NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाना संघवाद की अवधारणा के विपरीत 
केंद्र ने कश्मीर में संघवाद के सिद्धांत को नज़रअंदाज़ किया है।
एलोरा पुरी
08 Aug 2019
jammu and kashmir
प्रतीकात्मक तस्वीर Image Courtesy: Kamran Yousuf

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को लोकसभा में जिस तरह का बहुमत है और जिस चालाकी से उन्होंने राज्यसभा को मैनेज किया है उस हिसाब से यह केवल समय की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में सरकार अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के लिए विधेयक पेश करे। फिलहाल ऐसा करना भारतीय जनसंघ के ज़माने से बुनियादी वादा रहा है।

हालांकि जो चौंकाने वाला था वह जल्दबाजी वाला तरीक़ा है जिसमें 5 अगस्त को भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करने वाले प्रावधानों को बेअसर करके धारा 370 को रद्द करने के लिए राष्ट्रपति का आदेश लाया गया। 

ये आदेश एक संशोधन विधेयक के साथ आया था जो इस उपमहाद्वीप में सबसे बड़ी रियासत को खंडित करते हुए दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने के लिए इस पूरी कार्रवाई को आश्चर्यजनक बनाता है।

एक राजनीतिक बहस, चर्चा, सहमति और असहमति के लिए अनुमति देने की संसदीय बारीकियों की अनदेखी के अलावा कई क़ानूनी और संवैधानिक सवाल हैं जो इस फैसले ने उठाया है। इनमें से कुछ सवाल पुराने हैं और कुछ नए हैं कि क्या राष्ट्रपति का आदेश जिससे परिवर्तन होता है संविधान के ऐसे कठोर परिवर्तन का परिणाम हो सकता है? वास्तव में हमारी संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका और विधायिका का संतुलन क्या है? देश के संघीय ढांचे को बदलने में केंद्र सरकार कितनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर सकती है, खासकर उन फैसलों में जो संघ को विषम बनाते हैं।

जैसा कि इन सवालों पर बहस और चर्चा होती है, आइए देखते हैं कि सरकार के इस फैसले में सिद्धांतों का कितना पालन हुआ और वे लोग जो इसके उद्देश्य के लिए काम किया है।

अनुच्छेद 370 ने भारतीय संघ को कमज़ोर कर दिया

सबसे पहले यह तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 370 की मौजूदगी ने भारतीय संघ को कमज़ोर कर दिया। कश्मीर के लिए अलग झंडे और संविधान ने इस विचार को चुनौती दी जो संयुक्त और एक राष्ट्र का निर्माण करता है। सच्चाई यह है कि विषमता भारतीय संघ की बुनियाद है चाहे वह नगालैंड, मेघालय या महाराष्ट्र और गुजरात का मामला हो। 

इसके अलावा, यह बताने के लिए बहुत सारे सबूत हैं कि इस तरह की विषमता- संबंधित क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और भूगोल को ध्यान में रखते हुए- राजनीतिक प्रतिनिधित्व, बेहतर और अधिक सहभागी शासन सुनिश्चित कर सकती है और इसलिए अलगाववादी राजनीति की संभावना में कम असहमति और कमी है। भारत अपने पड़ोस नेपाल और श्रीलंका में इसकी वकालत कर रहा है।

कश्मीर में महिलाओं के अधिकार और बाहरी लोगों पर प्रतिबंध

इन सबके अलावा विवाद यह था कि अनुच्छेद 35ए के माध्यम से जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के समान अधिकारों का इस्तेमाल करने से बाहरी लोगों को प्रतिबंधित करना। अनुच्छेद 370 बाहरी लोगों को इस अधिकार से वंचित करता है। यह तर्क दिया गया कि यह देश के बाकी हिस्सों के नागरिकों को नुकसान पहुंचाने वाला था।

इसकी मौजूदगी ने विशेष रूप से यहां के महिला नागरिकों के अधिकार के ख़िलाफ़ विरोध किया जिन्होंने राज्य के गैर-नागरिकों से विवाह किया। यह सच है कि बाहरी लोग ज़मीन नहीं ख़रीद सकते थे या राज्य में हिस्सेदारी नहीं रख सकते थे लेकिन इस तरह के प्रावधान देश के अन्य हिस्सों में भी मौजूद हैं खासकर पांचवीं और छठी अनुसूचियों के तहत आने वाले क्षेत्रों में।

