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भारत
राजनीति
जम्मू-कश्मीर : विधानसभा चुनाव में जितनी देरी होगी, उतनी ही अवाम से दूरी बढ़ेगी!
जम्मू-कश्मीर में पहले से चलता आ रहा राष्ट्रपति शासन का दौर फिर से बढ़ा दिया गया है। यह निर्णय राज्य में 20 जून 2018 से लगे राज्यपाल शासन का ही विस्तार है।
अजय कुमार
13 Jun 2019
Kashmir
फोटो साभार: Amar Ujala

जम्मू-कश्मीर की सियासत एक ऐसे दौर में पहुँच चुकी है, जहाँ पर भारतीय राज्य के संघवाद का मूलभूत सिद्धांत टूटता हुआ दिख रहा है। केंद्र चाहता है कि वह राज्य पर अपना क़ाबू बनाए रखे। क़ाबू करने की इस कोशिश में सबसे अधिक परेशान जम्मू-कश्मीर का अवाम होता रहा है। जम्मू-कश्मीर में पहले से चलता आ रहा राष्ट्रपति शासन का दौर फिर से बढ़ा दिया गया है। यह निर्णय राज्य में 20 जून 2018 से लगे राज्यपाल शासन का ही विस्तार है। सरकारी बयान में बताया गया है कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की रिपोर्ट में बताए गए राज्य के हालात के आधार पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 (4) के तहत जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की मियाद छह महीने बढ़ाने को मंज़ूरी दे दी जो तीन जुलाई से प्रभावी होगी।  

साल 2014 के अंत में हुए जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। पीडीपी के 29, भाजपा के25, नेशनल कॉन्फ़्रेंस के 15, कांग्रेस के 12 और जम्मू-कश्मीर पीपल्स कॉन्फ़्रेंस के 2 विधायक के अलावा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी तथा जम्मू-कश्मीर पीपल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट के एक-एक और तीन निर्दलीय विधायक चुने गए थे। ऐसी स्थिति में एक-दूसरे से वैचारिक तौर पर पूरी तरह से अलग भाजपा और पीडीपी ने साथ मिलकर सरकार बनाई। यह कश्मीर की राजनीति में अभूतपूर्व घटना थी।

जनता के सामने कहा गया कि दोनों पार्टियाँ कश्मीर की भलाई के लिए कॉमन मिनिमम एजेंडा के तहत काम करेंगी। लेकिन पर्दे के पीछे की बात यह थी कि भाजपा अपने रवैये के साथ चल रही थी कि उसे किसी भी क़ीमत पर सत्ता चाहिए और यह सत्ता उसे पीडीपी के सहयोग से आसानी से मिलती दिख रही थी। यह गठबंधन बहुत सारे विवादों के साथ चालीस महीने तक चला। और साल 2019 के चुनाव के ठीक एक साल पहले 19 जून 2018 को ख़त्म कर दिया गया।

इस साझेपन को ख़त्म करने के चाहे जितने भी कारण गिनाए जाते हों लेकिन एक कारण साफ़ था कि यह गठबंधन भाजपा के लिए पूरे देश में कश्मीर के नाम पर ध्रुवीकरण कराने में रोड़ा बनने वाला था। मतलब साफ़ है कि गठबंधन किया भी गया सत्त्ता का हिस्सा बनने के मक़सद से और तोड़ा भी गया सत्ता के मक़सद से। सरकार के अंत के बाद जम्मू-कश्मीर में जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत 19 जून 2018 से राज्यपाल शासन लागू कर दिया गया। यह राज्यपाल शासन 19 दिसम्बर 2018 तक रहा। उसके बाद वहाँ राष्ट्रपति शासन लग गया। इसी राष्ट्रपति शासन को फिर से बढ़ा दिया गया है।

इस बार भी राष्ट्रपति शासन बढ़ाने के कारण के तौर पर राज्य की मौजूदा हालात को ही ज़िम्मेदार बताया जा रहा है। लोकसभा चुनावों के दौरान भी कहा गया था कि सुरक्षा कारणों की वजह से राज्य में विधानसभा चुनाव नहीं करवाए जा रहे हैं। यह बात बहुत पचने वाली नहीं थी क्योंकि कोई भी सामान्य व्यक्ति यह सवाल पूछ सकता है कि जब राज्य में लोकसभा चुनाव करवाए जा सकते हैं तो विधानसभा चुनाव क्यों नहीं? वहीं साल 2019 के चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी टीवी चैनल को इंटरव्यू देते हुए कह रहे थे कि जम्मू-कश्मीर की सारी परेशानियाँ केवल ढाई ज़िलों तक सीमित हैं। और पंचायत चुनावों से लगता है कि जनता  लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को अपनाने के लिए बहुत अधिक उत्सुक है। पंचायत चुनावों में 75 फ़ीसदी पोलिंग हुई।

