NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
दुनिया भर की : नेतन्याहू के जानेभर से इज़रायल भला नहीं बन जाएगा
अमेरिकी डोनाल्ड ट्रंप के बाद नेतन्याहू दूसरे नेता हैं जिनकी हार, या यूं कहें तो जिन्हें सत्ता से बेदखल किए जाने पर दुनियाभर की लोकतांत्रिक ताकतों ने बड़ी राहत की सांस ली है। लेकिन बेनेट के आ जाने से इज़रायली नीतियां व तौर-तरीके बदल जाएंगे, इस खुशफ़हमी में आ जाना फिलहाल थोड़ी जल्दबाज़ी होगी।
उपेंद्र स्वामी
14 Jun 2021
दुनिया भर की : नेतन्याहू के जानेभर से इज़रायल भला नहीं बन जाएगा

इज़रायल में ‘बीबी’ नेतन्याहू का दौर खत्म हुआ। दो साल में हुए चार आम चुनाव भी जब इस देश को एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार न दे सके तो आखिरकार तमाम अलग-अलग छटाओं वाली कई पार्टियों ने मिलकर एक नई गठबंधन सरकार बना ही ली और रविवार देर शाम इज़रायली संसद ने इस नई सरकार को महज एक वोट के अंतर (59 के मुकाबले 60) से स्वीकार कर लिया।

इसे पढ़ें: नेफ़्ताली बेनेट इज़रायल के नए प्रधानमंत्री बने

अमेरिकी डोनाल्ड ट्रंप के बाद नेतन्याहू दूसरे नेता हैं जिनकी हार, या यूं कहें तो जिन्हें सत्ता से बेदखल किए जाने पर दुनियाभर की लोकतांत्रिक ताकतों ने बड़ी राहत की सांस ली है। लेकिन जिस तरह से एक ट्रंप के जाने के बाद किसी बाइडेन के आने से अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियां बदल नहीं जातीं, उसी तरह से एक नेतन्याहू के जाने के बाद किसी नाफ्ताली बेनेट के आ जाने से इज़रायली नीतियों व तौर-तरीके बदल जाएंगे, इस खुशफ़हमी में आ जाना फिलहाल थोड़ी जल्दबाजी होगी।

उम्मीदों व आशंकाओं, दोनों की अपनी-अपनी वजहें हैं। कई बार लगता है कि हम इज़रायल की राजनीति में अपने देश की राजनीति का अक्स देख रहे हैं, और इस बात से मेरा आशय नेतन्याहू के अक्स के तौर पर नरेंद्र मोदी को देखने भर से कतई नहीं है।

नेतन्याहू को सत्ताच्युत करने के लिए साथ आई पार्टियों में वामपंथी भी हैं, दक्षिणपंथी भी हैं, मध्यमार्गी भी हैं और वहां 21 फीसदी अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां भी। इज़रायल के इतिहास में पहली बार ही यह हुआ है कि अरब लोगों की पार्टियां वहां सत्ता में भागीदारी करेंगी। यह कितनी ही सकारात्मक बात क्यों न लगे लेकिन इतने भर से यह मान लेना नासमझी होगी कि इससे फ़िलिस्तीन व ईरान के प्रति इज़रायल का रुख बदल जाएगा। 

पिछले महीने रमज़ान के दौरान जब अचानक इज़रायल व फ़िलिस्तीन के बीच हाल के दशकों की सबसे भीषण जंग हुई थी तो कुछ विश्लेषकों की यह राय थी कि यह अनायास ही नहीं था, और इस तरह की हिंसा का सबसे बड़ा फायदा अपने राजनीतिक भविष्य पर ही खतरा झेल रहे नेतन्याहू को होने वाला था। उस समय यह लग रहा था कि फ़िलिस्तीनियों से देश की सुरक्षा को खतरे का हौवा खड़ा करके नेतन्याहू अपने खिलाफ़ हो रही लामबंदी को बिखेर देंगे और बात फिर एक चुनाव की तरफ चली जाएगी और इसकी बदौलत उन्हें कुछ और महीने सत्ता में बने रहने का मौका मिल जाएगा। तो देश को जानबूझकर हिंसा में झोंकने के आरोप तो सीधे नहीं लगाए गए, लेकिन सुगबुगाहटें तो चल ही रही थीं।

