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‘यूनिवर्सल बेसिक इनकम’ : विचार और व्यावहारिकता के बीच खड़े हैं कई सवाल
यूनिवर्सल बेसिक इनकम का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि नागरिकों को एक तरफ पैसे दिए जाएं और दूसरी तरफ से सामाजिक कल्याण की योजनाएं हटा ली जाएं...।
अजय कुमार
18 Jan 2019
यूनिवर्सल बेसिक इनकम
सांकेतिक तस्वीर

 

हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहाँ इतने संसाधन हैं कि उनका सही तरह से बंटवारा हो तो एक इंसान ऐसी जिंदगी  के बारे में सोच सकता है जिसे जीना कहा जाता है। इतिहास से लेकर अब तक के जीवन संघर्ष की यात्रा में ऐसा नहीं हुआ है लेकिन लोकतांत्रिक ढांचे की यही खासियत है कि इसके संघर्ष हर वक्त उस दिशा की तरफ देखते हैं जिधर से वह रास्ता जाता है,जिसपर चलते हुए सभी के लिए आजादी बराबरी और इंसाफ हासिल किया जा सके। सिक्किम की सत्ताधारी पार्टी सिक्किम डेमोक्रेटिक  फ्रंट (एसडीएफ) द्वारा अपने चुनाव घोषणापत्र में यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) शामिल करने का फैसला लेना भी इसी दिशा का एक कदम है। इनका कहना है कि अगर 2019 में सिक्किम में एक बार फिर हमारी सरकार बनती है तो साल 2022 तक हम पूरे राज्य में यूनिवर्सल बेसिक इनकम लागू कर देंगे। और अगर ऐसा होता है तो सिक्किम पूरे भारत में यूनिवर्सल बेसिक इनकम अपनाने वाला पहला राज्य बन जाएगा। इस पूरी खबर के बहाने हमें एक बार फिर यह अवसर मिला है कि हम यह समझें कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम क्या है और भारत जैसे देश में इसे कैसे लागू किया जाना चाहिए ?

 यूनिवर्सल बेसिक इनकम 

 यूनिवर्सल बेसिक इनकम मतलब सभी के लिए बुनियादी आय। यानी राज्य के जरिये अपने सभी नागरिकों को बिना किसी शर्त के इतनी आय का सहयोग जिससे वह अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर पाए। यह विचार इस नजरिये पर निर्भर है कि एक न्यायसंगत समाज बनाने के लिए सबसे पहली जरूरत यह है कि सबकी बुनियादी जरूरतें पूरी हों। साथ में यह विचार यह भी कहता है कि  जैसे ही हम जन्म लेते हैं वैसे ही हम उस संसाधन के हकदार हो जाते हैं, जो हमारे जीने के लिए जरूरी है, इसलिए राज्य की यह जिम्मेदारी बनती है कि हमें वह साधन उपलब्ध करवाए जिससे हम सभी उन संसाधनों का इस्तेमाल कर पाए जो एक जिंदगी जीने के लिए जरूरी हैं। थोड़े और आसान शब्दों में कहें तो सबके पास इतना पैसा हो जिससे उसकी रोटी,कपड़ा, मकान सहित सभी आवश्यक जरूरतें पूरी हों। 

यूनिवर्सल बेसिक इनकम के पक्ष और विपक्ष में तर्क 

इसके पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि घनघोर आर्थिक गैरबराबरी सबके हकों को छीन रही है। कम से कम सभी अपने हकों को समझ सकें इसलिए राज्य उन्हें इतनी आय मुहैया करवाए जिससे उनकी बुनियादी जरूरतें पूरा हों। इसके साथ यह भी कहा जाता है टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन की वजह से आगे चलकर नौकरियां कम होती जाएँगी, इसलिए राज्य को इस पर विचार करना चाहिए कि कैसे सभी अपनी बुनियादी जरूरतें पूरा कर पाएं। इस लिहाज से यूनिवर्सल बेसिक इनकम भारत जैसे देश की जरूरत हो सकती है। इनके अलावा यह तर्क तो सबसे जरूरी है ही कि  ऐसी किसी भी तरह की योजना से बहुत  बड़ी गरीब आबादी को अपनी परेशानियों और मजबूरियों से राहत मिलती है।

