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ईरान के साथ तनाव में अमेरिका की विश्वसनीयता कमजोर हो रही है !
पिछले साल मई में ईरान परमाणु समझौते को छोड़ने के अमेरिका के फैसले ने तनाव को बढ़ा दिया था और अब इसके संकेत देने की जिम्मेदारी ट्रम्प प्रशासन की है।
एम. के. भद्रकुमार
22 Jun 2019
drone
यूएस नेवी आरक्यू -4ए ग्लोबल हॉक की फाइल फोटो

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई के फैसले को अचानक वापस लेने की खबर है जिसका उन्होंने पहले आदेश दे दिया था। ये घटना यूएस-ईरान के बीच बढ़ती जटिलता को उजागर करता है।

वास्तव में इस तरह की खतरनाक स्थिति को मानने के लिए राजनीतिक साहस की आवश्यकता है और विवेक वीरता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ट्रंप काफी चालाक रहे हैं। लेकिन यह कहना चाहिए कि इसका परिणाम खराब होने वाला है। ट्रम्प प्रशासन पंगु दिखाई देता है। और तेहरान ने राजनयिक वार्ता को समाप्त कर दिया है।

ट्रम्प के पुनर्विचार ने क्या संकेत दिया? निश्चित रूप से ये पुनर्विचार कुछ हद तक ईरानी दावे को वैधता देता है कि इसने अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया जो इसके हवाई क्षेत्र में घुस गया था। (वास्तव में ईरान ने दावा किया है कि उसने देश के दक्षिणी जल क्षेत्र में गिराए गए अमेरिकी ड्रोन के मलबे को बरामद किया है।) अमेरिका का ऐसी परिस्थितियों में झूठ बोलने का इतिहास है। याद कीजिए वर्ष 1988 में एक ईरानी यात्री एयरबस ए300 जहाज को यूएसएस विनसेन्नेस से एसएम-2एमआर सतह-से -हवा में मार करने वाली मिसाइल ने गिरा दिया था, जिसमें 66 बच्चों सहित सभी 290 लोगों की मौत हो गई थी?

उपराष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के स्तर पर अमेरिका ने कहा था कि "मैं संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कभी माफी नहीं मांगूंगा - मुझे परवाह नहीं है कि सच्चाई क्या है। ईरान द्वारा इस घटना को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में उठाया गया था। इस मामले को बंद करने के लिए कुछ वर्ष बाद ही 1996 में वाशिंगटन ने ईरान को 131.8 मिलियन डॉलर का भुगतान करने के लिए समझौता किया था।

इसलिए इस 'ज्ञात अज्ञात' का अर्थ यहां पर यह है कि ट्रम्प ने आखिर किस स्थान पर महसूस किया होगा कि यह एक अमेरिकी जासूसी मिशन था जो काफी गलत हुआ- और ईरान के ख़िलाफ़ जल्दबाजी में असमय इसे शुरु किया गया। बेशक अपराध की स्वीकृति की उम्मीद नहीं होती है लेकिन ट्रम्प ने स्पष्ट रूप से मिथ्या पर आधारित युद्ध शुरू नहीं करने का फैसला किया।

अटलांटिक में एक विशेषज्ञ की राय "असभ्य सच्चाई" का वर्णन करती है जो इसके पूरे इतिहास में है, "अमेरिका ने उन देशों पर हमला किया है जिसने उसे धमकी नहीं दिया था। इस तरह के युद्धों को अंजाम देने के लिए अमेरिकी नेताओं ने अमेरिकी हमले को सही ठहराने के लिए पूर्वग्रहों को पेश किया। यही डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन- और विशेष रूप से इसके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन-अब ईरान के साथ कर रहे हैं।"

न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार ईरान द्वारा अपने हवाई क्षेत्र में घुसपैठ के लिए अमेरिकी निगरानी ड्रोन को मार गिराए जाने के बाद ट्रम्प के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बंट ने कहा है कि "उन्हें सैन्य कार्रवाई के रूप में जवाब देना" चाहिए या नहीं। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने अखबार को बताया कि सेक्रेट्री ऑफ स्टेट माइके पोम्पिओ, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन और सीआईए निदेशक जीना हासपेल ने सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया था। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, "लेकिन पेंटागन के शीर्ष अधिकारियों ने आगाह किया था कि इस तरह की कार्रवाई से उक्त क्षेत्र में अमेरिकी सेना के लिए जोखिम बढ़ सकता है।"

