NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका
गुटनिरपेक्षता आर्थिक रूप से कम विकसित देशों की एक फ़ौरी ज़रूरत
गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के संस्थापकों ने अपने हस्ताक्षरित एक संयुक्त बयान में कहा था, “गुटों के साथ गुटनिरपेक्षता की यह नीति...'तटस्थता' या 'निष्पक्षता' की नुमाइंदगी नहीं करती है और जैसा कि कभी-कभी आरोप लगाया जाता है, न ही यह निष्क्रियता का प्रतिनिधित्व करती है। यह उस सकारात्मक, सक्रिय और रचनात्मक नीति का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका लक्ष्य सामूहिक सुरक्षा की नींव के रूप में सामूहिक शांति है।”
नॉनटोबेको हेला
04 May 2022
Nehru
1960 के दशक में भारत के जवाहरलाल नेहरू, घाना के क्वामे नक्रूमा, मिस्र के जमाल अब्देल नासिर, इंडोनेशिया के सुकर्णो और यूगोस्लाविया के जोसिप ब्रोज़ टीटो के विशेष प्रयासों से गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत हुई थी। फ़ोटो:गेटी इमेजेस

यूक्रेन में चल रहे युद्ध के जवाब में संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूस के ख़िलाफ़ हुए मतदान से दूर रहने वाले दक्षिण अफ़्रीका और दूसरे देशों को ज़बरदस्त अंतर्राष्ट्रीय आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। दक्षिण अफ़्रीका में होने वाली घरेलू आलोचना तो ग़ैर-मामूली रूप से तीखी रही है, और अक्सर यह आलोचना साफ़ तौर पर नस्लीय होती है। मतदान से दूर रहने का मतलब अक्सर यही निकाला जाता है कि दक्षिण अफ़्रीका रूसी हमले के समर्थन में है, और यह समर्थन या तो रूसी और दक्षिण अफ़्रीकी अभिजात वर्ग के बीच के भ्रष्ट रिश्तों के चलते है, या सोवियत संघ की ओर से रंगभेद विरोधी संघर्ष को दिये गये समर्थन से जुड़ीं पुरानी यादों के चलते है, या फिर इसके पीछे दोनों ही कारण हैं।

इस बात को शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है कि इस मामले में गुटनिरपेक्षता संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगियों या रूस के साथ किसी भी तरह के गठबंधन से इनकार का सिद्धांत है। यह एक सैद्धांतिक स्थिति तो हो ही सकती है और भू-राजनीतिक की हक़ीक़त से जुड़ी एक कुशल रणनीति भी हो सकती है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के संस्थापकों में से दो शख़्सियत-यूगोस्लाविया के तत्कालीन राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज़ टीटो और भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 22 दिसंबर, 1954 को अपने हस्ताक्षरित एक संयुक्त बयान में कहा था, “गुटों के साथ गुटनिरपेक्षता की यह नीति...'तटस्थता' या 'निष्पक्षता' की नुमाइंदगी नहीं करती है और जैसा कि कभी-कभी आरोप लगाया जाता है, न ही यह निष्क्रियता का प्रतिनिधित्व करती है। यह उस सकारात्मक, सक्रिय और रचनात्मक नीति का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका लक्ष्य सामूहिक सुरक्षा की नींव के रूप में सामूहिक शांति है।”

ग्लोबल साउथ यानी कि कम विकसित देशों में दुनिया के 80 प्रतिशत से ज़्यादा लोग रहते हैं, इसके बावजूद इन देशों को "अंतर्राष्ट्रीय समुदाय" के नाम पर फ़ैसला लेने वाले अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में किसी भी तरह के निर्णय लेने से व्यवस्थित रूप से बाहर रखा जाता है। दशकों से ग्लोबल साउथ के ये देश संयुक्त राष्ट्र में सुधार की वकालत कर रहे हैं, ताकि संयुक्त राष्ट्र संघ शीत युद्ध की नूरा-कुश्ती की मानसिकता वाले उन  देशों से दूर हो जाये, जो इसे जारी रखते हैं। चिली के तत्कालीन विदेश मंत्री गेब्रियल वाल्डेस ने कभी कहा था कि जून 1969 में हेनरी किसिंजर ने उनसे बताया था, “ग्लोबल साउथ के देशों से कुछ भी ख़ास होना-जाना नहीं है। इस भाग में इतिहास कभी रचा ही नहीं गया। इतिहास की धुरी तो मास्को में शुरू होती है, बॉन तक जाती है, वाशिंगटन से गुज़रती है, और फिर टोक्यो चली जाती है। दक्षिण में जो कुछ होता है, इसकी कोई अहमियत ही नहीं है।”

