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कोविड-19
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वैश्विक महामारी कोरोना में शिक्षा से जुड़ी इन चर्चित घटनाओं ने खींचा दुनिया का ध्यान
कोविड-19 महामारी से यूं तो दुनिया के ज्यादातर देशों में एजुकेशन सिस्टम प्रभावित हुआ है, लेकिन अमेरिका के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अन्य देशों के मुकाबले यह अपेक्षाकृत अधिक ताकतवर और विकसित होने के बावजूद इस मोर्चे पर मौजूदा नस्लीय और आर्थिक असमानताओं से जूझता दिख रहा है।
शिरीष खरे
30 Nov 2021
Afganistan
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल की एक मस्जिद में पढ़ते स्कूली बच्चे. (फोटो साभार: ह्यूमन राइट्स वॉच)

इस वर्ष वैश्विक महामारी के दौरान कुछ देशों में स्कूली शिक्षा से जुड़ी चर्चित घटनाएं घटीं, जो कहीं रोचक बहस तो कहीं चिंता का सबब बन गईं। बात शुरू करते हैं हांगकांग से, जहां स्कूल परिसरों में बच्चों द्वारा किए जाने वाले राजनीतिक गीत-संगीत के आयोजन को लेकर वहां की सरकार और विशेष तौर पर शिक्षा मंत्रालय ने सख्त आपत्ति जताई थी और कहा था कि स्कूली बच्चों को चाहिए कि वे सियासी विषयों से दूर रहें। 

इस बारे में शिक्षा मंत्री केविन येउंग का कहना था कि स्कूली बच्चे अवयस्क होते हैं और इसलिए वे पूरी तरह से अभिव्यक्ति के अधिकार के योग्य नहीं माने जा सकते हैं. दूसरी तरफ, इस दौरान वहां के कुछ नागरिक समूहों ने इस मुद्दे पर विरोध जताते हुए यह मांग की कि बच्चों को भी राजनीतिक मुद्दों पर शांतिपूर्ण तरीके से अपना मत रखने और राजनीतिक मुद्दों पर हस्तक्षेप करने का अधिकार होना चाहिए।

हांगकांग के शिक्षा मंत्री केविन येउंग बीते दिनों अपने एक निर्णय के चलते चर्चा में रहे. (फोटो साभार: हांगकांग शिक्षा मंत्रालय पोर्टल)

कुछ नागरिक समूहों ने अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का हवाला देते हुए यह कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तभी प्रतिबंधित किया जा सकता है जब उससे दूसरों लोगों के अधिकारों में बाधा पहुंच रही हो, या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक हो, या फिर सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मामला हो।

इस दौरान हांगकांग की सरकार और वहां के शिक्षा मंत्री को इस मुद्दे पर घेरने के लिए इन नागरिक समूहों ने 'बाल-अधिकार सम्मेलन' के तहत बच्चों को भी दी गई बोलने की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के संकल्प की याद दिलाई और कहा कि राजनेताओं को असहज करने वाले गीतों में ऐसा कुछ भी गलत नहीं है कि उन पर प्रतिबंध लगाया जाए।

अफगानिस्तान में धार्मिक शिक्षा को लेकर चिंता

कुछ महीने पहले अफगानिस्तान सरकार के एक प्रस्ताव पर विश्व के कुछ मानवाधिकार संगठनों द्वारा शिक्षा क्षेत्र में वहां की सरकार की 'प्रतिबद्धता' पर चिंता जताई गई। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि प्राथमिक स्कूलों के तहत पहले तीन वर्षों के लिए बच्चे मस्जिद में पढ़ेंगे। इस प्रस्ताव को लाते समय अफगानिस्तान की शिक्षा मंत्री रंगीना हमीदी ने कहा, "हम स्कूल की अवधि की पहली, दूसरी और तीसरी कक्षाओं को मस्जिद में स्थानांतरित करने के लिए काम कर रहे हैं।" उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि नए भर्ती हुए छात्र मस्जिद परिसर के भीतर लगने वाले स्कूल में इन तीन कक्षाओं का अध्ययन करेंगे और फिर उसके बाद चौथी कक्षा के लिए स्कूल जाएंगे।

