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समाज
भारत
आख़िर क्यों सिर्फ़ कन्यादान, क्यों नहीं कन्यामान?
मोहे के नए विज्ञापन में आलिया पितृसत्तात्मक समाज के रीति-रिवाजों और परंपराओं पर सवाल उठा रही हैं। और 'कन्यादान' की जगह 'कन्यामान' का नया आइडिया दे रही हैं, जो रूढ़िवाद की बेड़ियों को तोड़ने के साथ ही समानता के प्रगतिशील संदेश को भी बढ़ावा देता है।
सोनिया यादव
22 Sep 2021
Manyavar Mohey
image credit- Manyavar Mohey

हमारे समाज में अक्सर देखा जाता है कि जब भी कोई महिला पितृसत्ता की खिंची लकीर को पार करने की कोशिश करती है, तो समाज और कट्टरपंथी विचारधारा उसपर धावा बोल देती है। कुछ यही हो रहा है फ़िल्म अभिनेत्री आलिया भट्ट के नए विज्ञापन के साथ। आलिया मान्यवर मोहे ट्रेडिशनल कपड़ों की ब्रैंड एंबेसडर हैं। इन दिनों कन्यादान को लेकर किया उनका एक विज्ञापन टेलीविज़न और सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

इस विज्ञापन में आलिया एक दुल्हन की भूमिका में हैं, जो मंडप में बैठ कर समाज के रीति-रिवाजों और परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ दी गई लड़की के ज़हन में आने वाले सवाल को उठा रही हैं। सिर्फ़ 'कन्यादान' की जगह 'कन्यामान' का नया आइडिया दे रही हैं। विज्ञापन के अंत में देखा जा सकता है कि लड़के के माता-पिता कन्यादान के समय अपने बेटे का हाथ आगे बढ़ाते हैं, जो रूढ़िवाद की बेड़ियों को तोड़ने के साथ ही समानता के प्रगतिशील संदेश को भी बढ़ावा देता है।

कहते हैं कि बदलाव कभी आसान नहीं होता, लेकिन हमेशा संभव जरूर होता है। बस आलिया के इस विज्ञापन को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। लोग सोशल मीडिया पर दो धड़ों में बंट गए हैं। एक ओर जहाँ आलिया की प्रशंसा हो रही है, तो वहीं दूसरी ओर आलोचनाओं और भद्दे कमेंट्स की बाढ़ आ गई है। वैसे तो इस विज्ञापन के ज़रिए एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की गई है। लेकिन समाज के कुछ तथाकथित 'ठेकेदारों' को ये विज्ञापन भारतीय संस्कृति और परंपरा का विरोध लग रहा है। लोग मान्यवर मोहे पर हिंदू संस्कृति के अपमान के आरोप लगा रहे हैं। साथ ही आलिया भट्ट और उनके परिवार को लेकर आपत्तिजनक बातें लिख रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के मुताबिक ‘मान्यवर मोहे’ शादी-ब्याह के ट्रेडिशनल कपड़ों का देशी ब्रैंड है। इस ब्रांड ने पारंपरिक लाल जोड़े का एक नया विज्ञापन जारी किया, जिसमें आलिया भट्ट एक दुल्हन बनी नज़र आ रही हैं। आलिया बता रही हैं कि कैसे एक बेटी न पराई होती है और न ही धन, जिसे किसी को दान कर दिया जाए।

वो कहती हैं, “दादी बचपन से कहती है, जब तू अपने घर चली जाएगी तुझे बहुत याद करूंगी… ये घर मेरा नहीं?…पापा की बिगड़ैल हूं, मुंह से बात निकली नहीं और डन। सब कहते थे पराया धन है इतना मत बिगाड़ो, उन्होंने सुना नहीं… पर ये भी नहीं कहा कि न मैं पराई हूं, न धन… मां चिड़िया बुलाती हैं मुझे। कहती है अब तेरा दाना-पानी कहीं और है… पर चिड़िया का तो पूरा आसमां होता है न?…अलग हो जाना, पराया हो जाना, किसी और के हाथ सौंपा जाना… मैं कोई दान करने की चीज़ हूं? क्यों सिर्फ कन्यादान?”

इसके बाद दिखाया जाता है कि दूल्हे के माता-पिता भी उसका हाथ वैसे ही पकड़कर आलिया के हाथ में देते हैं जैसे कन्यादान के वक्त लड़की के माता-पिता करते हैं। आखिर में आलिया कहती हैं, ‘नया आइडिया, कन्या मान।’

बेटियां क्यों होती हैं पराई?

