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अब साहित्य का दक्षिण टोला बनाने की एक कोशिश हो रही है: जयप्रकाश कर्दम
इतवार विशेष: दलित साहित्य और दलित लेखकों के साथ भेदभाव हो रहा है जैसे गांव में होता है न, दलित बस्ती दक्षिण टोला। दलित साहित्य को भी यह मान लीजिए कि यह एक दक्षिण टोला है। इस तरह वे लोग दलित साहित्य को हाशिए पर धकेल रहे हैं। तुम्हारा साहित्य है तुम ही लिखो। तुम ही गोष्ठियां करो। तुम्ही पढ़ो।
राज वाल्मीकि
13 Feb 2022
अब साहित्य का दक्षिण टोला बनाने की एक कोशिश हो रही है: जयप्रकाश कर्दम

जयप्रकाश कर्दम दलित साहित्य के ही नहीं बल्कि हिन्दी के राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकार हैं और दलित साहित्य के आधार स्तंभ। उनका पहला उपन्यास ‘छप्पर’ हिन्दी दलित साहित्य का भी पहला उपन्यास माना जाता है। कर्दम जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। उन्होंने कविताएं, कहानियां, लेख, उपन्यास, आलोचना, बाल साहित्य और खंड काव्य (राहुल) लिखे हैं। ‘द चमार’ का हिन्दी अनुवाद किया। हिन्दी दलित साहित्य वार्षिकी का आप वर्षों से संपादन कर रहे हैं। उनके अथक प्रयासों से यह वार्षिकी दलित साहित्य में दलित सोच और सृजन का एक बुनियादी आधार बन गई है। दलित साहित्य को सामने लाने, उसे स्थापित करने और परंपरागत हिन्दी साहित्य के समानांतर दलित साहित्य के बुनियादी सरोकारों को उजागर करने में जिन दलित साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान है उनमें डॉ. जयप्रकाश कर्दम एक जाना-पहचाना नाम है। वह दलित साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं और अपने व्यक्तित्व, सृजनकर्म के बूते अपने समकालीनों में काफी चर्चित और समादृत हैं। स्कूल-कालेजों के पाठ्यक्रम में उनकी रचनाएं पढ़ाई जा रही हैं। छात्र-छात्राएं उन पर पीएचडी कर रहे हैं।

उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। इसमें एक दिल्ली का ‘‘विशिष्ट योगदान सम्मान’’ भी है।

जयप्रकाश कर्दम जी का जन्म 5 जुलाई 1958 को इंदरगढ़ी, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ। कर्दम जी ने हिन्दी साहित्य में पीएचडी की है। ‘गूंगा नहीं था मैं’ और ‘तिनका-तिनका आग’ उनके प्रसिद्ध कविता संग्रह हैं। ‘नो बार’, ‘कामरेड का घर’, ‘लाठी’, ‘पगड़ी’, ‘मजदूर का खाता’ उनकी चर्चित कहानियां हैं। इसके साथ ही उनका उपन्यास ‘उत्कोच’ भी काफी चर्चित रहा। वे केन्द्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान में निदेशक रहे। आज भी आप साहित्य लेखन कर रहे हैं। आपसे वर्तमान समय-समाज, राजनीति, दलित, दलित साहित्य आदि विषयों पर विस्तार से बातचीत हुई। इस बातचीत के प्रमुख अंश—

 

सवाल :   मौजूदा दौर में मनुस्मृतिकालीन परिस्थितियां फिर से हावी होने जा रही हैं। उदाहरण के लिए सवर्ण समाज के स्कूली बच्चे दलित भोजन माता के हाथ का बना भोजन नहीं खा रहे हैं। यानी आज भी सदियों पुराना जातिवाद जिन्दा है।  ऐसे में दलित समाज अपनी गरिमा, अस्तित्व और अस्मिता के साथ जीए इसके लिए दलित समाज के समक्ष आप क्या चुनौतियाँ देखते हैं?

कर्दम जी : छोटे बच्चे क्या जानते हैं लेकिन वे दलित भोजन माता के हाथ का बना भोजन नहीं खाते। इसका मतलब है कि परिवार में बचपन से ही उन्हें भेदभाव सिखाया जाता है। जिन राज्यों में ऐसा माहौल बनाने वाले लोग हैं। अध्यापक हैं। उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। ऐसे मामलों को रफा-दफा कर दिया जाता है। आज भी छात्र दलित महिलाओं  के हाथ का बना खाना नहीं खाते इसका मतलब है कि जातिगत भेदभाव खत्म नहीं हुआ है। संविधान में प्रावधान है कि जाति के आधार पर कोई किसी के साथ भेदभाव नहीं कर सकता। और यदि कोई ऐसा करता है तो उसे कानून के तहत सजा हो सकती है। लेकिन अब जातिगत आधार पर भेदभाव पुराने तरीके से नहीं करते। उनके पास बहुत सारे तरीके हैं जिनके जरिए जातिगत भेदभाव खुले आम होता है। हम अखबारों में इस तरह की घटनाएं पढ़ते रहते हैं।

