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राजनीति
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क्या वाममार्गी हो रहे हैं बाइडेन?
दो निर्णय उनके इस बदलाव के संकेतक हैं। पहला कोविड-19 से राहत मद के लिए 1.9 ट्रिलियन डॉलर की योजना बनाना और दूसरा सीआईए के चीफ के रूप में कुशल राजनयिक विलियम बर्न्स का चुनाव।
एम. के. भद्रकुमार
20 Jan 2021
क्या वाममार्गी हो रहे हैं बाइडेन?

रेडिकल और असमानता के अन्य रूप अमेरिका की आर्थिक ताकत को संकुचित करते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित जो बाइडेन ने पिछले सप्ताह दो महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिससे यह उम्मीद की जा सकती है कि उनके राष्ट्रपति के कार्यकाल में बराक ओबामा युग की पुनर्वापसी होगी। इनमें से पहला निर्णय पिछले बृहस्पतिवार को कोविड-19 के राहत मद में 1.9 ट्रिलियन डॉलर की राहत योजना की घोषणा है और दूसरा, सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) के प्रमुख के रूप में एक धुरंधर राजनयिक विलियम बर्न्स की उनकी पसंद है। 

परस्पर भिन्न प्रतीत होते हुए भी ये फैसले एक शक्तिशाली संकेत देते हैं कि जो बाइडेन समझते हैं कि अमेरिका में वैश्विक महामारी कोरोना का असली खतरा समाज के विघटन के रूप में आया है और इस सामाजिक विघटन को रोकने, उसे समस्या बनने देने से रोकने के लिए एक राष्ट्रीय नीति की दरकार है और एक विदेश नीति की भी, जो उनकी सरकार की इस प्राथमिकता को बेहतर तरीके से प्रतिबिंबित करें।
  
सलाहकारों ने इसके बारे में अक्टूबर में ही बता दिया था कि अगर बाइडेन राष्ट्रपति चुनाव जीतते हैं, तो शपथ ग्रहण के दिन का इंतजार किए बिना वे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं तथा मध्य वर्ग और निम्न वर्ग के परिवारों को लक्षित व निर्देशित कर उन्हें तत्काल वित्तीय राहत उपलब्ध कराएंगे। बड़े कॉरपोरेट घराने जिनका बड़े-बड़े बैंकों से बेहतर संपर्क है, के बजाए लघु व्यवसायों-व्यापारियों को तरजीह देंगे, क्योंकि ‘इन परिवारों को मेज पर भोजन जुटाने, उनके बिजली-बिलों का भुगतान करने तथा उनके सिर पर छत बनाए रखने की जरूरत है।

 बाइडेन ने अपना वादा निभाया। उनके व्यय-प्रस्ताव में कोरोना के प्रकोप से लड़ने के लिए 400 बिलियन डॉलर, कोरोना से पीड़ित व्यक्तियों और परिवारों को सीधी राहत देने के लिए 1 ट्रिलियन डॉलर और इस महामारी के चलते बुरी तरह तबाह हुए समुदायों और व्यवसायों की मदद के मद में 440 बिलियन डॉलर की राशि आवंटित की गई है। 
 
उनका व्यय प्रस्ताव इस रूप में परिकल्पित है:

  • इसमें सर्वोच्च स्तर पर 600 डॉलर नगद सहायता देने का अमेरिकी कांग्रेस से पिछले महीने पारित प्रस्ताव के अलावा 1400 डॉलर अतिरिक्त भुगतान किया जाएगा। 
  • बेरोजगार को दिए जाने वाले लाभ की राशि पिछले सितंबर से 300 डॉलर के बजाए प्रति हफ्ते 400 डॉलर किया गया है। 
  • बीमारी और परिवार और मेडिकल लीव मद में 14 सप्ताहों का सवैतनिक अवकाश दिया जाएगा।
  • राष्ट्रीय मजदूरी को बढ़ाकर प्रति घंटे $15 किया गया है।
  • 160 बिलियन डॉलर व्यापक दायरे के कार्यक्रमों के लिए सुरक्षित रखे गए हैं जिनमें, कोरोनावायरस के वैक्सीन, उसकी जांच, इलाज, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले की खोज व्यक्तिगत संरक्षक उपकरण पीपीई इत्यादि शामिल हैं। 
  • स्कूलों के लिए 170 बिलियन डॉलर का प्रावधान किया गया है।
  • सुविधाओं और सेवाओं से वंचित आबादी (अफ्रीकी-अमेरिकी आदि) के लिए करोड़ों डॉलर का प्रावधान किया गया है, जिसमें आदिवासी क्षेत्रों के लोगों के लिए स्वास्थ्य की देखभाल करने वाली सेवाएं शामिल हैं। 
  • लंबे समय तक देखभाल करने वाले कामगारों की सहायता तथा जिन्हें इस महामारी का सर्वाधिक खमियाजा (और जो अनुपातहीन तरीके से अश्वेत हैं) भुगतना पड़ा है, उनकी मदद के लिए करो़ड़ों डॉलर का अतिरिक्त प्रावधान किया गया है।

