NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
जम्मू-कश्मीर में उपभोक्ता क़ानून सिर्फ़ काग़ज़ों में है 
सैंकड़ों उपभोक्ताओं की शिकायतों का अभी तक कोई हल नहीं हुआ है। अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से एक भी नया मामला दर्ज नहीं किया गया है। क़ानूनों को बड़ी तेज़ी से निरस्त और लागू किया जा रहा है, लेकिन इसके बाद मामला कुछ भी आगे नहीं बढ़ रहा है।
राजा मुज़फ़्फ़र भट
28 Mar 2022
consumer
चित्र साभार: द डिस्पैच 

जम्मू-कश्मीर सरकार ने एक साल से भी अधिक समय पहले से प्रस्तावित राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एससीडीआरसी) में अध्यक्ष के रिक्त पद के लिए विज्ञापन जारी किया था। खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग द्वारा जारी विज्ञापन में इस पद के लिए अवकाशप्राप्त या सेवारत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से आवेदन आमंत्रित किया गया था। आज तक- जब 18 मार्च को आवेदन खिड़की बंद हो चुकी है – इसके बावजूद राज्य आयोग निष्क्रिय है।

जम्मू-कश्मीर में एक भी जिला आयोग काम नहीं कर रहा है, और हजारों की संख्या में लंबित मामले निपटान के लिए लंबित पड़े हैं। गौरतलब है कि केंद्र द्वारा अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद से पिछले 2.5 सालों में जम्मू-कश्मीर में एक भी नया मामला दर्ज नहीं किया गया है।

जम्मू-कश्मीर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1987 का निरसन 

अधिग्रहण के फौरन बाद ही, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत लगभग 800 केंद्रीय क़ानूनों को जम्मू-कश्मीर तक विस्तारित कर दिया गया था। 31 अक्टूबर 2019 से प्रभावी, केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 को जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के नव गठित केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित कर दिया गया था।

पूर्व में जम्मू-कश्मीर का अपना खुद का उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम था, जो 1987 से प्रभावी हुआ, और इसके तहत राज्य आयोग और जिला फोरम अपना काम कर रहे थे। अक्टूबर 2019 में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग के द्वारा जारी आदेश में सभी मौजूदा उपभोक्ता मंचों को बंद करने का निर्देश दिया। इसके परिणामस्वरूप, 31 अक्टूबर, 2019 से 1987 से 24 वर्षों से काम कर रहे राज्य क़ानून बेमानी हो गये, और केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 ने इसका स्थान ले लिया।

प्रसंगवश, 9 अगस्त 2019 को, केंद्र ने 1986 के केंद्रीय अधिनियम को भी निरस्त कर दिया और इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 से बदल दिया। नए अधिनियम के नियमों को केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के द्वारा तैयार किया गया था, और 15 जुलाई 2020 को जारी किया गया। इस नए केंद्रीय क़ानून को हालाँकि जम्मू-कश्मीर तक के लिए विस्तारित कर दिया गया था, लेकिन यह आज भी चालू नहीं है। इसका नतीजा यह है कि समूचे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में उपभोक्ताओं को अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। 

जब से राज्य एवं जिला ग्राहक फोरमों को तत्कालीन राज्य में बंद किया गया है, तबसे उन उपभोक्ताओं के बीच में अफरातफरी और भ्रम की स्थिति बनी हुई है, जिनके मामले इन निकायों के समक्ष लंबित पड़े हैं। अधिग्रहण के बाद से, उनके मामले खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामलों के विभागों में धूल फांक रहे हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत नई शिकायतों से पीड़ित उपभोक्ताओं को भी उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। उनके पास ऐसी कोई संस्था नहीं बची जिसके पास वे अपनी शिकायतें लेकर जा सकें।

