NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
अंतरराष्ट्रीय
अगर अब भी नहीं जगे तो अगले 20 साल बाद जलवायु परिवर्तन से तबाही की संभावना : रिपोर्ट
इस रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ोतरी की वजह से खूब अधिक बारिश होगी। सूखे की संभावना भी बढ़ेगी। हीटवेव का दंश भी झेलना पड़ेगा। हिमखंड पिघलेंगे। चक्रवाती तूफानों में बढ़ोतरी होगी। समुद्र का तापमान बढ़ेगा और समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी होगी।
अजय कुमार
11 Aug 2021
climate

पिछले 20 लाख सालों में भी दुनिया उतनी अधिक गर्म नहीं थी जितना वह मौजूदा दौर में है। तापमान में 1 डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोतरी से झकझोर देने वाली बारिश 7 गुना अधिक बढ़ रही है। पिछले 3 हजार सालों में पृथ्वी के समुद्र स्तर में उतनी अधिक बढ़ोतरी कभी नहीं हुई जितनी अब हो रही है। उत्तरी ध्रुव पर मौजूद महासागर की हिम खंडों की ऊंचाई पिछले एक हजार सालों के मुकाबले हाल फिलहाल सबसे कम है। पृथ्वी की जलवायु में हो रहे यह कुछ ऐसे बदलाव हैं जिन्हें फिर से बदलने में हजार साल लग सकते हैं। अगर हम दुनिया की गर्माहट को जरूरी मात्रा में नियंत्रित करने में कामयाब भी होते हैं फिर भी ध्रुवों पर मौजूद हिमखंडो की लगातार हो रही पिघलाहट को रोकने में तकरीबन एक हजार साल लगेगा। समुद्रों का तापमान बढ़ता रहेगा और समुद्रों के जलस्तर में अगले सौ साल तक बढ़ोतरी होती रहेगी।

यह सारी बातें संयुक्त राष्ट्र संघ के जलवायु परिवर्तन के अध्ययन से जुड़े एक संस्था इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की छठवीं रिपोर्ट में प्रकाशित हुई है। साल 1990 के बाद हर सात साल के बाद यह संस्था जलवायु परिवर्तन पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित करती है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों के जलवायु परिवर्तन अध्ययन को इस संस्था द्वारा जांचा परखा जाता है और उसके बाद यह रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है। इस बार दुनिया के 195 देशों की 14 हजार वैज्ञानिकों पेपर के अध्ययन के बाद 234 लेखकों ने 3 हजार पन्नों से ज्यादा की यह रिपोर्ट तैयार की है।

चूंकि इसमें दुनिया के सभी प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों के अध्ययन को जांचा परखा जाता है। यह आरोप लगाने की संभावना कम होती है कि दुनिया के कुछ शक्तिशाली देशों ने मिलकर इस रिपोर्ट को तैयार किया है इसलिए इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता ज्यादा होती है।

इसी संस्था ने यह निर्धारित किया था कि अगर दुनिया को जलवायु परिवर्तन के भयंकर परिणामों से बचाना है तो इस सदी के अंत तक दुनिया के औसत तापमान की बढ़ोतरी को 19 वी सदी के अंत यानी कि औद्योगिक काल के तापमान के मुकाबले 2 डिग्री सेंटीग्रेड से कम रखना होगा। धीरे धीरे दुनिया के वैज्ञानिकों को लगा कि यह लक्ष्य भी ठीक नहीं है। अगर इसके मुताबिक भी चले तब भी दुनिया को जलवायु परिवर्तन के भयंकर परिणाम सहने होंगे। इसलिए साल 2015 के पेरिस सम्मेलन में यह समझौता बना कि इस सदी के अंत तक औसत तापमान में बढ़ोतरी 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक नहीं होनी चाहिए। यह लक्ष्य भी अब छोटा साबित हो रहा है। जारी हुई इस रिपोर्ट के मुताबिक जिस गति से कार्बन उत्सर्जन हो रहा है उस गति से 2030 से पहले ही दुनिया के औसत तापमान में 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक की वृद्धि हो जाएगी। यही इस रिपोर्ट की सबसे अधिक चिंताजनक बात है। इस रिपोर्ट से जुड़े वैज्ञानिकों का तो यहां तक कहना है कि बहुत बड़े स्तर पर कार्बन उत्सर्जन रोकने के बाद भी शायद 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक नियंत्रित करने के लक्ष्य को हासिल ना किया जा सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस सदी के अंत तक जितना कार्बन उत्सर्जन होना चाहिए उतने कार्बन उत्सर्जन का तकरीबन 86 फ़ीसदी हिस्सा हमने इस सदी के शुरुआती दो दशक में ही उत्सर्जित कर दिया है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ोतरी की वजह से खूब अधिक बारिश होगी। सूखे की संभावना भी बढ़ेगी। हीटवेव का दंश भी झेलना पड़ेगा। हिमखंड पिघलेंगे। चक्रवाती तूफानों में बढ़ोतरी होगी। समुद्र का तापमान बढ़ेगा और समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी होगी। यह नई बात नहीं है। हकीकत तो यह है कि यह सारी दशाएं हम सब महसूस कर रहे हैं।