 इसके विपक्ष में बात करने वाले कहते हैं कि इंसान पैसे की वजह से ही काम करता है। अगर बिना काम के उसे पैसे मिल जाएंगे तो वह करना बंद कर देगा। वह आलसी और निठल्ला हो जाएगा। यह तर्क बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है। इस तर्क के पीछे सबसे बड़ी कमी है इसका नजरिया। यह तर्क इस नजरिया से पैदा होता है कि इंसान पैसे के लिए काम करता है। किसी दूसरी तरह की चाहतें उसे काम करने के लिए नहीं उकसाती हैं। साथ में यह भी कि इंसान काम करने के लिए ही जन्म लेता है। इंसानों के लिए अपनाया जाने वाला यह बहुत ही क्रूर किस्म का नजरिया है। यूनिवर्सल बेसिक इनकम से इंसानों के लिए बना यह   क्रूर नजरिया भी कमजोर होता है, क्योंकि इस विचार का जन्म ही इस बात से होता है जन्म लेते ही इंसान अपने जीवन के बुनियादी हकों का मालिक हो जाता है और उसे ये हक मिलना ही चाहिए। लेन-देन वाली व्यवस्था की यह जिम्मेदारी बनती है कि  वह ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें सबके बुनियादी हकों की मौत नहीं होती हो।  इसके साथ दूसरी चिंता यह जताई जाती है कि क्या आय को रोजगार से अलग कर देना चाहिए। यानी क्या ऐसी सम्भावना के बारें में सोचा जा सकता है जहां बिना रोजागर के आय मिले। इस तरह से सोचने वाले यह भूल जाते हैं गैर-बराबरी वाले समाज की यह हकीकत है कि बहुत छोटी आबादी बिना काम के ही बहुत बड़ी आबादी के हकों और आय पर कब्जा जमाये बैठी रहती है। इस गैरबराबरी को कम करने के लिए जरूरी है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसे तरीके अपनाए जाएं। 

मौजूदा समय में यूनिवर्सल बेसिक इनकम और भारत 

साल 2017 आर्थिक सर्वे में पहली बार भारत के सरकारी किताबों में इसपर वैचारिक किस्म की चर्चा हुई। उसके बाद अभी जाकर सिक्किम की सरकार ने इस पर मजबूती से फैसला लेने का इशारा दिया है। भारत के संदर्भ में हकीकत यह है कि तेंदुलकर कमेटी के हिसाब से भारत में किसी व्यक्ति को  गरीबी रेखा से ऊपर उठने के लिए तकरीबन महीने में 1090 रुपये की जरूरत पड़ती है। अगर भारत की पूरी आबादी के लिए  इतनी राशि का जुगाड़ किया जाए तो सरकार को एक महीने में अपने साल भर की पूरी कमाई का तकरीबन साढ़े बारह फीसदी खर्च करना होगा। यानी अभी हाल-फिलहाल भारत की पूरी आबादी के लिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम लागू करना नामुमकिन है क्योंकि यह खर्चा भारत की महीने भर की आमदनी से बहुत ज्यादा है, इसलिए अभी की जरूरत यह है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम एक विचार के तौर पर हमारे साथ बना रहे और सरकार सामाजिक कल्याण और गरीबी उत्थान से जुडी योजनाओं पर अधिक ख़र्च कर जनता की भलाई का अपना काम करती रहे रहे। 

इस विषय पर न्यूज़क्लिक से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार सुबोध वर्मा कहते हैं ''भारत जैसे देश में यूनिवर्सल बेसिक इनकम एक विचार के तौर पर तब बहुत अच्छा विचार है, जब सरकार इसे लागू करने के बारे में सोचते हुए यह ना सोचे कि इसे लागू करने के बाद राज्य की तरफ से नागरिकों को दी जाने वाली दूसरे सहयोग छीन लिए जाएंगे। यानी यूनिवर्सल बेसिक इनकम का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि नागरिकों को एक तरफ पैसे दिए जाएं और दूसरी तरफ से फ़ूड सिक्योरिटी स्कीम, गैस सब्सिडी, खाद सब्सिडी जैसी योजनाएं हटा ली जाएं। अभी जिस तरह की सरकारें पूरी दुनिया में काम कर रही हैं उनका रवैया समाजवादी किस्म का नहीं है। वह बाजार के सहारे जनता की भलाई का सपना देखने वाले सरकारें हैं। इनको सलाह देने वाले अर्थशास्त्री उदारवादी धड़े से आते हैं। इनके मुँह से यूनिवर्सल इनकम जैसी अच्छी बातें सुनकर यह लगता है कि यह एक तरफ से पैसा देंगी और दूसरी तरफ यह कहेंगी कि अब हम सभी नागरिकों को पैसा दे रहे हैं इसलिए आरक्षण जैसी व्यवस्था ख़ारिज की जाती है। सिद्धांत में यूनिवर्सल इनकम शब्द जितना अच्छा लगता है, हमारी व्यवहारिक राजनीति इसे इतना ही खौफनाक बनाती है। अगर केवल इस सोच के आधार पर इसे लागू किया जाए कि जन्म से ही हर इंसान अपनी बुनियादी जरूरतों का हकदार होता है तो यह सही है लेकिन इसके पीछे अगर यह मंशा हो कि सरकार का मतलब केवल बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी को पैसा देना है तो यह बिलकुल गलत है।''

 

 

 

 

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