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भारत
राजनीति
यह सामुहिक शर्म का मामला है
रजनीश साहिल
29 Apr 2015
पिछले कुछ दिनों में इसके सिवाय कुछ नया नहीं हुआ कि एक किसान ने चुपचाप अपने खेत को न चुनते हुए देश की राजधानी के एक पेड़ पर, पूरे सरकारी तंत्र की नाक के नीचे ऐलानिया आत्महत्या कर ली। इसके बाद भी जो हुआ और हो रहा है वह भी पुराना ही है। आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं, गेंद दूसरे के पाले में फेंकी जा रही है। टीवी पर तमाम बहसें हो रही हैं जिनमें बस यह परतें खोली जा रही हैं कि यूपीए ने यह किया, एनडीए ने वह। जो किसी भी तरह इससे अलग नहीं है जैसे झगड़े के दौरान एक आदमी दूसरे से कहे कि ‘तू ने भी तो यह किया था।’ राजनीति के गलियारों में चल रही गतिविधियों और टीवी चैनलों पर किसान के नाम पर हो रही इन बहसों से किसान और उसकी समस्याएँ नदारद हैं। 
                                                                                                      
 
गजेन्द्र की आत्महत्या पर तो सब बात कर रहे हैं, लेकिन इस पर कोई बात नहीं कर रहा कि आखिर क्यों एक किसान राजस्थान से दिल्ली आकर आत्महत्या करता है। आखिर क्यों राज्य और केन्द्र सरकारों की मुआवज़े और राहत की घोषणाओं के बावजूद एक किसान आत्महत्या करता है? वह कौन-सा सच है जिसे सुनाने के लिए उसे अपनी जान देनी पड़ती है? यह वह सवाल है जो कृषि के प्रति सरकारों की जवाबदेही और तमाम योजनाओं को कठघरे में खड़ा करता है। इसे गंभीरता से लिये जाने की ज़रूरत है। पर दुःखद है कि अब भी इस ओर हमारे नीति निर्माताओं का ध्यान नहीं है।
 
2006 में जब विदर्भ में एक साथ कई किसानों की आत्महत्या की ख़बर आाई थी और यह मुद्दा गरमाया था, तब से अब तक किसान आत्महत्या के आँकड़े देखें तो यह बेहद डराने वाले हैं। और पीछे जाएँ तो पंद्रह सालों में तकरीबन चार लाख किसान अपनी जान दे चुके हैं। लगातार किसान आत्महत्याओं का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है, अकेले महाराष्ट्र में ही यह वृद्धि 40 प्रतिशत से ज्यादा है। मध्यप्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश जिन्हें कि कृषि संपन्न राज्य माना जाता है, वहाँ किसान आत्महत्या कर रहे हैं। इन तमाम मौतों को सूखा, बाढ़, बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं के मत्थे मढ़ा जाता रहा है। (हालाँकि यह भी एक सवाल है कि यह आपदाएँ कितनी प्राकृतिक हैं और कितनी मानव-जनित।) अगर पड़ताल करें तो पाएँगे कि यह कृषि की सरकारी उपेक्षा और राजनीतिक संवेदनहीनता का मामला भी है। यह महज फसल की बर्बादी से हुई मौतें नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था द्वारा ली गई जानें भी हैं जिसमें आज भी देश के कृषि समृद्ध राज्यों में किसान की औसत मासिक आय महज 3000 रुपये है। बाकी राज्यों में इससे भी कम। जिसमें 80 प्रतिशत किसान बड़े कर्ज़ के बोझ तले हैं और कृषि के लिए मिलने वाली सुविधाओं का 90 प्रतिशत लाभ किसानों के बजाय कृषि कंपनियों को मिल रहा है। और यह उन किसानों के संदर्भ में है जिनके पास अपनी ज़मीन है। खेती पर आश्रित लोगों में सबसे बड़ी तादात खेतिहर मज़दूरों की है जो इससे भी महरूम हैं। 
 
फसल ख़राब होने पर मिलने वाले मुआवज़े पर सब इन दिनों सब अपनी-अपनी पीठ ठोक रहे हैं कि हमने नुकसान की सीमा 50 से घटाकर 33 प्रतिशत कर दी, कि हमने दूसरे राज्यों से ज़्यादा मुआवज़े का ऐलान किया। पर इस हकीकत पर कोई ध्यान नहीं दे रहा कि न तो अब तक हर जगह नुकसान का सही आकलन हुआ है और न ही मुआवज़ा लोगों तक पहुँचा है। यह भी कोई नयी बात नहीं है। पिछले साल बर्बाद हुई फसल के आकलन और मुआवजे के लिए किसान आज भी इंतज़ार कर रहे हैं। यह क्रम कई सालों से जारी है। मौसम की मार झेली फसल का बाज़ार में मूल्य नहीं है। सरकारी अनाज मंडियों से किसान मायूस लौट रहे हैं क्योंकि मौसम की मार झेल चुके अनाज का कोई ख़रीदार नहीं है। ‘ग़रीबी में आटा गीला’ होने जैसी इस स्थिति में सरकार की ओर से सिर्फ़ आश्वासन ही मिलते रहे हैं, जो धरातल पर नहीं उतरते। जबकि इसके उलट देखें तो जब भी किसी विकास परियोजना के नाम पर, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के नाम पर किसानों की ज़मीन चाहिए होती है, तो घोषणाएँ तुरंत अमली जामा पहनने लगती हैं। यह कोई आज की सरकार अकेली पर या केवल केन्द्र की पिछली सरकारों पर आक्षेप नहीं हैं। यह अगली-पिछली राज्य सरकारों पर भी लागू है।
 
