NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?
कई धार्मिक स्थलों के बारे में कई मुकदमे लंबित हैं, और साथ ही 1991 के अधिनियम को चुनौती दी गई है जो धार्मिक स्थलों की यथास्थिति में किसी भी बदलाव को प्रतिबंधित करता है।
सुबोध वर्मा
23 May 2022
Translated by महेश कुमार
क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?

दिसंबर 2021 में, दिल्ली में एक दीवानी न्यायाधीश ने उस याचिका को खारिज़ कर दिया था, जिसमें दावा किया गया था कि दिल्ली में कुतुब मीनार परिसर में 27 जैन और हिंदू मंदिरों को नष्ट करने के बाद बनाया गया था और अनुरोध किया कि इन्हें फिर से स्थापित किया जाए, और भक्तों को पूजा करने की अनुमति दी जाए।

“भारत का सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इतिहास रहा है। इस पर कई राजवंशों का शासन रहा है। बहस के दौरान वादी वकील ने राष्ट्रीय शर्म की बात पर जोरदार तर्क दिया है। हालांकि, किसी ने भी इस बात से इनकार नहीं किया कि अतीत में गलतियां की गई थीं, लेकिन इस तरह की गलतियां हमारे वर्तमान और भविष्य की शांति को भंग करने का आधार नहीं हो सकती हैं।'' याचिकाकर्ता अब इस आदेश के खिलाफ अपील करने जा रहे हैं।

2019 में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला आने के बाद से इस तरह के मुकदमों की झड़ी लग गई है:

2020 में मथुरा में श्री कृष्ण मंदिर परिसर से सटी शाही ईदगाह को हटाने के संबंध में दावे किए गए या मांग को फिर से पुनर्जीवित कर दिया गया है। सिविल कोर्ट द्वारा इसे खारिज़ किए जाने के बाद, याचिकाकर्ता अपील में चले गए हैं। 19 मई, 2022 को जिला न्यायालय ने याचिका को स्वीकार कर नोटिस जारी कर दिए हैं। इसी मुद्दे पर एक और मुकदमा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सामने लंबित पड़ा है। यह एक जनहित याचिका है जिसे पहले 2019 में डिफ़ॉल्ट रूप से खारिज कर दिया गया था, लेकिन अदालत ने अब इसे फरवरी 2022 में पुनर्जीवित कर दिया है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में भी भाजपा के एक पदाधिकारी ने याचिका दायर की थी जिसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को निर्देश देने की मांग की गई थी कि आगरा में ताजमहल के नीचे 22 बंद कमरों को खोल कर जांच करने की अनुमति दी जाए क्योंकि वहां मंदिरों के अवशेष हैं। बिना किसी सबूत के यह दावा किया गया है कि ताज का निर्माण शिव मंदिर 'तेजो महालय' के अवशेषों पर किया गया था। यह याचिका भी खारिज हो गई है।
ज्ञानवापी मस्जिद के संबंध में एक मुकदमा दायर किया गया था, हालांकि 1991 के मूल मुकदमे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी थी। इसके बारे में बाद में बात करेंगे।

चूंकि न्यायपालिका, वादियों को 1991 के अधिनियम के बारे में बार-बार याद दिला रही थी जो धार्मिक चरित्र के किसी भी परिवर्तन और किसी भी मुकदमे को प्रतिबंधित करता है, इसलिए अधिनियम को चुनौती देने वाली दो याचिकाएं भी सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई हैं।

इन सभी में से, ज्ञानवापी मस्जिद मामले ने एक अलग ही गति पकड़ ली है - और कई लोगों का मानना है कि निचली अदालत ने अपने आदेशों के ज़रिए 1991 के अधिनियम का घोर उल्लंघन किया है। आइए देखें, यह अधिनियम है क्या?

