NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अंतरराष्ट्रीय
भारत, पाकिस्तान और तालिबान अब एक ही राह पर
भारत सरकार अफ़गानिस्तान में मानवीय संकट को दूर करने के लिए पश्चिमी रणनीति की छिपी प्रवृत्ति के साथ तालेमल बैठाते हुए तालिबान और पाकिस्तान के साथ फिर से जुड़ने की कोशिश में है। 
एम.के. भद्रकुमार
01 Dec 2021
Translated by महेश कुमार
ipt
सहायता के रूप में बांटे गए खाद्यान्न की बोरियों के पास बैठे हैं अफ़गान

दो जूनियर कमीशंड अधिकारियों और दो पुलिसकर्मियों सहित नौ सैनिकों की हत्या के बाद पूंछ के भट्टा दुरियन जंगल में 11 अक्टूबर से भारतीय सेना द्वारा "जम्मू और कश्मीर में विद्रोह और आतंकवाद के इतिहास में चलाए गए तीन सप्ताह लंबे "आतंकवाद विरोधी अभियान" को "सबसे लंबे समय तक चलने वाले अभियान" के रूप में माना गया है। 

फिर भी, किसी भी भारतीय पदाधिकारी या राजनेता ने पाकिस्तान पर उंगली नहीं उठाई है। यह इस तथ्य के बावजूद है कि 21 अक्टूबर को मनी लॉन्ड्रिंग और आतंक के वित्तपोषण पर वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (FATF) के रूप में जानी जाने वाली बहुपक्षीय निगरानी की पूर्ण बैठक में पाकिस्तान पेरिस में जांच का सामना कर रहा है। 

फिर से उत्तर प्रदेश और पंजाब में राज्य के चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बड़े पैमाने पर दिखाई दे रही है। भारतीय जनता पार्टी ने अब तक चुनाव अभियानों के दौरान पाकिस्तान को शैतान के रूप में नहीं पेश किया है।

बजाय इसके अफ़गानिस्तान को मानवीय सहायता के रूप में 50 हजार मीट्रिक टन गेहूं के परिवहन के लिए सुविधाओं की तलाश में पाकिस्तान को रचनात्मक रूप से शामिल करने के लिए दिल्ली ने कूटनीतिक पहल करना चुना है। मामले की जड़ यह है कि दिल्ली ने पाकिस्तानी रूट को तरजीह दी है।मजे की बात यह है कि इस पहल ने करतारपुर कॉरिडोर को फिर से खोलने के सरकार के फैसले को भी ओवरलैप कर दिया है। दिलचस्प रूप से, पाकिस्तानी से मिले संकेत के साथ ऐसा किया गया है।

अब यह पता चला है कि पाकिस्तान ने भारतीय गेहूं को अफ़गानिस्तान भेजने के लिए परिवहन के अनुरोध के लिए हरी झंडी दे दी है। दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच इसके तौर-तरीकों पर चर्चा चल रही है। दरअसल तालिबान नेतृत्व ने पहले वाघा सीमा के माध्यम से गेंहू भेजने के भारतीय अनुरोध का समर्थन किया था।

निस्संदेह सकारात्मक पाकिस्तानी प्रतिक्रिया का गहरा प्रभाव पड़ा है, क्योंकि इस्लामाबाद वास्तव में काबुल में दिल्ली और तालिबान अधिकारियों के बीच एक रचनात्मक जुड़ाव की शुरुआत की सुविधा प्रदान कर रहा है।दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अफ़गानिस्तान में मानवीय संकट से निपटने के संबंध में दिल्ली, इस्लामाबाद और काबुल खुद को एक ही राह पर पाते हैं।लोककथा यह हुआ करती थी कि भारत तालिबान विरोधी प्रतिरोध आंदोलन को फिर से चलाएगा और पाकिस्तान काबुल से भारतीय उपस्थिति को खत्म कर देगा। इन दोनों मान्यताओं को अब अलग रख देना चाहिए। दिल्ली ने काबुल में तालिबान के अधिग्रहण को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया है और वह तालिबान को पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा प्रतिष्ठान के मात्र प्रॉक्सी के रूप में देखने के अपने हठधर्मी दृष्टिकोण के बारे में अनिश्चित है।

इन बिंदुओं को जोड़ते हुए जो उभर कर सामने आता है, वह यह है कि भारत सरकार तालिबान और पाकिस्तान के साथ फिर से जुड़ने के लिए पश्चिमी रणनीति की छिपी प्रवृत्ति के साथ तेजी से तालमेल बैठा रही है। मूल रूप से भारत सरकार ने कभी भी अपनी नीतियों को अमेरिकी रणनीति से "विघटित" या अलग नहीं किया है।