कथित उच्च जाति के लोग ये नहीं चाहते कि जो लोग हम से पीछे रहे हैं वो हमारे बराबर आ जाएं। एक शिक्षित समाज बने। साक्षरता अलग चीज होती है। हम प्राइमरी एजुकेशन देखें हम लोगों को यह नहीं कह सकते कि हमने उन्हें शिक्षित कर दिया उसे शिक्षा नहीं कहते। केवल साक्षर होने से काम नहीं चलेगा समाज को जागरूक करने की जरूरत है। शिक्षित लोगों में वैज्ञानिक सोच होनी चाहिए। हम साक्षर लोगों में वैज्ञानिक सोच विकसित नहीं कर पाए।

आजादी के 70 सालों में बाबा साहब ने जो सपना देखा था कि आने वाला भारत कैसा होगा वह पूरी तरह खंडित होता दिखाई दे रहा है। क्योंकि बहुत से लोग संविधान को फूंक रहे हैं। वे मनुस्मृति को लागू करना चाहते हैं।

सवाल :  आजकल ‘धर्म संसद’ का आयोजन किया जा रहा है? जो हमारे लोकतंत्र और  संविधान को सिरे से ख़ारिज करते हुए हिन्दू राष्ट्र को लाने और उसके लिए हथियार उठाने तक  का आह्वान कर रही हैं, सत्तारूढ़ दलों ने इस पर चुप्पी साध ली है, आप इसे किस नजरिये से देखते हैं?

कर्दम जी : धर्म के मामले में सवाल यह है कि हम धर्म को किस रूप में लेते हैं। जहां तक मैं समझता हूं धर्म एक आचरण की चीज है। यह हमारे सामाजिक व्यवहार को बताता है। हमें सिखाता है कि कि धर्म एक तरह की नैतिकता है  हम जिस नैतिकता का पालन करते हैं। मनुष्यता का पालन करते हैं तो हम धर्म को जीते हैं। और यह  अधर्म होता है जब हम समाज में एक दूसरे के साथ भेदभाव करने लगते हैं। एक मनुष्य दूसरे को  प्यार नहीं करता। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से ईर्ष्या करता है। धर्मगुरुओं का काम होता है समाज में  भाईचारा लाना। समाज में लोग कैसे मिल जुल कर रहें इस तरह की भावनाएं पैदा करना। सामाजिक सौहार्द  का सन्देश देना।

हमारे देश के संविधान में धर्मनिरपेक्ष स्वरूप है। उसमें सभी धर्मों को अपने अपने अनुसार  अपनाने की स्वतंत्रता है। सभी धर्मों  की  अपनी –अपनी  मान्यताएं हैं, विश्वास हैं,  उसके अनुसार अपने धर्मों को मानने का उन परंपराओं का पालन करने का और अपने – अपने धर्म का प्रचार – प्रसार करने का भी अधिकार है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब कोई व्यक्ति दूसरे धर्म पर प्रहार करने लगता है। उसकी आलोचना करने लग जाता है।  

ओशो ने एक बार कहा था कि आज जो  धर्म है वह  प्राचीन समय की राजनीति है। तो आज धर्म एक राजनीति का माध्यम बन गया है।

असल में धर्म समाज को एकता के सूत्र में बांधता है। दूसरा धर्म एक सामाजिक नियंत्रण की शक्ति के रूप में भी काम करता है और उसे अनुशासित करता है। हमारे धर्मगुरु समाज में समानता क्यों नहीं ला पा रहे। समाज में भ्रष्टाचार क्यों है। समाज में हिंसा क्यों है। नफरत क्यों है। आप किसी दूसरे के धर्म की आलोचना कर सामाजिक रिश्तों का माहौल खराब करते हैं तो मैं समझता हूं यह धर्म का काम नहीं है।

 सवाल  : अभी पांच राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा) में चुनाव हो रहे हैं। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी जैसे बुनियादी मुद्दे सिरे से गायब हैं। राजनीतिक दलों द्वारा मूल मुद्दों से मतदाताओं का ध्यान भटकाया जा रहा है। विभिन्न प्रलोभन देकर उन्हें लुभाया जा रहा है। दूसरे दलों की कमियों को गिनाया जा रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग लोकतंत्र के महापर्व यानी निष्पक्ष चुनाव कराने में अपनी सही भूमिका निभा पायेगा? लोकतंत्र के साथ न्याय होगा? आप क्या सोचते हैं?

