भारतीय मीडिया देश की त्रासद हो चुकी स्थिति पर सरकार से सवाल नहीं कर रही है बल्कि सरकार के मनुहार में गीत गा रही है. देश के मुख्य धारा की मीडिया लगातार जनता का भरोसा भी खोती जा रही है.
आदेश में कहा गया, “इससे आवेदक के पक्ष में कोई न्यायसंगतता नहीं बनती कि वह भविष्य में पूरे संयंत्र के संचालन की मांग या उम्मीद करे। मौजूदा आदेश सिर्फ इस समय चिकित्सीय स्तर की ऑक्सीजन की उपलब्धता…
उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘रेमडेसिविर की कमी की भरपाई के लिए प्रोटोकॉल नहीं बदलें। यह गलत है। इससे डॉक्टर रेमडेसिविर दवा नहीं लिख पाएंगे। अदालत ने कहा, ‘‘यह सरासर कुप्रबंधन है।’’
क्या शासन की भटकी हुई प्राथमिकता लोगों के लिए मुसीबत बन रही है? कुछ ठोस उदाहरण के साथ भारत की भयावह कोरोना-स्थिति का आकलन कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश .
त्रिपुरा में एक अधिकारी द्वारा आम नागरिक को पीटने की बात ने जातिवादी रंग ले लिया। एक यादव कलेक्टर ने पंडित जी को मारा, इससे सोशल मीडिया दो भागों में बँट गया। एक, जो इस बात पर उद्वेलित थे कि यादव…