जहां तक बात रही भारत की तो मौजूदा वक्त में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मामले में भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। लेकिन प्रति व्यक्ति ग्रीन हाउस उत्सर्जन के मामले में भारत की स्थिति बहुत अच्छी है। भारत के मुकाबले अमेरिका में प्रति ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तकरीबन 9 गुना अधिक होता है। यानी जलवायु परिवर्तन से संघर्ष करने के लिहाज से भारत से ज्यादा अमेरिका जैसे विकसित देशों की जिम्मेदारी अधिक बनती है। फिर भी हकीकत की बात यह है कि जब जलवायु में बदलाव होगा तो इसकी मार दुनिया के सभी देशों को सहना पड़ेगा। उन देशों को अधिक सहना पड़ेगा जिनके जमीन का जुड़ाव समुद्रों से भी है।

इसलिए यह रिपोर्ट कहती है कि भारत की समुद्री तटरेखा तकरीबन 7500 किलोमीटर से अधिक है। इसलिए बढ़ते हुए समुद्री जल स्तर से भारत को बहुत अधिक नुकसान भी सहना पड़ेगा। भारत पर आधारित इस रिपोर्ट का एक हिस्सा कहता है कि चेन्नई, कोच्चि, कोलकाता, मुंबई, सूरत विशाखापत्तनम जैसे शहर भारत के प्रमुख बंदरगाह हैं. यहां तकरीबन 28 लाख लोगों की आबादी रहती है। अगर समुद्र के जलस्तर में 50 सेंटीमीटर की भी बढ़ोतरी हुई तो यह शहर बाढ़ से डूब जाएंगे।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का इस रिपोर्ट पर बयान मडिया में छपा है। महासचिव कहते हैं कि साल 2013 में जब यह रिपोर्ट छपी थी तब वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के कारणों के तौर पर पूरी तरह से मानव जनित कारणों को जिम्मेदार ठहराने से हिचक रहे थे। लेकिन इस रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने माना है जलवायु में हो रहे बदलाव के लिए पूरी तरह से मानव जनित कारण ही जिम्मेदार हैं। मौजूदा वक्त में दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक काल के मुकाबले 1.2 सेंटीग्रेड पहले ही बढ़ चुका है। इसलिए अगर 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तापमान रखना है तो इसके लिए असंभव लगने वाले कोशिशों को अमल में लाना होगा। दुनिया के विकसित देशों के संगठन जैसे कि G 20 और ऑर्गेनाइजेशन आफ इकोनामिक डेवलपमेंट काउंसिल को अधिक जिम्मेदारी लेनी होगी। यह योजना बनानी होगी की दुनिया के अधिकतर देशों की कोयले और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम हो। सौर और वायु ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों पर निर्भरता बढ़े।

सुनीता नारायण देश की जानी मानी पत्रकार हैं जो जलवायु जैसे मुद्दे पर लंबे समय से एक कार्यकर्ता की तरह काम करते आ रही हैं। डाउन टू अर्थ पत्रिका में वे लिखती हैं कि समुद्र भूमि और जंगल यह तीनों मिलकर जलवायु के सफाई तंत्र के तौर पर काम करते हैं। ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन सोंकने का काम करते है। पेड़ों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन पेड़ बड़ी मात्रा में कटे हैं। इसलिए रिपोर्ट बताती है कि आने वाले समय में हम इस पर भरोसा नहीं कर सकते कि यह तीनों मिलकर ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को उसी तरह से सोकेंगे जिस तरह से वह सोकते आ रहे है। इनकी सोकने की क्षमता पहले ही अपने शीर्ष पर पहुंच चुकी है।

इसलिए शून्य उत्सर्जन वाली पहल पर भी फिर से सोचने की जरूरत है। खतरे की घंटी ऐसी है कि अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन जैसे देशों को अधिक जिम्मेदारी से काम करना होगा।यह कौन नहीं जानता कि जलवायु परिवर्तन में बड़़ा हिस्सा कुछ मुटठी भर देशों का है। अमेरिका और चीन मिलकर दुनिया के कुल सालाना उत्जर्सन का आधा हिस्सा वहन करते हैं। अगर हम 1870 से 2019 के बीच उत्सर्जन को देखें तो इसमें अमेरिका और यूरोपीय संघ का योगदान 27 फीसद और ब्रिटेन, जापान और चीन का योगदान 60 फीसदी मिलता है। दूसरी ओर कार्बन डाइऑक्साइड को नियंत्रित करने के लिए इन देशों का बजट उस सीमा तक नहीं है, जितना उनका उत्सर्जन है। इसलिए इस बड़े अंतर को समझना जरूरी है, तभी हम यह जान पाएंगे कि वास्तव में हमें करना क्या है।