वास्तव में संसद में बीजेपी के साथ मतदान करने वाले कई दल भारत में नैटविस्ट राजनीति के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं। शिवसेना और असम गण परिषद (एजीपी) जैसे दलों की राय बाहरी लोगों के खिलाफ 'मिट्टी के अपने बेटे' के अधिकारों की रक्षा कर रही है।

कश्मीर में उद्योग एवं व्यावसायिक हित

एक अन्य सुझाव यह था कि अनुच्छेद 370 ने राज्य में व्यवसाय का प्रसार करने नहीं दिया और इसके औद्योगीकरण को रोका। जिसके चलते कहा गया कि यह रोज़गार सृजन और राज्य के आर्थिक विकास में बाधा बन गया। 

यह सच हो सकता है लेकिन मैं यह तर्क दूंगा कि यह राजनीतिक संघर्ष की तरह अनुच्छेद 370 का एक कार्य था। ये राजनीतिक संघर्ष पिछले तीस वर्षों में गहराया है। ‘ईज ऑफ बिजनेस’ के लिए इस क्षेत्र में निवेशकों की रुचि के लिए अपेक्षित शांति की आवश्यकता होती है।

दरअसल, राज्य से भूमि को पट्टे पर देकर भी अनुच्छेद 370 के तहत उद्योगों की स्थापना की जा सकती है जैसे कि हिमाचल प्रदेश में होटल मालिकों को ज़मीन पट्टे पर दी जा सकती है। जम्मू के हिंसा-मुक्त क्षेत्रों में पहले से ही औद्योगिक निवेश हैं।

लद्दाख और जम्मू के ख़िलाफ़ भेदभाव रोकने के लिए संघशासित प्रदेश का दर्जा

जम्मू-कश्मीर के संबंध में अनुच्छेद 370 के ख़िलाफ़ एक तर्क यह दिया गया था कि इसने गैर-कश्मीरी क्षेत्रों में भेदभाव बढ़ाया है। सच्चाई यह है कि इस अनुच्छेद में ऐसा कुछ भी नहीं था जो इस तरह के भेदभाव को जन्म देता हो। यही रीति थी जिसमें राजनीति ने राज्य में भूमिका अदा किया जिसके परिणाम स्वरूप लद्दाख और जम्मू के क्षेत्रों में असमान विकास, राजनीतिक शक्ति के असमान वितरण और भेदभाव का एहसास हुआ।

इस अनुच्छेद के सबसे मुखर विरोधी और इसके उन्मूलन के प्रस्तावक राज्य के हिंदू-बहुल क्षेत्रों के लोग थे। दरअसल, सरकार के इस फैसले का जश्न मनाते उत्साह से भरे पुरुष व महिलाओं को दिखाते हुए मीडिया में प्रकाशित की गई तस्वीरें जम्मू की हैं। लेकिन क्या जम्मू के हिंदू निवासियों को वास्तव में इसके विभाजन और विशेष दर्जा को हटाने से फ़ायदा हुआ है? हालांकि लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से पूरी तरह अलग कर दिया गया है लेकिन इन दोनों क्षेत्रों को अभी भी एक साथ रखा गया है।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि राज्य में शक्ति संतुलन समान हो ऐसे में किन प्रावधानों को रखा जाएगा? राज्य को केंद्रशासित प्रदेश बनाने के साथ जम्मू को अधिक राजनीतिक शक्ति देने की मांग को कैसे संबोधित किया जा रहा है? वास्तव में जो हुआ है वह ठीक इसके विपरीत है।

केंद्र द्वारा प्रत्यक्ष शासन-नौकरशाही तंत्र द्वारा विशेष रुप से चलाया जाता है- न तो पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व देता है और न ही यह सहभागी शासन सुनिश्चित करता है। इस पूरी कवायद ने न सिर्फ कश्मीर बल्कि जम्मू को भी मताधिकार से वंचित और शक्तिहीन कर दिया है।

ये तर्क थे कि गृह मंत्री अमित शाह ने धारा 370 को ख़त्म करने और राज्य का विभाजन करने के पक्ष में संसद में बनाया है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश करते हुए "उद्देश्य तथा कारण" में कहा गया कि लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाना यहां के लोगों की लंबे समय से चली आ रही आकांक्षा को पूरा करता है। और सीमा पार आतंकवाद के कारण आंतरिक सुरक्षा ख़तरे के लिए आवश्यक है कि जम्मू-कश्मीर को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए।

केंद्र शासित प्रदेश के रूप में लद्दाख की अलग राज्य की मान्यता संघर्ष से नहीं मापी जाती जो राज्य के बाक़ी हिस्सों को प्रभावित करता है। यह इस तथ्य के बावजूद कि कारगिल ज़िले में इस मांग को समर्थन नहीं था ज़मीन पर खड़ा उतर सकता है। हमें यह देखना होगा कि यह कैसे पूरा होता है।