कर्दम जी : चुनाव एकदम निष्पक्ष तरीके से हों। शांतिपूर्ण हो।  यह काम चुनाव आयोग का काम है। चुनाव आयोग चुनाव का एजेंडा तय नहीं कर सकता। अपना अपना एजेंडा राजनीतिक पार्टियां तय करती हैं।  पार्टियों ने अपने एजेंडे तय किए  हुए हैं। इन दिनों एजंडे पार्टियों से ज्यादा मीडिया तय करता है।  मीडिया जिन चीजों को प्रचार देता है वही जनमानस तक पहुंचती हैं। वोटर तक पहुंचती हैं। और वही चीजें ब्रेनवाश करती हैं।

समय इस तरह का हो गया है कि महंगाई इतनी बढ़ती चली जा रही है।  पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ रहे हैं। सिलेंडर का दाम बढ़ रहा है। सब चीज का रेट बढ़ रहा है।  तो मुद्दे गौण हो गए हैं। सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी है।  उसके पास राम मंदिर है।  उसके पास रामराज है।  उनके पास इस तरह के दूसरे मुद्दे हैं। उनको लेकर वह समझते हैं कि हमने राम मंदिर बना दिया है तो ऐसा काम कर दिया कि अब किसी चीज की जरूरत ही नहीं है।  अब लोगों को रोटी चाहिए ना रोजगार चाहिए। बस राम मंदिर बन गया है। जनता  की जो बुनियादी समस्याएं उन पर फोकस नहीं है। दूसरी जो राजनीतिक पार्टियां हैं। वह भी उन मुद्दों को नहीं ले रही हैं। कोई लैपटॉप तो कोई साइकिल कोई मोबाइल फोन बांट रहा है लेकिन हम अच्छी शिक्षा दे देंगे यह कोई पार्टी नहीं कह रही है। हम रोजगार देंगे ऐसा कोई पार्टी नहीं कह रही है। तो शिक्षा मुद्दा नहीं है। रोजगार मुद्दा नहीं है।

आरक्षण धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। इसके लिए कोई नहीं कह रहा है। यह कोई नहीं कह रहा है कि हम इसको संरक्षण देंगे। रोजगार नहीं होगा। शिक्षा नहीं होगी। स्वास्थ्य सेवाएं नहीं होंगी। महंगाई पर कंट्रोल नहीं होगा।  तब सांप्रदायिक आधार पर या कोई और आधार बनाकर पार्टी चुनाव तो जीत लेगी लेकिन इसमें जनता का हित नहीं होगा।

चुनाव आयोग  को निष्पक्ष रहना चाहिए। क्योंकि वह संवैधानिक संस्था है। लेकिन उनकी नियुक्ति  सत्ताधारी सरकार ही करती है।  इसी तरह राज्यों में प्रशासनिक अधिकारी चुनाव आयोग के सदस्यों और पदाधिकारियों का चयन करते हैं। किसी पार्टी के प्रति चुनाव आयोग में सॉफ्ट कॉर्नर हो तो और जो आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं उनकी अनदेखी कर दें और दूसरी पार्टी से छोटा सा भी उल्लंघन होता है तो उसके खिलाफ एक्शन ले ले यह काम चुनाव आयोग जरूर कर लेगा।  इतना तो होता ही है।

 

सवाल : आज हमारे देश में स्त्री, दलित और आदिवासी समुदाय समानता, स्वतंत्रता और न्याय या कहें कि बराबरी के मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। इन्हें बराबरी का हक़ कैसे मिल पायेगा?

कर्दम जी : सभी नागरिकों को सम्मानपूर्वक जीने का हक़ है। भारत के प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता, समानता और न्याय चाहिए। लेकिन दलित वर्गों को, स्त्रियों को आदिवासियों को और भी बहुत सारे समुदाय हैं जो आज भी समानता के, स्वतंत्रता के और न्याय के अधिकार से वंचित हैं, जो कि उनकी मूलभूत आवश्यकता है। और ये जो मानव अधिकार हैं जिन्हें हमारे संविधान में फंडामेंटल राइट्स के रूप में दिए गए हैं मौलिक अधिकार। वस्तुतः ये मानव अधिकार ही हैं। आज मानव अधिकारों को लेकर पूरी दुनिया में जागृति है कि जिन लोगों को जिन समाजों को, जिन समूहों को, जिन व्यक्तियों को जो मानवाधिकारों से वंचित हैं उन्हें मानव अधिकार मिलने चाहिए ताकि वे भी सब की तरह सम्मान पूर्वक स्वाभिमान पूर्वक जी सकें। जब तक कोई भी व्यक्ति अपने मानव अधिकारों से वंचित रहेगा तब तक हम न तो सभ्य समाज बन सकते हैं और न प्रगतिशील समाज और राष्ट्र बन सकते। दलितों को, स्त्रियों को, आदिवासियों को मानव अधिकार प्रदान करना ये केवल उनकी आवश्यकता नहीं है बल्कि ये हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। और ये एक वैश्विक समुदाय के रूप में खुद को प्रस्तुत करने की भी हमारी मूलभूत आवश्यकता है। एक राष्ट्र के रूप में एक समाज के रूप में तो यदि हम चाहते हैं कि एक सम्मानजनक राष्ट्र के रूप में एक सम्मानजनक नागरिक के रूप में हम सब जाने जाएं, समझे जाएं,  तो जरूरी है कि हमारे जो नागरिक मानव अधिकारों से वंचित हैं उनको उनके मानव अधिकार दिए जाएं।

सवाल : बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने कहा था जब तक सामाजिक समानता और आर्थिक समानता नहीं होगी तब तक राजनीतिक समानता (एक व्यक्ति एक मत) कारगर नहीं होगी। इस कथन के सन्दर्भ में आर्थिक विषमता को आप कैसे देखते हैं?

