NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सर्वेक्षण: अनलॉक में भी असंगठित क्षेत्र के मज़दूर को बहुत राहत नहीं, मज़दूरी घटी, क़र्ज़ बढ़ा
एक्शन एड के सर्वेक्षण में शामिल लगभग 24% उत्तरदाताओं ने बताया कि अनलॉक के विभिन्न चरणों के दौरान उनके पास कोई काम नहीं था, और 50% के आस-पास श्रमिकों का कहना था कि इस दौरान मजदूरी के तौर पर उनकी मासिक आय 5,000 रुपये से भी कम थी।
सुमेधा पाल
09 Nov 2020
सर्वेक्षण

एक्शनएड एसोसिएशन इंडिया की ओर से असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लेकर चलाए गए सर्वेक्षणों के आधार पर एक फैक्ट शीट जारी की गई है, जिसने इस तथ्य का खुलासा किया है कि श्रमिकों की जिंदगी में सुधार के मामले में सरकारें किस प्रकार से अक्षम साबित हुई हैं।

यह विस्तृत रिपोर्ट, इस संगठन द्वारा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर कोरोनावायरस और लॉकडाउन से पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चलाए गए देशान्तरीय अध्ययन का हिस्सा है, जिसे शनिवार को जारी किया गया था। दूसरे दौर के सर्वेक्षण को इस वर्ष के अगस्त और सितंबर माह में 23 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों में संचालित किया गया था। इस सर्वेक्षण को अनलॉक 3.0 (महामारी के बीच में सरकार के चरणबद्ध तरीके से लॉकडाउन को खोलने के तीसरे दौर में) के दौरान चलाया गया था। कुल 402 जिलों के 16,900 से अधिक श्रमिकों के बीच में इस सर्वेक्षण को किया गया था। इस बातचीत में आजीविका और मजूदरी सहित, बचत और खर्चों, सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं एवं अन्य अधिकारों तक पहुँच सहित कई मुद्दों को शामिल किया गया था।

‘जीवन-निर्वाह के संसाधन छिन चुके हैं, जबकि कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है’

एक्शन एड के आँकड़े इस तथ्य को दर्शाते हैं कि पहले दौर के सर्वेक्षण की तुलना में रोजगार के मामले में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालाँकि सर्वेक्षण में शामिल 48% श्रमिकों का कहना था कि उनके हाथ में अभी भी कोई रोजगार उपलब्ध नहीं है। मात्र 10% श्रमिकों ने ही पूर्णकालिक रोजगार हासिल होने की पुष्टि की, जबकि 42% श्रमिक ऐसे थे जो या तो पार्ट-टाइम तौर पर रोजगारशुदा थे या अनलॉक के विभिन्न चरणों के दौरान उन्हें कभी-कभार काम मिल जा रहा था।

रिपोर्ट से पता चलता है कि करीब 68% उत्तरदाताओं ने सूचित किया है कि वे पूर्व की तुलना में कम और अपर्याप्त भोजन की खपत कर रहे हैं। शहरी क्षेत्रों के 67% से अधिक और ग्रामीण क्षेत्रों के 68% श्रमिकों के बीच में यह स्थिति देखने में आ रही है।

मजदूरी की दर में कमी और बचत में गिरावट के चलते श्रमिक काफी हद तक कर्ज पर निर्भर हैं। करीब 39% श्रमिकों ने सूचित किया है कि खुद के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए उन्हें बाहर से कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है। सर्वेक्षण में शामिल शहरी क्षेत्रों के श्रमिकों में यह दर 47% थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्र के श्रमिकों में यह दर 36% थी।

लॉकडाउन से पूर्व रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले लगभग 57% श्रमिकों ने बताया है कि वे काम की तलाश में बाहर जाने के बजाय अपने ही गृह जिलों में बने रहना चाहते हैं। इनमें से करीब 61% श्रमिकों ने बताया कि कोरोनावायरस की चपेट में आ जाने के डर से वे वापस नहीं जाना चाहते, जबकि 20% का कहना था कि उनके प्रवास के चलते वे काम के अवसरों की कमी को लेकर चिंतित थे।

जहाँ एक तरफ अभी भी रोजगार के अवसर लॉकडाउन-पूर्व के स्तर तक नहीं पहुँच सके हैं, वहीं दूसरी ओर श्रमिकों को मिल रही मासिक मजदूरी भी बेहद निचले स्तर पर बनी हुई है।

तकरीबन 24% उत्तरदाताओं ने सूचित किया है कि अनलॉक चरणों में उनके पास कोई काम नहीं था, जबकि 50% के करीब श्रमिकों ने कहा कि उनकी मासिक मजदूरी 5,000 से भी कम थी। इसके अलावा 64% उत्तरदाताओं ने इस बात की पुष्टि की है कि लॉकडाउन की शुरुआत में उनकी जो मजूदरी देय थी, वह अभी तक उन्हें नहीं मिली है।

