NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भारत में संस्थाएं ही फेल कर रही हैं बुद्धिजीवियों को 
‘देश में तेजी से बढ़ते ध्रुवीकरण एवं अनावश्यक शत्रुतापूर्ण माहौल में सार्वजनिक बुद्धिजीवी सत्ता से सच बोलने का प्रयास कर रहे हैं’, न्यायमूर्ति डी.वाई.चंद्रचूड़ की यह हालिया टिप्पणी बहुत देर से आई और एक बेहद अल्प प्रतिक्रिया है-हालांकि यह ध्यान देने लायक और प्रासंगिक है, इसी विषय पर लिखती हैं-अंशु सलुजा।
अंशु सलुजा
09 Sep 2021
भारत में संस्थाएं ही फेल कर रही हैं बुद्धिजीवियों को 

हमारी संस्थाओं की सत्यनिष्ठा में तेजी से होता क्षरण, असहिष्णुता को बढ़ावा दिया जाना, और यहां तक कि असहमतियों से हद तक नफरत करना, असंतुष्टों का तत्परता से दमन कर देना, सटीक सूचनाओं को रोक लेना और इसके विपरीत, फर्जी खबरों का व्यापक रूप से प्रसार करना-ये आज के हमारे देश-समाज की बड़ी गंभीर समस्याएं हैं। हमारे सार्वजनिक बुद्धिजीवियों को इस तेजी से बढ़ते प्रतिकूल वातावरण में उन मसलों के हल के लिए अपनी आवाज बुलंद करने में परेशानी हो रही है। 

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने छठे एम सी छागला स्मृति व्याख्यान में जर्मन के प्रख्यात दार्शनिक इमैनुएल कांट के बरअक्स अमेरिकी दार्शनिक नोम चोमस्की की बातों को रखते हुए कहा कि “राज्य-सत्ता से सवाल करना” एवं लोकतंत्र को सचारु रखने के लिए “राज्य-सत्ता एवं उसके विशेषज्ञों के असत्य” को उजागर करते रहना, सार्वजनिक बुद्धिजीवियों का विशेष कर्तव्य है।

यह तो निश्चित है कि भारत में सार्वजनिक बुद्धिजीवियों ने तीखे सवाल पूछने एवं सत्ता से सच बोलने का अपना फर्ज निभाया है। लेकिन क्या न्यायपालिका समेत अन्य संस्थानों ने तथाकथित इन सार्वजनिक बुद्धिजीवियों के प्रति अपने कर्तव्यों का निबाह किया है? क्या उन्होंने ताकतवर लोगों से इनके टकराव मोल लेने एवं धारा के विरुद्ध चलने के लिए एक आवश्यक समर्थन प्रणाली की पेशकश की है, जो कि ऐसे मामलों में अहम है?

अब यहां इस समर्थन प्रणाली के घटकों के बारे में पूछा जा सकता है। तो यकीनन, इसमें सबसे पहला यह आश्वासन शामिल है कि आप सुरक्षित रहेंगे, चाहे आप किसी से सवाल करें या फिर उनका विरोध करें। दूसरा, उनके साथ संबद्ध होने, उनसे जुड़ने की इच्छा रखना और सच को स्वीकार करना, चाहे वह स्वीकार्य हो अथवा कितने भी असुविधाजनक क्यों न हो। इन चीजों को न कर पाने की विफलता ने दुरुपयोग, दमन एवं उत्पीड़न के लिए सारा मैदान खुला छोड़ दिया है। निश्चित ही यह स्थिति लोगों में डर पैदा करती है और सच में, उसने अपने खास उपायों के जरिए ऐसा किया भी है। 

बढ़ता खौफ 

निकट अतीत में, उच्च शिक्षण की हमारी कई सार्वजनिक संस्थाएं, जिनमें हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसे संस्थान तक शामिल हैं, वे अपने छात्रों के बड़े-बड़े प्रदर्शनों के स्थल बन कर उभरे हैं, जिनके स्वरों को अनर्गल तरीके शक्तिशाली हो गए एवं सवालों को बर्दाश्त न करने वाले विश्वविद्यालय-प्रशासनों ने दबा दिया है-कभी-कभी तो राज्य समर्थित अधिकारियों के हिंसक प्रतिरोध द्वारा भी उनकी आवाजों को घोंट दिया गया है। यहां तक कि बड़े-बड़े निजी विश्वविद्यालय, जो स्पष्ट रूप से आइवी लीग संस्थानों की तरह अपने लिए एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बनाने की मांग कर रहे हैं, वे भी असहिष्णुता की तेज होती आंच में झुलस गए हैं। जबकि यह उम्मीद की जाती थी कि निजी विश्वविद्यालय निजी पूंजी के बल पर अपना बचाव कर सकते हैं और जारी रह सकते हैं। यह भी उम्मीद की जाती थी कि निजी पूंजी की ताकत पर बने येनिजी विश्वविद्यालय एक तैयार स्थानों के रूप में अपनी बेहतर सेवाएं दे सकते हैं, जहां वे बौद्धिक पूछताछ की स्वतंत्र भावना की रक्षा कर सकते हैं, और उन्हें जारी रख सकते हैं। हालांकि ऐसी उम्मीदें अब बेबुनियाद साबित हो रही हैं।

