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भारत
राजनीति
इतिहास के कोढ़ : ´हिंदुत्व´और ´हिंदूराष्ट्र´ का विचार सिर्फ आरएसएस की देन नहीं है
सवाल यह है सारे देश में ´हिंदुत्व´ और ´हिंदू राष्ट्रवाद´ की आंधी कैसे आई ॽ उसने किस तरह के दार्शनिक मॉडल का इस्तेमाल किया ॽ इत्यादि सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरतहैI
जगदीश्वर चतुर्वेदी
30 Apr 2018
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 हिंदू राष्ट्रवाद ने हर नागरिक के मन को किसी न किसी रुप में प्रभावित किया है, यह प्रक्रिया राममंदिर आंदोलन के बाद से चल रही है, मोदी सरकार बनने के साथ इन दिनों चरम पर है। इसके पहले अटल बिहारी सरकार बनने के समय भी इसके मध्यवर्ती उभार को देख सकते हैं, लेकिन आक्रामक ढंग से हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्रवाद और मोदी की महानेता की जो इमेज इस बार सामने आई है वैसा व्यापक असर पहले कभी नहीं देखा गया। चुनौती यह है कि ´हिंदुत्व´ और ´हिंदू राष्ट्रवाद´ की इमेज को कैसे समझें। तदर्थ उपकरणों के जरिए इसे समझना मुश्किल है, यह प्रचलित समाजविज्ञान के नजरिए से भी पकड़ में नहीं आ सकती। साथ ही प्रेस क्रांति के संदर्भ में रचे गए साम्प्रदायिकता विरोधी विचारधारा संदर्भ में भी इसके समाधान नहीं खोजे जा सकते। इसे समझने के लिए नए युग के साइबर परिप्रेक्ष्य की जरुरत है।

´हिंदुत्व´ और ´हिंदूराष्ट्र´ का नया संदर्भ वर्चुअल रियलिटी रच रही है। साइबर संचार रच रहा है। इसलिए वर्चुअल रियलिटी की प्रक्रियाओं की सटीक समझ के आधार पर ही इसके समूचे वैचारिक ताने-बाने को खोला जाना चाहिए। सवाल यह है सारे देश में ´हिंदुत्व´ और ´हिंदू राष्ट्रवाद´ की आंधी कैसे आई ॽ उसकी प्रक्रिया क्या है ॽ उसने किस तरह के दार्शनिक मॉडल का इस्तेमाल किया ॽ इत्यादि सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

´हिंदुत्व´और ´हिंदू राष्ट्रवाद´ अचानक पैदा हुई विचारधारा नहीं है। यह पहले से थी और इसका सौ साल से भी पुराना इतिहास है, इस विचार के इतिहास में वे भी शामिल हैं जो आरएसएस में रहे हैं और वे भी शामिल हैं जो आरएसएस में नहीं रहे हैं। 19वीं सदी के पुनरूत्थानवाद में इस विचारधारा के बीज बोए गए थे। जिनकी ओर हमने कभी कोई विचारधारात्मक संघर्ष नहीं चलाया। हमने नवजागरण के सकारात्मक पक्षों पर ध्यान केद्रिंत किया लेकिन उसके नकारात्मक पक्ष पर ध्यान ही नहीं दिया। राजा राममोहन राय के सकारात्मक विचारों पर नजर गयी लेकिन नकारात्मक विचारों को छिपाए रखा। उसी तरह दयानंद सरस्वती के आर्य समाज और उसके समाजसुधारों और खड़ी बोली हिंदी के विकास से संबंधित योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की लेकिन हिंदुत्ववादी विचारों की अनदेखी की। इसी तरह बाल गंगाधर तिलक, मदनमोहन मालवीय आदि के स्वाधीनता संग्राम में योगदान को महत्व दिया लेकिन उनके हिंदुत्ववादी विचारों की अनदेखी की। कहने का आशय यह कि ´हिंदुत्व´ ´गोरक्षा´और ´हिंदूराष्ट्र´की अवधारणा हाल-फिलहाल की तैयारशुदा विचारधाराएं नहीं हैं. ये भारतीय समाज में पहले से मौजूद रही हैं। इससे पहला यह मिथ टूटता है कि ´हिंदुत्व´और ´हिंदूराष्ट्र´ का विचार सिर्फ आरएसएस की देन है।

