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भारत
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जम्मू-कश्मीर : अस्पताल से हुई पेलेट गन से पीड़ित लड़कियों की दोस्ती की शुरुआत
कश्मीर की तीन नाबालिग लड़कियां पेलेट गन की गोली से अक्षम हो गई हैं। हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के 115वें दिन यानी 31 अक्टूबर 2016 को कर्फ्यू के दौरान उन पर पेलेट गन से गोलियां दागी गई।
जुबैर सोफी
10 Jan 2019
कश्मीर

जब इन तीनों नाबालिग लड़कियों की पहली बार मुलाकात हुई तो इनके चेहरे और आंखों पर पट्टी बंधी थी। इनकी दोस्ती शेरी महाराजा हरि सिंह अस्पताल (एसएमएचएस) के वार्ड नंबर सात से शुरू हुई।

ये सभी लड़कियां 31 अक्टूबर 2016 को पेलेट गन के छर्रों से ज़ख़्मी हुईं थीं। ये दिन कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के 9 जुलाई 2016 को मारे जाने के बाद शुरू हुए दिन और रात के कर्फ्यू का 115 वां दिन था। दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले के गांव रोहमू में तैनात भारतीय सेना की राष्ट्रीय राइफल (आरआर) 53 बटालियन की टुकड़ी इलाक़े में गश्त कर रही थी। द्वारा के पास बैठे लड़कों को कुछ सैनिकों ने कथित तौर पर दीवारों और बिजली के खंभे से वानी को श्रद्धांजलि देने वाले पोस्टर हटाने के लिए कहा। जब लड़कों ने विरोध किया तो सैनिकों ने कथित तौर पर उन्हें पीटना शुरू कर दिया। लड़कों को बचाने के लिए लोग अपने घरों से बाहर निकल आए और जवाब में सैनिकों ने उन पर गोलियां और पेलेट गन चलाया। स्थानीय लोगों के मुताबिक इसके चलते इलाके में झड़पें हुईंं।

कई युवाओं को पेेलेट गन के छर्रे लगने के बाद कथित तौर पर झड़पें तीव्र हो गईं।

शबरोजा मीर जिसकी उम्र उस वक़्त 16 साल अपने घर में अकेली थी क्योंकि उसके परिवार के अन्य सदस्य रिश्तेदार के यहां गए हुए थें। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी शबरोजा ने जब घर के बाहर गोलीबारी और आंसू गैस के गोले छोड़ने की आवाज़ सुनी तो अपने घर के दरवाज़ों और खिड़कियों को जल्दी से बंद कर दिया। वह कहती है, "मै काली मिर्च, मिर्च और आंसू गैस के चलते घुटन महसूस कर रही थी इसलिए मैंने अपने चाचा के घर जाने का फैसला किया जो मेरे घर के पीछे है।"

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शबरोज़ा मीर 

घर से बाहर निकलने के बाद वह काफ़ी तेज़ी से आगे बढ़ी। हालांकि जब वह कोने पर मुड़ने ही वाली थी तो उसने जम्मू-कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (एसओजी) के कुछ अधिकारियों को अपने घर की तरफ आते हुए देखा। शायद वे पथराव करने वालों का पीछा कर रहे थें।

शबरोजा बताती है, उन्हें देखने के बाद "मैं अपने घर के कोने के पास बैठ गई, मैंने अपना सिर ये देखने के लिए पीछे घुमाया कि अभी वे गए हैं या नहीं। लेकिन जो हो रहा था उसे मैं कुछ समझ पाती कि वर्दी पहने एक व्यक्ति ने सीधे मेरे चेहरे पर पेलेट गन चलानी शुरु कर दी।” फिर उसे उप-जिला अस्पताल ले जाया गया जहां से उसे एसएमएचएस में रेफर कर दिया गया।

इफरा शकूर जिसकी उम्र उस वक़्त 14 साल थी अपने घर में बैठी थी जो कि शबरोज़ा के घर से कुछ मीटर की दूरी पर है। जब झड़पें तेज़ हो गईं तो उसकी मां फरीदा बानो ने उसे अपने छोटे भाई रईस जो दूसरे बच्चों के साथ बाहर खेल रहा था उसे तलाशने के लिए कहा। रईस की उम्र अब 10 साल है।

