NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
पाकिस्तान
क्यों किसानों की लड़ाई में WTO का दबाव मानने की ज़रूरत नहीं है?
बाज़ार पर हक़ कॉरपोरेट का होगा या किसानों का? नए कृषि कानून को लेकर असली लड़ाई यही चल रही है। चूंकि नए कृषि कानूनों में बाज़ार पर ज़ोर है। इसलिए इसके तार डब्ल्यूटीओ यानी विश्व व्यापार संगठन से भी जुड़ते हैं। 
अजय कुमार
23 Dec 2020
wto

बाज़ार पर हक़ कॉरपोरेट का होगा या किसानों का? नए कृषि कानून को लेकर असली लड़ाई यही चल रही है। चूंकि नए कृषि कानूनों में बाज़ार पर ज़ोर है। इसलिए इसके तार डब्ल्यूटीओ यानी विश्व व्यापार संगठन से भी जुड़ते हैं। 
 
डब्ल्यूटीओ यानी विश्व व्यापार संगठन वह संगठन है जिसका साल 1990 की बाद की दुनिया में पूरी दुनिया के बाजार में खासा प्रभाव रहा है। कृषि बाजार से भी संगठन का ऐसा ही नाता रहा है। इस संगठन के कामकाज को लेकर दुनिया के बहुत सारे इलाकों में मौजूदा समय में बहुत सारे विरोध दर्ज किए गए हैं। मेन स्ट्रीम मीडिया से दूर अगर आप सब ने समाज और दुनिया को थोड़ा गहरे तरीके से परखने में दिलचस्पी ली होगी तो आपने भारत में मौजूद लेफ्ट पार्टियों की डब्ल्यूटीओ के खिलाफ उठने वाले बुलंद आवाज को जरूर सुना होगा। दुनिया की सोच पर एक खास ढंग का विचार हावी होने की वजह से लेफ्ट पार्टियों के डब्ल्यूटीओ के विरोध को खारिज कर दिया जाता है। बहुत सारे लोग ऐसे विरोध की आवाज सुनकर लेफ्ट पार्टियों पर यह ठप्पा लगाते हैं कि लेफ्ट पार्टियां तो हर बात में विरोध करती हैं। लेफ्ट पार्टियों पर यह ठप्पा लगाना ठीक ऐसे ही है जैसे सामने वाले व्यक्ति की जायज बात को खारिज करने के लिए उस पर लांछन लगाने का तरीका विकसित कर लिया जाता है। 

यहां पर लेफ्ट पार्टियों का जिक्र करना इसलिए ज़रूरी है कि साल 1990 के बाद की दुनिया में बाजार के जरिए बनाए गए शोषणकारी माहौल पर दुनिया की लेफ्ट पार्टियों ने शुरू से हमला बोला है। और अब स्थिति यह आ गई है की लेफ्ट पार्टियों के अलावा बहुत सारे धड़े भी यह बात पुरजोर तरीके से कहने लगे हैं कि डब्ल्यूटीओ के छाते अंदर भूमंडलीकरण का तर्क देकर दुनिया के सभी बाजारों को एक खास तरह की नियम से नहीं चलाया जा सकता है। इस नियम को अपनाने की वजह से दुनिया के बहुत सारे इलाके समृद्ध देशों के शोषण का शिकार बने हैं।

ऐसे ही नियम से जुड़ा मसला है डब्ल्यूटीओ में फार्म सब्सिडी से जुड़ा हुआ नियम। यह नियम किस तरह से दुनिया के कृषि बाजार को प्रभावित करता है? क्या इस समय भारत जैसे देश को इस पर अमल करना जायज है या नाजायज? क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य देने में डब्ल्यूटीओ के नियम जायज नियम की तरह काम करते हैं? इस मुद्दे को समझते हैं-

साल 1990 के बाद पैदा हुई भूमंडलीकरण से जुड़ी बहसों के बाद साल 1985 का जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ नाम का संगठन साल 1995 में वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन में तब्दील हो गया। बेसिक तौर पर यह समझिए कि जब देशों ने अपने बाजार को पूरी दुनिया के लिए पूरी तरह से खोल दिया तब बाजार को चलाने के लिए कुछ कायदे कानूनों की जरूरत थी। उन कायदे कानूनों के लिए डब्ल्यूटीओ की स्थापना हुई। एक उदाहरण के तौर पर यह समझिए कि अगर अमेरिका अपने कृषि उत्पादों पर बहुत अधिक सब्सिडी देने लगे तो अमेरिका के कृषि उत्पाद अपने आप बहुत कम कीमत पर बाजार में उपलब्ध होंगे। सरकार के ऐसे हस्तक्षेप की वजह से अगर इनकी कीमत बहुत अधिक कम हुई तो पूरी दुनिया में इन्हीं के कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी और ऐसे में दूसरे देशों का कृषि बाजार पूरी तरह से तहस-नहस हो जाएगा। इसी तरह की परेशानियों से निजात पाने के लिए डब्ल्यूटीओ नामक संस्था बनी।