पर्यावरण जलवायु के मसले पर लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी की माने तो अगर तापमान बढ़ोतरी का यही रवैया चलता रहा तो इस सदी के अंदर तक औसत तापमान में तापमान में 3 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक की बढ़ोतरी हो सकती है। (पूर्व औद्योगिक काल के मुकाबले) 1 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ोतरी ढेर सारी खतरा पैदा करती है तो 3 डिग्री सेंटीग्रेड तो बहुत बड़ी तबाही ला सकती है। जहां तक भारत की बात है तो हिंदू कुश के ग्लेशियर का इलाका खतरे की श्रेणी में है। इसी पर भारत की नदियों की निर्भरता है। अगर यह खतरे में हुआ तो मामला खाद्यान्न संकट तक पहुंच सकता है। 

भारत की 50 फ़ीसदी से अधिक की खेती बारिश पर निर्भर है। भारत में 10,000 से अधिक छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं। 7500 किलोमीटर की समुद्री तट रेखा है। यानी भारत जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बहुत अधिक संवेदनशील क्षेत्र है। समुद्रों का तापमान बढ़ेगा और जब जमीन और समुद्र के तापमान के बीच फासला बढ़ेगा तो चक्रवाती तूफानों की संख्या बढ़ेगी। इसकी तीव्रता बढ़ेगी। मौसम में असंतुलन बढ़ेगा। इसकी सबसे बड़ी मार भारत की आबादी सहेगी जो सबसे अधिक गरीब है, जिसकी संख्या भारत में 25 करोड़ से अधिक है।


बाकी खबरें

  • ghazipur
    भाषा
    गाजीपुर अग्निकांडः राय ने ईडीएमसी पर 50 लाख का जुर्माना लगाने का निर्देश दिया
    30 Mar 2022
    दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने दो दिन पहले गाजीपुर लैंडफिल साइट (कूड़ा एकत्र करने वाले स्थान) पर भीषण आगजनी के लिये बुधवार को डीपीसीसी को ईडीएमसी पर 50 लाख रुपये का जुर्माना लगाने और घटना के…
  • paper leak
    भाषा
    उत्तर प्रदेश: इंटर अंग्रेजी का प्रश्न पत्र लीक, परीक्षा निरस्त, जिला विद्यालय निरीक्षक निलंबित
    30 Mar 2022
    सूत्रों के अनुसार सोशल मीडिया पर परीक्षा का प्रश्न पत्र और हल किया गया पत्र वायरल हो गया था और बाजार में 500 रुपए में हल किया गया पत्र बिकने की सूचना मिली थी।
  • potato
    मोहम्मद इमरान खान
    बिहार: कोल्ड स्टोरेज के अभाव में कम कीमत पर फसल बेचने को मजबूर आलू किसान
    30 Mar 2022
    पटनाः बिहार के कटिहार जिले के किसान राजेंद्र मंडल, नौशाद अली, मनोज सिंह, अब्दुल रहमान और संजय यादव इस बार आलू की बम्पर पैदावार होने के बावजूद परेशान हैं और चिंतित हैं। जि
  • east west
    शारिब अहमद खान
    रूस और यूक्रेन युद्ध: पश्चिमी और गैर पश्चिमी देशों के बीच “सभ्य-असभ्य” की बहस
    30 Mar 2022
    “किसी भी अत्याचार की शुरुआत अमानवीयकरण जैसे शब्दों के इस्तेमाल से शुरू होती है। पश्चिमी देशों द्वारा जिन मध्य-पूर्वी देशों के तानाशाहों को सुधारवादी कहा गया, उन्होंने लाखों लोगों की ज़िंदगियाँ बरबाद…
  • Parliament
    सत्यम श्रीवास्तव
    17वीं लोकसभा की दो सालों की उपलब्धियां: एक भ्रामक दस्तावेज़
    30 Mar 2022
    हमें यह भी महसूस होता है कि संसदीय लोकतंत्र के चुनिंदा आंकड़ों के बेहतर होने के बावजूद समग्रता में लोकतंत्र कमजोर हो सकता है। यह हमें संसदीय या निर्वाचन पर आधारित लोकतंत्र और सांवैधानिक लोकतंत्र के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License