NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भारत के पास असमानता से निपटने का समय अभी भी है, जानें कैसे?
घोर पूंजीवाद के नेतृत्व में चलने वाली अर्थव्यवस्था और संयुक्त राज्य अमेरिका के मॉडल का अनुसरण करने वाला वर्तमान अत्यधिक असमान आर्थिक मार्ग सभी नागरिकों की ज़रूरतों को स्थायी रूप से पूरा नहीं कर सकता है।
भरत डोगरा
21 Dec 2021
Translated by महेश कुमार
Inequality

देश की अर्थव्यवस्था किस हद तक असमान हो गई है, इसे जताने के लिए भारत को बार-बार धन और आय असमानता के वैश्विक सूचकांकों में उद्धृत किया जाता है। हाल ही में जारी विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। आखिरकार, शीर्ष 1 प्रतिशत भारतीयों के पास नीचे की 50 प्रतिशत आबादी की संपत्ति का पांच गुना से अधिक है। आय के संदर्भ में, शीर्ष 1 प्रतिशत की आमदनी नीचे की 50 प्रतिशत आबादी से लगभग दोगुनी है।

जबकि असमानताओं ने पूरी दुनिया को त्रस्त किया हुआ है, लेकिन भारत इसमें सबसे अधिक असमान देशों में से एक बन गया है, यह एक उदाहरण है कि अर्थव्यवस्था को कैसे चलाया जा रहा है। फिर भी हमारे नीति निर्माताओं को ये तथ्य चौंकाने वाले नहीं लगते हैं कि असमानताएं बढ़ रही हैं, और ये सभी असमानताएँ पिछले तीन दशकों से नीतिगत ढांचे और विकास मॉडल के साथ कदम मिला कर चल रही है। इन त्रुटिपूर्ण नीतियों के परिणामस्वरूप, विशेषकर पिछले एक दशक में, असमानताएँ काफी तेजी से बढ़ी हैं और तीव्र हुई हैं।

सत्तारूढ़ शासन अक्सर असमानताओं के कारण होने वाले नुकसान और समानता को बढ़ाने  वाली नीतियों के लाभों को अनदेखा करता है। नागरिकों के कल्याण पर ध्यान केंद्रित करने का मतलब यह होगा कि भारत किस तरह से अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को पाट सकता है। ऐसा करने के बजाय, लगता है भारत सरकार की प्राथमिकता कुछ के लिए धन खोजने की लगती है। अपनाई जा रही नीतियां संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रतिध्वनि हैं, जो सबसे अधिक संसाधन संपन्न देशों में से एक है।

संयुक्त राज्य अमेरिका को सैन्य और व्यापार प्रभुत्व का भी लाभ मिलता है, लेकिन हाल के दशकों में इस सब के बावजूद इसने कई अधिक असमानताओं को जन्म दिया है। अमेरिकी आबादी के शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों ने राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग 71 प्रतिशत और वार्षिक आय का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा हड़पा हुआ है। उच्च और बढ़ती असमानता के चलते आबादी के निचले आधे हिस्से के पास राष्ट्रीय संपत्ति का मात्र 1.5 प्रतिशत हिस्सा ही आया है, जिसका अर्थ है कि आधा देश अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। फिर भी भारतीय नीति निर्धारक विकास के बजाय विकास दर को आगे बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।

2018 में, अर्बन इंस्टीट्यूट ने 2017 की अपनी खोजी रपट जारी की जिसमें पाया गया कि  संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 40 प्रतिशत गैर-बुजुर्ग वयस्कों और उनके परिवारों ने कम से कम एक बुनियादी जरूरत, स्वास्थ्य देखभाल, आवास, यूटिलिटी या भोजन का खर्च उठाने के लिए कडा संघर्ष करना पड़ा है। यह स्थिति तब थी जब कोविड-19 महामारी से पहले आर्थिक और रोज़गार की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर थी। अप्रैल 2020 में, महामारी के बाद, अर्बन इंस्टीट्यूट ने अपने एक नए पेपर में बताया कि संयुक्त राज्य में 41 प्रतिशत वयस्कों ने परिवार में कम से कम एक नौकरी के नुकसान की सूचना दी थी, जबकि 31 प्रतिशत को भोजन पर अपने खर्च में कटौती करने पर मजबूर होना पड़ा था। लगभग 26 मिलियन लोगों ने बेरोजगारी बीमा के लिए आवेदन किया है। इसलिए कोविड-19 संकट के दौरान अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करने वालों की संख्या काफी बढ़ गई है।