जबकि असलियत अलग थी कि जम्मू-कश्मीर की मेन स्ट्रीम पार्टी ने चुनावों का बहिष्कार किया। कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ़्रेंस और पीडीपी ने चुनावों में हिस्सा ही नहीं लिया। लोगों ने पंचायत चुनावों का जमकर बहिष्कार किया। बहुत सारे वार्डों में मतदान का दर दहाई का आंकड़ा भी पर नहीं कर पाया। सौ से अधिक वार्डों में एक भी जनप्रतिनिधि ने अपनी दावेदारी नहीं प्रस्तुत की। यही हाल संसदीय चुनवी क्षेत्र में भी रहा।

अनंतनाग, बारामुल्लाह, श्रीनगर जैसे क्षेत्रों में मतदान करने के लिए पहले से भी कम लोग आए। वहीं पुलवामा और शोपियान जैसे इलाक़े में चुनाव को लेकर कोई उत्सुकता नहीं दिखी। दर्जनों बूथों पर एक भी लोग वोट देने नहीं गए। साल 1980 के बाद अब तक सबसे कम लोग मतदान के लिए पहुँचे। यह पूरी तरह से कश्मीरी अवाम के भारत से अलग होते जाने इशारा है। यह बहुत ही साधारण बात है, जिसे कोई भी समझ सकता है कि कश्मीरी जनता ख़ुद को अलग-थलग मानने लगी है। प्रधानमंत्री की बातें ज़मीनी सच्चाई को झुठलाने में लगी हुई हैं जबकि असल सच्चाई यह है कि कश्मीर जैसे अशांत क्षेत्र की बुरी स्थिति राज्य सरकार की ग़ैर-मौजूदगी में बद से बदतर होती जा रही है। 

राज्य सरकार न होने की वजह से राज्य में पहले से मौजूद डिफ़ेन्स प्रेशर अधिक बढ़ जाता है। केंद्र सरकार फ़ौज के ज़रिये ही जम्मू-कश्मीर को कंट्रोल करने की कोशिश करती है। इससे जहाँ राज्य सरकार वहाँ के लोगों के असंतोष को अपनी जनकल्याणकारी नीतियों की वजह से कम कर सकने में भूमिका निभाती, वह भूमिका पूरी तरह ग़ायब रहती है। सैनिकों से कंट्रोल होता समाज सैनिकों को तैनात करने वाले सिस्टम के प्रति यानी भारत के केंद्रीय शासन के प्रति बहुत अधिक तीखा हो जाता है। यही हो रहा है। साथ में केंद्र में मौजूद सत्ता की यह भी कोशिश है कि वह राज्य के पोलिटिकल लीडरशिप को इस लम्बे दौर में  शांत कर दे। बहुत सारे सामाजिक संगठन चुपचाप शांत हो जाएँ ताकि आने वाले चुनावों में कमज़ोर चुनौती का सामना करना पड़े। इस दौरान हो सकता है कि परिसीमन जैसे कामों को भी अंजाम देने की कोशिश की जाए। और सबसे बड़ी बात केंद्र से संचालित होता जम्मू-कश्मीर जैसा अशांत राज्य, राज्य सरकार के अभाव में हर क़दम पर केंद्र के लिए अपना भरोसा खोता जाता है। 

जम्हूरियत, कश्मीरियत और इंसानियत के नारे पर काम करने वाली केंद्र सरकार ने पिछले कुछ सालों में जम्मू-कश्मीर के साथ कोई व्यवहार नहीं किया है, जिससे यह कहा जाए कि मोदी सरकार इस नारे का अर्थ भी समझती है? जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए होती देरी कश्मीर को भारत से और अलग कर रही है। ऐसी देरी का ज़मीनी प्रभाव मौजूदा स्थिति को कंट्रोल करने की बजाए और अधिक ख़रतनाक बनाने में काम करता है। कश्मीर की मिलटेन्सी में कमी राष्ट्रपति शासन से नहीं राज्य सरकार के शासन से आएगी।

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