कर्दम जी :  संविधान की जो उद्देशिका है उसमें स्पष्ट रूप से  स्वतंत्रता को परिभाषित किया गया है। समानता  को भी   अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है। अवसरों की समानता निजी प्रगति करने के लिए जरूरी है। जो मौलिक अधिकार हैं वे हर  नागरिक को होने चाहिए। तभी स्वस्थ भारत समृद्ध भारत और शिक्षित भारत हो पाएगा। शिक्षा एक मौलिक अधिकार है । स्वास्थ्य का अधिकार है। एक नागरिक का स्वास्थ्य की रक्षा राज्य का दायित्व है लेकिन आज हो यह रहा है कि  नागरिकों को खास कर दलितों और आदिवासियों को उन्हें उनके अधिकार नहीं मिल रहे हैं।  रोजगार के अवसर प्रदान करना। हर व्यक्ति को रोजगार देना।  रोजगार के अवसर उपलब्ध करा देना।  इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए ही सरकारी सेवाओं में राजनीति में भी अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है।

जो संवैधानिक प्रावधान है उनकी एक तरह से हत्या कर दी जा रही है। संवैधानिक संस्थाओं की हत्या कर रहे हैं। और राज्य को आरक्षण को अप्रासंगिक बना दिया गया है। जितना सरकारी तंत्र सिमट  रहा है। जितना प्राइवेटाइजेशन हो रहा है उतनी  नौकरियां कम हो रही  हैं।  प्राइवेट सेक्टर बढ़ता जा रहा है।  वहां कोई आरक्षण नहीं है। वहां केवल मजदूर की जगह है जो 8 घंटे काम करता था अभी 12 घंटे काम करता है। उनकी क्या दुर्दशा हो रही है। यह हम सब लोग देख रहे हैं और दूसरी ओर 30 से  50 करोड़ के लुभावने प्रोजेक्ट दिए जा रहे हैं।

 

सवाल  : ये जो नई शिक्षा नीति 2020  आई है, इसे आप कैसे देखते हैं?

कर्दम जी :  शिक्षा का निजीकरण हो रहा है जो दलित वर्ग है जो मेजॉरिटी है वह शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता।  क्योंकि सरकारी संस्थानों को लगभग ख़त्म किया जा रहा है। कहीं  अध्यापक नहीं है। स्कूल में सुविधा नहीं है।  बच्चों को बैठने के लिए जगह नहीं है। शौचालय व  पानी की सुविधा नहीं है।

प्राइवेट में सारी सुविधाएं हैं। लेकिन प्राइवेट में फीस इतनी महंगी हैं और जो शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से होती है। कुकुरमुत्ता की तरह प्राइवेट स्कूलों की दुकाने खुल गई हैं। और एक कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा वहां जा रहा है। वहां बच्चे जाते भी हैं तो उनकी पढ़ाई ठीक से नहीं हो पाती।

बच्चों की बुनियादी सुविधाएं पूरी नहीं हो रही है। उनकी पढ़ाई चौपट होती जा रही है यानी जो एक फंडामेंटल राइट्स शिक्षा का अधिकार राज्य का दायित्व था। नई शिक्षा नीति के माध्यम से उसका निजीकरण किया जा रहा है।

सवाल :  दलित उत्पीड़न, दलित महिलाओं पर यौन हिंसा, बलात्कार, दलितों के हाथ काटने जैसी घटनाएं घट रही हैं, ऐसे में दलित राजनैतिक हस्तक्षेप क्यों नहीं हो रहा है?

उत्तर:  देखिए सब चल रहा है। दलित राजनीति  है ही नहीं। दलित राजनीति का मतलब होता है उसका सशक्त प्रस्तुतीकरण जो नहीं है।  दलित लोग जो राजनीति में हैं वे  अलग-अलग पार्टियों के सदस्य हैं। वहां भी वे अपने लिए काम करते हैं किसी को मिनिस्टर बनना है, एमपी बनना है,  एमएलए बनना है। पार्टी के जो  उच्च पदाधिकारी होते हैं उनकी जो नीतियां होती हैं उन्हें उन्हीं के अनुसार काम करना होता है।

सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि  जो लोग आज अलग-अलग संस्थाओं पार्टियों में सांसद हैं। नेता हैं। पक्ष में है या विपक्ष में। वे दलित मुद्दों को नहीं उठा रहे हैं।  जबकि उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। वे समाज के प्रतिनिधि हैं। इसलिए उनकी जिम्मेदारी है कि वे उन मुद्दों को उठाएं। विधानसभा और संसद में मुद्दा उठाएं। लेकिन वे इन मुद्दों को उठाने में ना काबिल हैं।  और यही वजह है कि इस तरह की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। जहां तक दलित अत्याचारों का प्रश्न है जो दोषी होते हैं उनके खिलाफ या तो मुकदमे दर्ज ही नहीं होते होते भी हैं तो हल्की-फुल्की धाराओं में होते हैं जिससे बहुत जल्दी उनकी जमानत हो जाती है। और जब उन्हें पता चलता है कि इतना बड़ा कांड होने पर भी उनके खिलाफ कुछ नहीं हुआ तो उनका हौसला और बढ़ जाता है।

दलित नेताओं को तो छोड़िए। हमारे जो सोशल एक्टिविस्ट हैं वे भी नहीं कर रहे हैं।  और हमारा जो मीडिया है वह भी कुछ नहीं करता।

2012 में जो निर्भया कांड हुआ था। उसमें कैसे पूरा देश एक साथ खड़ा हो गया था। रात दिन जुटा रहा और सारे सोशल एक्टिविस्ट इंडिया गेट पर कैंडल मार्च कर रहे थे। रोज वहां मोमबत्ती जला रहे थे। धरना प्रदर्शन कर रहे थे। लंबे समय तक विरोध  किया था। सभी राजनीतिक पार्टियां साथ दे रही थीं। लेकिन दलितों के साथ तो रोज अत्याचार हो रहे  हैं। बलात्कार हो रहे हैं। नरसंहार हो रहे हैं। दलित आदिवासियों के मामले में सोशल एक्टिविस्ट भी थोडा –सा दिखावा  करते हैं और फिर चुप हो जाते हैं।

सवाल : आप दलित लेखन के बुनियादी स्तंभों में से एक हैं और काफी समय से लिख रहे हैं। आपका उपन्यास “छप्पर” काफी पहले लिखा गया था। ऐसा माना जाता है कि यह हिंदी दलित साहित्य का पहला उपन्यास है। आपने “उत्कोच” उपन्यास भी लिखा है। आज उपन्यास विधा पर ज्यादा काम नहीं हो रहा है। आप क्या सोचते हैं?

कर्दम जी:  हिंदी दलित साहित्य में अपेक्षाकृत उपन्यास लेखन में ध्यान कम है और मुझे ऐसा लगता है। उपन्यास लिखने के लिए हमें कविता और कहानी से आगे बढ़ना होता है। क्योंकि उपन्यास में बहुत सारी घटनाओं का समुच्चय होता है। घटनाएं आपस में  गुंथी हुई होती हैं। वहां उसमें विचार होता है।  अलग-अलग तरह के  पात्र होते हैं। अलग-अलग तरह के विचार होते हैं। अलग-अलग तरह की घटनाएं होती हैं। इसके लिए चिंतन की जरूरत होती है। क्योंकि उपन्यास के माध्यम से आप एक बड़ा मैसेज भी दे रहे होते हैं। उपन्यास का फलक बड़ा होता है। उपन्यासकार के लिए अध्ययन बहुत जरूरी है। सामाजिक अध्ययन भी साहित्य का अध्ययन भी। दूसरा उसके पास चिंतन का स्तर होना चाहिए जो चीज वह देख रहा है अपने चिंतन से उसे गुजार रहा है  उसका चिंतन स्तर क्या कह रहा है वह किस रूप में देख रहा है तब वह प्रस्तुत कर पाएगा।

मुझे लगता है कि हमारे यहां इस मामले में थोड़ी सी उदासीनता है। उपन्यास भी आने चाहिए। हालांकि कुछ लोगों ने उपन्यास भी  लिखे हैं  जैसे कैलाश चंद चौहान ने तीन उपन्यास लिखे हैं। उमराव सिंह जाटव ने भी लिखे हैं।  ईश कुमार गंगा निया ने लिखे हैं।  उससे पहले अजय नावरिया का भी उपन्यास आया था। अभी मैं सुन रहा हूं रत्न कुमार सांवरिया का भी उपन्यास आ रहा है। और भी लोग लिख रहे हैं। नैमिशराय जी ने भी कई उपन्यास लिखे हैं।  लेकिन जितना अन्य विधाओं में लेखन हुआ है उतना उपन्यास विधा में नहीं हुआ है। उपन्यास और अधिक लिखे जाने की जरूरत है।

सवाल: दलित साहित्य में आत्मकथा लिखने का भी दौर रहा है। आपके कई साथी लेखकों ने अपनी आत्मकथाएं लिखीं हैं। आपने आत्मकथा नहीं लिखी?

