गांधी जी के युग से स्वदेशी शब्द ने अनेक अर्थ धारण किए हैं और अब मोदी काल में स्वदेशी शब्द कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों के औद्योगिक साम्राज्य का पर्यायवाची बनता जा रहा है।
प्रोपगेंडा की बजाय ऑक्सीज़न और मेडिकल सुविधाएं मिलें तो आशा का संचार होगा। सरकार दर्दनाक हालात को संवेदनहीन प्रोपेगेंडा से ढंकना बंद करे और ज़िम्मेदरी ले, तो आशा का संचार होगा।
आखिर कोरोना के बाद दिए जाने वाकई दस्तावेज़ पर प्रधानमंत्री मोदी की शक्ल क्यों ? क्योंकि ये टीके तो टैक्स देने वाले लोगों के पैसे से दिए जा रहे हैं। बीजेपी के अपने पैसे से नहीं ! आखिर बीजेपी सरकार…