जब वह अपने भाई को देखने के लिए बाहर गई तो कुछ ही समय में एक पुलिस वाले ने कथित तौर पर उसके चेहरे पर गोली चला दी। यह पेलेट का छर्रा था। इफरा कहती है, “पुलिस वालों ने मुझे एक लड़की की पोशाक में देखा। उन्होंने मुझ पर गोलियां चलाई। उन्होंने मेरा बाल पकड़ लिया और मुझे बुरी तरह पीटा। कुछ लोग मुझे छुड़ाने में कामयाब रहे लेकिन उसके बाद उनपर पेलेट गन चलाए गए।

शबरोज़ा की तरह स्थानीय लोग भी उसे पुलवामा के उपजिला  अस्पताल ले गए। उसे भी एसएमएचएस के लिए रेफर कर दिया गया। संयोग से शबरोज़ा के बाईं ओर का उसे बेड मिला।

उनके दोनों घर कर्ल-ए-बाल (कुम्हारों का पहाड़) इलाक़े में स्थित हैं। इन झड़पों के बाद इलाक़े के लोगों ने सुरक्षा के लिए एक स्थान पर इकट्ठा होने का फैसला किया।

कर्ल-ए-बाल के दूसरे तरफ से एसओजी और आरआर सैनिकों का एक समूह कथित तौर पर उस स्थान की ओर जा रहा था जहां झड़पें हो रही थीं। उन्होंने वहां खड़े लोगों को देखा और कथित तौर पर उन पर पेलेट गोलियां चलाई। इसे देखने के लिए 16वर्षीय श्बरोजा  अख्तर पीछे मुड़कर देखी लेकिन इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती कि क्या हुआ उसके चेहरे और आँखों पर कई छर्रे लग गए। उसे भी उसी वार्ड में भर्ती कराया गया था जिसमें शबरोज़ मीर के दाईं ओर उसका बेड था।

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शबरोज़ा अख्तर 
 

एक ही गाँव  में रहते हुए वे एक-दूसरे के लिए अजनबी हैं। तीनों लड़कियों का एक ही दिन ऑपरेशन किया गया और उनके माता-पिता नेएक-दूसरे से मिलवाया। मीर बताती है, "मैंने अपनी मां को इफरा की मां से बात करते हुए सुना। उन्होंने मुझे बताया कि वे हमारे गांव के ही हैं। तो हमने एक-दूसरे से बात करनी शुरू की।"

इफरा कक्षा आठवीं की छात्रा थी और अपने परीक्षा की तैयारी कर रही थी लेकिन ज़ख़्मी होने के चलते वह शामिल नहीं हो पाई थी।

मीर और अख्तर एक ही स्कूल में पढ़ रही थीं। दोनों दसवीं कक्षा में थी लेकिन अलग-अलग सेक्शन में थी। मीर ने कहा, "हमनेकिसी मौके पर एक दूसरे को देखा था लेकिन हमने कभी बात नहीं की थी।"

बिना देखे हुए तीन दिनों से वे एक-दूसरे से बात कर रही थीं। उन्होंने बताया कि कैसे उन पर गोलियां चलाई गई और एक-दूसरे की बातों से सुकून पाने की कोशिश कर रही थी।

तीन दिनों के बाद जब उनकी आँखों से पट्टी हटाई गई तो शबरोज़़ा मीर और इफ़रा दोनों ही अपनी आंखों से नहीं देख पा रही थी। इफरा की दोनों आंखों में छर्रे थे जबकि शबरोज़़ मीर की बाईं आंख में एक गोली लगी थी और उनकी दाहिनी आंख में एक खाली गोली लगी थी जिससे उसकी नज़र धुंधली हो गई थी। शबरोज़ा अख्तर के बाईं आंख की 75 प्रतिशत रोशनी चली गई थी।

आंख की रोशनी पूरी या आंशिक रूप से चले जाने के बारे में जब वे सोची तो काफी रोईं। पूरे वार्ड के अन्य मरीज़ों और उनके रिश्तेदारों ने उन्हें समझाने की कोशिश की लेकिन सच्चाई यह था कि इसका कोई इलाज नहीं था और उनकी दुनिया अंधेरी होने जा रही थी।

शबरोज़ा मीर कहती है, "आंखों के प्रत्यारोपण की भी कोई संभावना नहीं है क्योंकि हम सभी को रेटिना में काफी चोटें आई थीं।"