नेतन्याहू के खिलाफ़ गठबंधन खड़ा करने की जिम्मेदारी संभाले हुए मध्यमार्गी येश आतिद पार्टी के नेता यैर लापिद ने उस समय एक फेसबुक पोस्ट में कहा था कि हमारी सरकार होती तो हम सुरक्षा चिंताओं को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से नहीं मिलाते। तब इस तरह के सवाल कोई नहीं उठाता कि आखिर क्यों आग हमेशा उस समय ही लगती है जब वह वक़्त प्रधानमंत्री (नेतन्याहू) के लिए अनुकूल होता है। उनका इशारा साफ़ था। इस अचानक छिड़े संघर्ष ने विपक्षी खेमेबंदी को उलझन में डाल दिया था।

लेकिन, अगर ऐसी चाल वाकई थी तो भी वह कामयाब न हो पाई। नेतन्याहू इस हकीकत को समझ रहे थे कि उनके खिलाफ खड़े तमाम राजनीतिक दलों को जो सबसे बड़ी बात जोड़े हुए थी, वह थी नेतन्याहू को हर कीमत पर सत्ता से बेदखल करना। यह आसान काम तो कतई नहीं था। सबसे पहली बार 1996 से 1999 तक और फिर 2009 से लगातार 12 साल तक प्रधानमंत्री पद कर काबिज नेतन्याहू इज़रायली इतिहास के सबसे कामयाब नेता माने जाते हैं।

किसी इस्लामी अरब पार्टी के सत्ता में भागीदार बनने का महत्व केवल सांकेतिक ही होगा, इससे ज्यादा कुछ नहीं, यह इस बात से भी साफ होता है कि जब 23 मार्च के हुए चुनावों के बाद नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को सरकार बनाने का पहला मौका मिला था तो उन्होंने भी इसी अरब पार्टी को लुभाने की कोशिश की थी। लेकिन दाल नहीं गली तो नेतन्याहू वामपंथी पार्टियों और इस्लामी पर्टियों के विपक्षी गठबंधन में शामिल होने को खतरनाक और ‘राष्ट्रविरोधी’ जतलाने लगे। बहरहाल, कोई भी चाल उनकी सत्ता को बचा नहीं सकी और इस तरह उन्हें अपने राजनीतिक कैरियर की पहली शिकस्त हाथ लगी।

नई सरकार के लिए हुए समझौते में पूर्व रक्षा-प्रमुख और हाई-टेक धनकुबेर 49 साल के बेनेट दो साल के लिए प्रधानमंत्री रहेंगे और 2023 में रोटेशन के समझौते के तहत 57 वर्षीय लापिद बाकी बचे दो साल के लिए प्रधानमंत्री बन जाएंगे। अब यह तभी होगा जब गठबंधन कायम रहे और नेतन्याहू या किसी अन्य की करतूत से इसमें पलीता न लग जाए।

अब यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है कि पिछले चुनावों में संसद की 120 सीटों में से केवल छह सीटें जीतने वाले यामिना पार्टी के बेनेट प्रधानमंत्री बन जाएं। लेकिन भारतीय राजनीति को नजदीक से देखने-समझने वाले तो इस जुगाड़ को अच्छी तरह समझते ही हैं।

नेतन्याहू के जाने से इज़रायल के भीतर लगों ने चाहे कितना भी जश्न क्यों न मनाया हो, उस पार फ़िलिस्तीनी फिलहाल तो इस सत्ता परिवर्तन से कोई खास उत्साहित नहीं हैं। उन्हें भी नहीं लगता कि इज़रायली नीतियों में कोई बदलाव होगा। बेनेट का फ़िलिस्तीनियों के प्रति अभी तक का रवैया नेतन्याहू से कोई अलग नहीं रहा है। कभी नेतन्याहू के चीफ ऑफ स्टाफ रहे बेनेट कहते रहे हैं कि विवाद केवल इलाके का नहीं है, वह दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के अस्तित्व को ही अस्वीकार करने का है। यह कितना बदलेगा, यह देखने वाली बात है।

बेनेट पश्चिमी तट के अधिगृहीत इलाके में और बस्तियां बसाने और उस पर आंशिक रूप से कब्जा कर लेने के हिमायती रहे हैं और उनके इस एजेंडे का विरोध अरब पार्टियां करती रही हैं। देखने वाली बात है कि वे नई सरकार में मिलकर कैसे काम करेंगे। देखना यह भी है कि नेतन्याहू के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों का क्या होगा। क्या यह सरकार उन्हें सजा दिलाने की हिम्मत जुटा पाएगी?