लेकिन इस संस्था ने अपना बेसिक काम ही नहीं किया। कई विशेषज्ञों का कहना है वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन अमेरिका और दूसरे विकसित देशों के फायदे के लिए काम करने लगा। दुनिया के बाजार के लिए ऐसे नियम कानून बनाने लगा जहां पर अमेरिका को छूट मिल जाती है और दूसरे देशों पर पाबंदी लगाई जाती है। 

इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है डब्ल्यूटीओ का फार्म सब्सिडी से जुड़ा हुआ नियम।

भारत जैसे विकासशील देशों में किसी फसल के लिये बाज़ार मूल्य समर्थन इसके उत्पादन के कुल मूल्य के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है। हालाँकि भारत के संदर्भ में यह मूल्य कभी भी 10 प्रतिशत से अधिक नहीं रहा। फिर भी अमेरिका भारत पर आरोप लगाता रहा है कि कई प्रमुख फसलों हेतु बाज़ार मूल्य समर्थन इस सीमा से काफी ऊपर है।

भारत जैसे विकासशील देशों में किसी फसल के लिये बाज़ार मूल्य समर्थन इसके उत्पादन के कुल मूल्य के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है। और उत्पादन का कुल मूल्य का निर्धारण साल 1986 और 88 के बीच फसलों के कुल अंतरराष्ट्रीय मूल्य के औसत से किया जाएगा। इस नियम को आधार बनाकर अमेरिका यूरोपीय संघ जापान ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारत की कृषि नीतियों पर आरोप लगाते रहते हैं। पिछले साल इसी नियम को आधार बनाकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर यह आरोप लगा दिया कि भारत को विकासशील देश का तमगा छोड़कर विकसित देश का तमगा अपना लेना चाहिए। ऐसा करने पर वह डब्ल्यूटीओ के जरिए विकासशील देशों को मिलने वाली छूट से खुद को अलग करने के लिए मजबूर होगा। 

अब इस नियम को थोड़ा हकीकत की जमीन पर आंकते हैं-

साल 1986 - 88 से जुड़े कीमतों को आधार बनाकर अमेरिका भारत पर आरोप लगाता है कि भारत कृषि क्षेत्र में बहुत अधिक सब्सिडी देता है। धान और गेहूं पर तो 60 फ़ीसदी से अधिक की सब्सिडी देता है। जबकि भारत कहता है कि इस तरह से आकलन करना ही गलत है। 1986 के बाद से दुनिया बहुत अधिक बदल चुकी है। कीमतें आसमान छूने लगी हैं। तो पैमाना भी अलग होना चाहिए। भारत ने 10 फ़ीसदी के पैमाने को अभी तक पार नहीं किया है। अभी भी भारत की कृषि क्षेत्र में दी जाने वाली सब्सिडी 10 फ़ीसदी से कम है।

एक विश्लेषण कहता है कि एक अमेरिकी किसान को सरकार की तरफ से (अम्बर बॉक्स - यानी कृषि उत्पाद जिन पर सरकार के जरिए सब्सिडी मिलने पर बाजार तहस-नहस हो सकता है, जिन पर 10 फीसदी की सीमा लगाई गई है) तकरीबन 5 लाख रुपये सालाना की मदद मिलती है। जबकि एक भारतीय किसान को सरकार की तरफ से महज 3 हजार रुपये की मदद मिलती है। 

और अगर सभी कृषि उत्पादों पर (जिन पर सब्सिडी की छूट है और नहीं भी है) उनका आंकड़ा देखा जाए तो अमेरिका के एक किसान को साल भर में सरकार की तरफ से तकरीबन 45 लाख रुपये की मदद मिलती है। और भारत में एक किसान को मिलने वाली सरकार की तरफ मदद साल भर में केवल 20 हजार रुपये के आसपास है। यह केवल भारत के साथ ही नहीं है। अमेरिका कनाडा यूरोपियन यूनियन डब्ल्यूटीओ से ऐसा तालमेल बिठाकर रखते हैं कि उनकी सब्सिडी पर कुछ नहीं बोला जाता। जबकि भारत और बांग्लादेश जैसे सरकारों द्वारा किसानों को दिए जाने वाले सरकारी मदद पर खूब हो हल्ला होता है। बहुत सारी वार्ताओं के बाद साल 2023 तक भारत को यह छूट मिली है कि उसके द्वारा अपने किसानों को दिए जाने वाले सरकारी मदद पर डब्ल्यूटीओ सवाल नहीं करेगा।