इस विज्ञापन में बेहद खूबसूरती से पितृसत्ता की व्यवस्था पर सवाल उठाया गया है। दरअसल, परिवार और विवाह संस्था से ही पितृसत्तात्मक समाज के उस स्वरूप को खड़ा करना सहज हो जाता है जो स्त्री-पुरुष की रूढ़िवादी भूमिकाओं को आकार देते हैं। वह उन्हें इन संस्थाओं में ढालने के लिए प्रेरित करते हैं। सामाजिक दबाव डालते हैं कि वे भी इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था का हिस्सा बन इस व्यवस्था को पोषित करें, इसे चलाने में अपना योगदान दें।

ये विज्ञापन भारतीय समाज में गहराई से रची बसी मान्यता को चुनौती देता है। जिसमें मायके में एक लड़की हमेशा पराए घर की होती है और ससुराल में पराए घर से आई लड़की। ये विज्ञापन सवाल कर रहा है कि कन्या क्या कोई चीज़ है जिसका दान कर दिया जाए? क्या किसी को एक व्यक्ति पर इतना अधिकार हो सकता है कि वो उसका दान कर सके? ऐसी कई लड़कियां हैं जो नहीं चाहतीं कि उनकी शादी में कन्यादान की रस्म हो, क्योंकि ये उन्हें ऑब्जेक्टिफाई करता है यानी एक इंसान से एक वस्तु के रूप में ढाल देता, जिसे एक व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति को दान कर सकता है। साथ ही ये रस्म उस विचार पर जोर देता है कि शादी के बाद एक लड़की की हर जिम्मेदारी उसके ससुराल के प्रति होती है, अपने माता-पिता और परिवार के प्रति नहीं।

भारतीय समाज में बेटी के लिए पराई हो या पराया धन जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है, जो किसी भी लड़की के लिए काफ़ी दुखी और बेइज़्ज़ती करने वाले होते हैं। वहीं ये माता-पिता के आचरण को भी प्रभावित करता है। हालाँकि वो उसे प्यार करते हैं, लेकिन उनमें भी कहीं ना कहीं बेटी को लेकर वैराग्य या डर होता है और वो इसे एक ज़िम्मेदारी की तरह लेते हैं। इस विज्ञापन के माध्यम से एक ऐसा समाज बनाने की कोशिश की गई है जिसमें बराबरी हो। जब एक माता-पिता अपनी बेटी सौंप रहे हैं, तो दूल्हे के माता-पिता भी अपना बेटा सौंपें। हो सकता है कि कुछ तथाकथित लोगों की थ्योरी में कन्यादान की परंपरा रिग्रेसिव न हो, लेकिन केवल कन्या का दान रिग्रेसिव ही है।

विज्ञापन का विरोध, बराबरी का विरोध है!

हमारे देश में इन दिनों नेशनल-एंटीनेशनल, हिंदू- एंटी हिंदू का एक नया ट्रेंड चल पड़ा है। जो लोग अपनी ही चुनी हुई सरकार से सवाल करते हैं, उन पर देश विरोधी होने का लेबल लगा दिया जाता है, जो अपने ही धर्म की रिग्रेसिव परंपराओं पर एक अलग राय रखते हैं, उन्हें धर्म विरोधी करार दे दिया जाता है। जो लोग कन्यादान को महादान बताकर इसे एक पिता द्वारा उसके बेटी की जिम्मेदारी उसके पति को सौंपना बता रहे हैं, वो ये भूल रहे हैं कि लड़कियां अब खुद की जिम्मेदारी खुद उठाने में सक्षम हैं।

जो लोग इसे हिंदू-मुस्लिम से जोड़कर धार्मिक भावना आहत करने की कोशिश से जोड़ रहे हैं, वो भी शायद भूल रहे हैं कि प्रगतिशील समाज में गलत गलत ही होता है फिर वो किसी भी धर्म में क्यों न हो। जितना गलत बुर्का है, उतना ही गलत घूंघट भी है। जितना गलत औरतों को मस्जिद में जाने से रोकना है, उतना ही गलत पीरियड्स के दिनों में उनके साथ भेदभाव करना है। सही है तो सिर्फ बराबरी। बराबर अधिकार, जीवन पर, प्रेम पर, अधिकारों पर और जिम्मेदारियों पर भी। अब पुरानी परंपराओं के साथ-साथ लिंग आधारित नियमों को भी बदलने की ज़रूरत है।

