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जेएनयू : इंसाफ़ के इंतज़ार में उर्मिला
उर्मिला ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि उन्हें हक़ के लिए लड़ने की सज़ा मिल रही है। बीते आठ महीने से उनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है, वो अपना जीवन दूसरों के सहारे चला रही हैं।
मुकुंद झा
02 Jul 2019
Urmila

उर्मिला बीते आठ महीने से इंसाफ का इंतजार में हैं। उर्मिला सफाई कर्मचारी हैं। बीते कई सालों से जेएनयू में एक संविदा कर्मचारी के तौर पर काम कर रहीं थी। जैसा कि हम हर जगह देखते हैं कि संविदा कर्मचारियों का शोषण होता है। न पूरा वेतन मिलता है, और जो मिलता है वह भी समय पर नहीं मिलता है।

इसके आलावा अधिकतर जगह समाजिक सुरक्षा के नाम पर भी कुछ नहीं मिलता। जेएनयू भी इससे बचा नहीं था। वहां भी सफाई कर्मचारी संविदा के तहत काम करते हैं और उन्हें वेतन बहुत कम मिलता था। इसको लेकर उर्मिला ने संघर्ष किया और जीतीं भी।

लेबर कोर्ट से उनके हक़ में निर्णय आया। सभी कर्मचारियों को समान काम का समान वेतन देने की बात कही गई लेकिन जेएनयू प्रशासन ने वेतन नहीं दिया। इतना ही नहीं अचानक उन्हें और उनकी एक अन्य साथी को हटा दिया गया।   

इसी के ख़िलाफ वो बीते आठ महीने से कोर्ट से लेकर सड़क तक संघर्ष कर रही हैं। अभी भी उन्हें उम्मीद है कि उनकी जीत होगी। उर्मिला ऑल इंडिया जनरल कामगार यूनियन की अध्यक्ष भी थीं। कामगार यूनियन हाल के महीनों में श्रमिकों के अधिकारों की सफलतापूर्वक लड़ाई लड़ी और जीती भी, इसलिए प्रशासन ने उनपर कार्रवाई कर बाकी सभी कर्मचारियों को एक चेतावनी भी देने का प्रयास किया कि अगर यूनियन के अध्यक्ष को बाहर किया जा सकता है तो समान्य कर्मचारी क्या है। 
 

जेएनयू प्रशासन के इस कदम की जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों ने भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि जेएनयू को अपनी गलती सुधारनी चाहिए थी और सभी कर्मचारियों को समान काम-समान वेतन देना चाहिए था लेकिन प्रशासन अब उन लोगों को दंडित कर रहा है जो जेएनयू में हो रहे शोषण के खिलाफ और अपने  अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

उर्मिला जो जेएनयू ऑल इंडिया जनरल कामगार यूनियन की अध्यक्ष हैं, उन्होंने कर्मचारियों को साथ लेकर प्रशासन के शोषण के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होंने इस दौर में एक बड़ी जीत हासिल की जब उनके मामले में फैसला देते हुए लेबर कोर्ट ने 17 सिंतबर, 2018 को जेएनयू को आदेश दिया की वो सभी कर्मचारियों को समान काम का समान वेतन दे। लेकिन ठीक इसके एक महीने बाद18 अक्टूबर को उनके ठेकेदार ने उन्हें काम से निकाल दिया। वो बिना किसी उचित कारण के। उसके बाद वो लेबर कोर्ट दोबारा गईं। 
कोर्ट में केस जाने के बाद उनका ठेकेदार मुकर गया और उसने कहा हमने इन्हें हटाया नहीं है बस ट्रांसफर किया है। लेकिन उर्मिला अपना टर्मिनेशन लेटर दिखाती हैं जिसमें साफ लिखा है कि उन्हें काम से हटाया जा रहा है। इसलिए उर्मिला चाहती हैं कि उन्हें उनके पुराने स्थान पर काम दिया जाए।

लेबर कोर्ट में इस मामले पर अगली सुनवाई 16 जुलाई को है। उर्मिला ने कहा की अगर इस मामले का जल्द निर्णय नहीं होता है तो वो हाईकोर्ट जाने पर विचार कर रही हैं। 
उर्मिला ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि बीते आठ महीने से उनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है, वो अपना जीवन दूसरों के सहारे चला रही हैं। अभी वो अपनी बहन के घर पर रह रही हैं। क्योंकि उनके पास इतने भी पैसे नहीं हैं कि मकान मालिक को दे सकें। उन्होंने बताया कि इस आर्थिक तंगी में जब वो अपना चार साल का पीएफ का पैसा लेने गईं तो कंपनी ने वो भी देने से इंकार कर दिया। जबकि पीएफ का पैसा उनकी खुद की मेहनत का पैसा है।   

आगे उन्होंने यह भी कहा शायद उन्हें हक़ के लिए लड़ने की सज़ा मिल रही है। जेएनयू प्रशासन ने उनपर कार्रवाई कर बाकी सभी कर्मचारियों को चेतावनी देने की कोशिश की है। इसमें शायद वो कामयाब भी होता दिख रहा है। कर्मचारी डरे हुए हैं, कोर्ट के आदेश के बाद भी अभी तक जेएनयू अपने कर्मचारियों को समान काम समान वेतन नहीं दे रहा। 

जेएनयू शिक्षक संघ का कहना है कि जेएनयू प्रशासन के कामकाज में एक पैटर्न दिख रहा है। वो शिक्षकों और छात्रों के खिलाफ दंडात्मक तरीकों का इस्तेमाल करता है ताकि उसके गैरकानूनी और अनुचित प्रशासनिक निर्णयों का अनुपालन किया जा सके और सफाई कर्मचारियों को हटाया जा रहा है। प्रशासन की मनमानी और विश्वविद्यालय विरोधी नीतियों का विरोध करने वाली किसी भी आवाज़ को दंडित किया जा रहा है और उनकी आवाज़ को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। जेएनयूटीए कर्मचारियों के साथ एकजुटता में खड़ा है और दो श्रमिकों की सेवाओं को समाप्त करने के आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग करता है।

safai karmachari andolan
safai karmachari
CONTRACT SAFAIKARAMCHARIS
JNU
Urmila
social justice

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