2020 में, यह भी बताया गया था कि संयुक्त राज्य में बाल गरीबी का स्तर वयस्कों की तुलना में 1.5 गुना अधिक था। सामाजिक सुरक्षा के बावजूद बड़ी संख्या में बुजुर्ग भी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बोस्टन में मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में जेरोन्टोलॉजी इंस्टीट्यूट ने एक बुजुर्ग आर्थिक सुरक्षा मानक सूचकांक तैयार किया है, जिसके अनुसार, 2016 में, अधिकांश वरिष्ठ नागरिकों के पास "उन वित्तीय संसाधनों की कमी थी जिनकी उन्हें आवश्यकता थी ..."। औसतन, संयुक्त राज्य अमेरिका में एक वर्ष में औसतन 3.7 मिलियन निष्कासन होते हैं, या प्रति मिनट सात, एक ऐसी प्रवृत्ति जो काफी समय से बढ़ रही है। 

अमेरिका यह उदाहरण जो बात स्पष्ट रूप से जताता है वह यह है कि प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन, यहां तक कि सैन्य शक्ति जो कि रियायती शर्तों पर अन्य देशों के धन को पा सकती  है, उसका मतलब असमानता नहीं है और न ही कुछ का संसधानों पर प्रभुत्व है। दोनों साथ-साथ चलते हैं, और यही बात भारतीय नीति निर्माताओं को समझनी चाहिए।

भारत को संसाधनों और धन के समान वितरण पर जोर देने की जरूरत है, अन्यथा यह 1.4 अरब लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता है। यह हमेशा से एक कडा सच था, लेकिन अब यह और भी अधिक कडा सच बन गया है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आर्थिक स्थितियाँ दुनिया को त्रस्त कर रही हैं। समय के साथ, नए प्रतिबंध या रोक लगना तय है, उदाहरण के लिए, जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल जो हमारे आर्थिक विकास को गति प्रदान करता है। इसलिए, हमारे पास जो आर्थिक गतिविधियाँ हैं, और वे जो विकास पैदा करती हैं, उन्हें सभी के कल्याण के लिए इस्तेमाल करने की जरूरत है।

समय-समय पर, भारत में अभाव के साक्ष्य सामने आए हैं, जैसे कि महत्वपूर्ण पोषण मानकों में दर्दनाक रूप से धीमी गति का सुधार, विशेष रूप से कमजोर वर्गों के बीच यह काफी व्याप्त है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण [2019-2021] के पांचवें दौर में 6 से 59 महीने की उम्र के बच्चों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम कद) एनएफएचएस -4 में 38 फीसदी से घटकर 36 फीसदी हो गया है। कुछ अन्य चौंकाने वाली तस्वीर इस प्रकार  हैं, कि एनीमिया की घटनाएं 2015-2016 में 58.6 प्रतिशत से बढ़कर 67.1 प्रतिशत हो गई हैं। महिलाओं में भी एनीमिया काफी बढ़ गया है [लगभग 53 प्रतिशत से 57 प्रतिशत]। इस महत्वपूर्ण मानदंड में गिरावट महामारी और दोषपूर्ण सरकारी नीतियों के कारण आई है।

अर्थशास्त्री जॉन ड्रेज़ ने हाल ही में सार्वभौमिक प्रारंभिक शिक्षा को नीति के "प्रमुख उदाहरण" के रूप में वर्णित किया है जो "आर्थिक प्रगति" और "सामाजिक असमानता को कम करने" में मदद कर सकती है। वास्तव में, भारत में साक्षरता दर में सुधार हुआ है, लेकिन यह मौजूद असमानताओं को नहीं दिखाता है। उदाहरण के लिए, उन्होंने लिखा, महामारी के 16 महीने में, झारखंड के लातेहार में चार दलित और आदिवासी बस्तियों के घर-घर के सर्वेक्षण से पता चला कि उनके पास "ऑनलाइन शिक्षा का कोई साधन नहीं था, अधिकांश बच्चे एक शब्द भी पढ़ने में असमर्थ थे, और सभी माता-पिता स्कूलों को फिर से खोलने के लिए बेताब थे।”

समानता का तर्क स्पष्ट लग सकता है, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं है जब तक कि न्याय विकास का आधार न हो। सावधानीपूर्वक योजना बनाने की आवश्यकता बढ़ गई है क्योंकि जिन कारकों को ध्यान में रखा जाना है वे अब अधिक जटिल हैं। पहले संसाधनों और उनके दोहन पर आधारित एक मॉडल आदर्श हो सकता था-अब किसी को भी जरूरतों और उन्हें प्रदान करने के लिए उपलब्ध कार्बन स्पेस के संदर्भ में सोचना होगा।