देश के बौद्धिक, जो बड़े मेट्रोपॉलिटन केंद्रों के प्रलोभनों से बहुत दूर रह कर सरजमीनी स्तर पर अथक परिश्रम कर रहे हैं, उनकी नियति पर अधिक खतरा है। यह विडम्बना है कि जमीनी स्तर पर संलग्नता का विचार पर उत्तेजक नारों एवं चमकदार विज्ञापनों का दखल हो गया है, जिसे लगातार कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के एक हिस्से के रूप में अवधारणाबद्ध किया गया है। लेकिन विभिन्न स्थानीय संदर्भों में कमजोर समूहों को प्रभावित करने वाले जमीनी स्तर की चिंताओं के साथ सार्वजनिक बुद्धिजीवियों की भागीदारी राज्य की तरफ से वैसी ही उत्साहजनक प्रतिक्रिया पाने में विफल रही है। 

राज्य प्रशासन अपनी तरफ से इस आसन्न संकट को दबाने, उनके नेताओं एवं प्रतिभागियों का दमन करने में अपनी सभी शक्ति का इस्तेमाल करता है। लेकिन इस दमनकारी मुहिम के प्रति हमारी संस्थाओं, खास कर, न्यायपालिका के व्यापक हिस्से की हालिया प्रतिक्रिया एकदम निराशाजनक रही है, इतना तो कम से कहा ही जा सकता है। 

यह बात तेजी से सच होती जा रही है कि राज्य-सत्ता से असहमति-असंतोष जताने वाले अकादमिकों एवं कार्यकर्ताओं का निबटना कभी आसान नहीं रहा है। वे हमेशा से ही अपनी आवाजों के लिए एक जगह बनाने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में, उनका यह रास्ता अधिक कंटीला, संघर्षमय और कठिन होता गया है, क्योंकि उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स की सेना से मुकाबला बढ़ गया है, टीवी चैनलों पर प्राइम टाइम में निंदा-अभियान बढ़ गया है, और इन सबसे बुरा तो यह हुआ है कि उन्हें आपराधिक मामले में जेल भेजा जाने लगा है, जो एक लंबे समय तक चलने वाली कानूनी लड़ाई की तरफ ले जाता है, जिसकी सुनवाई शुरू होने और उस पर फैसला आने में, दोनों ही प्रक्रियाओं में सालों साल लग जाते हैं। कई मामलों में यह तय प्रक्रिया किसी नतीजे पर पहुंचने के पहले उस बद्धिजीवी की असमायिक मृत्यु के साथ ही खत्म होती है। 

“अधिक सतर्क”, “पारदर्शी” और “अन्य लोगों के विचारों को खुले तौर पर स्वीकार करने” के लिए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की चेतावनी के आने में शायद बहुत देर हो गई है। वर्तमान माहौल में केवल चेतावनी देने वाले संदेश पर्याप्त नहीं होने वाले हैं। इन संदेशों के साथ हमारे संस्थानों, जिनमें न्यापालिका सबसे अग्रणी है, उनकी ओर से भी मजबूत संकेत देने होंगे और इसके लिए तत्काल सुधारात्मक उपाय भी अमल में लाने होंगे। 

संस्थागत साख को बचाना

सार्वजनिक बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा विभिन्न संस्थाओं में जारी क्षरणों के बारे में हमें  सचेत करने के लिए खतरे की घंटी लगातार बजाता रहेगा। लेकिन अंतिम विश्लेषण में, बात यहीं आकर टिकती है कि इन संस्थाओं में तेजी से हो रहे क्षरण को बचाने का सारा दारोमदार उन्हीं संस्थाओं के कंधे पर है, जिनमें नौकरशाही, न्यायपालिका, लोकप्रिय या मुख्यधारा का मीडिया जैसी कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण संस्थाएं शामिल हैं। ये वे संस्थाएं हैं, जिन्हें अपने घरों को ठीक करने के लिए पूरी लगन से लगना होगा। उन्हें धारणात्मक एवं वस्तुगत दोनों ही संदर्भो में, अपनी सिकुड़ती गई जगहों पर फिर से अपना दावा जताना होगा। 