इसके बाद कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने प्राथमिक स्कूल के बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने के प्रस्ताव का विरोध जताते हुए कहा कि अफगानिस्तान के स्कूली राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में इस्लामिक अध्ययन पहले से ही एक प्रमुख भाग के रुप में शामिल है, ऐसे में इस प्रस्ताव से एक खतरा यह है कि गरीब समुदाय और दूरदराज के कई बच्चे शिक्षा से वंचित हो सकते हैं, क्योंकि अफगानिस्तान में 41% स्कूलों के पास अपने भवन तक नहीं हैं, जिस ओर सरकार का ध्यान नहीं जाएगा। हालांकि, ग्रामीण अंचल के कुछ बच्चे मस्जिदों में पढ़ने के लिए जाते हैं। इसके बावजूद मस्जिदों को सरकारी स्कूलों का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

दरअसल, अफगानिस्तान में मस्जिदें राष्ट्रीय पाठ्यक्रम को मानने के लिए बाध्य नहीं होती हैं। वहां शिक्षा मंत्रालय द्वारा निगरानी का कोई तंत्र तैयार नहीं है और बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को लेकर भी किसी तरह की कोई सुनिश्चितता नहीं है। 'ह्यूमन राइट्स वॉच' के सर्वेक्षण में मस्जिदों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चों ने यह बताया कि वहां उन्हें मुख्य रुप से धार्मिक शिक्षा दी जाती है।

आमतौर पर ऐसे बच्चे चौथी के लिए सरकारी स्कूलों में दाखिल होने लायक नहीं रहते हैं, क्योंकि उनमें चौथी के स्तर की प्रारंभिक शिक्षा की कमी रहती है। वहीं, एक मांग यह भी है कि मस्जिदों को शिक्षा मंत्रालय द्वारा पंजीकृत किया जाना चाहिए और मस्जिदों को बच्चों के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम पढ़ाना चाहिए।

बाइलिंगुअल एजुकेशन मॉडल से परेशान स्पेन

बीते समय स्पेन के शहर वलाडोलिड में अनेक शिक्षकों ने प्राकृतिक विज्ञान के बारे में बच्चों को पढ़ाने के लिए इंग्लिश के शब्दों के कारण आ रही मुश्किलों को लेकर चिंता जाहिर की। उनके मुताबिक प्राकृतिक विज्ञान में कुछ समान शब्द हैं जिनके अर्थ स्पेनिश और इंग्लिश में भिन्न-भिन्न हैं।

उदाहरण के लिए 'स्विफ्ट' (Swift) का मतलब अंग्रेजी में एक पक्षी की प्रजाति से हैं, लेकिन स्पेन में इसी नाम से एक पॉप सिंगर पॉपुलर है। शिक्षकों के मुताबिक जब वे स्विफ्ट पक्षी की तस्वीर बताते हुए बच्चों को इसके बारे में जानकारियां देते हैं, तो बच्चे इंग्लिश में इस पक्षी का नाम रटने के लिए पॉप सिंगर के नाम का सहारा लेते हैं, जो कि सीखने का एक गलत अभ्यास है।
 
वहीं, स्पेन के कई स्कूली शिक्षक यह मानते हैं कि उनके देश में चलाए जा रहे बाइलिंगुअल एजुकेशन प्रोग्राम बहुत सारी कमियों के कारण बच्चों के लिए परेशानी के सबब बनते जा रहे हैं। उनके मुताबिक वहां बाइलिंगुअल एजुकेशन प्रोग्राम को लेकर एक बड़ी समस्या यह है कि खासकर विज्ञान की पुस्तकों में दी गई शब्दावली और उच्चारण दोनों को लेकर बच्चे उलझन के शिकार बन रहे हैं।
वजह यह है कि इंग्लिश की क्लास में विज्ञान से जुड़े कई शब्द ऐसे होते हैं जिन्हें स्पेनिश बच्चे अपनी भाषा में कहीं बेहतर ढंग से समझते हैं। फिर विज्ञान के क्षेत्र के कई प्रचलित शब्द वहां इंग्लिश की बजाय स्पेनिश भाषा में कहीं उन्नत माने जाते हैं। इससे बच्चों को यह समझने में परेशानी हो रही है कि वह क्या पढ़ रहे हैं।