निश्चित रूप से यह प्रगतिशील एजेंडा है,जिसके लिए वामपंथी दल पिछले कई दशक से प्रयास करते रहे थे और यकीनन बाइडेन के उन कार्यक्रमों में बहुतों का आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं से कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी वे सामाजिक कल्याण के उपाय के लिहाज से बेहतर हैं। 

और दिलचस्प यह है कि बाइडेन इसके लिए किसी से कोई कर चुकाने के लिए नहीं कह रहे हैं, बल्कि अपने इस कार्यक्रम के लिए देश के धनाढ्यों के ऊपर श्रृंखलाबद्ध तरीके से कर की दरें बढ़ाने वाले हैं, जिसके तहत नियमित आमदनी के लिए पूंजी हासिल करने पर कर लगाया गया है तथा सर्वाधिक कमाने वालों पर लगभग 40 फीसदी कर का प्रस्ताव किया है। 

बाइडेन ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था के फिर से निर्माण (“बिल्ड बैक”) की दीर्घावधि की इस व्यापक योजना की घोषणा वसंत में की थी।यहां मुझे सार्विया मूल के प्रसिद्ध अमेरिकन अर्थशास्त्री ब्रांको मिलानोविक का लिखा हुआ याद आता है। मिलानोविक आय के पुनर्वितरण, असमानता और निर्धनता पर अपने काम के बारे में विश्व में विख्यात है। वे वर्ल्ड बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री रहे हैं और वर्तमान में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एवं न्यूयॉर्क सिटी यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं। उनकी ताजा किताब कैपिटलिज्म, एलोन : द फ्यूचर ऑफ द सिस्टम दैट रूल्स द वर्ल्ड अंतरराष्ट्रीय मामलों की बेहतरीन किताबों की सूची में शामिल है और उन्हें 2020 के विश्व के 50 चिंतकों की कोटि में शामिल किया गया है।

मिलानोविक ने पिछले साल मार्च में फॉरेन अफेयर्स में प्रकाशित अपने एक लेख में वैश्विक महामारी के लम्बे समय तक जारी रहने का अनुमान किया था, जो उस समय तक अमेरिका में तेजी और मजबूती से पांव पसार चुकी थी। अपने अति-असाधारण पूर्व ज्ञान से उन्होंने चेतावनी दी थी कि “इस महामारी से होने वाली मानवीय क्षति सर्वाधिक कीमती होगी और कोई व्यक्ति सामाजिक अलगाव की तरफ बढ़ सकता है। जो लोग असहाय हैं, रोजगारविहीन हैं और दरिद्र हैं, वे बेहद आसानी से उनके खिलाफ हो सकते हैं, जो इन सब मामलों में उनसे बेहतर हैं।”  

“पहले ही 30 फ़ीसदी अमेरिकी या तो संपत्ति से शून्य हैं या उनके पास नकारात्मक परिसंपत्ति है। और अगर इस मौजूदा संकट में ऐसे और लोग शामिल हो जाते हैं, जिनके पास न तो पैसा है, न नौकरी है, स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच नहीं है और अगर ये लोग बेचैन हो जाएं और गुस्से में आ जाएं…अगर सरकार ने उदाहरण के लिए दंगे और हमले को रोकने के लिए अर्धसैनिक बल या सैन्य बल का प्रयोग किया
 तो समाज के बिखराव की शुरुआत हो जाएगी। अतः आर्थिक नीति का मुख्य (शायद एकमात्र) लक्ष्य सामाजिक टूटन को रोकना होना चाहिए। 

