधता की स्थिति उत्पन्न होने लगती है। बहुसंख्यकवाद अपने पूर्ण चक्र में आ चुका है, जिसमें उसने अपनी जीत के दावों और नैरेटिव के जरिये बाकियों को किनारे लगाने के माध्यम से उन्हें नैतिक गैर-वैधता की स्थिति में पहुंचा दिया था, लेकिन आज खुद को उसी स्थिति में पा रहा है। इसके प्रतिउत्तर में नपी-तुली अराजकता और लक्षित हिंसा के बजाय और यह बड़े पैमाने पर उग्रता एवं लक्षित हिंसा का सहारा ले सकता है। यह एक ऐसी संभावना है जिसका मुकाबला किसानों द्वारा सिखाये गए खुद को लामबंद करने में निहित है। 

लेखक जेएनयू के सेंटर फॉर पोलिटिकल स्टडीज विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-

What Indian Opposition Gains from Farmers’ Protests

Farmers Protest Delhi
Majoritarian politics
Narendra modi
Suit-boot ki sarkar

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