लिहाजा, स्कूली शिक्षकों की इस आपत्ति के बाद स्पेन के क्षेत्र कॉस्टिला वाई लियोन में सात सरकारी स्कूल बाइलिंगुअल एजुकेशन प्रोग्राम से बाहर हो गए हैं। इसी तरह, स्पेन के एक अन्य बड़े क्षेत्र कॉस्टिला-ला मंचा के 271 में से 80 स्कूल भी बाइलिंगुअल एजुकेशन प्रोग्राम पर आधारित मॉडल को नकार चुके हैं।

दूसरी तरफ, मैड्रिड क्षेत्र के सभी नए स्कूलों में बाइलिंगुअल एजुकेशन प्रोग्राम को अनिवार्य रखा गया है। इसका नतीजा यह है कि इस क्षेत्र में स्कूली बच्चों के परिजनों को अपने बच्चों के लिए नॉन-बाइलिंगुअल एजुकेशन पर आधारित कोर्स वाले स्कूल ढूंढ़ने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, कई शिक्षक बड़ी संख्या में अरब से संबंधित देशों से आए गैर-स्पेनिश छात्रों के बारे में अपनी राय देते हुए कहते हैं कि जो छात्र स्पेनिश सीखने के लिए ही जूझ रहे हैं, उन पर इंग्लिश सीखने का बोझ भी क्यों बढ़ाया जाए।

कहा यह भी जा रहा है कि स्पेन की उन जगहों पर जो शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे हैं, यदि वहां के स्कूली निकायों के शिक्षक, परिजन और बच्चे बाइलिंगुअल प्रोग्राम का विरोध करते हैं तो स्कूल प्रबंधन अपने यहां इंग्लिश में पढ़ाने की बाध्यता तोड़ सकते हैं।

प्रश्न है कि स्पेन की स्कूली शिक्षा में वहां विभिन्न वैचारिक राजनैतिक दलों के समर्थन से जो एक बड़ी शैक्षणिक पहल हुई थी, उसे स्कूल स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहे हैं? इस बारे में कार्लोस-III यूनिवर्सिटी में रिसर्चर ऐंटीनो कब्रालेस यह मानते हैं कि स्कूलों के स्पेनिस कोर्स में पहले से ही बहुत अधिक कंटेंट शामिल किया जा चुका है, ऐसे में इंग्लिश कोर्स भी जोड़ने से खासकर उन शिक्षकों पर अतिरिक्त भार आ गया है, जो मूलत: इंग्लिश के शिक्षक नहीं हैं।

देखा जाए तो वर्ष 2000 से स्पेन में बाइलिंगुअल एजुकेशन को क्षेत्रीय सरकारों द्वारा बड़ी मजबूती के साथ बढ़ावा देने की कोशिशें शुरू हुई थीं। इसके लिए सरकारी और अर्ध-सरकारी स्कूलों में राज्य की वित्तीय मदद से कार्यक्रम शुरू किए गए थे। इसके तहत केटालोनिया राज्य को छोड़ दिया जाए तो पूरे यूरोप में वर्ष 2010-11 तक दो लाख चालीस हजार 154 छात्रों ने अपने पंजीयन कराए थे।

महामारी और अमेरिका के एजुकेशन सिस्टम में व्याप्त नस्लीय भेदभाव

कोविड-19 महामारी से यूं तो दुनिया के ज्यादातर देशों में एजुकेशन प्रभावित हुआ है, लेकिन अमेरिका के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अन्य देशों के मुकाबले यह अपेक्षाकृत अधिक ताकतवर और विकसित होने के बावजूद इस मोर्चे पर मौजूदा नस्लीय और आर्थिक असमानताओं से जूझता दिख रहा है।

इस दौरान वहां वंचित वर्ग के बच्चों की शिक्षा के लिए किए गए अनेक प्रयासों पर पानी फिरता तो दिख ही रहा है, खास तौर से अमेरिका का गरीब अश्वेत समुदाय मुख्यधारा की शैक्षणिक गतिविधियों से दूर हो रहा है।

हावर्ड ग्रेजुएट स्कूल में एजुकेशन रिडिजाइन लैब के संस्थापक व निदेशक पॉल रेविल के मुताबिक अमेरिका में प्रणालीगत जातिवाद से पैदा हुए अतिरिक्त तनाव और गरीबी व हिंसा प्रेरित आघातों ने वंचित वर्ग के स्वास्थ्य और कल्याण पर बुरा असर डाला है और यही असर उनके बच्चों की शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ा है। वह कहते हैं, "हाशिए पर रहने वाले अश्वेत और अल्पसंख्यक अमेरिकी बच्चों और उनके परिजनों की चुनौतियां अब पहले से विकट हो चुकी हैं, खासकर उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाना उनके लिए पहले से और भी ज्यादा मुश्किल हो गया है।"