विकसित समाजों को अवश्य ही अपनी अर्थव्यवस्था,खासकर वित्तीय बाजारों के सौभाग्यों को इन वास्तविकताओं से आंख नहीं मूंद लेने देना चाहिए कि मौजूदा अति असाधारण दबाव के समय में आर्थिक नीति की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका सामाजिक जुड़ाव को और मजबूत करने की होनी चाहिए।” 

बाइडेन ने बृहस्पतिवार को अपने संबोधन में घोषणा की कि विलियम बर्न्स उनके प्रशासन में सीआईए के निदेशक होंगे। यह असाधारण पसंद कही जाएगी। दरअसल किसी बाहरी व्यक्ति को सीआईए का मुखिया बनाया जाना असामान्य नहीं है। 

पिछली चौथाई सदी सीआईए के 10 निदेशकों में 7 लोग “बाहरी” चुने गए हैं-जिनमें सेना के तेज-तर्रार जनरल्स और कई राजनीतिक भी रहे हैं। यद्यपि सीआईए के 73 वर्षों के इतिहास में यह पहला मौका होगा, जब एजेंसी की कमान एक कैरियर राजनयिक के हाथ में होगी। 

बाइडेन ने बेहतर चुनाव किया है। बर्न्स की सराहना “विदेश नीति की दुनिया में एक टाइटन (असाधारण व्यक्ति)” के रूप में की जाती है और वे राजनयिकों की ऐसी प्रजाति से आते हैं जो विश्वास करती है कि डिप्लोमेसी और जासूसी दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।  

अपनी एक बेजोड़ किताब ‘द बैक चैनल :ए मेमायर ऑफ अमेरिकन डिप्लोमेसी एंड द केस फॉर इट्स रिन्यूअल’ में बर्न्स ने लिखा है कि विदेश नीति में राजनयिक को अमेरिकी राजकौशल के सभी औजारों-उपकरणों-विचारों की नरम ताकत से लेकर संस्कृति और लोक राजनय खुफिया सूचनाएं जुटाने और गुप्त कार्रवाई तक का उपयोग करना चाहिए। 
 
यह दिलचस्प है कि बर्न्स विदेश नीति के तथाकथित “सैन्यीकरण” को अस्वीकार करते हैं। इसके बारे में उनसे जब फॉरेन सर्विस जनरल के एक इंटरव्यू में सवाल पूछा गया तो उनका आकलन था कि “ बारहां हमने देखा है कि सैन्य उपकरणों पर अत्यधिक निर्भरता हमें नीतिगत फंसाव की तरफ ले जा सकती है। जब-जब हम सेना के इसके अति उपयोग या अपरिपक्व तरीके से उसका उपयोग करने के जाल में फंसे हैं; इससे अमेरिकी खून और खजाने की भारी क्षति हुई है और कूटनीति की प्रवृत्ति समाप्त हो गई है और उसके बाद संसाधनों के खिंचाव का सामना करना पड़ा है।” 

 निस्संदेह बर्न्स की पसंद एक प्रतीकात्मक है, जहां बाइडेन अपनी विदेश नीति को व्यावहारिक बनाने की दिशा में बढ़ना चाहते हैं। बाइडेन देखते हैं कि बर्न्स डिप्लोमेसी को राष्ट्र की ताकत के एक विशेष उपकरण के रूप में फिर से जान डालने की काबिलियत रखते हैं, वे खुफिया समुदाय से कूटनीति के सहपूरक के अपने मिशन में अधिक से अधिक ध्यान केंद्रित करने पर जोर दे सकते हैं। 