1991 अधिनियम

पूजा के स्थान (विशेष प्रावधान) अधिनियम को 1991 में संसद में तब पारित किया गया था जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था जिसे भाजपा और उसके सहयोगियों जैसे विश्व हिंदू परिषद (विहिप), बजरंग दल और अन्य के नेतृत्व में चलाया जा रहा था।

इस संक्षिप्त लेकिन शक्तिशाली अधिनियम की धारा 3 किसी को भी किसी भी धार्मिक संप्रदाय के पूजा स्थल को किसी अन्य धार्मिक संप्रदाय के पूजा स्थल में परिवर्तित करने से रोकती है। धारा 4 घोषित करती है कि पूजा स्थल का धार्मिक चरित्र वैसा ही रहेगा जैसा 15 अगस्त, 1947 को था, और बदलाव के बारे में कोई भी लंबित मुकदमा या अपील रद्द हो जाएगी, यानी वह समाप्त हो जाएगी। धारा 5 में कहा गया है कि यह अधिनियम अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद पर लागू नहीं होगा।

इस प्रकार इस अधिनियम के मार्फत विभिन्न मस्जिदों के बारे में सभी अपील और याचिकाएं वर्जित हैं। यही कारण है कि ज्यादातर दक्षिणपंथी हिंदुत्व समर्थकों से जुड़े वादियों ने अधिनियम पर ही सवाल उठाना शुरू कर दिया है और इसलिए इसे रद्द करने के लिए याचिकाएं डालना भी शुरू कर दिया है। निचले स्तर पर आरएसएस और भाजपा के विभिन्न नेताओं का मत है कि शायद संसद या सर्वोच्च न्यायालय को इस अधिनियम पर फिर से विचार करने की जरूरत है। 

जहां तक सुप्रीम कोर्ट का सवाल है तो अयोध्या फैसले में उसने इस एक्ट का पूरा समर्थन किया था। कोर्ट ने कहा था कि "इतिहास और उसकी गलतियों को वर्तमान और भविष्य पर अत्याचार करने के लिए उपकरणों के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा"। इसकी कटऑफ तिथि – 1947 स्वतंत्रता के वर्ष को - भारत में एक नए युग की शुरुआत को बताने के लिए जानबूझकर लागू किया गया है, जिसमें उम्मीद की गई थी कि इतिहास के बोझ को एक तरफ रख दिया जाएगा और एक नई शुरुआत की जाएगी।

ज्ञानवापी मस्जिद मुकदमेबाजी का अशुभ रास्ता 

1991 में, काशी विश्वनाथ मंदिर के भक्तों ने एक मुकदमा दायर किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सम्राट औरंगजेब ने विश्वेश्वर मंदिर के हिस्से को नष्ट कर दिया था और इस मस्जिद का निर्माण किया था। 2021 में, पांच महिलाओं के एक समूह ने सिविल जज, वाराणसी की अदालत में मुक़दमा दायर किया, जिसमें दावा किया गया कि वे हिंदू सनातन धर्म की भक्त हैं और मस्जिद में मौजूद विभिन्न देवताओं की साल भर पूजा करना चाहते हैं। 1991 के मुकदमे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी थी। इस बीच, दोनों पक्षों की विभिन्न दलीलों पर कई आदेश पारित किए गए।

अप्रैल 2021 में, सिविल कोर्ट ने एएसआई को 1991 के मुकदमे के तहत मस्जिद परिसर का सर्वेक्षण करने का आदेश दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने इस आदेश की आलोचना की और यह कहते हुए इस पर रोक लगा दी कि ऐसा नहीं किया जा सकता क्योंकि उच्च न्यायालय ने मूल वाद पर रोक लगा दी थी। सिविल कोर्ट ने तब नई याचिका (पांच महिला भक्तों द्वारा दायर) पर विचार किया और सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी का आदेश दे दिया।

मस्जिद पक्ष ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश VII नियम 11 के तहत याचिका को खारिज करने के लिए एक याचिका दायर की, जो एक याचिका को खारिज किए जाने पर आकस्मिकताओं को निर्धारित करता है। यह तर्क दिया गया था कि 1991 का अधिनियम पूजा स्थल पर किसी भी पुनर्विचार पर रोक लगाता है, और इसलिए पांच महिला भक्तों का मुकदमा विफल हो गया था।