विज्ञापनों की बदलती दुनिया, महिलाओं का बदलता स्वरूप

गौरतलब है कि विज्ञापन जगत ने एक लंबा सफ़र तय किया है और उसमें महिलाओं की भूमिका भी बदली है। पहले अक्सर प्रोडक्ट्स में महिलाओं का ओब्जेक्टिफ़िकेशन होता था यानी पेन हो या टायर का विज्ञापन, वहाँ एक सुंदर लड़की अर्ध नग्नता के साथ दिखाई जाती थी। अब भी कुछ विज्ञापनों में ये तस्वीर बदली नहीं है लेकिन समय के साथ कुछ बदलाव भी देखने को मिला है, जो कि अच्छा है।

हाल ही में कैडबरी का ताज़ा विज्ञापन आया है, जो क़रीब 27 साल पहले आए विज्ञापन का रिवर्सल या उलट है। इस विज्ञापन की काफ़ी प्रशंसा हो रही है और ये कहा जा रहा है कि लोग पुरानी यादों को फिर जीने जैसा अनुभव कर रहे हैं। ये एक सकारात्मक सोच को दर्शाता है, जहाँ एक महिला क्रिकेट मैच में छक्का लगाती है और इस उपलब्धि को बेफ़िक्री के साथ एक भावुक पुरुष खुलकर सेलिब्रेट कर रहा है। जो आमतौर पर देखा नहीं जाता है। बल्कि एक महिला की जीत या उपलब्धि को ईष्या या हीनता के साथ जोड़ कर देखा जाता है। ये विज्ञापन #GoodLuckGirls से ख़त्म होता है।

इससे पहले भारतीय आभूषण ब्रैंड तनिष्क का एक विज्ञापन आया था। ये विज्ञापन अलग-अलग समुदाय के शादीशुदा जोड़े से जुड़ा था और इसमें एक मुस्लिम परिवार में हिंदू बहू की गोद भराई की रस्म को दिखाया गया था। जो काफ़ी विवादास्पद रहा और उसे हटाना पड़ा। क्योंकि इससे भी कुछ तथाकथित लोगों की भावनाएं आहत हो गई थीं और बकायदा तनिष्क को खुलेआम धमकी तक दे दी गई। अब एक बार फिर मोहे और आलिया को निशाना बनाया जा रहा है।

महिला सशक्तिकरण की आड़ में महिला विरोध

खुद को मणिकर्णिका और नारी शक्ति की सशक्त आवाज़ बताने वाली बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत तक ने इस विज्ञापन को बांटने वाला करार दे दिया। कंगना ने इंस्टाग्राम पर एक लंबा पोस्ट लिखा। उन्होंने आलिया को पोस्ट में टैग करते हुए ऐड के आइडिया पर सवाल उठाया। कंगना ने कहा कि इस ऐड का उद्देश्य अपने फायदे के लिए ग्राहकों के साथ 'धर्म और अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की राजनीति' के जरिए जोड़-तोड़ करना है और ये बिल्कुल ठीक नहीं है।

कंगना ने लिखा, "सभी ब्रांड्स से विनम्र निवेदन है कि धर्म, माइनॉरिटी, मेजॉरिटी पॉलिटिक्‍स को चीजें बेचने के लिए इस्‍तेमाल ना करें। इस चालाकी के साथ ऐड के माध्यम से लोगों को बांट कर भोले-भाले उपभोक्ताओं को मेनूपुलेट न करें।"

मालूम हो कि कंगना इससे पहले भी आरक्षण और तमाम मुद्दों पर अपनी दकियानुसी मानसिकता जाहीर कर चुकी हैं, लेकिन इस बार उन्होंने खुद महिला होकर महिलाओं की आवाज़ दबाने और इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की है, जो एक नायिका के तौर पर उनसे कतई उम्मीद नहीं थी।

बहरहाल, हम यहां इस सुंदर विज्ञापन के खिलाफ सोशल मीडिया पर चल रहे भद्दे पोस्ट्स को कतई दिखाने के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि कोई कुछ भी कहे सच्चाई यही है कि आज महिलाएं अपना मुकाम खुद हासिल कर रही हैं, पुरुषों के बराबर आगे की पंक्ति में खड़ी हैं। वो समाज और घर की जिम्मेदारी उतनी ताकत से निभा रही हैं जितनी ताकत से पुरुष निभाते आए हैं। अब वो पिता, पति या भाई की जिम्मेदारी से आगे बढ़कर एक आजाद इंसान के तौर पर अपनी पहचान बना रही है। ऐसे में ये विज्ञापन कई वर्जनाओं को तोड़ता हुआ नज़र आता है, महिलाओं को और सशक्त करता है।

Manyavar Mohey
Aliya Bhatt
Kanyadaan
Hindu rituals
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patriarchal society
women empowerment

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