जैसे इज़रायल के प्रति अमेरिकी दोस्ताना रुख कभी नहीं बदलता, चाहे वहां रिपब्लिकन सरकार हो या डेमोक्रेटिक, उसी तरह से फिलस्तीनियों के प्रति इज़रायली रवैया केवल वहां सरकार बदलने से बदल जाएगा, यह उम्मीद रखना बेवकूफी होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Israel
Benjamin Netanyahu
Naftali Bennett
International news

Related Stories

दुनिया भर की: कोलंबिया में पहली बार वामपंथी राष्ट्रपति बनने की संभावना

न नकबा कभी ख़त्म हुआ, न फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध

अल-जज़ीरा की वरिष्ठ पत्रकार शिरीन अबु अकलेह की क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीन में इज़रायली सुरक्षाबलों ने हत्या की

अमेरिका में महिलाओं के हक़ पर हमला, गर्भपात अधिकार छीनने की तैयारी, उधर Energy War में घिरी दुनिया

रूस-यूक्रैन संघर्षः जंग ही चाहते हैं जंगखोर और श्रीलंका में विरोध हुआ धारदार

अमेरिका ने रूस के ख़िलाफ़ इज़राइल को किया तैनात

इज़रायली सुरक्षाबलों ने अल-अक़्सा परिसर में प्रार्थना कर रहे लोगों पर किया हमला, 150 से ज़्यादा घायल

दुनिया भर की: सोमालिया पर मानवीय संवेदनाओं की अकाल मौत

लैंड डे पर फ़िलिस्तीनियों ने रिफ़्यूजियों के वापसी के अधिकार के संघर्ष को तेज़ किया

अमेरिका ने ईरान पर फिर लगाम लगाई


बाकी खबरें

  • hisab kitab
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तर प्रदेश में क्यों पनपती है सांप्रदायिक राजनीति
    24 Dec 2021
    उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले वहां सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत फिर से हो गयी है। सवाल यह है कि उप्र में नफ़रत फैलाना इतना आसान क्यों है? इसके पीछे छिपी है देश में पिछले दस सालों से बढ़ती बेरोज़गारी
  • night curfew
    रवि शंकर दुबे
    योगी जी ने नाइट कर्फ़्यू तो लगा दिया, लेकिन रैलियों में इकट्ठा हो रही भीड़ का क्या?
    24 Dec 2021
    देश में कोरोना महामारी फिर से पैर पसार रही है, ओमिक्रोन के बढ़ते मामलों ने राज्यों को नाइट कर्फ़्यू लगाने पर मजबूर कर दिया है, जिसके मद्देनज़र तमाम पाबंदिया भी लगा दी गई है, लेकिन सवाल यह है कि रैलियों…
  • kafeel khan
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोरखपुर ऑक्सिजन कांड का खुलासा करती डॉ. कफ़ील ख़ान की किताब
    24 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक के इस वीडियो में वरिष्ठ पत्रकार परंजोय गुहा ठाकुरता डॉ कफ़ील ख़ान की नई किताब ‘The Gorakhpur Hospital Tragedy, A Doctor's Memoir of a Deadly Medical Crisis’ पर उनसे बात कर रहे हैं। कफ़ील…
  • KHURRAM
    अनीस ज़रगर
    मानवाधिकार संगठनों ने कश्मीरी एक्टिविस्ट ख़ुर्रम परवेज़ की तत्काल रिहाई की मांग की
    24 Dec 2021
    कई अधिकार संगठनों और उनके सहयोगियों ने परवेज़ की गिरफ़्तारी और उनके ख़िलाफ़ चल रहे मामलों को कश्मीर में आलोचकों को चुप कराने का ज़रिया क़रार दिया है।
  •  boiler explosion
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    गुजरात : दवाई बनाने वाली कंपनी में बॉयलर फटने से बड़ा हादसा, चपेट में आए आसपास घर बनाकर रह रहे श्रमिक
    24 Dec 2021
    गुजरात के वडोदरा में बॉयलर फटने से बड़ा हादसा हो गया, जिसकी चपेट में आने से चार लोगों की मौत हो गई, जबकि कई घायल हुए जिनका इलाज अस्पताल में जारी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License