NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका
जब ‘हाउडी मोदी’ का मतलब हो गया ‘हाउडी ट्रंप’
'हाउडी मोदी' के दौरान जो कुछ दिखा, वह हैरान करने वाला था। कह सकते हैं कि खुश हो रहे भारतीयों के मन को कचोटने वाला था।
प्रेम कुमार
23 Sep 2019
modi trump
फोटो साभार : अमर उजाला

अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में हाउडी मोदी कार्यक्रम संपन्न हुआ। कितना सफल रहा, इस पर बात होनी ज़रूरी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भाग लेने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री का अमेरिका पहुंचना और उस मौके पर प्रवासी भारतीयों का उनके सम्मान में समारोह का आयोजन आह्लादित करने वाली पहल रही। हिन्दुस्तान में टीवी से चिपके लोगों का मन बाग-बाग हो उठा। वहीं, इस दौरान जो कुछ दिखा, वह हैरान करने वाला था। कह सकते हैं कि खुश हो रहे भारतीयों के मन को कचोटने वाला था।

स्थानीय नेताओं के भाषण सुनने को विवश हुए मोदी

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब ह्यूस्टन पहुंचे तब परम्परागत स्वागत के बाद उन्हें स्थानीय नेताओं के भाषण सुनने को विवश होना पड़ा। उसके आगे तो हद हो गयी। पीएम मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का इंतज़ार करना पड़ा। ऐसा लगा मानो ‘हाउडी मोदी’ न होकर ‘हाउडी ट्रंप’ का आयोजन हो। मेज़बान-मेहमान में फर्क करना मुश्किल हो गया।

जब पीएम नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप की शान में कसीदे पढ़े, तो वह अतिशयोक्ति लगी, हालांकि इसलिए बुरी नहीं लगी क्योंकि उन्होंने इस बहाने खुद को मेजबान और ट्रंप को मेहमान साबित कर दिखाया। ऐसा करके वास्तव में मेजबानी में जो कमी थी, उसकी ओर ध्यान भी दिलाया और उसकी पर्देदारी भी कर दी।

मुनासिब नहीं था कहना ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’

मगर, प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ का नारा दिया वह बिल्कुल मुनासिब नहीं था।
मोदी ने स्टेडियम में मौजूद भारतीय मूल के लोगों को याद दिलाया कि ट्रंप ने कहा था, ‘‘अबकी बार ट्रंप सरकार’’। उन्होंने कहा कि ट्रंप के शासनकाल में व्हाइट हाउस में दीवाली मनाया जाना भी अनोखा रहा।

इस एक कदम से पलक झपकते ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव प्रचारक बन गये भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। हिन्दुस्तान का कद अचानक छोटा हो गया। भले ही उन्होंने 2016 के बहाने यह दोहराया, लेकिन इसका साफ अर्थ 2020 के संदर्भ में दिखा। आपको बता दें कि अमेरिका में 2020 में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने जा रहा है। जिसके लिए प्रचार अभियान लगभग शुरू हो गया है। इस तरह एक देश किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए वोट मांगता या प्रचार करता दिखे, तो उसकी शान बढ़ती नहीं, घट जाती है।

ओबामा की दोस्ती क्यों भुला बैठे मोदी?

माना कि डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के बीच अच्छी केमिस्ट्री है। दोनों दोस्त हैं। हालांकि इसमें भी संदेह है, क्योंकि जब-तब कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता का राग छेड़ ही देते हैं ट्रंप। इसके अलावा ट्रेड वार भी चल रहा है और भारत से कोई मुरव्वत नहीं करते हैं ट्रंप। ह्यूस्टन में भी ट्रंप की घोषणा में भारत को निर्यात पर ज़ोर था जो भारतीय व्यापार संतुलन के नज़रिये से कोई स्वागतयोग्य कदम नहीं कहा जा सकता।
फिर भी क्या यह माना जा सकता है कि ह्वाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप से अच्छा भारत का कोई मित्र नहीं हो सकता? याद कीजिए जब बराक ओबामा को नरेंद्र मोदी अपना सबसे अच्छा मित्र बताया करते थे। ‘बराक’ कहकर वह आभास दिलाया करते थे मानो वे लंगोटिया यार हों। बराक ओबामा डेमोक्रैट हैं और डोनाल्ड ट्रंप रिपब्लिकन। क्या भारत ने रिपब्लिकन ट्रंप के लिए परोक्ष ही सही लेकिन ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ का नारा देकर हमेशा के लिए डेमोक्रैट को नाराज़ नहीं कर दिया है? क्या देशहित में ऐसा किया जाना जरूरी था?

