NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
यूपी एनकाउंटरः पीयूसीएल ने स्वतंत्र जांच के लिए एससी में याचिका दाख़िल किया
राज्य भर में मार्च 2017 से 1,100 से ज़्यादा एनकाउंटर किए गए जिसमें 49 लोग मारे गए। वहीं 370 से ज़्यादा लोग घायल हुए और 3,300 से अधिक गिरफ्तार किए गए हैं।
विवान एबन
04 Jul 2018
pucl

यूपी में एनकाउंटर की बढ़ते मामलों को लेकर कहा जा रहा है कि ये अब योगी की अगुवाई वाली उत्तर प्रदेश सरकार की पहचान बन गई है। मार्च 2017 से 1,100से ज़्यादा एनकाउंटर किए गए जिसमें 49 लोग मारे गए हैं। राज्य भर में 370 से ज़्यादा लोग घायल हुए हैं और 3,300 से अधिक गिरफ्तार किए गए हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) से नोटिस दिए जाने के बावजूद लगता है कोई कार्रवाई नहीं की गई। हालांकि पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज(पीयूसीएल) ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर किया है और आरोप लगाया कि पहले के फैसलों में अदालत द्वारा जारी दिशानिर्देशों का उत्तर प्रदेश पुलिस ने पालन नहीं किया। सोमवार को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की एक खंडपीठ ने कहा कि याचिका की एक कॉपी राज्य के एडिशनल एडवोकेट जनरल को दी जाए जो दो सप्ताह के भीतर जवाब देंगे। पीयूसीएल ने अपनी याचिका में अदालत की निगरानी में एक स्वतंत्र जांच के लिए अदालत से दिशानिर्देश देने के लिए प्रार्थना किया है। पीड़ितों के परिवारों को पर्याप्त मुआवजा देने के लिए भी याचिका में प्रार्थना किया गया है।

याचिका में इन घटनाओं की टाइमलाइन दी गई है जिसने पीयूसीएल को ये मानने पर मजबूर किया कि यूपी में वर्तमान योगी सरकार अपराध ख़त्म करने के नाम पर 'प्रशासन को ध्वस्त' कर रही थी। यूपी के संबंध में 16 सितंबर 2017 को हिंदू में प्रकाशित एक रिपोर्ट के साथ यह टाइमलाइन शुरू हुई। यह बताया गया कि सहायक महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) आनंद कुमार ने कहा था कि यूपी में पुलिस मुठभेड़ "सरकार की इच्छाओं, जनता की अपेक्षाओं और पुलिस को दी गई संवैधानिक तथा कानूनी शक्ति के अनुसार थी।" इस रिपोर्ट में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बयान को लिखा गया है कि" आज अपराधी डरते हैं कि उन्हें अपराध छोड़ देना होगा या यूपी, या इस दुनिया को भी छोड़ देना होगा।" 19 नवंबर 2017 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि" अपराधियों को मुठभेड़ों में मार दिया जाएगा या जेल में डाल दिया जाएगा।" तीन दिन बाद एनएचआरसी ने मीडिया में रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री के बयान का स्वतः संज्ञान लिया और सरकार द्वारा पुलिस मुठभेड़ों का समर्थन करने पर चिंता व्यक्त की थी।

5 फरवरी 2018 को नोएडा में पुलिस एनकाउंटर के दौरान एक जिम ट्रेनर गंभीर रूप से घायल हो गया था। एनएचआरसी ने इसकी निंदा करते हुए उसी दिन एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि "वे (पुलिस) लोगों के विवाद को सुलझाने में अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल कर रही है। पुलिस बल लोगों की रक्षा करने के लिए है और इस तरह की घटनाएं समाज को गलत संदेश भेजेगी। भय का माहौल बनाना अपराध से निपटने का सही तरीका नहीं है। इस विशेष मामले में घायल व्यक्ति अपराधी नहीं है। वह अपने दोस्तों के साथ जा रहा था तब आरोपी एसआई द्वारा किए गए निर्दयी व्यवहार ने निर्ममता से जीवन और स्वतंत्रता के उसके अधिकार का हनन किया था।" हालांकि 9 फरवरी को योगी आदित्यनाथ ने इन मुठभेड़ों के बारे में विपक्ष की सवालों का जवाब दिया और कहा कि" सभी की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए, लेकिन जो लोग समाज की शांति को ख़त्म करना चाहते हैं और बंदूक में विश्वास करते हैं उन्हें बंदूक की भाषा में ही जवाब दिया जाना चाहिए।" 15 फरवरी को उन्होंने कहा कि " यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग अपराधियों के प्रति सहानुभूति दिखा रहे हैं। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। 3 फरवरी को नोएडा की घटना हुई जिसमें जितेंद्र यादव को गोली मारी गई थी वह पुलिस एनकाउंटर नहीं थी और पुलिस इसे मुठभेड़ के रूप में नहीं मानती है। यहां तक कि पीड़ित व्यक्ति ने इसका समर्थन किया था।"