पिछले सप्ताहांत में दोहा में अमेरिका और यूरोपीयन यूनियन के प्रतिनिधियों और तालिबान के बीच वार्ता की बहाली इस बात का संकेत है कि पश्चिमी शक्तियां अब अपना गियर बदल रही हैं। इस दिशा में दो चीजें जो गति दे रही हैं, वे दो चीजें ये हैं - पहला, जब तक मानवीय स्थिति को तत्काल संबोधित नहीं किया जाता है और अर्थव्यवस्था में तरलता पैदा करके अफ़गान बैंकिंग प्रणाली के पतन को टाला नहीं जाता है, देश से शरणार्थी का प्रवाह जारी रहेगा। दूसरा, तालिबान अफ़गानिस्तान में आगे बढ़ रहे सक्रिय आतंकवादी समूहों का मुकाबला करने के लिए कठोर दबाव बना रहा है। दोनों अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यधिक परिणामी परिदृश्य हैं।

फिर, व्यापक पश्चिमी चिंता है कि काबुल से लंबी अनुपस्थिति केवल चीन और रूस (और ईरान) के लाभ के लिए काम कर सकती है। अमेरिकी नीति तालिबान सरकार के "वैधता" पहलू में फंस गई है।इसके विपरीत, मास्को, बीजिंग और तेहरान ने "वैधता" के विवादास्पद मुद्दे को फिलहाल दूर कर दिया है, जो तालिबान सरकार को मान्यता दिए बिना भी काबुल में अधिकारियों के साथ अपने संबंधों को विकसित करने के लिए जगह बना रहे हैं। ग्लोबल टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि कई चीनी कंपनियां अफ़गानिस्तान में संभावित लिथियम परियोजनाओं की साइट का निरीक्षण भी कर रही हैं। यह जानकर, अशरफ गनी की निगरानी में अफ़गान लिथियम पर गुप्त रूप से कारोबार करने वाली अमेरिकी कंपनियां परेशान हो रही होंगी कि चीनी कंपनियां उनसे मोर्चा मार रही हैं।

ऐसी पृष्ठभूमि में, वाशिंगटन ने तालिबान के साथ पश्चिम के जुड़ाव की शर्तों को पूरा करने में मदद के लिए पाकिस्तान का दरवाजा खटखटाया है। पाकिस्तान मदद के लिए तैयार है। अतीत में इमरान खान के कड़े पश्चिमी विरोधी रुख के बावजूद, प्रधानमंत्री बनने के बाद, उन्होंने उल्लेखनीय व्यावहारिकता दिखाई थी - क्योंकि आईएमएफ से मदद लेने के लिए उनका खुलापन या सीपीईसी पर धीमी गति से चलने के लिए अमेरिका की मांगों पर ध्यान देना इस बात की गवाही देता है। 

जो भी हो, रावलपिंडी में जीएचक्यू से एक उच्च स्तरीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल की ब्रुसेल्स में नाटो मुख्यालय की हालिया यात्रा और गठबंधन के महासचिव जेन्स स्टोलटेनबर्ग द्वारा एक सैन्य सहयोगी के रूप में पाकिस्तान की शानदार भूमिका के बारे में अस्पष्ट शब्द मजबूत संकेतक हैं कि परवेज मुशर्रफ ने इक्कीस साल पहले न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में हुए 9/11 के हमलों के बाद जो प्रदर्शन किया था, उसी तरह पाकिस्तान तालिबान शासन के साथ एक उदारवादी भूमिका निभाने की उम्मीद करता है।

अगर पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने के लिए खुद के ठिकानों का इस्तेमाल करने के लिए अमेरिका के आग्रह पर ध्यान देता है तो इस पर किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। नसीराबाद (अफ़गान सीमा के करीब) में एक नए एयरबेस के आने की अफवाहें बंद नहीं हो रही हैं।
बेशक, अमेरिका प्यार और मार की नीति अपनाने में माहिर है। एफएटीएफ पाकिस्तान के गले में एक हड्डी की तरह है - और पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पहले से ही गंभीर संकट में है। दूसरी ओर, एक उल्लेखनीय यू-टर्न में, व्हाइट हाउस ने अब इमरान खान को 9-10 दिसंबर को राष्ट्रपति बाइडेन द्वारा लोकतंत्र पर आयोजित की जाने वाले एक शिखर सम्मेलन में आमंत्रितों की अपनी सूची में शामिल किया है।

यह पूरी तरह से दिमागी तौर पर मानने वाली बात है कि बाइडेन प्रशासन दिल्ली से इन परिस्थितियों में पाकिस्तान के खिलाफ अपने शत्रुतापूर्ण रुख को नरम करने की उम्मीद करेगा, खासकर तब-जब पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व की मदद से तालिबान के साथ जुड़ने की एंग्लो-अमेरिकन परियोजना एक ऊंचे चरण में प्रवेश कर गई है।