अस्पताल में सात दिन गुज़ारने के बाद तीनों लड़कियों को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई और एक और सर्जरी के लिए सात दिनों के बाद फिर से आने के लिए कहा गया क्योंकि पेलेट के छर्रे अभी भी उनकी आंखों में थे।

14 नवंबर को एक एम्बुलेंस एसएमएचएस जाने के लिए लड़कियों का इंतज़ार कर रहा था (उन दिनों केवल एम्बुलेंस और बख़्तरबंद वाहनों को ही जाने की अनुमति दी गई थी)। वाहन में लड़कियों ने एक-दूसरे के बगल में बैठने का फैसला किया और एनेस्थीसिया इंजेक्शन के पीड़ायुक्त प्रभावों के बारे में बात करनी शुरू कर दी जिसे उन्होंने एक क़हर के तौर पर महसूस किया था।

शबरोज़ा मीर याद करते हुए कहती है, "हम स्वतंत्र रूप से बात करने के लायक नहीं थें क्योंकि हमारे माता-पिता हमारे बगल में बैठे थें इसलिए हमने ऑपरेशन थियेटर में पहुंचने पर अपने दिल की बात करने का फैसला किया।"

कई पुलिस चौकियों को पार करने के बाद वे अस्पताल पहुंचीं और उस कतार में शामिल हो गईं जहां पेलेट गन की अन्य पीड़ित अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थें।

लड़कियां अनाउंसर के बारे में मज़ाक़ उड़ाने में व्यस्त थीं जो वास्तव में जोर से नाम पुकारती थी जिससे सभी मरीज़ों को गुस्सा आ रहा था। जैसे उनकी बारी नज़दीक आ रही थी वे घबरा रहे थे।

मीर और इफरा बताती हैं, आख़िर में अनाउंसर ने नाम "शोबरोज़ा अख्तर" नाम पुकारा और वह अंदर गई। उसकी चीख थिएटर से सुनी जा सकती थी क्योंकि उसकी आंख में एक इंजेक्शन दिया गया था।

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इफरा शकूर

अख्तर के बाद इफरा की बारी थी लेकिन इफरा चिल्लाई नहीं जिससे मीर को थोड़ा राहत मिली और एक और सर्जरी की गई। मीर की दाहिनी आंख ठीक हो रही थी लेकिन उसने अपनी बाईं आंख की रोशनी खो दी थी। इफरा की बाईं आंख में केवल 20प्रतिशत रोशनी थी और उसकी दाहिनी आंख की रोशनी पूरी तरह ख़त्म हो चुकी थी। शबरोज़ा अख्तर की बाईं आंख में 35प्रतिशत रोशनी थी जबकि दाहिनी आंख को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।

सात दिन और वार्ड नंबर 7 बिताने के बाद उन्हें अपने रिश्ते को मजबूत करने का एक और मौका मिला। शबरोज़ा मीर ने कहा, "जो हमारे साथ हुआ उस पर हम चर्चा करते और चौंक जाते कि क्या कोई भविष्य में हमसे शादी करेगा।"

उन्हें छुट्टी दे दी गई लेकिन उनकी तीसरी सर्जरी के लिए अलग-अलग तारीखें दी गईं जिससे वे परेशान थीं।

अपने गांवों में पहुंचने पर उन्होंने संपर्क में रहने के वादे के साथ एक दूसरे को अलविदा कहा। वे हफ्ते में एक बार मिलने लगीं। अपनी अक्षमता के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी लेकिन इस ज़ख़्म से उबरने के लिए उन्होंने एक-दूसरे की मदद करने की कोशिश की।

मीर कहती है, "एक बार मेरी मां का एक पड़ोसी के साथ विवाद हुआ जिसने मेरी आंख को लेकर मेरा मज़ाक उड़ाया।"

बैडमिंटन चैंपियन रही शबरोज़ मीर अब अपने परिवार से अपने नाना के घर भेजने को कह रही है क्योंकि लोग हमेशा उसे याद दिलाते हैं और उसकी अक्षमता को लेकर उसे चिढ़ाते हैं।

मीर कहती है, “मैं किसी भी ताने का जवाब नहीं देती , मैंने सब कुछ अल्लाह पर छोड़ दिया है। वह मुझे ज़िंदा रहने में मदद करेगा।”


 

 

Jammu and Kashmir
shabroza mir .ifarah akhtar
kashmir hospital

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