कर्दम जी: आत्मकथाओं का दौर रहा नहीं है। आत्मकथाएं अभी भी लोग लिख रहे हैं।  और अब तो ऐसा ट्रेंड  या प्रवृत्ति बन गई है कि अब कोई आत्मकथा लिखेगा तभी वह दलित लेखक के रूप में स्थापित होगा। आत्मकथाएं सबसे ज्यादा चर्चित होती हैं। आत्मकथाएं बड़े स्तर पर कठघरे में खड़ा कर रही  हैं समाज को।

जहां तक मेरा सवाल है अभी तक मैंने आत्मकथा नहीं लिखी है। हालांकि कहते तो मुझसे बहुत से लोग हैं। प्रकाशक भी मुझसे मांगते रहते हैं।  मेरे दिमाग में दो चीजें आती हैं कभी-कभी तो यह आता है कि  आत्मकथा जो आई है वह किसी एक लेखक की नहीं है बल्कि वह हमारे पूरे समाज की  हैं।  ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा पढ़ते हैं तो यह नहीं लगता है कि वह ओमप्रकाश वाल्मीकि की है वह लगता है कि वह मेरी भी आत्मकथा है।  मैं नैमिशराय की आत्मकथा पढ़ता हूं तो मुझे लगता है उनकी नहीं है यह तो मेरी भी कहानी है। सूरजपाल चौहान ने लिखा या किसी और ने लिखा तुलसीराम ने लिखा,  लगता है कहीं ना कहीं हम उस में होते हैं।  मुझे यह भी लगा कि इतनी आत्मकथाएं आ गई है तो मैं आत्मकथा  नहीं भी लिखूंगा तो कोई बड़ी चीज नहीं है, जो चीजें नहीं लिखी जा रही हैं अगर मैं उन चीजों को लिख दूं तो शायद ज्यादा अच्छा योगदान रहेगा।

नए विषयों को पढ़कर जो देखता हूं। इधर उधर खोजता हूं।  शोध  करता हूं। उन पर लिखने की कोशिश करता हूं। अभी मैंने लोक साहित्य पर काम किया है लोक साहित्य और दलित संस्कृति पर।

सवाल: आपके  शुरुआती दौर के दलित लेखन में और आज के दलित लेखन में क्या आप कोई बदलाव देखते हैं?

कर्दम जी :  समय के साथ बदलाव होता है। मैं अपनी कहता हूं जब मैंने शुरुआत की थी लेखन की उस समय दलित साहित्य का आंदोलन नहीं था। सन 80 से पहले की बात है। उस समय मैं जो साप्ताहिक अखबार होते हैं उनमें रिपोर्टिंग करता था।  लेख लिखा करता था सामाजिक मुद्दों पर। क्योंकि अंबेडकर आंदोलन में तो मैं शुरू से ही रहा हूं तो 1983 में मैंने किताब लिखी थी ‘वर्तमान दलित आंदोलन’  ‘करुणा’  उपन्यास 1986 में लिखा था मैंने।

हां, समय के साथ कुछ अलग चीजें देखी है। कुछ अलग चीजें पढ़ी हैं।  समाज में जो परिवर्तन आए हैं। उन परिवर्तनों को देखा है। उनके आधार पर उनको साहित्य में लाने की कोशिश करता हूं। उस समय जो देखा हां उस समय युवा थे तो उस समझ से लिखा। अब जब इस उमर में आए हैं तो हमारा सोचने का ढंग बदला है। चीजों को देखने की हमारी दृष्टि बदली है।  समय के साथ दृष्टि बदल जाती है। इस दौरान हमने समाज को कुछ नए ढंग से देखा है।  कुछ पढ़ा भी है।  चिंतन के दौर से भी चीजें गुजारते हैं। तो मुझे लगता है समय के साथ हम नया सीखते जाते हैं।  तब हमारे लिखने में गुणवत्तापूर्ण चीजें सामने आती हैं।  क्योंकि उस समय तक हम काफी आगे बढ़ चुके होते हैं।

 

सवाल: हिंदी दलित साहित्य के समक्ष क्या चुनौतियां हैं?

कर्दम जी : देखिए चुनौतियां तो पहले भी थीं आज भी हैं।  लेकिन पहले अलग तरह की थीं आज अलग तरह की हैं।  पहले यह थी कि लोग दलित साहित्य को स्वीकार नहीं कर रहे थे।  और दलित साहित्य को खारिज करने के लिए नए नए तरह के तर्क दिए जा रहे थे।  कोई कहता था इसमें भाषा नहीं है। कोई कहता था शिल्प नहीं है।  यह तो कच्ची सब्जी की तरह है।  कोई सौन्दर्यबोध को लेकर सवाल उठाता था  तो कोई कहता था इसमें  केवल सपाट बयानी है।  यह तो शिकायतनामा है। इस तरह की चीजें कही जाती थीं। तो लोग दलित साहित्य को साहित्य  मानने को तैयार नहीं थे। लेकिन जब निरंतर प्रतिबद्धता के साथ हम लोग लिखते रहे और बहस करते रहे इधर-उधर गोष्ठियों में, विश्वविद्यालय में सेमिनारों में और जहां भी मौका मिला वहां तब उसे स्वीकार किया गया और जो पाठ्यक्रमों में लगाने का प्रयास किया गया तो पाठ्यक्रमों में भी लगने लगा। अब दलित साहित्य पाठ्यक्रमों भी लग गया और शोध भी खूब हो रहे हैं।  तो कोई अब यह नहीं कहता कि दलित साहित्य साहित्य नहीं है। अब वो लोग एक प्रयास करते हैं कि दलित साहित्य को किस तरह हाशिए पर धकेला जाए।