तत्कालीन नाइजीरियाई विदेश मंत्री-जाजा वाचुकु ने 30 सितंबर, 1963 को संयुक्त राष्ट्र के 18वें सत्र में एक बेहद ज़रूरी सवाल उठा दिया था और वह सवाल था: "क्या यह संगठन यही चाहता है ...कि संयुक्त राष्ट्र के अहम हिस्सों में जब कोई विशेष मामला आता हो,तो (ये) अफ़्रीकी देश बस ख़ामोश रहने वाले ऐसे सदस्य ही बने रहें, जिनके पास इस मामले पर अपने विचार रखने का कोई अधिकार ही नहीं हो … [?] तो क्या हम चुपचाप देखने वाले देश ही बने रहेंगे ?” ग्लोबल साउथ के देश अब भी "चुपचाप देखने वाले" ऐसे ही देश हैं, जो उन्हीं बड़े देशों का मुंह ताकते हैं,जो नियम बनाते हैं और उस रास्ते पर चलने का फ़ैसला लेते हैं,जिस पर वे दुनिया को चलाना चाहते हैं। जब ये देश उन देशों की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं कार्य करते, तो उन्हें फटकारा जाता है और धमकाया जाता है।

यह समय गुटनिर्पेक्षता को फिर से जीवंत करने का समय है।गुटनिर्पेक्ष आंदोलन तभी कायमाब होगा, जब ग्लोबल साउथ के देशों के नेता अपने अहंकार को एक तरफ़ रख देंगें, वैश्विक स्तर पर रणनीतिक रूप से सोचेंगे और अपनी मानव पूंजी, प्राकृतिक संसाधनों और तकनीकी कौशल को बेहतर उपयोग में लायेंगे। ग्लोबल साउथ के देशों में ताक़तवर देश चीन भी है, जो इस समय दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है। साउथ ग्लोबल के देशों में भारत भी आता है,जो चिकित्सा सेवा और तकनीकी नवाचार के लिहाज़ से अग्रणी देशों में से एक है। अफ़्रीका बढ़ती आबादी और उन प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है, जो कि आर्टिफ़िशिलयल इंटेलिजेंस और स्वच्छ ऊर्जा उद्योगों के लिए ज़रूरी हैं। हालांकि, इन संसाधनों को अभी भी दूर-दराज़ की राजधानियों में जमा होने वाले लाभ के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है, जबकि अफ़्रीका और ग्लोबल साउथ के ज़्यादतर देश अविकसित हैं, लाखों लोग अब भी दरिद्रता की हताशा में फ़ंसे पड़े हैं।

अगर नये संस्थानों के निर्माण और आर्थिक युद्ध के ख़िलाफ़ बफ़र बनाने को लेकर समय निकाला जाता है, तो एक नवीनीकृत गुटनिर्पेक्ष आंदोलन में इतनी स्वाभिक क्षमता है कि वह क्यूबा और वेनेजुएला जैसे देशों और इस समय रुस के ख़िलाफ़ लड़ रहे संयुक्त राज्य अमेरिका विरुद्ध एक बड़ी ताक़त के रूप में खड़ा हो सकता है। इसके लिए वित्तीय स्वायत्तता अहम है।

ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका) के पास एक बैंक है, और दक्षिणी अफ़्रीकी विकास समुदाय (SADC) के 16 देशों के लिए डेवलपमेंट बैंक ऑफ़ साउथ अफ़्रीका है; इसके बावजूद इन परियोजनाओं में शामिल देशों के रिज़र्व अब भी संयुक्त राज्य अमेरिका या यूरोपीय देशों की राजधानियों में ही रखे होते हैं। यह समय ग्लोबल साउथ के नेताओं के जागरूक होने और महसूस करने का वक़्त है कि इस समय रूस जैसे देश पर जिस तरह के आर्थिक युद्ध को थोपा जा जा रहा है, उसे देखते हुए ग्लोबल साउथ के कमज़ोर देशों के पास कोई सार्थक स्वायत्तता का नहीं होना चिंता की बात है।