बर्न्स आत्मचेता होने के साथ दुर्लभ राजनयिक-बुद्धिजीवी हैं, जो विश्वास करते हैं कि अमेरिका की विदेश नीति के रास्ते में आने वाली वैश्विक चुनौतियों का हल करने के लिए रूस और चीन के साथ सक्रिय समन्वय बनाना आवश्यक है। जो ईरान के प्रति जरूरत से ज्यादा दबाव की डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों, जो शानदार तरीके से विफल होती रही हैं, को उपहासपूर्वक देखते हैं, जो शीत-युद्ध के बाद नाटो के विस्तार को एक गंभीर भूल मानते हैं, जिसने रूस के साथ अमेरिका के संबंध को बिगाड़ दिया, और जो रूस के साथ समान हितों के आधार पर शस्त्र नियंत्रण पर वार्ता करने के लिए मजबूती से अपना पक्ष रखते हैं।
 
फॉरेन सर्विस जनरल को दिये एक इंटरव्यू में बर्न्स ने वर्तमान वैश्विक स्थिति में अमेरिकी विदेश नीति की दिशाओं के बारे में बातचीत की। उन्होंने कहा : “आज अमेरिकी विदेश नीति के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियां जो मुझे प्रतीत होती हैं -एक अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य बनाने की है जिसमें अमेरिकी प्रभुत्व की कौंध फीकी पड़ती है। इसे बेलाग कहूं तो अमेरिका इस भू-राजनीतिक खंड में अकेली बड़ी शक्ति नहीं रहा। इसका मतलब अपने को खारिज करना नहीं है। दरअसल इस मौजूदा सदी में अमेरिका की सम्मानित और प्रभुत्व सम्पन्न जगह को लेकर मैं अब भी बहुत आशावान हूं। किंतु हम घड़ी की सुई को शीत-युद्ध के बाद के “एकल ध्रुवीय क्षण” की ओर नहीं मोड़ सकते। लेकिन अगले कुछ दशकों तक हम विश्व की केंद्रीय ताकत बने रह सकते हैं, अपने मित्र राष्ट्रों और शत्रु राष्ट्रों के बीच बेहतर स्थिति में रहते हुए एक अधिक भीड़-भाड़ वाले, जटिल और प्रतिस्पर्द्धी विश्व का नेतृत्व-संचालन कर सकते हैं। अगर हम बुद्धिमानी से खेलें तो हम आज भी अपने मुख्य प्रतिद्बंद्बियों के बनिस्बत बेहतर स्थिति में हैं।”

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29 सितम्बर 2014 को अमेरिका दौरे पर आए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (बाएं) का स्वागत करते उप विदेश मंत्री विलियम बर्न्स (दाएं) 

सीआईए के निदेशक के रूप में बर्न्स की पसंद अमेरिकी विदेश नीतियों में कूटनीति को पहले क्रम पर रखने के उनके इरादे को रेखांकित करती है। इसका यह भी मतलब है कि वास्तविक समझदारी पर आधारित संबंध बनाया जाएगा क्योंकि अमेरिका लम्बे समय तक दूसरे देशों पर अपनी मर्जी नहीं थोप सकता।

वैश्विक महामारी ने शक्ति और प्रभाव के समीकरण को बहुत तीव्र गति के साथ पश्चिम से पूर्व की तरफ स्थानांतरित करना शुरू कर दिया है। बाइडेन ने एक बहादुर नये विश्व में-जहां शीत-युद्धकालीन “एकध्रुवीय क्षण” सदा-सदा के लिए गायब हो जाए-अमेरिकी खुफिया समुदाय का नेतृत्व प्रदान करने के लिए बर्न्स में फिर से अपना विश्वास जताया है।

बुनियादी रूप से बाइडेन की अपेक्षा होगी कि अमेरिका की विदेश नीति और सुरक्षा नीतियां उनकी राष्ट्रीय कार्यनीति में प्रतिबिम्बित हों।बर्न्स के शब्दों में कहें तो “जो एक मजबूत राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली वाले देश में न केवल अपने घर से शुरू होती हैं, बल्कि उसका अंतिम लक्ष्य देश में ज्यादा से ज्यादा रोजगार देने ज्यादा से ज्यादा खुशहाली लाने एक स्वस्थ पर्यावरण बनाने और अपने नागरिकों को एक बेहतर सुरक्षा प्रदान करने में ही है।”
 
अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Biden is Shifting Leftward?

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