हालांकि, सुरक्षा कारणों के कारण जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाने का तर्क समीक्षा योग्य नहीं है। संघर्ष का केंद्र संपूर्ण कश्मीर घाटी वर्तमान में क़िला बना हुआ है क्योंकि सरकार को हिंसक गतिविधि की आशंका है। 

यह दावा कैसे किया जाता है कि सरकार ने सुरक्षा जोखिमों को कम कर दिया है? घाटी में विरोध से कैसे निपटा जाएगा, यह एक सवाल है। हर कोई इस बारे में चिंतित है कि केंद्रशासित प्रदेश होने के नाते इस क्षेत्र में युवाओं के बढ़ते कट्टरता को दूर करने में इससे कैसे मदद मिलेगी, यह दूसरा बड़ा सवाल है।

वास्तव में जम्मू-कश्मीर में संघर्ष जारी है और हिंसा का ख़तरा अभी भी ज्यों का त्यों है। भारत में राज्य-केंद्र संबंधों के लिए दूरगामी परिणामों के साथ इसके संघीय प्रयोग को एक जबरदस्त झटका लगा है।


एलोरा पुरी जम्मू विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की अध्यापक हैं।

federalism
Union Territory Status to J&K
Regional Imbalance
Women of Kashmir
ladakh
Jammu
Article 370

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

कैसे जम्मू-कश्मीर का परिसीमन जम्मू क्षेत्र के लिए फ़ायदे का सौदा है

जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती

जम्मू-कश्मीर: बढ़ रहे हैं जबरन भूमि अधिग्रहण के मामले, नहीं मिल रहा उचित मुआवज़ा

जम्मू-कश्मीर: अधिकारियों ने जामिया मस्जिद में महत्वपूर्ण रमज़ान की नमाज़ को रोक दिया

सीपीआईएम पार्टी कांग्रेस में स्टालिन ने कहा, 'एंटी फ़ेडरल दृष्टिकोण का विरोध करने के लिए दक्षिणी राज्यों का साथ आना ज़रूरी'

केजरीवाल का पाखंड: अनुच्छेद 370 हटाए जाने का समर्थन किया, अब एमसीडी चुनाव पर हायतौबा मचा रहे हैं

जम्मू-कश्मीर : रणनीतिक ज़ोजिला टनल के 2024 तक रक्षा मंत्रालय के इस्तेमाल के लिए तैयार होने की संभावना

जम्मू-कश्मीर में उपभोक्ता क़ानून सिर्फ़ काग़ज़ों में है 


बाकी खबरें

  • nihang
    अजय कुमार
    निहंग कौन हैं? क्या निहंगों को आगे कर षड्यंत्र रचा गया है?
    20 Oct 2021
    निहंग कौन हैं? इनका इतिहास क्या है? हिंसा को ढाल बनाकर क्या भाजपा सरकार ने फिर से कोई चाल तो नहीं चल दी है?
  • flooding
    रवि कौशल
    दिल्ली के गांवों के किसानों को शहरीकरण की कीमत चुकानी पड़ रही है
    20 Oct 2021
    नरेला के गढ़ी बख्तावरपुर गांव में एक उफनते नाले की वजह से खेतों में साल भर में लगभग आठ महीने तक जलभराव की स्थिति बनी रहती है।
  • Uttar Pradesh's soil testing laboratories stalled but publicity completed
    राज कुमार
    उत्तर प्रदेश की मिट्टी जांच प्रयोगशालाएं ठप लेकिन प्रचार पूरा
    20 Oct 2021
    भाजपा उत्तर प्रदेश ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना को लेकर एक वीडियो ट्वीट किया है, आइए जानते हैं इसकी हक़ीक़त।
  • Ajay Mishra Teni cannot be a part of the Council of Ministers of the Government of India: SKM
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    अजय मिश्रा टेनी भारत सरकार के मंत्रिपरिषद का हिस्सा नहीं रह सकते : एसकेएम
    20 Oct 2021
    एसकेएम की मांग है कि अजय मिश्रा को तुरंत बर्ख़ास्त और गिरफ़्तार किया जाए, और ऐसा न करने पर लखीमपुर खीरी हत्याकांड में न्याय के लिए आंदोलन तेज़ किया जाएगा
  • corona
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 14,623 नए मामले, 197 मरीज़ों की मौत
    20 Oct 2021
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 41 लाख 8 हज़ार 996 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License