यह समय इस बात पर फिर से विचार करने का है कि जिस समय पश्चिम साफ़ तौर पर इन पूरे देशों को तबाह करने पर तुले हुए दिखते है,वैसे में हम राजनीति, अर्थशास्त्र और विदेश नीति का संचालन किस तरह से कर रहे हैं,यह मायने रखता है। रूस के ख़िलाफ़ जिन चीज़ों को आर्थिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, उनका इस्तेमाल उन देशों के ख़िलाफ़ भी किये जा सकते हैं, जिनमें वाशिंगटन के रास्ते पर नहीं चलने का माद्दा है।

ब्रिक्स कई मामलों में निराशाजनक रहा है, लेकिन ग्लोबल साउथ के देशों के पंथ, संस्कृति, राजनीतिक और आर्थिक प्रणालियों में कई फ़र्क़ होने के बावजूद ब्रिक्स ने काम करने के एक आम तरीक़े की तलाशने की कुछ गुंज़ाइश निकाली है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सामूहिक तौर पर अपने हाथ-पांव मोड़े रखने को लेकर पड़ते तीव्र दबाव का ख़ारिज किया जाना ग्लोबल साउथ के दशों के लिए एक ऐसा उत्साहजनक उदाहरण है, जो इस धारणा को खारिज कर रहा है कि उन्हें स्थायी तौर पर "चुपचाप रहने वाले आज्ञाकारी" देश के रूप में बने रहना चाहिए।

जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका रूस और चीन के ख़िलाफ़ अपने नये शीत युद्ध को तेज़ी से बढ़ाता हुआ दिख रहा है, और दूसरे देशों से उम्मीद लगाये बैठा है कि वे भी उनकी हां में हां मिलायेंगे, ऐसे में इस समय शीत युद्ध की उस मानसिकता को ख़ारिज किये जाने की तत्काल ज़रूरत है, जो दुनिया को पुराने कटुतापूर्ण तरीक़ों से बांटना चाहती है। ग्लोबल साउथ के देशों को इस नज़रिये को अस्वीकार कर देना चाहिए और सभी देशों की ओर से अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के सम्मान का आह्वान करना चाहिए। वे तभी उद्वेलित होते हैं, जब वे ऐसे देश होते हैं, जिन्हें पश्चिम नापसंद करता है या जिनसे असहमत होता है, जो उन्हें तोड़ते हैं,तो यही वह मानसिकता है,जो मानवाधिकारों और अंतर्राष्ट्रीय क़ानून की अवधारणाओं का मज़ाक उड़ाती है।

एक साथ खड़े हो जाने और एक स्वर से बोलने मात्र से ही ग्लोबल साउथ के देश अंतर्राष्ट्रीय मामलों में किसी भी तरह के प्रभाव छोड़ पाने की उम्मीद कर सकते हैं और पश्चिम के नज़रिये पर सिर्फ़ मुहर लगाने वाले देश नहीं बने रह सकते हैं।

गुट निरपेक्ष आंदोलन को आत्मविश्वास और साहस से भरा होना चाहिए और पश्चिम से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेताओं को यह समझने की ज़रूरत है कि वे अपने नागरिकों की सेवा करने और अपने हितों की रक्षा करने के लिए हैं और किसी भी मुद्दों पर अपने रुख़ को प्रभावित करने वाले "कथित बड़े देशों की चौकड़ी" में शामिल होने के प्रलोभन में फंसने की उन्हें ज़रूरत बिल्कुल नहीं हैं। उन्हें लगातार इस बात को ज़ेहन में रखने की ज़रूरत है कि उन्हें बहुत लंबे समय तक "चुपाचाप रहने वाले आज्ञाकारी देशों" के रूप में रखा गया है, और जब तक वे वास्तव में अपने भाग्य की डोर को अपने हाथों में नहीं थाम लेते, तबतक वे लगातार महत्वहीन बने रहेंगे, वहां के नागरिक वैश्विक अर्थव्यवस्था के उस संचित धन से महज़ झूठन ही खाते रहेंगे, जिसका ज़्यादातर हिस्सा ग्लोबल साउथ के दोहन से इकट्ठा किया गया है।

