NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
बढ़ती थोक महंगाई दर और बदहाल होती भारत की अर्थव्यवस्था 
कुछ लोग अमीर हो रहे हैं। लेकिन उसके मुक़ाबले अनगिनत लोग गरीब हो रहे हैं। जो लोग अमीर हो रहे हैं उनका एकाधिकार बढ़ता जा रहा है। यह एकाधिकार की प्रवृत्ति भी भारत में बढ़ती महंगाई का एक कारण है।
अजय कुमार
16 Nov 2021
inflation

थोक महंगाई दर के आंकड़े आए हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक भारत की अक्टूबर महीने की थोक महंगाई दर 12.54 प्रतिशत है। पिछले साल अक्टूबर महीने में थोक महंगाई दर महज 1.31 प्रतिशत थी। साल 2011-12 के आधार वर्ष के आधार पर आंकी जाने वाली थोक महंगाई दर की यह महंगाई पिछले 7 महीने से लगातार 10 फ़ीसदी के ऊपर बनी हुई है। पिछले 20 सालों में थोक महंगाई दर की यह सबसे ऊंची मौजूदगी है। पिछले 20 सालों में थोक महंगाई दर का आंकड़ा इतने ऊंचे स्तर पर नहीं पहुंचा था। थोक महंगाई दर का इतना बड़ा स्तर उस देश से बना हुआ है जहां पर 90 फ़ीसदी से अधिक आबादी असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। जिसकी आमदनी कभी भी महंगाई दर के हिसाब से नहीं बढ़ती है। तब सोचिए कि इसका असर कितना बड़ा पड़ता होगा 

थोक महंगाई दर का मतलब उन कीमतों के आधार पर महंगाई दर का आकलन करना होता है, जिन कीमतों के आधार पर दुकानदार थोक विक्रेताओं से माल खरीदता है। खुदरा महंगाई दर और थोक महंगाई दर के बीच कई अंतर हैं। जैसे कि खुदरा महंगाई दर में सेवाओं को शामिल किया जाता है लेकिन थोक महंगाई दर में सेवाओं को शामिल नहीं किया जाता है। खुदरा महंगाई दर के आकलन के लिए जिस हिसाब से माल और सेवाओं का भारांस तय किया जाता है ठीक उसी हिसाब से थोक महंगाई दर में भारांस नहीं तय किया जाता। लेकिन सबसे बड़ा अंतर यह है कि थोक महंगाई दर में खुदरा दुकानदार द्वारा तय की गई कीमतों के आधार पर महंगाई का आकलन नहीं किया जाता बल्कि थोक विक्रेताओं द्वारा तय की गई कीमतों के आधार पर महंगाई का आकलन किया जाता है। जैसे अगर अगर थोक विक्रेता ₹90 कीमत के आधार पर कोई माल बेचेगा तो खुदरा विक्रेता माल को ₹90 से अधिक की कीमत पर ही बेचेगा, ₹90 से कम की कीमत पर नहीं बेच सकता। तो थोक महंगाई दर में खुदरा महंगाई दर से कम कीमतों के आधार पर महंगाई दर का आकलन होता है। इसलिए थोक महंगाई दर अक्सर खुदरा महंगाई दर से कम होती है। 

लेकिन पिछले कुछ समय से थोक महंगाई दर, खुदरा महंगाई दर से ज्यादा दर्ज की जा रही है। इसका कारण यह है कि थोक महंगाई दर के पूरे बास्केट में इंधन और शक्ति ( फ्यूल एंड पावर) का भारांस 13.5 प्रतिशत का होता है। फ्यूल और पावर के क्षेत्र में 37.18% की खतरनाक दर से महंगाई दर बनी हुई है। भारत में 80 फ़ीसदी दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल होता है। इसका सीधा असर उन पर पड़ रहा है 

बहुमूल्य खनिज पदार्थ में निवेश करने वाले बहुत अधिक निवेश कर रहे हैं। कॉपर, जिंक, आयरन, स्टील में पिछले कुछ समय से बड़ा निवेश किया गया है। भविष्य की चिंताएं और भविष्य की योजनाओं को देखते हुए कई देश बड़ी मात्रा में इन बहुमूल्य पदार्थों को खरीद रहे हैं। ऐसे में इनकी कीमतों में भी बहुत बड़ा इजाफा हुआ है। यह इजाफा थोक महंगाई दर में दिख रहा है। 

महामारी की वजह से सारा काम ठप पड़ गया था। उत्पादन बैठ गया था। उस उत्पादन में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। लेकिन वह इतना बड़ा सुधार नहीं है कि सप्लाई बोटेलनेक यानी आपूर्ति में कमी की समस्या से छुटकारा मिल जाए। यानी माल कम है और मांगने वाला ज्यादा हैं। परिणाम कीमतों की बढ़ोतरी में दिखता है।

इन सब का निचोड़ यही है कि माल बनाने वाली कंपनी की लागत बढ़ेगी। लागत बढ़ेगी तो थोक मूल्य भी बढ़ेगा और थोक मूल्य बढ़ेगा तो खुदरा महंगाई भी बढ़ेगी। इसका असर तो आम जनता पर पड़ता ही पड़ता है। भले आंकड़े इसे दिखा पाए या नहीं।

अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार इन सब कारणों के अलावा एक और महत्वपूर्ण कारण बताते हैं। प्रोफ़ेसर अरुण कुमार की राय है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था में एकाधिकार की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कुछ लोग कीमतें बढ़ा रहे हैं उनके साथ प्रतियोगिता करने वाला कोई नहीं है। और मुनाफा बढ़ता जा रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था की इस प्रवृत्ति का सत्यापन ढेर सारे आंकड़े कर सकते हैं। अब इसी आंकड़े को देखिए कि वित्तवर्ष 2021-22 की दूसरी तिमाही के नतीजों में लिस्टेड कंपनियों ने रिकॉर्ड 2.39 लाख करोड़ की कमाई की है। कंपनियों के मुनाफे में सालाना करीब 46 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है। इनमें भी बड़ा मुनाफा सभी लिस्टेड कंपनियों ने दर्ज नहीं की है। बल्कि कुछ ही कंपनियों ने दर्ज की है। वह कंपनियां जो एनर्जी सेक्टर से जुड़ी हुई है उन्होंने तकरीबन 87 फ़ीसदी का मुनाफा दर्ज किया है।

क्रिस्टल रिसर्च के आंकड़े कहते हैं कि महंगाई की वजह से सबसे अधिक मार शहरी गरीबों पर पड़ी है। भारत के 20% निम्न आय वाले शहरी गरीबों की कमर महंगाई के बोझ न तोड़ दी है।

यहां पर यह भी समझने वाली बात है कि मौजूदा समय की महंगाई बढ़ती महंगाई नहीं है जो लोगों की जेब में पैसा होने की वजह से होती है। बल्कि यह अजीब स्थिति है। तकनीकी भाषा में इसे स्टैगफ्लेशन कहा जाता है। लोगों की जेब में पैसा नहीं है और सामानों के दाम बढ़ते जा रहे हैं। 

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी का अध्ययन बताता है कि भारत में महज 1.6 फ़ीसदी कामगारों की कमाई ₹50 हजार रुपए महीने से अधिक है। भारत की बहुत बड़ी आबादी जो गांव देहात में बसती है, इसकी कमाई से जुड़ा साल 2017 का आंकड़ा कहता है कि भारत की 70 फ़ीसदी ग्रामीण परिवार महीने में 8333 रुपए कमाते हैं। इसमें से 40 फ़ीसदी परिवार महीने में ₹4500 से भी कम कम कमाते हैं और 20 फ़ीसदी परिवार महीने में ₹2500 भी कम कम कमाते है। अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा के मुताबिक पिछले 8 साल में तकरीबन आठ करोड़ लोग गरीब हुए हैं। 

भारत की इस गरीबी के साथ महंगाई के आंकड़े और कारणों को देखने पर ऐसा लगता है जैसे मानो आम जनता का कोई रहनुमा नहीं है। सरकार को आम जनता की परेशानियों से कोई लेना देना नहीं। इसीलिए अर्थशास्त्री कौशिक बसु अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखते हैं कि दुनिया के कई मुल्कों में थोक महंगाई दर ऊंची है। लेकिन यह कारण बताकर के भारत की सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। दुनिया के दूसरे मुल्कों में सरकारें गरीब मध्यम वर्ग और मजदूर का सहारा बन रही हैं। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा है। 

Inflation
Food Inflation
Rising inflation
economic crises
Economic Recession
poverty
Hunger Crisis

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

गतिरोध से जूझ रही अर्थव्यवस्था: आपूर्ति में सुधार और मांग को बनाये रखने की ज़रूरत

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

एक ‘अंतर्राष्ट्रीय’ मध्यवर्ग के उदय की प्रवृत्ति


बाकी खबरें

  • अजय कुमार
    मोदी जी की नोटबंदी को ग़लत साबित करती है पीयूष जैन के घर से मिली बक्सा भर रक़म!
    29 Dec 2021
    मोदी जी ग़लत हैं। पीयूष जैन के घर से मिला बक्से भर पैसा समाजवादी पार्टी के भ्रष्टाचार का इत्र नहीं बल्कि नोटबंदी के फ़ैसले को ग़लत साबित करने वाला एक और उदाहरण है।
  • 2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    29 Dec 2021
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने साल 2021 के उन उजले-स्याह पलों का सफ़र तय किया, जिनसे बनती-खुलती है भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की राह।
  • जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    रवि शंकर दुबे
    जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    29 Dec 2021
    यह हड़ताली रेजिडेंट डॉक्टर्स क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं, अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरना इनके लिए क्यों ज़रूरी है। आइए, क्रमवार जानते हैं-
  • सोनिया यादव
    जेएनयू: ICC का नया फ़रमान पीड़ितों पर ही दोष मढ़ने जैसा क्यों लगता है?
    29 Dec 2021
    नए सर्कुलर में कहा गया कि यौन उत्पीड़न के मामले में महिलाओं को खुद ही अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। महिलाओं को यह पता होना चाहिए किए इस तरह के उत्पीड़न से बचने के लिए उन्हें अपने पुरुष दोस्तों के…
  • कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    एजाज़ अशरफ़
    कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    29 Dec 2021
    सेंसरशिप अतीत की हमारी स्मृतियों को नष्ट कर देता है और जिस भविष्य की हम कामना करते हैं उसके साथ समझौता करने के लिए विवश कर देता है। प्रलयकारी घटनाओं से घिरे हुए कश्मीर में, लुप्त होती जा रही खबरें…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License