आंकड़े साफ कह रहे हैं कि भारत अगर अपने किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने को प्रतिबद्ध हो तो डब्ल्यूटीओ के नियम भले अड़ंगा बन जाए लेकिन डब्ल्यूटीओ की जमीनी हकीकत अड़ंगा नहीं बन सकती है। अमेरिका यूरोपियन संघ जापान ऑस्ट्रेलिया जैसे देश जब अपने किसानों का ख्याल रख सकते हैं तो भारत जैसा विकासशील देश क्यों नहीं? केवल प्रतिबद्धता का सवाल है कि भारतीय सरकार अपने किसानों का भला करना चाहती है या कॉरपोरट और विकसित देशों के लिहाज से बने डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत सोचना चाहती है।

इस लिहाज से वह तर्क तो पूरी तरह से बेदम है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने से डब्ल्यूटीओ के नियम आड़े आएंगे। 

लेकिन एक दफा के लिए मान लीजिए कि अगर डब्ल्यूटीओ के नियम आड़े आ भी जाए तो आखिरकार डब्ल्यूटीओ में भारत जैसे किसी विकासशील देश के लिए क्या रखा है? इस पर क्यों नहीं सोचा जाए। 

दुनिया को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए नियमों की जरूरत होती है। लेकिन अगर नियम ही शोषण का कारण बन जाए तो या तो नियमों को बदल देना चाहिए या त्याग देना चाहिए। इसलिए किसानों की इस लड़ाई में डब्ल्यूटीओ जैसी संस्था भारत के लिहाज से कोई ऐसी संस्था नहीं है जिस पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए।

WTO
America
india in wto
farm subsidy rule by wto
amerca subsidy in agriculture
india subsidy in agriculture

Related Stories

एमएसपी भविष्य की अराजकता के ख़िलाफ़ बीमा है : अर्थशास्त्री सुखपाल सिंह

अमेरिका क्यों तीनों कृषि क़ानूनों का समर्थन करता है?

किसानों को अपनी जमीनों को लेकर खतरा क्यों महसूस हो रहा है?


बाकी खबरें

  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    करनाल में किसान महापंचायत, रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन और अन्य
    07 Sep 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी हरियाणा के करनाल में किसान महापंचायत, रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ रेल कर्मियों का बुधवार को राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन,यूपी में डेंगू और वायरल बुखार का…
  • निमहांस के बर्ख़ास्त किये गए कर्मचारी जुलाई से हैं हड़ताल पर
    रोसम्मा थॉमस
    निमहांस के बर्ख़ास्त किये गए कर्मचारी जुलाई से हैं हड़ताल पर
    07 Sep 2021
    19 कर्मचारियों को इसलिये बर्ख़ास्त कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने अस्पताल प्रशासन से कोविड कर्फ़्यू के दौरान रात को घर जाने की व्यवस्था करने की मांग की थी।
  • मुज़फ़्फ़रनगर: 2013 की हिंसा के ज़ख़्म ज़िंदा है जौला गांव में
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुज़फ़्फ़रनगर: 2013 की हिंसा के ज़ख़्म ज़िंदा है जौला गांव में
    07 Sep 2021
    ग्राउंड रिपोर्ट में मुज़फ़्फ़नगर के जौला गांव में पहुंची वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह, जहां 2013 के सांप्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों को पनाह मिली। किसान आंदोलन के भविष्य का रास्ता जौला गांव से होकर ही…
  • पेगासस विवाद : उच्चतम न्यायालय ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए और समय दिया
    भाषा
    पेगासस विवाद : उच्चतम न्यायालय ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए और समय दिया
    07 Sep 2021
    मामले में अगली सुनवाई के लिए 13 सितंबर की तारीख तय की है।
  • जातीय जनगणना: जलता अंगार
    बी. सिवरामन
    जातीय जनगणना: जलता अंगार
    07 Sep 2021
    यदि नीतीश सचमुच में इस मुद्दे पर ईमानदार हैं, तो उन्हें मांग करनी चाहिये थी कि केंद्र सरकार, जिसको आरएसएस-भाजपा का ओबीसी मास्टहेड मोदी का नेतृत्व मिला है, 2011 के सामाजिक-आर्थिक व जातीय जनगणना के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License