NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सुप्रीम कोर्ट : जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधों की समीक्षा का आदेश, इंटरनेट का इस्तेमाल भी मौलिक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बिना किसी निर्धारित अवधि के या अनिश्चितकाल के लिए इंटरनेट बंद करना टेलिकॉम नियमों का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 19 (1) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा बताया।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
10 Jan 2020
jammu and kashmir
Image courtesy: Punjabi Akhbar

जम्मू-कश्मीर में लगे प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फ़ैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को सभी प्रतिबंधों की समीक्षा करने का निर्देश दिया है। इसके लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है।

न्यायमूर्ति एन वी रमण की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी आवश्यक सेवाएं प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं में इंटरनेट सेवाओं को बहाल करने के लिए कहा। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत इंटरनेट के इस्तेमाल को मौलिक अधिकार का हिस्सा बताते हुए शीर्ष अदालत ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से इंटरनेट के निलंबन के सभी आदेशों की समीक्षा करने के लिए कहा।

कश्मीर में लगे प्रतिबंधों को लेकर न्यायालय ने कहा कि किसी विचार को दबाने के लिए धारा 144 सीआरपीसी (निषेधाज्ञा) का इस्तेमाल औजार के तौर पर नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि मजिस्ट्रेट को निषेधाज्ञा जारी करते समय इसपर विचार करना चाहिए और आनुपातिकता के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।

कोर्ट ने कहा, ''जम्मू-कश्मीर प्रशासन को सीआरपीसी की धारा 144 के तहत जारी प्रतिबंध के सभी आदेश प्रकाशित करने हैं ताकि प्रभावित लोग इन्हें चुनौती दे सकें।''

जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की तीन जजों की बेंच ने कश्मीर में प्रतिबंधोें की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर 27 नवंबर को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था।

आपको मालूम है कि पांच अगस्त, 2019 को को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत मिलने वाले विशेष दर्जे को ख़त्म कर दो अलग-अलग केंद्र शासित राज्यों लद्दाख और जम्मू-कश्मीर में बांट दिया था। और साथ ही राज्य में ख़ासकर कश्मीर घाटी में कई तरह की पाबंदियां लगा दी गईं थीं।

इन्हीं प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ कश्मीर की वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन, कांग्रेस नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद और कुछ अन्य लोगों ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में पेश होने वालीं वकील वृंदा ग्रोवर ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कहा, ''जब किसी राज्य में सुरक्षा और आज़ादी का संतुलन बनाने की ज़रूरत होती है तब आप संविधान के कुछ सिद्धांतों के अनुसार स्वतंत्रता पर रोक लगा सकते हैं। कश्मीर में भी जब आप सुरक्षा और आज़ादी का संतुलन बनाएंगे तो इन बातों का ध्यान रखना होगा। मगर राज्य ने इंटरनेट और संचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगाने और धारा 144 लगाने से जुड़े आदेश न तो प्रकाशित किए और न ही कोर्ट के सामने रखे।"

वृंदा ग्रोवर ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने धारा 144 के तहत पाबंदियां लगाने के आदेशों को प्रकाशित न करने को ग़लत बताया है और इन्हें प्रकाशित करने का राज्य को निर्देश दिया गया है। आगे भी सारे आदेश हमेशा प्रकाशित किए जाएंगे। लोग उस आदेश को चुनौती दे सकेंगे। उस आदेश में ये बात होनी चाहिए कि किस कारण से स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा रही है।''

उन्होंने बताया, ''कोर्ट ने ये भी कहा कि आज की तारीख़ में इंटरनेट अनुच्छेद 19 (1) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने आज बेहद महत्वपूर्ण बात कही है। इसलिए अगर सरकार कभी भी इंटरनेट पर रोक लगाएगी तो उसे सीमाओं को पूरा ख़्याल रखना होगा।''

इसे भी पढ़े :जम्मू कश्मीर से सभी प्रकार के प्रतिबंध हटाए जाएं: सीपीएम

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

Jammu and Kashmir
Supreme Court
internet ban
Fundamental Rights
Article 19
Article 370
BJP
modi sarkar

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • BJP
    अनिल जैन
    खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं
    01 May 2022
    राजस्थान में वसुंधरा खेमा उनके चेहरे पर अगला चुनाव लड़ने का दबाव बना रहा है, तो प्रदेश अध्यक्ष सतीश पुनिया से लेकर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत इसके खिलाफ है। ऐसी ही खींचतान महाराष्ट्र में भी…
  • ipta
    रवि शंकर दुबे
    समाज में सौहार्द की नई अलख जगा रही है इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा
    01 May 2022
    देश में फैली नफ़रत और धार्मिक उन्माद के ख़िलाफ़ भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) मोहब्बत बांटने निकला है। देशभर के गावों और शहरों में घूम कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन किए जा रहे हैं।
  • प्रेम कुमार
    प्रधानमंत्री जी! पहले 4 करोड़ अंडरट्रायल कैदियों को न्याय जरूरी है! 
    01 May 2022
    4 करोड़ मामले ट्रायल कोर्ट में लंबित हैं तो न्याय व्यवस्था की पोल खुल जाती है। हाईकोर्ट में 40 लाख दीवानी मामले और 16 लाख आपराधिक मामले जुड़कर 56 लाख हो जाते हैं जो लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट की…
  • आज का कार्टून
    दिन-तारीख़ कई, लेकिन सबसे ख़ास एक मई
    01 May 2022
    कार्टूनिस्ट इरफ़ान की नज़र में एक मई का मतलब।
  • राज वाल्मीकि
    ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना
    01 May 2022
    “मालिक हम से दस से बारह घंटे काम लेता है। मशीन पर खड़े होकर काम करना पड़ता है। मेरे घुटनों में दर्द रहने लगा है। आठ घंटे की मजदूरी के आठ-नौ हजार रुपये तनखा देता है। चार घंटे ओवर टाइम करनी पड़ती है तब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License