याचिका में एनडीटीवी, द वायर और द हिंदू के लेखों का संदर्भ भी दिया गया है। 21 फरवरी को एनडीटीवी ने एक लेख प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने पाया कि यूपी पुलिस द्वारा मुठभेड़ के बाद दायर किए गए सभी एफआईआर की भाषाएं एक जैसी थी मानो कि उनको कॉपी कर चिपका दिया गया था।

24 फरवरी को द वायर ने एक लेख प्रकाशित किया जिसमें बताया गया था कि चौदह मुठभेड़ों में मारे गए तेरह मुस्लिम थें। इस लेख में प्रत्येक मुठभेड़ के विवरणों में समानताओं को भी उजागर किया गया। सभी पीड़ित सत्रह और चालीस वर्ष के बीच के थे और सभी पर मुकदमे चल रहे थे। प्रत्येक एनकाउंटर से पहले पुलिस को उनके लोकेशन के बारे में गुप्त सूचना मिली। पीड़ितों को या तो बाइक या कार पर दिखाया गया था और दिखाया गया कि जैसे ही पुलिस ने उन्हें रोका उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी को गोली लगी और अस्पताल पहुंचते ही दम तोड़ दिया। ज़्यादातर मामलों में पुलिस ने एक .32 बोर पिस्टल और ज़िदा कारतूस बरामद किया था। इस लेख में यह भी उल्लेख किया गया कि मारे गए लोगों के लिए इनाम की घोषणा मुठभेड़ के बाद की गई थी।

31 मार्च को द हिंदू ने एक लेख प्रकाशित किया जिसमें कहा गया था कि "मार्च 2017 से राज्य भर में 1,100 से अधिक मुठभेड़ों में 49 लोग मारे गए हैं और 370से ज़्यादा लोग घायल हुए हैं और 3,300 से अधिक गिरफ्तार किए गए हैं।"

इस एनकाउंटर में दिलचस्प यह है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही क़ानून बना दिया गया है। साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (मणिपुर फर्जी मुठभेड़ मामले) में कहा था कि आरोपी को गिरफ्तार करने का विकल्प कहीं भी उपलब्ध था, आतंकवाद से निपटने के लिए उन्हें जबरन मारना न्यायसंगत उपाय नहीं था। पश्चिम बंगाल राज्य बनाम डीके बसु मामले में जिसका फैसला 1997 में ही किया गया था सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "अगर सरकारी अधिकारी क़ानून तोड़ने वाले बन जाते हैं तो वे क़ानून की अवमानना को बढ़ावा देंगे और वे कानूनहीनता को प्रोत्साहित करेंगे और हर आदमी में अपने आप को कानून बनने की प्रवृत्ति होगी, जिससे अराजकता का कारण बनता है। कोई सभ्य राष्ट्र ऐसा होने की अनुमति नहीं दे सकता है।"

झारखंड राज्य बनाम ओम प्रकाश मामले में साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "सिर्फ एक कुख्यात अपराधी होने पर आरोपी को मारना पुलिस अधिकारियों का काम नहीं है। निस्संदेह, पुलिस को आरोपी को गिरफ्तार करना होगा और उन्हें मुकदमा करना होगा। अदालत ने पुलिस कर्मियों को बार-बार चेताया है जो अपराधियों को मारते हैं और इस घटना को एक मुठभेड़ के रूप में पेश करते हैं। ऐसी हत्याओं को बंद किया जाना चाहिए। वे हमारे आपराधिक न्याय प्रशासन प्रणाली द्वारा़ क़ानूनी रूप से मान्यता प्राप्त नहीं हैं। वे राज्य प्रायोजित आतंकवाद का परिणाम है।"