बेशक, अच्छी बात यह है कि उपरोक्त रुझान भारत-पाकिस्तान तनाव को कम करने के लिए अनुकूल हैं। फरवरी या मार्च में होने वाले पंजाब और यूपी चुनावों के करीब आने से यह सरकार  के लिए एक लिटमस टेस्ट होगा। कि क्या हिंदू राष्ट्रवादी अपने चुनाव अभियान में पाकिस्तान को शत्रु के रूप में पेश करेंगे?
इस बीच, अफ़गानिस्तान में गेहूं की खेप में लगभग 5,000 ट्रकों का एक काफिला शामिल होगा - कुछ ऐसा जिसमें करीब 200 ट्रक वाघा सीमा से और खैबर दर्रा से हर एक दिन, एक या दो महीने में कठोर सर्दियों में पार करेंगे। यह महाकाव्य गाथा सनसनीखेज होने वाली है और भारत-पाक कथा को फिर से लिख सकती है।

वास्तव में, अफ़गानिस्तान के मानवीय संकट ने भारत, पाकिस्तान और तालिबान को एक ही रहा पर लाकर खड़ा कर दिया है - कुछ ऐसा जो हाल तक अकल्पनीय था।

(एम॰ के॰ भद्रकुमार एक पूर्व राजनयिक हैं। वे उज्बेकिस्तान और तुर्की में भारत के राजदूत रह चुके हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।सौजन्य: इंडियन पंचलाइन)

यह लेख मूल रूप में अंग्रेजी में है।  इसे आप इस लिंक के जरिए पढ़ सकते हैं। 

https://www.newsclick.in/India-Pakistan-Taliban-Same-Page

India
pakisatn
Afganistan
TALIBAN
America

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आईपीईएफ़ पर दूसरे देशों को साथ लाना कठिन कार्य होगा

नेपाल की अर्थव्यवस्था पर बिजली कटौती की मार

भोजन की भारी क़िल्लत का सामना कर रहे दो करोड़ अफ़ग़ानी : आईपीसी

क्या दुनिया डॉलर की ग़ुलाम है?

रूस की नए बाज़ारों की तलाश, भारत और चीन को दे सकती  है सबसे अधिक लाभ

तालिबान: महिला खिलाड़ियों के लिए जेल जैसे हालात, एथलीटों को मिल रहीं धमकियाँ

सातवें साल भी लगातार बढ़ा वैश्विक सैन्य ख़र्च: SIPRI रिपोर्ट

तालिबान को सत्ता संभाले 200 से ज़्यादा दिन लेकिन लड़कियों को नहीं मिल पा रही शिक्षा


बाकी खबरें

  • ganguli and kohli
    लेस्ली ज़ेवियर
    कोहली बनाम गांगुली: दक्षिण अफ्रीका के जोख़िम भरे दौरे के पहले बीसीसीआई के लिए अनुकूल भटकाव
    19 Dec 2021
    दक्षिण अफ्रीका जाने के ठीक पहले सौरव गांगुली बनाम विराट कोहली की टसल हमारी टीवी पर तैर रही है। यह टसल जितनी वास्तविक है, यह इस तथ्य पर पर्दा डालने के लिए भी मुफ़ीद है कि भारतीय टीम ऐसे देश का दौरा कर…
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    चुनावी चक्रम: लाइट-कैमरा-एक्शन और पूजा शुरू
    19 Dec 2021
    सरकार जी उतनी गंभीरता, उतना दिमाग सरकार चलाने में नहीं लगाते हैं जितना पूजा-पाठ करने में लगाते हैं। यह पूजा-पाठ चुनाव से पहले तो और भी अधिक बढ़ जाता है। बिल्कुल ठीक उसी तरह, जिस तरह से किसी ऐसे छात्र…
  • teni
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : जयपुर में मौका चूके राहुल, टेनी को कब तक बचाएगी भाजपा और अन्य ख़बरें
    19 Dec 2021
    सवाल है कि अजय मिश्र को कैसे बचाया जाएगा? क्या एसआईटी की रिपोर्ट के बाद भी उनका इस्तीफा नहीं होगा और उन पर मुकदमा नहीं चलेगा?
  • amit shah
    अजय कुमार
    अमित शाह का एक और जुमला: पिछले 7 सालों में नहीं हुआ कोई भ्रष्टाचार!
    19 Dec 2021
    यह भ्रष्टाचार ही भारत के नसों में इतनी गहराई से समा चुका है जिसकी वजह से देश का गृह मंत्री मीडिया के सामने खुल्लम-खुल्ला कह सकता है कि पिछले 7 सालों में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ।
  • A Critique of Capitalism’s Obscene Wealth
    रिचर्ड डी. वोल्फ़
    पूंजीवाद की अश्लील-अमीरी : एक आलोचना
    19 Dec 2021
    पूंजीवादी दुनिया में लगभग हर जगह ग़ैर-अमीर ही सबसे ज़्यादा कर चुकाते हैं और अश्लील-अमीरों की कर चोरी के कारण सार्वजनिक सेवाओं में होने वाली कटौतियों की मार बर्दाश्त करते रहते हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License