आरएसएस ने पहले से मौजूद इन दोनों विचारों को अपने सांगठनिक-वैचारिक ढांचे में शामिल किया और मनमाना विस्तार दिया। यह सच है वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष विचारकों ने बड़े पैमाने पर आरएसएस का मूल्यांकन किया,हिं दुत्व,राष्ट्रवाद आदि की परंपरा का विवेचन भी किया लेकिन वे यह बताने में असमर्थ रहे कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का विचार आम जनता के दिलो-दिमाग में कैसे घुसता चला गया ॽ धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र, संविधान, सरकारें आदि इसे रोकने में असफल क्यों रहीं ? ´हिंदुत्व´ और ´हिंदू राष्ट्र´ के विचारों की आम जनता में आज जो गहराई तक मौजूदगी नजर आती है उसकी प्रक्रियाओं को दार्शनिक तौर पर खोले बिना यह समझ में नहीं आएगा कि आखिरकार ये विचार जनता में इतनी गहराई तक कैसे पहुँचे। कहने का आशय यह कि विचार की आलोचना से विचार का सतही रुप समझ में आता लेकिन उसकी जनता में पैंठ को देखकर उसका असली रूप समझ में आता है।

´हिंदुत्व´ और ´हिंदू राष्ट्रवाद´ के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष ताकतें तदर्थ भाव से वैचारिक संघर्ष करती रहीं, लेकिन उसका सफाया नहीं कर पाए, जबकि हर स्थान और संरचना में उनका दखल था। इसका अर्थ यह है संरचना पर कब्जा कर लेने या कानून बनाने से कोई भी प्रचलित विचार मरता नहीं है। धर्मनिरपेक्षतावादी इस संघर्ष के जरिए अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे, हरबार के चुनावों में जनसंघ-भाजपा की हार पर खुश हो रहे थे, धर्मनिरपेक्ष ताकतों की विजय पर जश्न मना रहे थे, लेकिन विगत 70सालों में धर्मनिरपेक्ष प्रचार अभियान अंत में वहीं आकर पहुँचा जहां पर वह 1947 में था, सन् 1947 में जो घृणा हमारे मन में थी वही घृणा आज भी हमारे मन में है, मुसलमानों, पाक के निर्माण आदि के खिलाफ जो घृणा 1947 में थी, वो आज भी है, इससे यह पता चलता है कि हम नौ दिन चले अढ़ाई कोस !

कहने का आशय यह कि देश की धर्मनिरपेक्ष आत्मा तो हमने बना ली, लेकिन उसके अनुरूप शरीर नहीं बना पाए, शरीर के अंग नहीं बना पाए। शरीर और अंगों के बिना आत्मा का चरित्र वायवीय बन जाता है। उल्लेखनीय विगत 70 सालों में साम्प्रदायिक ताकतों ने अपने प्रयोगों के जरिए एक ही चीज पैदा की है वह है अशांति! अशांति के बिना वे अपना विकास नहीं कर सकते। उनके सारे एक्शन अ-शांति पैदा करने वाले होते हैं।संघियों के प्रयोग सिर्फ प्रचार तक ही सीमित नहीं रहे हैं बल्कि शरीर, राजनीति, सेंसरशिप, दंगे और दमन तक इनका क्षितिज फैला हुआ है। इन सबके कारण वे समाज को शांति से रहने नहीं देते। इस सबका असर यह हुआ कि धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक भारत का तानाबाना और ढांचा लगातार क्षतिग्रस्त हुआ है। मसलन् जब कभी दंगा होता है तो हम उसे संपत्ति,जानो-माल के नुकसान या कानून-व्यवस्था की समस्या से ज्यादा देखते ही नहीं हैं, हम यह नहीं देखते कि इससे भारत का धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक शरीर क्षतिग्रस्त हुआ है। हमने भारत की आत्मा को एकदम वायवीय बना दिया है। दिलचस्प बात यह है कि भारत की बातें सब करते हैं, लेकिन भारत के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष शरीर के अंगों की बात कोई नहीं करता। अंगों के बिना शरीर का कोई अर्थ नहीं है।