रिपोर्ट के जारी होने के अवसर पर बोलते हुए ओपी जिंदल विश्वविद्यालय के डॉ. सुमित म्हासकर ने कहा “यह रिपोर्ट रोजगार के संसाधनों के नुकसान के साथ-साथ ऋणग्रस्तता के बारे में एक सुगठित आंकड़ों के सेट को प्रस्तुत करने का काम करती है। यह कुल मिलाकर लगातार जारी अस्थिर चित्र को प्रस्तुत करने का काम करता है। महामारी के चलते इस अस्थिरता में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन देखें तो ये हालात महामारी और लॉकडाउन से पूर्व भी यथावत बने हुए थे।”

वेबिनार में बोलते हुए टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज की प्रोफेसर लक्ष्मी लिंगम का कहना था कि “जिस प्रकार की असहायता की स्थिति बनी हुई है, ऐसे में महिलाओं को ही इसका सबसे बड़ा खामियाजा भुगतने के लिए विवश होना पड़ेगा, जिसमें मातृत्व स्वास्थ्य, इसके दस्तावेजीकरण और सामाजिक सुरक्षा तक पहुँच बना पाने में कमी इत्यादि शामिल हैं। कोरोना काल से पहले के दौर की तुलना में महिलाओं को शादी के बंधन में धकेला जा रहा है। कई परिवार अपनी बेटियों की शादियाँ जल्द से जल्द कराने के इच्छुक हैं, क्योंकि उस स्थिति में उनके प्रति किसी प्रकार की हिंसा की आशंका की चिंता किये बिना उन्हें रोजगार के सिलसिले में प्रवासन को लेकर फिर कोई चिंता नहीं रहेगी।” अपनी बात में आगे जोड़ते हुए उनका कहना था कि भोजन और पानी को हासिल करने के लिए महिलाओं को काफी मशक्कत उठानी पड़ रही है, जिसके नतीजे में उनकी पढ़ाई-लिखाई भी बंद हो गई है।

एक्शन एड की और से पहले दौर का राष्ट्रीय सर्वेक्षण 14 से 22 मई के बीच में आयोजित किया गया था। इसके निष्कर्षों ने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बीच मौजूद के तीव्र संकट को उजागर किया था, जिसमें आजीविका के संसाधनों में (78%) तक के उच्च स्तर का नुकसान और (53%) तक ऋणग्रस्तता का स्तर पर बना हुआ था। आधे से ज्यादा की संख्या में प्रवासी मजदूरों ने सूचित किया था की वे एक महीने से भी अधिक समय से फँसे हुए थे और हर पांच में से तीन श्रमिकों को लॉकडाउन के दौरान अपने आवास को खाली करने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Informal Sector Workers Continue to Struggle with Low Wages, High Debts: ActionAid Report

ActionAid
Informal Workers
Employment
loans
wages
Workers’ Rights
unemployment
debt
migration
COVID-19
Lockdown

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत


बाकी खबरें

  • farmers
    शंभूनाथ शुक्ल
    सरकार औपनिवेशक नीतियां न लादे!
    28 Jul 2021
    संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता जा रहा है और सरकार किसी भी सर्वमान्य हल की तरफ़ बढ़ने का संकेत नहीं दे रही है। यह सरकार की ज़िद है और लोकतंत्र-विरोधी काम है।
  • p
    कुमुदिनी पति
    मनोरंजन का कारोबार बनाम पॉर्न का बाज़ार
    28 Jul 2021
    आखिर हम कैसे फर्क करें कि राज का धंधा इरोटिका से जुड़ा था या पॉर्न उद्योग से? हम कैसे समझें कि वह अपनी टीम के साथ जो कुछ कर रहा था वह समाज के लिए अस्वस्थ है या नहीं और कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी…
  • पीपल्स डिस्पैच
    म्यांमार में 4,800 खदान कर्मचारियों की हड़ताल के छह महीने पूरे
    28 Jul 2021
    माइनिंग वर्कर्स फ़ेडरेशन ऑफ़ म्यांमार से जुड़े ये खनिक फ़रवरी में सैन्य तख़्तापलट के बाद से हड़ताल पर हैं। उनकी लंबी हड़ताल ने सैन्य शासन के राजस्व को प्रभावित किया है।
  • neoliberalism
    अजय गुदावर्ती
    नवउदारवाद के तीन ऐसे रास्ते जिन्होंने नए भारत में राजनीति को बदल दिया है
    28 Jul 2021
    आज के नेता विचारधारा की परवाह नहीं करते हैं और एक पार्टी से दूसरी पार्टी में आते-जाते रहते हैं, और फिर भी वे जनता के हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। आख़िर ऐसा क्यों है?
  • सफाइकर्मचारियों की हड़ताल
    अजीत सिंह
    उत्तराखंड में स्वच्छता के सिपाही सड़कों पर, सफाई व्यवस्था चौपट; भाजपा मांगों से छुड़ा रही पीछा
    28 Jul 2021
    उत्तराखंड राज्य के नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में स्वच्छता और सफ़ाई व्यवस्था में लगे हजारों की तादाद में सफ़ाईकर्मी अपना काम छोड़ कर हड़ताल पर हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License