यह लेख मॉर्निंग स्टार और ग्लोबट्रॉटर ने तैयार किया था। नॉनटोबेको हेला केन्या की राजधानी नैरोबी स्थित दक्षिण अफ़्रीका के उच्चायोग में पहली सचिव (राजनीतिक) थीं। इस समय वह दक्षिण अफ़्रीका के जोहान्सबर्ग, ब्राज़ील के साओ पाओलो,अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स,और भारत के नई दिल्ली स्थित ट्राईकॉन्टिनेंटल इंस्टीट्यूट फ़ॉर सोशल रिसर्च नामक एक ग्लोबल साउथ थिंक टैंक के साथ काम कर रही हैं।

 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

https://www.newsclick.in/why-nonalignment-urgent-imperative-global-south

nehru
Non-Aligned Movement
South Africa
Russia
ukraine
Jawaharlal Nehru

Related Stories

पीएम मोदी को नेहरू से इतनी दिक़्क़त क्यों है?

मध्यप्रदेशः सागर की एग्रो प्रोडक्ट कंपनी से कई गांव प्रभावित, बीमारी और ज़मीन बंजर होने की शिकायत

रूस की नए बाज़ारों की तलाश, भारत और चीन को दे सकती  है सबसे अधिक लाभ

यूक्रेन की स्थिति पर भारत, जर्मनी ने बनाया तालमेल

भारतीय लोकतंत्र: संसदीय प्रणाली में गिरावट की कहानी, शुरुआत से अब में कितना अंतर?

रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं

क्या हर प्रधानमंत्री एक संग्रहालय का हक़दार होता है?

पश्चिम बनाम रूस मसले पर भारत की दुविधा

नेहरू म्यूज़ियम का नाम बदलनाः राष्ट्र की स्मृतियों के ख़िलाफ़ संघ परिवार का युद्ध

सद्भाव बनाम ध्रुवीकरण : नेहरू और मोदी के चुनाव अभियान का फ़र्क़


बाकी खबरें

  • Kashmir press club
    राज कुमार
    जम्मू-कश्मीर में मीडिया का गला घोंट रही सरकार : प्रेस काउंसिल
    15 Mar 2022
    ग़ौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने सितंबर 2021 में प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को एक पत्र लिखा था और मांग की थी कि काउंसिल एक फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम भेजकर जम्मू-कश्मीर में…
  • Jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: हेमंत सरकार ने आदिवासी समूहों की मानी मांग, केंद्र के ‘ड्रोन सर्वे’ कार्यक्रम पर लगाईं रोक
    15 Mar 2022
    ‘ड्रोन सर्वे’ और ‘ज़मीन की डिजिटल मैपिंग’ कार्यक्रम के खिलाफ आवाज़ उठा रहे सभी आदिवासी संगठनों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है।
  • अजय कुमार
    रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध का भारत के आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
    15 Mar 2022
    आर्थिक जानकारों का कहना है कि सरकार चाहे तो कच्चे तेल की वजह से बढ़े हुए ख़र्च का भार ख़ुद सहन कर सकती है।
  • रौनक छाबड़ा
    ईपीएफओ ब्याज दर 4-दशक के सबसे निचले स्तर पर, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने आम हड़ताल से पहले खोला मोर्चा 
    15 Mar 2022
    ईपीएफओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड ने शनिवार को वित्त वर्ष 2021-22 के लिए अपनी मौजूदा ब्याज दर को 8.5% से घटाकर 8.1% करने की सिफारिश की है। 
  • सतीश भारतीय
    हरियाणा के बजट पर लोगों की प्रतिक्रिया 
    15 Mar 2022
    सरकार बजट को आंकड़ों की लफ़्फ़ाज़ी के साथ पेश तो कर देती है। मगर अधिकतर पढ़े लिखे और आम लोग बजट के बारे में ढंग से जानते नहीं है। क्योंकि उन्हें लगता है कि बजट का उन्हें सीधे तौर पर कोई वाजिब लाभ नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License