हालांकि, सिविल जज ने इस याचिका को लंबित रखा और सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी का निर्देश जारी कर दिया, जिसे बाद में सर्वेक्षण में मदद करने के लिए कथित तौर पर एक 'निजी फोटोग्राफर' ने मीडिया में लीक कर दिया था। कथित तौर पर बताया गया कि सर्वे में एक 'शिवलिंग' मिला है। 
इस आधार पर, मुख्य न्यायाधीश के समक्ष एक विशेष उल्लेख के तहत फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया, जिसने तीन-न्यायाधीशों की बेंच को मामले पर नज़र डालने को कहा।

जस्टिस चंद्रचूड़, सूर्यकांत और पीएस नरसिम्हा की इस बेंच ने आखिरकार आदेश दिया कि सिविल जज द्वारा सुनी जा रही वाद को जिला जज को ट्रांसफर कर दिया जाए क्योंकि ऐसे मामलों में उनका अधिक अनुभव होगा। इस बीच, बेंच ने 17 मई के अपने आदेश में कहा गया है कि नमाज़ और वुज़ू को जारी रखने की अनुमति दी जाए, जबकि जिस स्थान पर कथित तौर पर शिवलिंग पाया गया था, उसे बंद कर दिया जाना चाहिए और संरक्षित किया जाना चाहिए।

संक्षेप में, बल्कि जो प्रेरक तर्क है वह यह कि सिविल जज द्वारा जारी किए गए सभी आदेश अवैध थे क्योंकि उन्होंने 1991 के अधिनियम का उल्लंघन किया था, जिसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है। बताया जाता है कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा है कि 1991 का अधिनियम सर्वेक्षणों को अन्य धार्मिक प्रथाओं के अवशेषों का पता लगाने से नहीं रोकता है और इसकी वैधता या अन्यथा पर बहुत अधिक विचार की जरूरत है। हालाँकि, उन्होंने घोषणा की कि एक संतुलन बनाना होगा और नमाज़ और वुज़ू की अनुमति के साथ, यह किया गया है।

ऐसा प्रतीत होता है कि इस घटना ने उस विवाद पर पर्दा डाल दिया है जो प्रज्वलित होने के कगार पर लग रहे थी। लेकिन ब उस बात को याद किया जा सकता है, जैसा कि कुछ लोगों ने तर्क दिया था कि अयोध्या विवाद भी तब बढ़ गया था जब फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने 1986 में मस्जिद के ताले खोलने का आदेश दिया था और हिंदू भक्तों द्वारा राम लला की मूर्ति की पूजा की अनुमति दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दावा किया था कि मस्जिद के फाटकों को खोलना हिंदू मांग में उनका योगदान था।
हालाँकि, उस कदम ने राम जन्म भूमि आंदोलन को गति दे दी थी, जिसने फाटक को एक बड़ी जीत के रूप में देखा। इसी तरह, 1992 में, सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा के यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के सिर्फ एक हलफनामे पर भरोसा करते हुए अयोध्या में विवादित स्थल पर 'प्रतीकात्मक कार सेवा' की अनुमति दी थी कि यथास्थिति बनाए रखी जाएगी और कुछ भी अप्रिय नहीं होने दिया जाएगा। 

'प्रतीकात्मक' कार सेवा 6 दिसंबर 1992 को होनी थी - वास्तव में हुआ यह था कि हजारों 'कार सेवकों' ने मस्जिद पर धावा बोल दिया और उसे ध्वस्त कर दिया, और जिस नज़ारे को यहां तक कि एक अचंभित सुप्रीम कोर्ट और एक हैरान दुनिया ने देखा।
इसलिए, न केवल मुसलमानों के दिलों में, बल्कि देश में शांति और सद्भाव चाहने वाले सभी लोगों के दिलों में बहुत ही वाजिब डर बसा है।

क्या इतिहास दोहराया जाएगा?

