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भारत
राजनीति
दिल्ली की बस्तियों में 80 प्रतिशत छोटे बच्चे देखरेख और सुरक्षा से वंचित
रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली जैसे शहर में आज भी 53 प्रतिशत बच्चे खुले में शौच के लिए जा रहे है। 39 प्रतिशत बच्चे आज भी आंगनवाड़ी सेवाओं से वंचित है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
01 Mar 2020
conference

राजधानी दिल्ली में आंगनवाड़ी केन्द्रों और अनेक योजनाओं के बावजूद आज भी कई जरूरत मंद बच्चे जरूरी देखरेख एवं सुरक्षा से वंचित हैं। ये खुलासा एक अध्ययन में सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली जैसे शहर में आज भी 53 प्रतिशत बच्चे खुले में शौच के लिए जा रहे है। 39 प्रतिशत बच्चे आज भी आंगनवाड़ी सेवाओं से वंचित है। 80 प्रतिशत बच्चों को महिलाऐं छोड़कर काम पर जाती है इनकी देखरेख के लिए कोई व्यवस्था नही है।

26 फरवरी 2020 को दिल्ली के प्रेस क्लब में इस रिपोर्ट को एक संवाददाता सम्मेलन में जारी किया गया। ये अध्ययन दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग, मोबाइल क्रैशिज, न्यू दिल्ली फोर्सेस एवं आई.एस.एस.टी के सहयोग से सामने आया है। इसमें बस्तियों में रहने वाले वंचित प्रवासी निर्माण मजदूर, कुड़ा चुनने वाले मजदूर, घरेलू कामकार, रेहड़ी पटरी, देह व्यापार आदि कार्यों मे लगे परिवारों में उनके छोटे बच्चों और संबंधित सेवाओं की वर्तमान स्थिति का जायजा लिया गया है।

यह अध्ययन दिल्ली के 9 जिलों से 441 परिवारों के साक्षात्कार एवं चर्चाओं के माध्यम से किया गया है। प्रेसवार्ता में अलग-अलग बस्तियों से समुदाय के लोगों की भी भागीदारी थी उन्होने अपने अनुभवों को संवादाताओं के समक्ष साझा किया।

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गीता देवी जो कि शाहबाद डेरी झुग्गी बस्ती से आई थी उन्होने बताया “मैं कोठियों में काम करती हुँ, जब मेरा बच्चा 3 माह का था तो मैं उसको ताले में बंद करके काम पर जाती थी पर अब वह 2 वर्ष का हो गया है मुझे डर लगता है की कही उसको चोट ना लग जाऐ। आंगनवाड़ी केन्द्र भी छोटे बच्चों को नहीं रखते है और वहाँ पर जगह भी नहीं है इस लिए मुझे काम छोड़ना पड़ा। मैं चाहती हुँ कि मेरे बच्चे के लिए पूरे दिन के लिए देखरेख की व्यवस्था हो ताकि मैं निश्चित हो कर काम पर जा सकूं।'

जहाँगीरपुरी पुनर्वास बस्ती से आई मकसुदा बीबी ने कहा, 'मैं कुड़ा चुनने का काम करती हुँ और जब मैं काम पर गई थी तो मेरा बच्चा नाले में गिर गया। उसको अस्पताल में भर्ती करवाया गया वहाँ पर डाक्टर की लपरवाही से उसकी मृत्यु हो गई। अगर मेरे बच्चे की देखरेख की सही व्यवस्था होती तो मेरा बच्चा मेरे पास होता। अब मुझे अपने दूसरे बच्चों को छोड़ कर काम पर जाने में डर लगता है।'

इस दौरान आंगनवाड़ी केन्द्रों की गुणवत्ता का मुद्दा भी सामने आया। दिल्ली महिला एवं बाल विकास विभाग के निर्देशक एस. बी. शशांक ने माना कि दिल्ली में आंगनवाड़ी केन्दों की स्थिति ठीक नहीं है। शहरी संदर्भ में आंगनवाड़ी का पुनर्गठन एवं सशक्तिकरण की जरूरत है साथ ही उनका कहना था कि कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए आंगनवाड़ी के समय को बढ़ाने के संदर्भ में उपलब्ध संसाधनों के आधार पर विचार किया जाएगा।

इस अवसर पर दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष रमेश नेगी ने कहा कि इस अध्ययेन का मुख्य उद्देश्य वंचित समूहा एवं क्षेत्रों को चिन्हित करना था। अध्ययन की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि इन समूहों में बच्चों की स्थिति ठीक नहीं है। जब तक बच्चों से संबंधित कार्यक्रमों में सभी समुदाय की भागीदारी नहीं होगी जब तक कार्यक्रम को सफल बनाना मुश्किल है।

दिल्ली में सरकारी आंकड़े दर्शाते हे कि 27 प्रतिशत 6 वर्ष तक के बच्चे अपनी आयु से कम वजन के है। 17 बच्चे प्रतिदिन गुम हो जाते है देश के आंकड़े बताते है कि 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ यौन शोषण के आंकड़े पिछले वर्ष से 21 प्रतिशत बढ़ा है।

बच्चों के लिए सरकार द्वारा चल रही केवल एक मात्र सेवा ‘‘समेकित बाल विकास परियोजना‘‘ (आई.सी.डी.एस) है जिसके अन्तर्गत दिल्ली में 10897 आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हैं। इनमें 42 प्रतिशत बच्चे ही सम्मिलित है जिसके कारण आज भी कई जरूरत मंद बच्चे इस योजना का फायदा नहीं ले पा रहे है। यह केंद्र भी केवल 4 घंटे के लिए ही खुलते है।

राष्ट्रीय ई.सी.सी.ई. नीति में आंगनवाड़ी सह क्रैश एवं राष्ट्रीय क्रैश योजना के अन्तर्गत बाल देखभाल केंद्र का प्रावधान भी है परन्तु अभी तक पूरी दिल्ली में सरकार द्वारा मात्र 23 आंगनवाड़ी सह क्रैष दो जिलों में खोले गये थे पर उनकों भी बंद कर दिया गया है। दिल्ली में राष्ट्रीय क्रैश योजना के तहत 164 झुलाघर चल रहे थे पर वर्तमान में वह घट कर केवल 85 ही रह गये है। आज भी शहरी बस्तियों में बच्चों की देखरेख और सुरक्षा एक चिंता का विषय बना हुआ है।

अध्ययन में कई सुझाव भी दिए गए हैं। जिसमें दिल्ली में आंगनवाड़ी की गुणवत्ता में सुधार हेतु पर्याप्त बजट, जरूरत अनुसार कार्यकर्ता की नियुक्ति एवं प्रशिक्षण होना चाहिए। इसके अलावा आंगनवाड़ी केन्द्र 8 घंटे के लिए खोले जाऐं जिसमें जरूरतमंद बच्चों की पूरे दिन देखरेख एवं सुरक्षा की व्यवस्था हो। साथ ही आंगनवाड़ी कार्यक्रम में सहयोग एवं निगरानी हेतु समुदाय भागीदारी हो और समुदाय को आंगनवाड़ी स्तर पर निर्णय एवं वित्तिय शक्ति सुनिश्चित हो।

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