दलित समाज की तरह दलित साहित्य को भी हाशिए पर धकेलने की अब परिपाटी हो गई है कि दलित साहित्य का एक अलग पाठ्यक्रम बना दिया। उसमें दलित लेखकों की रचनाएं डाल दीं। उन्हें कौन पढ़ता है – दलित विद्यार्थी। गैर दलित बहुत कम पढ़ते हैं उसे। और सबसे बड़ी बात जितनी चर्चाएं होती हैं। सेमिनार होते हैं। साहित्य के अन्य विषयों पर होती हैं तो उनमे दलित लेखकों, बुद्धिजीवियों को नहीं बुलाया जाता। जो दलित साहित्य पर होती हैं उनमें दलित साहित्यकारों को बुलाया जाता है। इस तरह कहिए कि साहित्य का दक्षिण टोला बनाने की एक कोशिश हो रही है। दलित साहित्य और दलित लेखकों के साथ भेदभाव हो रहा है जैसे गांव में होता है न, दलित बस्ती दक्षिण टोला। दलित साहित्य को भी यह मान लीजिए कि यह एक दक्षिण टोला है। इस तरह वे लोग दलित साहित्य को हाशिए पर धकेल रहे हैं। तुम्हारा साहित्य है तुम ही लिखो। तुम ही गोष्ठियां  करो।  तुम्ही पढ़ो। लेकिन दलित लेखकों  प्रोफेसरों को इस योग्य नहीं समझा जाता  कि दूसरे विषयों पर जो डिबेट  होती हैं उन पर बोलने के लिए उन्हें  बुलाया जाए। उन्हें नहीं बुलाया जाता है। जैसे अभी मैं देख रहा हूं कि कोई प्रोग्राम प्रेमचंद पर हो, निराला पर हो, तुलसीदास पर हो, मुक्तिबोध पर हो या हाल ही में अभी फणीश्वर नाथ रेणु पर कई जगह सेमिनार हुए वहां कोई दलित लेखक या बुद्धिजीवी नहीं था। तो  क्या दलित लेखक जो लिख रहे हैं। दलित प्रोफेसर जो पढ़ा रहे हैं। क्या बे उनके बारे में नहीं बोल सकते।

तो आज के समय में दलित साहित्य के सामने यह बहुत बड़ी चुनौती है। हालांकि छपने की समस्या नहीं है। दलित साहित्य का बाजार है इसलिए प्रकाशक उन्हें छाप रहे हैं। दलित साहित्य विश्वविद्यालय में भी जा रहा है।  बाहर भी जा रहा है। लेकिन जो वहां बैठे हुए मठाधीश अकादमीशियन हैं या जो और संस्थाएं हैं या जो विश्वविद्यालय में बैठे हुए आचार्य हैं जो  वर्णव्यवस्था वाली सोच के लोग बैठे हुए हैं  वो अंदर से स्वीकार ही नहीं कर रहे। वे चाहते हैं कि दलित साहित्य लिखा जाए तो बिल्कुल उसी धारा पर लिखा जाए जो तुलसीदास की रामचरितमानस  की धारा है।

उनका दंभ  होता है कि यदि उस धारा पर लिखा जाएगा तो हम बिल्कुल उसे स्वीकार करेंगे। उनकी जो बड़ी रचनाएं हैं उन्हें आप ख़ारिज करेंगे, मनुवाद को खारिज करेंगे या आप ईश्वर पर सवाल खड़ा करेंगे। आप वर्ण व्यवस्था को नकारेंगे।  यदि आप उन पर प्रहार करेंगे तो फिर तो हम आपको बिल्कुल स्वीकार नहीं करेंगे।

वे समझते हैं कि हम ही सही हैं। हम जो कह रहे हैं वही सही है। वही प्रमाणिक है। वही श्रेष्ठ है।  इस दंभ में हैं कि हम जो कुछ कह रहे हैं वही सही है। वे  कह रहे हैं कि हमारा अनुकरण करो। जैसा हम कह रहे हैं वैसा लिखो । जैसा हम बोल रहे हैं वैसा आप लिखो। यह उनका आग्रह है। जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

सवाल:  आजकल आप क्या लिख रहे हैं?