पॉल रेविल के मुताबिक ताजा शोध बताता है कि कोरोना प्रकोप के समय अमेरिका में भी लगभग सभी स्कूली बच्चे शिक्षा के मामले में पिछड़ चुके हैं। इनमें बड़ी संख्या अश्वेत बच्चों की है, जो विशेष रुप से गणित जैसे विषय में पीछे छूट रहे हैं।

यहां महत्त्वपूर्ण बात है कि यह रिपोर्ट अमेरिका में नस्लीय और आर्थिक कारण से आई डिजिटल असमानता को भी स्पष्ट करती है। इसमें यह तथ्य सामने आया कि अश्वेत परिवारों के स्कूली बच्चों की तुलना में करीब डेढ़ गुना अधिक श्वेत परिवार के बच्चों ने कंप्यूटर और इंटरनेट का उपयोग किया। यह एक ऐसी समस्या है जिसके वहां दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि अमेरिका में ज्यादातर अश्वेत परिवारों के बच्चे दूर-दराज के गांवों में रहते हैं, जहां आज भी ऑनलाइन एजुकेशन का माहौल नहीं बन सका है।

अमेरिका की शिक्षाविद व अर्थशास्त्री ब्रिजेट लॉन्ग कहती हैं, "कोविड ने खुलासा किया है कि ये असमानताएं कितनी गंभीर हैं। इसने कम आय वाले परिवारों के छात्रों, विशेष जरूरतों वाले छात्रों और सीमित संसाधन वाले स्कूली सिस्टम को अत्याधिक नुकसान पहुंचाया है।" सामुदायिक आधारित कॉलेज निम्न-आय के परिवार वाले छात्रों के लिए प्रवेश-द्वार होते हैं, जहां वे विभिन्न मुद्दों पर शोध-अध्ययन कर सकते हैं। ब्रिजेट लॉन्ग कहती हैं, "कोविड ने इस प्रक्रिया को दस गुना बदतर बना दिया है। इसलिए सामुदायिक आधारित कॉलेजों में नामांकन की संख्या अत्याधिक घट गई है।"

सार्वजनिक प्राथमिक स्कूलों में भेदभाव के कारण होने वाले नुकसान का अंतर वहां साफ दिखाई देता है। वर्ष 2019 की एक अध्ययन के मुताबिक अमेरिका में अश्वेत बहुल जिलों के मुकाबले श्वेत बहुल जिलों में अधिक धन खर्च किया जाता है।

वहीं, ब्रिजेट लॉन्ग के मुताबिक स्कूल अध्यन केंद्र के अलावा भी अन्य कारणों से महत्त्वपूर्ण हैं और ऐसी बातें कोविड के समय कहीं अधिक अच्छी तरह से स्पष्ट भी हुई हैं। दरअसल, स्कूल बच्चों का सामाजिक व भावनात्मक रुप से समर्थन करते हैं, उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हैं। स्कूल भोजन सुरक्षा और स्वास्थ्य देखभाल की प्रणाली भी है. जाहिर है कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान अश्वेत परिवारों के बच्चों को उठाना पड़ा है।

ब्रिजेट लॉन्ग कहती हैं कि जब स्कूली बच्चों को सुरक्षा और समर्थन की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब इस सुरक्षा जाल को काट दिया गया है, जबकि ऐसे बच्चों की संख्या कहीं अधिक है। अमेरिका में कोविड से करीब 4 लाख मौतें हो चुकी हैं, स्वास्थ्य से लेकर आजीविका के संकट के मामले में यह प्रकोप अश्वेत समुदायों को असमान रूप से प्रभावित कर रहा है, ऐसे में आप उन बच्चों की कल्पना कर सकते हैं, जो इस परिस्थिति में घरों में रहे। 

(शिरीष खरे पुणे स्थित स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।) 

ये भी पढ़ें: विचार: एक समरूप शिक्षा प्रणाली हिंदुत्व के साथ अच्छी तरह मेल खाती है

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