भारत के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष शारीरिक अंगों के बिना भारत की आत्मा वायवीय है,अमूर्त है,अ-प्रासंगिक है। साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के संघर्ष में अनेक लोग मारे गए, अनेक किस्म के विचारों का भी अंत हुआ। बार-बार कहा गया ´सचेत रहो´। लेकिन ´सचेत रहो´ के आह्वान ने हमें अंत में कहीं का नहीं छोड़ा, हम क्रमशः ´अचेत´होते चले गए, जनता में ´सचेत रहो´ के आह्वान को पहुँचाने में असफल रहे। असफल क्यों रहे इसका कभी वस्तुगत मूल्यांकन नहीं किया। आज सत्तर साल बाद हकीकत यह है कि आम आदमी की जुबान, बोली, अभिव्यंजना शैली आदि में साम्प्रदायिक लहजा घुस गया है। कायदे से व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक बनना था लेकिन हुआ एकदम उलटा। आज हम सबके कॉमनसेंस में साम्प्रदायिक विचारों और नारों ने गहरी पैठ बना ली है। हम सबको योग, भगवान राम, कृष्ण, राधा,सीता, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद आदि के निरर्थक प्रपंचों में उलझा दिया गया है। व्यक्ति को हमने लोकतंत्र-धर्मनिरपेक्षता के अनुरुप पूरी तरह नए रुप में तैयार ही नहीं किया, हम ऊपर से मुखौटे लगाकर उसे धर्मनिरपेक्ष बनाते रहे, लोकतांत्रिक बनाते रहे, उसके व्यक्तित्वान्तरण के सवालों को कभी बहस के केन्द्र में नहीं लाए। सवाल यह है व्यक्ति को पूरी तरह बदले बगैर यह कैसे संभव है कि भारत लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष हो जाए। हमने रणनीति यह बनायी कि व्यक्ति जैसा है, वैसा ही रहे, थोड़ा –बहुत बदल जाए तो ठीक है, जो हिदू है वो हिंदू रहे, जो मुसलमान है वो मुसलमान रहे, जो ईसाई है वो ईसाई रहे, बस इससे हमें सद्भाव का पाखंडी मार्ग मिल गया। हमने व्यक्ति के कपड़े बदले, जीवन के साजो-सामान बदले, समाज का ऊपरी ढाँचा बदला, कल-कारखाने बनाए, सड़कें बनाईं, नई-नई गगनचुम्बी इमारतें बनाईं, नए कानून बनाए, लेकिन व्यक्ति को नहीं बदला। यही वो जगह है जहां पर भारत हार गया, भारत वायवीय बन गया, बिना शरीर के अंगों का देश बन गया। आधुनिक भारत को आधुनिक मनुष्य भी चाहिए, इस सामान्य किंतु महत्वपूर्ण बात को हम समझ ही नहीं पाए, लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत की परिकल्पना को आधुनिक मनुष्य बनाए बगैर साकार करना संभव नहीं है, यही वह बिंदु है जहां से साम्प्रदायिक ताकतों ने समाज के जर्रे-जर्रे पर हमला किया और उसे अपने साँचे में ढालने में उनको सफलता मिली।

Courtesy: Hastakshep,
Original published date:
29 Apr 2018
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