आखिरकार साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य में अपने फैसले के माध्यम से मुठभेड़ की हत्या के मामले में विस्तृत दिशानिर्देशों दिया। इन दिशानिर्देशों ने उस तरीके का उल्लेख किया जिसमें मुठभेड़ की साइट को रिकॉर्ड की जानी चाहिए। मृत व्यक्तियों के परिवारों को मौत की जानकारी दी जानी चाहिए। इस दिशानिर्देशों में यह भी उल्लेख किया गया है कि जब तक पुलिस कर्मियों को बहादुरी को संदेह से परे नहीं माना जाता है तब तक मुठभेड़ में शामिल पुलिस कर्मियों को बहादुरी का पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी बताया कि मुठभेड़ की रिपोर्ट की जांच सीआईडी या अन्य पुलिस स्टेशन के पुलिस कर्मियों द्वारा की जानी चाहिए।

यहां जो पता चलता है वह यह कि यद्यपि क़ानून है लेकिन यूपी में मुठभेड़ इतनी ज़्यादा संख्या से कोई यह मान सकता है कि यहां कानून का पालन नहीं किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए रिपोर्ट ने दिखाया कि पीड़ितों के परिवारों को मौत की जानकारी कभी भी पुलिस द्वारा नहीं की गई थी। न तो कोई मुआवजा दिया गया है। जब कोई मानता है कि दर्ज एफआईआर की भाषा की कॉपी की गई है तो यह स्पष्ट है कि यूपी में वर्दीधारियों ने क़ानून का पालन नहीं किया। इस निर्ममता का खुलासा केवल स्वतंत्र जांच से ही संभव हो सकता है।

PUCL
yogi government
Uttar pradesh
Encounter killings

Related Stories

आजमगढ़ उप-चुनाव: भाजपा के निरहुआ के सामने होंगे धर्मेंद्र यादव

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही मस्जिद ईदगाह प्रकरण में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल

ग्राउंड रिपोर्ट: चंदौली पुलिस की बर्बरता की शिकार निशा यादव की मौत का हिसाब मांग रहे जनवादी संगठन

जौनपुर: कालेज प्रबंधक पर प्रोफ़ेसर को जूते से पीटने का आरोप, लीपापोती में जुटी पुलिस

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

उपचुनाव:  6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में 23 जून को मतदान

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

क्या वाकई 'यूपी पुलिस दबिश देने नहीं, बल्कि दबंगई दिखाने जाती है'?


बाकी खबरें

  • leather industry
    न्यूज़क्लिक टीम
    बंद होने की कगार पर खड़ा ताज नगरी का चमड़ा उद्योग
    10 Feb 2022
    आगरा का मशहूर चमड़ा उद्योग और उससे जुड़े कारीगर परेशान है। इनका कहना है कि सरकार इनकी तरफ ध्यान नही दे रही जिसकी वजह से पॉलिसी दर पॉलिसी इन्हें नुकसान पे नुक्सान हो रहा है।
  • Lakhimpur case
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर कांड: मुख्य आरोपी और केंद्रीय मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा को मिली ज़मानत
    10 Feb 2022
    केंद्रीय मंत्री के बेटे की ओर से पेश वकील ने अदालत से कहा था कि उनका मुवक्किल निर्दोष है और उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है कि उसने किसानों को कुचलने के लिए घटना में शामिल वाहन के चालक को उकसाया था।
  • uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव : टिहरी बांध से प्रभावित गांव आज भी कर रहे हैं न्याय की प्रतीक्षा!
    10 Feb 2022
    उत्तराखंड के टिहरी ज़िले में बने टिहरी बांध के लिए ज़मीन देने वाले ग्रामीण आज भी बदले में ज़मीन मिलने की आस लगाए बैठे हैं लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
  •  Bangladesh
    पीपल्स डिस्पैच
    बांग्लादेश: सड़कों पर उतरे विश्वविद्यालयों के छात्र, पुलिस कार्रवाई के ख़िलाफ़ उपजा रोष
    10 Feb 2022
    बांग्लादेश में शाहजलाल विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई के बाद, देश के कई विश्वविद्यालयों में छात्र एकजुटता की लहर दौड़ गई है। इन प्रदर्शनकारी छात्रों ने…
  • Newsletter
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    वैश्विक निरक्षरता के स्थिर संकट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ
    10 Feb 2022
    संयुक्त राष्ट्र ने नोट किया कि 'दुनिया भर में 150 करोड़ से अधिक छात्र और युवा कोविड-19 महामारी के कारण बंद स्कूल और विश्वविद्यालयों से प्रभावित हो रहे हैं या प्रभावित हुए हैं'; कम से कम 100 करोड़…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License