समानता का तर्क स्पष्ट लग सकता है, लेकिन तब तक इसका कोई मतलब नहीं है जब तक कि न्याय विकास का आधार न हो। सावधानीपूर्वक योजना बनाने की जरूरत बढ़ गई है क्योंकि जिन कारकों को ध्यान में रखा जाना है वे अब अधिक जटिल हैं। पहले संसाधनों और उनके दोहन पर आधारित एक मॉडल आदर्श हो सकता था-लेकिन अब इन जरूरतों को पूरा करने के लिए उपलब्ध कार्बन स्पेस के संदर्भ में सोचना होगा।

हालांकि, ठीक उसी समय जब योजना बनाने की जरूरत थी और जिसमें काफी जटिलताएं मौजूद थीं, मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने योजना आयोग को खत्म करने का फैसला किया था। योजना के अंत का मतलब था संसाधनों के एकीकरण की संभावनाओं, बुनियादी जरूरतों और पर्यावरणीय स्पेस को एक ही झटके में बिखेर देना। योजना में सुधार करने के बजाय - जिसकी भारत को अभी भी जरूरत है - इसे पूरी तरह छोड़ दिया गया है। अनियोजित खर्च ने देश के संसाधनों को लूटने के लिए घोर पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को और अधिक अनियंत्रित अवसर दिए हैं। यह वह क्षेत्र है जिस पर नए सिरे से ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि असमानताएं और विकास दोनों कभी एक साथ नहीं चल सकते हैं। 

लेखक, कैंपेन टू सेव अर्थ नाउ के मानद संयोजक हैं। उनकी हाल की किताबों में प्रोटेक्टिंग अर्थ फॉर चिल्ड्रेन और मैन ओवर मशीन शामिल हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें। 

Why India’s Time to Tackle Inequality is Now

inequality
deprivation
food security
education
US Economy
Modi regime
Planning Commission
NITI Aayog
Pandemic
economic insecurity
US homelessness

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

कर्नाटक पाठ्यपुस्तक संशोधन और कुवेम्पु के अपमान के विरोध में लेखकों का इस्तीफ़ा

जौनपुर: कालेज प्रबंधक पर प्रोफ़ेसर को जूते से पीटने का आरोप, लीपापोती में जुटी पुलिस

बच्चे नहीं, शिक्षकों का मूल्यांकन करें तो पता चलेगा शिक्षा का स्तर

विशेष: क्यों प्रासंगिक हैं आज राजा राममोहन रॉय

अलविदा शहीद ए आज़म भगतसिंह! स्वागत डॉ हेडगेवार !

लोगों की बदहाली को दबाने का हथियार मंदिर-मस्जिद मुद्दा


बाकी खबरें

  • J&K
    अनीस ज़रगर
    परिसीमन आयोग के जम्मू क्षेत्र पर ताजा मसौदे पर बढ़ता विवाद
    11 Feb 2022
    जम्मू के सुचेतगढ़ और आरएस पुरा इलाकों में पहले ही विरोध प्रदर्शन आयोजित किये जा चुके हैं, जहाँ दो विधानसभा क्षेत्रों का विलय प्रस्तावित किया गया है।
  • hijab vivad
    भाषा
    हिजाब विवाद: कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश के ख़िलाफ़ शीर्ष अदालत में याचिका दायर
    11 Feb 2022
    एक छात्र द्वारा दायर याचिका में हिजाब मामले की सुनवाई कर रहे उच्च न्यायालय के निर्देश के साथ ही तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष चल रही कार्यवाही पर भी रोक लगाने का अनुरोध किया गया है। अपील में दावा…
  • गोवा ग्राउंड रिपोर्ट: कोरोना लॉकडाउन से संकट में आए टैक्सी चालकों का मुद्दा चुनाव से ग़ायब
    मोहम्मद ताहिर
    गोवा ग्राउंड रिपोर्ट: कोरोना लॉकडाउन से संकट में आए टैक्सी चालकों का मुद्दा चुनाव से ग़ायब
    11 Feb 2022
    "सरकार से कुछ सब्सिडी की मांग की थी। सरकार की तरफ से पांच हज़ार रूपये देने का वादा भी किया गया था लेकिन अभी तक कुछ नहीं मिला।"
  • corona
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 58,077 नए मामले, 657 मरीज़ों की मौत
    11 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1.64 फ़ीसदी यानी 6 लाख 97 हज़ार 802 हो गयी है।
  • MNREGA
    दित्सा भट्टाचार्य
    विशेषज्ञों के हिसाब से मनरेगा के लिए बजट का आवंटन पर्याप्त नहीं
    11 Feb 2022
    पीपल्स एक्शन फ़ॉर एम्प्लॉयमेंट गारंटी (PAEG) के मुताबिक़ वित्तीय साल 2022-23 के बजट में नरेगा के लिए जो राशि आवंटित की गयी है, उससे प्रति परिवार महज़ 21 श्रमदिवस का काम ही सृजित किया जा सकता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License