किसी भी तरह ट्रम्प की सरगर्मी इसमें यहां निहित है - इस अर्थ में कि वह समझते हैं कि ईरान के साथ युद्ध जोखिम भरा है जिसे अमेरिका सिर्फ बड़ी क़ीमत पर ही जीत सकता है और यहां तक कि वे अपने राष्ट्रपति पद को भी गंवा सकते हैं। दूसरा, ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से शामिल होने वाला कोई नहीं है। यहां तक कि यूएई और सऊदी अरब भी डरा हुआ है। (तेहरान ने खुलासा किया है कि अमेरिकी ड्रोन ने यूएई से उड़ान भरी थी।)

यूरोप में मनःस्थिति को दर्शाते हुए फ्रांस ने ईरान के साथ गतिरोध पर अमेरिका से खुले तौर पर असहमति जताई है। ट्रम्प को पता हो जाएगा कि अमेरिका द्वारा ईरान के ख़िलाफ़ उठाया जाने वाला कोई भी कदम एक अकेली कार्रवाई होगी। इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका के एक प्रभावशाली वर्ग ने भी ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार के अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को लेकर विरोध करना शुरू कर दिया है। जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और वाशिंगटन में फ्रांस के पूर्व राजदूत जेरार्ड अरौड के साथ पीबीएस को साक्षात्कार वीडियो को देखें।

अब आगे का रास्ता क्या है? ज़ाहिर है ट्रम्प अब तक ईरान के साथ संभावित गंभीर सैन्य संकट से बचने के लिए रास्ता तलाश रहे थें। बहरहाल इसके गहराने का खतरा बना हुआ है। दोनों देशों में कट्टरपंथी हैं और ऐसा हो सकता है कि वे इसे उकसाने के लिए आपस में सहयोगी बन गए हों। फिर एक दूसरे के इरादों के बारे में अनुमान लगाते हुए जब दो विरोधी अस्थिरता में लिप्त होते हैं तो खतरनाक परिणाम होते हैं।

मूल रूप से ट्रम्प की नीति में सामंजस्यता और स्पष्टता का अभाव है। इसकी "अधिकतम दबाव" की नीति अपने आप में समाप्त हो गई है। ये नीति दो लक्ष्यों - स्पष्ट ईरानी संधिपत्र या ईरानी शासन का अन्तःस्फोट- में से एक को प्राप्त करने के लिए कमतर बना देती है- और न ही यह एक यथार्थवादी उद्देश्य है।

सामान्य तौर पर देखें तो ड्रोन घटना में ईरान ने जो हासिल किया होगा वह न केवल अपनी क्षमता बल्कि अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति और अपने खिलाफ अमेरिका के आर्थिक युद्ध का मुकाबला करने के लिए दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन करना है।

सीधे तौर पर कहें तो इस प्रतिरोध ने स्थिति बदल दी है। ट्रम्प के औपचारिक रूप से 2020 के चुनाव के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के दो दिनों के भीतर ही अमेरिकी ड्रोन पर ईरानी मिसाइल ने हमला किया। यह सत्य है कि मंगलवार को ऑरलैंड के एमवे सेंटर स्टेडियम में उत्सव का शुरुआती कार्यक्रम युद्ध के ढ़ोल की आवाज़ में डूब गया है।

उपरोक्त को देखते हुए प्रत्यक्ष यूएस-ईरानी राजनयिक अनुबंध का कोई वास्तविक विकल्प नहीं है। लेकिन ऐसा होने के लिए अमेरिकी पक्ष की तरफ से किसी प्रकार का संकेत देना होगा। तीसरी दुनिया के देशों द्वारा ईरान से तेल आयात में छूट देने के मामले में तेहरान ट्रम्प प्रशासन से प्रतिबंधों को कम से कम ढील की उम्मीद करेगा।

निश्चित रूप से पिछले साल मई में ईरान परमाणु समझौते को छोड़ने के अमेरिका के फैसले ने तनाव को बढ़ा दिया था और अब इसके संकेत देने की जिम्मेदारी ट्रम्प प्रशासन की है। यह एक बड़ा सवाल है कि ट्रम्प इसे कैसे संभालेंगे। ट्रम्प प्रशासन की ईरान के प्रति आक्रामक और भ्रमित नीति ने अमेरिकी विश्वसनीयता को प्रभावित किया है।

सौजन्य: इंडियन पंचलाइन

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