कर्दम जी:  मैं अभी कुछ पढ़ रहा हूं। कुछ लिख रहा हूं । वह चीजें बाद में आपके सामने आएंगी। अभी मैंने लोकसाहित्य  पर काम खत्म  किया है।

सवाल: आज जो युवा दलित साहित्यकार हैं उनके लिए कोई सलाह कि क्या लिखा जाना चाहिए।

कर्दम जी:  लिखने के लिए बहुत सारी चीजें हैं। मैं तो कह रहा हूं  जो भी साहित्य की विधाएं हैं उन सभी विधाओं में लिखा जाना चाहिए। उन विधाओं के अलावा भी अगर हम किसी और तरीके से लिख सकते हैं तो वह भी लिखा जाना चाहिए। यह जरूरी नहीं है हम विधाओं में बंध कर लिखेंगे। हमारे मन में जो आता है वह हमें लिखना चाहिए।  जो चीज हमें दिखाई देती है उस पर लिखना चाहिए।

लेकिन अब हमें लेखन का जो दायरा है उसको आगे बढ़ाना होगा। हमारा जैसे एक पहले रूटीन सा बन गया था जैसे कि एक गांव है। गांव में ठाकुर है।  ब्राह्मण है। हमारी कहानियां हमारी सारी चीजें वहीं पर केंद्रित हो रही हैं। गांव से जो व्यक्ति शहर में आ रहा है चाहे मजदूरी करने आ रहा है नौकरी करने आ रहा है चाहे पढ़ने के लिए आ रहा है या और कुछ करने के लिए आ रहा है। अब महानगरों में दलितों की क्या स्थिति है। महानगरों में भी अब स्लम है। महानगरों में भी उनकी बस्ती हैं। महानगरों में जातिवाद किस रूप में है। महानगरों में अस्पृश्यता किस रूप में है। यहां वह किस तरह जुड़ रहा है।  किस तरह की चीजें झेल रहा है। निम्न वर्ग से निकलकर अब पढ़ लिखकर नौकरी करके जो मध्यवर्ग में आ रहा है तो मध्यमवर्ग  में आने के बाद उसकी क्या समस्याएं होती हैं। वहां वह चीजों को किस तरह   झेलता है।

मैं समझता हूं आज नई  चुनौतियां हैं जो पहले की समस्या  थी आज वह समस्याएं बदल रही है। आज वह किस रूप में बदल कर हमारे सामने आ रही हैं। हमारी आने वाली पीढ़ियों के सामने क्या संकट रहेगा। उन पर क्या आर्थिक  प्रभाव पड़ने वाले हैं। उदारीकरण का क्या  प्रभाव हो रहा है।  निजी करण का जो प्रभाव हो रहा है या आज की जो राजनीति है आज जो सामाजिक बदलाव हो रहे हैं जो आजकल चल रहा है इसका रिजल्ट आने वाले समय में क्या होगा। तो हमें इन चीजों को फोकस करना पड़ेगा। हमें गहनता से उनके बारे में जानना  पड़ेगा। केवल वहीं तक रुकना नहीं है। जो चीजें हिडन हैं  जो दिखाई नहीं देती उनको ढूंढ कर लाना पड़ेगा। वहां लोगों को नई चीजें दिखानी पड़ेगी। यह मुझे लगता है कि ज्यादा जरूरी है। जैसे कि मैं (हालांकि अपने बारे में जिक्र नहीं करना चाहिए) बता रहा हूं कि मैंने ‘हाउसिंग सोसायटी’  कहानी लिखी। मुझे पता चला कि जो हाउसिंग सोसायटी बनती है उसके जो मेंबर बनते हैं वहां दलितों को हाउसिंग सोसायटी का मेम्बर नहीं बनाया जाता। ऐसे विषयों पर कहानी लिखिए।

वैसे तो आदर्शवादी लोग कहते हैं कि अब  जाति-पाति नहीं रही। जाति बहुत पुरानी चीज हो गई है। कोई जातिवाद को नहीं मानता। कोई भेदभाव को नहीं मानता। लोग ऐसी बातें करेंगे। लेकिन आप अख़बार उठाकर देख लीजिए। उनके मैट्रीमोनियल देख लीजिए। shaadi.com या जो भी मैट्रीमोनियल साईट हैं उन्हें देख लीजिए। उसमे 95% विज्ञापन जाति आधारित होते हैं। जो आदमी पढ़ा-लिखा नहीं है या कम पढ़ा लिखा है वह तो शादी के लिए मैट्रीमोनी पर विज्ञापन नहीं देते हैं। वो तो आपस में ही रिश्ता ढूढकर शादी कर लेते हैं। शिक्षित लोग ही मैट्रीमोनीयल में विज्ञापन देते हैं। मैं यह कह रहा हूं की हमें इन चीजों को देखना चाहिए कि किस रूप में चीजें बदल रही हैं। उन्हें हमें उजागर करना चाहिए। यह जो सच्चाई है। इसको बेपर्दा करना चाहिए।

(साक्षात्कारकर्ता राज वाल्मीकि सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं।)

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