मोदी ने नहीं कहा- ट्रंप आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप के लिए खड़े होकर अभिवादन करने की अपील करने से पहले उन्हें आतंकवाद के खिलाफ योद्धा के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि ट्रंप आतंकवाद के खिलाफ खड़े हैं। हालांकि यह कहने से पीएम मोदी ने परहेज किया कि आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ ट्रंप खड़े हैं। यानी दोस्ती और गाढ़ी दोस्ती में बारीक फर्क बरकरार है। दोस्ती का डंका तो है, प्रतिबद्धता का अब भी इंतज़ार है।

प्रवासी भारतीयों के वोट पर है ट्रंप की नज़र

माना कि ऐसा पहली बार हुआ कि भारत और अमेरिका के राष्ट्रपति किसी सार्वजनिक सभा में इस तरह शरीक हुए। मगर, अमेरिकी राष्ट्रपति की हाउडी मोदी में मौजूदगी भारतीय पीएम का सम्मान करने के लिए हुई थी, ऐसा कतई नहीं था। शायद इसीलिए ट्रंप ने मोदी को इंतज़ार कराकर संकेत दे दिया। राष्ट्रपति चुनाव में 40 लाख भारतीय अमेरिकियों के वोट पर ट्रंप की नज़र है। ये प्रवासी भारतीय ट्रंप के वोटर नहीं हैं बल्कि डेमोक्रैट के समर्थक रहे हैं। इनकी मांग अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव खत्म करने की रही है। ये लोग ट्रंप के अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति के भी विरोधी रहे हैं। ऐसे में डेमोक्रैट समर्थक प्रवासी भारतीयों को रिपब्लिकन के लिए वोट देने को कहना राजनीति बदलने वाली कवायद कही जानी चाहिए। नरेंद्र मोदी ऐसा इसलिए कर सके हैं क्योंकि बीते दिनों में भारत और पाकिस्तान के बीच जो तनाव रहा है उसमें प्रवासी भारतीय भी अपने देश का समर्थन करना चाहते हैं।

मोदी-ट्रंप को भाता है ‘इस्लामी आतंकवाद’ का जिक्र

अगर डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी दोनों के भाषण को जोड़कर देखें तो आतंकवाद और इस्लामी आतंकवाद का जिक्र ही इन्हें एक मंच पर एक-दूसरे से जोड़ता है। अमेरिका में रिपब्लिकन का अल्पसंख्यक विरोध यहां मानवतावाद का लबादा ओढ़ता नज़र आता है। भारत में दक्षिणपंथी बीजेपी की सरकार भी ऐसा ही करती रही है। आतंकवाद के साथ-साथ इस्लामिक आतंकवाद का जिक्र भी दोनों राजनीतिज्ञों की सियासत को सूट करता है। 9/11 और पुलवामा का जिक्र भी दोनों नेताओं को इसी लिहाज से एक-दूसरे का साथी बनाता है। मगर, इस साथ में स्थायित्व नहीं दिखता। चुनावी मौसम के लिहाज से जरूरी भावनाओं की बरसात भर लगती है।