लेकिन मरम्मत के इन कामों को शुरू करने और भवन-निर्माण किए जाने के पहले, उन्हें अपने हुए नुकसान का साफ-साफ अंदाजा अवश्य लगा लेना चाहिए। आत्मनिरीक्षण और स्वीकार का भाव उसी के भीतर से ही आना है। उसे आवश्यक रूप से मौलिक सुधार करने के मकसद से ठोस उपायों के साथ किया जाना चाहिए। 

विरोधियों के बीच संतुलन खोजने की क्षमता एक लाभ दिलाने वाली योग्यता है, लेकिन केवल अपने हित में संतुलन बनाने की इस कला को हमें त्यागना होगा। हमें बिना लाग लपेट के सच कहना होगा, और सच को स्वीकार करना होगा, भले ही यह हमारी सबसे अधिक पोषित धारणाओं से मुठभेड़ क्यों न करता हो। उदाहरण के लिए, हमें नफरत फैलाने वाले या धमकी वाले वक्तव्य एवं भाषण को पहचानना होगा, बिना इस दबाव में आए कि इसको किसने दिया है, संस्थाओं की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर हो रहीं फिसलनों को रोकना होगा तथा भ्रामक सूचनाओं का प्रतिकार करना होगा। यह करते हुए, हमें सभी स्तरों पर जवाबदेही निभाए जाने की मांग के लिए कड़ी मेहनत भी जारी रखनी होगी। 

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने व्याख्यान में “उत्तर-सत्य वाले विश्व” में रहने की चुनौतियों का जिक्र किया, जिसमें “हमारे सच” बनाम “तुम्हारे सच” के बीच लड़ाई मची हुई है, और यह भी कहा कि “लोकतंत्र एवं सच दोनों जुड़े हुए हैं। लोकतंत्र की निरंतरता के लिए सच की ताकत की जरूरत है।“ अपने व्याख्यान के अंत में, न्यायमूर्ति का सुझाव था कि “सच को झूठ से अलगाना” कठिन है और यह नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे सच को सुनिश्चित करने के लिए राज्य-सत्ता से सवाल पूछें। उनके व्याख्यान के ये कुछ अमूल्य सबक हैं, जिनका हमारी संस्थाओं को अनुसरण करना चाहिए एवं उन्हें लागू करना चाहिए। 

(अंशु सलुजा एक स्वंतत्र शोधार्थी एवं लेखिका हैं। आलेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

पहली बार लीफ्लेट में प्रकाशित 

अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Intellectuals are Being Failed by Institutions in India

Attack on free speech
Intellectuals in India
BJP
RSS
Justice Chandrachud

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • No more rape
    सोनिया यादव
    दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर
    29 Jan 2022
    भारत के विकास की गौरवगाथा के बीच दिल्ली में एक महिला को कथित तौर पर अगवा कर उससे गैंग रेप किया गया। महिला का सिर मुंडा कर, उसके चेहरे पर स्याही पोती गई और जूतों की माला पहनाकर सड़क पर तमाशा बनाया गया…
  • Delhi High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: तुगलकाबाद के सांसी कैंप की बेदखली के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दी राहत
    29 Jan 2022
    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 फरवरी तक सांसी कैंप को प्रोटेक्शन देकर राहत प्रदान की। रेलवे प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट में सांसी कैंप के हरियाणा में स्थित होने का मुद्दा उठाया किंतु कल हुई बहस में रेलवे ने…
  • Villagers in Odisha
    पीपल्स डिस्पैच
    ओडिशा में जिंदल इस्पात संयंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतरे लोग
    29 Jan 2022
    पिछले दो महीनों से, ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोग 4000 एकड़ जमीन जिंदल स्टील वर्क्स की एक स्टील परियोजना को दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह परियोजना यहां के 40,000 ग्रामवासियों की…
  • Labour
    दित्सा भट्टाचार्य
    जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने गंवाए 259 अरब श्रम घंटे- स्टडी
    29 Jan 2022
    खुले में कामकाज करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के हिस्से में श्रम हानि का प्रतिशत सबसे अधिक दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में है, जहाँ बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग कृषि क्षेत्र में…
  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : नदियों का दोहन और बढ़ता अवैध ख़नन, चुनावों में बना बड़ा मुद्दा
    29 Jan 2022
    नदियों में होने वाला अवैज्ञानिक और अवैध खनन प्रकृति के साथ-साथ राज्य के खजाने को भी दो तरफ़ा नुकसान पहुंचा रहा है, पहला अवैध खनन के चलते खनन का सही मूल्य पूर्ण रूप से राज्य सरकार के ख़ज़ाने तक नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License