मुआवज़े और राहत पैकेज की घोषणाएँ कोई नई चीज़ नहीं हैं और अब तक का इनका अनुभव बताता है कि इससे किसानों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। यह पिछले ही सालों की घटनाएँ हैं जब किसानों को दो और तीन रुपये के मुआवज़े के चैक मिले थे। बुंदेलखंड से खबरें आई थीं कि ग़रीबी और सूखे की मार झेल रहे किसान अपने परिजनों को बेच रहे हैं। एक तो मुआवज़े का आकलन वैसे भी लागत से तक कम होता है, उस पर भी अगर तीन से पचहत्तर रुपये तक का मुआवज़ा मिलने जैसा घिनौना मज़ाक किसान के साथ होता है, तो वह किस तरह सरकार की राहत घोषणाओं पर यकीन करे। अगर किसी भी इलाके में किसान के साथ बुंदेलखंड जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं या वह आत्महत्या को चुनता है तो निश्चित तौर पर यह देश के नागरिक के मूलभूत अधिकारों की अनदेखी है। यह संविधान की उस धारा का उल्लंघन है जिसके मुताबिक प्रत्येक नागरिक को मूलभूत सुविधाएँ और गुणवत्तापूर्ण जीवन मुहैया कराना राज्य का दायित्व है। किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएँ और उनमें हो रही निरंतर वृद्धि यह साफ करती है कि राज्य यानी सरकारें इस दायित्व को निभाने में नाकाम रही हैं। 
 
कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था का दंभ भरती सरकारों ने कृषि को लेकर किये गए प्रयासों में खेती की संवहनीय या टिकाऊ व्यवस्था पर ध्यान न के बराबर दिया है। ‘कितने टन अनाज का उत्पादन हुआ’ के पैमाने से एग्रीकल्चरल ग्रोथ मापने वाली व्यवस्था में सबसे ज़रूरी चीज़ खेती के लिए ज़रूरी अधोसंरचनाओं की कमी आज भी है। भारत की कुल कृषि भूमि में से 68 प्रतिशत भूमि पर खेती बारिश पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए बुंदेलखंड और विदर्भ ऐसे ही इलाके हैं और बीते एक दशक से वहाँ सूखे की मार हर साल अख़बारों की सुर्खियों में दिखाई देती है। वैश्विक तापमान वृद्धि और पर्यावरणीय असंतुलन (क्लाइमेट चेंज) के वर्तमान परिदृष्य में यह अब कोई न मानने जैसी बात नहीं रही है कि बारिश अनियमित हो गई है। आने वाले समय में यह स्थिति और कितना गंभीर रूप लेगी इसका बस अनुमान ही लगाया जा सकता है, जो भयावह है। जो लोग पर्यावरण के इस बदलाव पर चल रहे शोध और अंतरराष्ट्रीय बहसों पर नज़र रखते हैं वे बखूबी इसकी गंभीरता को जानते हैं। इस लिहाज से सरकार से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह भी इस गंभीरता को समझती होगी, क्योंकि वह खुद अंतरराष्ट्रीय बहसों में एक पार्टी है। यह भी बहुत साफ है कि मौसम में किसी भी प्रकार के बदलाव का प्रभाव कृषि पर पड़ता ही है। इस सबके बावजूद अगर सरकार राहत पैकेजों की घोषणा के इतर कृषि की संवहनीय व्यवस्था के प्रति गंभीर और प्रतिबद्ध दिखाई नहीं देती तो यह दुःखद है। ठीक यही बात औसत आय को आधार मानकर किसानों के आर्थिक स्तर के संदर्भ में सरकार के प्रयासों (अनाज भंडारण, कृषि उपज मंडियों की स्थिति, समर्थन मूल्य आदि) के बारे में भी कही जा सकती है।
 
गजेन्द्र शायद पूरे देश के किसानों की इन्हीं दुःखद स्थितियों का विलाप राजधानी को सुनाने आया था। मगर अफ़सोस, उसकी मौत भी राजनीति के धुरंधरों के लिए खेलने के ही काम आ रही है। ऐसा करते हुए उन्हें झिझक तक नहीं हो रही, जबकि यह किसी एक दल के लिए नहीं सभी के लिए सामुहिक शर्म का मामला है।
 
डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।
गजेन्द्र सिंह
जंतर मंतर
आम आदमी पार्टी
भूमि अधिग्रहण कानून
भाजपा

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