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व, चाहे वह राष्ट्रीय स्तर पर हो या राज्य में, इन घटनाओं के बारे में काफी हद तक चुप रहा है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ने ट्वीट किया, 'सच्चाई की जीत होगी', जबकि आरएसएस और बीजेपी के अन्य पदाधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि 1991 के अधिनियम पर निश्चित रूप से पुनर्विचार होना चाहिए। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह अच्छा है कि लोग खुद (इन मुकदमों को दाखिल करने में) आगे आ रहे हैं, जो इस तथ्य की उपेक्षा करता है कि अधिकांश वादी संघ परिवार से जुड़े हुए हैं।

हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या मंदिर-मस्जिद के इन नारों के इर्द-गिर्द लोग लामबंद होंगे जैसा कि 1992 में बाबरी विध्वंस और उसके बाद के वर्षों में हुआ था? इसकी संभावना नहीं है क्योंकि चीजें अब जैसी हैं उससे यही लगता है, और यही एक कारण हो सकता है कि भाजपा के शीर्ष नेता भी इंतजार कर रहे हैं और तमाशा देख रहे हैं।

हालांकि, सत्तारूढ़ भाजपा ने एक बात हासिल कर ली है - देश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक संकट पर बढ़ते हुए ध्यान को फिलहाल के लिए मोड़ दिया गया है। यह भी एक कारण है कि भाजपा के शीर्ष नेता घटनाक्रम से राहत महसूस कर रहे हैं। लेकिन फिर, अभी या बाद में, इस पर जवाब देने का समय आएगा।

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें 

Will Gyanvapi Dispute Cause More Strife or is the Temple-Mosque Gambit Over?

Gyanvapi Mosque Controversy
Supreme Court
Places of worship Act 1991
Babri Masjid demolition
Justice DY Chandrachud
Communalism
RSS
VHP
Hindutva

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!


बाकी खबरें

  • rally
    भाषा
    कोविड-19 की तीसरी लहर के मद्देनजर चुनावी रैलियों पर रोक लगाए सरकार : इलाहाबाद उच्च न्यायालय
    24 Dec 2021
    अदालत ने कहा, दूसरी लहर में हमने देखा कि लाखों की संख्या में लोग संक्रमित हुए और लोगों की मृत्यु हुई। उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के कारण बड़ी संख्या में लोग संक्रमित…
  • covid
    भाषा
    सिंगापुर के विशेषज्ञों को 2022 में ‘ओमीक्रोन’ के सबसे अधिक मामले सामने आने की आशंका
    24 Dec 2021
    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 वैश्विक महामारी को अगले साल खत्म करने के लिए विश्व से एक साथ आने का आह्वान किया है।
  • omicron
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश के 24 घंटो में 6,650 नए मामले, ओमिक्रॉन के मामले बढ़कर 350 के पार 
    24 Dec 2021
    देश में कोरोना वायरस संक्रमण के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन का खतरा बढ़ता जा रहे हैं। बढ़ते मामलो को देखकर कई राज्य सरकारों ने धीरे-धीरे पाबंदिया लगानी शुरू कर दी हैं।
  • kisan
    अमेय तिरोदकर
    महाराष्ट्र: किसानों की एक और जीत, किसान विरोधी बिल वापस लेने को एमवीए सरकार मजबूर
    24 Dec 2021
    मोदी सरकार के तीनों कृषि क़ानूनों को निरस्त करने के लिए मजबूर होने के बाद अब महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार ने वर्तमान में जारी विधानसभा सत्र के दौरान विधायी कामकाज के लिए सूचीबद्ध प्रस्तवित विधेयकों…
  • Modi in Varanasi
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव : पीएम मोदी की 1 लाख करोड़ की घोषणा कितनी प्रभावी?
    24 Dec 2021
    इसमें से क़रीब 70,000 करोड़ रुपये एक्सप्रेसवे और हवाई अड्डों के लिए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License