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत और अमेरिका साथ रहे, यह जरूरी है। मगर, इस नाम पर अपने-अपने देश के चुनावी लड़ाई में दोनों देशों के हुक्मरान एक-दूसरे का साथ ले तो यह विपक्ष के साथ और लोकतंत्र के साथ अन्याय है। इज़राइल में बेंजामिन नेतन्याहू ने भी ऐसी ही कोशिश की थी। मगर, जनता ने उन्हें सबक सिखा दिया है। डोनाल्ड ट्रंप को भी क्या अमेरिकी लोकतंत्र पसंद जनता सबक सिखाएगी?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

Howdy Modi
Narendera Modi
Donand Trump
United Nations General Assembly
Barack Obama
Terrorism
Benjamin Netanyahu

Related Stories

'कश्मीर में नागरिकों की हत्याओं का मक़सद भारत की सामान्य स्थिति की धारणा को धूमिल करना है'—मिलिट्री थिंक-टैंक के निदेशक

तिरछी नज़र : ऐसे भोले भाले हैं हमारे मोदी जी...

उनके लिए सफाई या स्वच्छता का एक दिन या एक तारीख़ नहीं होती

प्लास्टिक कचरे के खिलाफ सरकार की असंतुलित मुहिम

बीच-बहस : भारत में सब अच्छा नहीं है, मोदी जी!

जटिल है जनसंख्या नियंत्रण का प्रश्न

मोदी जी! हमें शब्दों से न बहलाइए, अपना इरादा साफ़ बताइए

अमेरिका और भारत में दो तस्वीरें लेकिन फसाना एक, नफ़रत के बीच शांति की ‘कोशिश’ 

मेरी नज़र से इतिहास के पन्ने’ - बीजेपी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी : कभी हाँ, कभी न

तो मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी तय करेंगे ‘शहीद’ और ‘शहादत’!


बाकी खबरें

  • lakshmibai college teacher Dr Neelam
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    डीयू : दलित शिक्षक का आरोप विभागाध्यक्ष ने मारा थप्पड़, विभागाध्यक्ष का आरोप से इनकार
    18 Aug 2021
    "शिक्षण संस्थानों में यह कोई पहली ऐसी घटना नहीं है बल्कि इससे पहले भी समाज के निचले तबके से आने वाले छात्र और शिक्षक इस प्रकार के जातिगत हमलों और जातिसूचक टिप्पणियों का सामना करते आये हैं।…
  • Farmers
    रूबी सरकार
    प्रधानमंत्री फसल बीमा के नाम पर किसानों से लूट, उतना पैसा दिया नहीं जितना ले लिया
    18 Aug 2021
    कृषि पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट कहती है कि निजी बीमा कंपनियों को प्रीमियम के तौर पर जितनी राशि मिली और कंपनियों द्वारा नुकसान के एवज में जो राशि किसानों को दी गई, अगर इसकी तुलना की जाए तो…
  • taiban
    पीपल्स डिस्पैच
    तालिबान द्वारा दिए गए आश्वासनों के बावजूद अफ़ग़ानवासियों को अपने भविष्य की चिंता
    18 Aug 2021
    कई मीडिया संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक़, अमेरिका ने रविवार को देश में अरबों डॉलर की अफ़ग़ान संपत्ति को फ्रीज़ कर दिया है।
  • संदीपन तालुकदार
    नया शोध बताता है कि सबसे पहले चीन में बने थे सिक्के
    18 Aug 2021
    शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि उन्होंने कांसे से बने छोटे फावड़े के आकार के सिक्कों की खोज की है जो लगभग 2,600 साल पहले चीन में बड़े पैमाने पर बनाए गए थे।
  • afgan
    अजय कुमार
    कैसे अमेरिका का अफ़ग़ानिस्तान में खड़ा किया गया 20 साल का झूठ भरभरा कर ढह गया?
    18 Aug 2021
    सबसे गहरी सच्चाई तो यही है कि भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति कुछ भी कहें कि उन्होंने अफगानिस्तान की कई स्तर पर मदद की। लेकिन हकीकत यह है कि बम, बारूद, गोली और सेना के बलबूते समाज को नहीं बदला जा सकता।…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License