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए, श्रीनगर के वरिष्ठ पत्रकार और कश्मीर आब्जर्वर अख़बार के संपादक, सज्जाद हैदर ने कहा, “2014 की बाढ़ के दौरान मेरा श्रीनगर वाला अखबार का कार्यालय क्षतिग्रस्त हो गया था। बाढ़ के पानी ने कार्यालय के भीतर रखे कंप्यूटरों, लैपटॉप, प्रिंटर्स एवं अन्य उपकरणों को नष्ट कर दिया था लेकिन इसके लिए मुझे पर्याप्त बीमा का भुगतान नहीं किया गया। 2016 में, मैंने बीमा कंपनी के खिलाफ राज्य उपभोक्ता आयोग का रुख किया और उम्मीद थी कि 2019 के अंत तक मेरे पक्ष में फैसला आ जायेगा। लेकिन इसी बीच आयोग को ही बंद कर दिया गया। नए उपभोक्ता क़ानून [केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019] को जम्मू-कश्मीर तक के लिए विस्तारित किये जाने के बावजूद भी नये राज्य और जिला आयोगों को गठित नहीं किया गया है। क्या सरकार हमें इस अन्याय और भारी विलंब के लिए मुआवजा देगी?” उन्होंने बताया कि पूर्ववर्ती राज्य उपभोक्ता आयोग के समक्ष 1,500 से अधिक मामले लंबित पड़े हैं और जिला मंचों के सामने तो हजारों मामले लंबित हैं।

मूलभूत सवाल यह है कि पूर्ववर्ती राज्य से निरस्त क़ानून-उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1987 भी 1986 वाले केंद्रीय अधिनियम के समान था। जम्मू-कश्मीर ने भी इसके तहत संस्थानों की स्थापना की थी। 5 अगस्त 2019 तक, राज्य के भीतर एक मजबूत उपभोक्ता अधिकार आंदोलन था, लेकिन निरसन ने हालात को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की प्रमुख विशेषताएं 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 स्पष्ट रूप से उपभोक्ता अधिकारों के दायरे को व्यापक बनाता है और आज के डिजिटल युग में ई-कॉमर्स, डायरेक्ट-सेलिंग, टेली-शॉपिंग, मल्टी-लेवल मार्केटिंग एवं वाणिज्य के अन्य स्वरुपों को कवर करता है। तकनीकी तौर पर यह देश में 20 जुलाई 2020 को अमल में आ गया था। इसका उद्देश्य कड़े जुर्मानों के जरिये निपटान और प्रशासनिक प्रकिया में सुधार करना था। जिला फोरम के आर्थिक क्षेत्राधिकार को बढाकर 1 करोड़ रूपये और राज्य स्तरीय फोरम के लिए इसे 10 करोड़ रूपये तक कर दिया था। अनुचित अनुबंध के दावों के लिए, जहाँ विचाराधीन मामले 10 करोड़ रूपये से अधिक नहीं है, वहीँ 10 करोड़ से उपर के दावों के लिए आर्थिक क्षेत्राधिकार राष्ट्रीय आयोग के पास है।   

महत्वपूर्ण रूप से, भ्रामक विज्ञापनों ने नए क़ानून के तहत कार्यवाई योग्य बनाया गया है, जिसमें विभिन्न प्रकार के भौतिक एवं डिजिटल स्वरूपों वाले विज्ञापनों, नोटिसों, सर्कुलर, लेबल, रैपर, बिलों या अन्य दस्तावेज शामिल हैं। यह जिला और राज्य आयोगों के साथ जुड़े उपभोक्ता मध्यस्थता सेल्स से जुड़ने का भी प्रावधान करता है।

जिला आयोगों को एक साथ जोड़ना?

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 28 में कहा गया है कि राज्य सरकार के द्वारा प्रत्येक जिले में एक जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (डीसीडीआरसी) को स्थापित किया जायेगा। इसमें यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार चाहे तो एक जिले एक से अधिक जिला आयोग स्थापित कर सकती है। प्रत्येक जिला आयोग के पास एक अध्यक्ष और दो सदस्य से कम नहीं होने चाहिए, और केंद्र सरकार के साथ विचार विमर्श के आधार पर और सदस्यों को तय किया जा सकता है।

22 फरवरी, 2022 को जम्मू-कश्मीर सरकार ने एक आदेश जारी कर बीस की बजाय दस जिला आयोगों के गठन का आदेश जारी किया। इसने जम्मू-कश्मीर भर में दो से तीन जिलों को एक में जोड़ दिया, जो 2019 अधिनियम का उल्लंघन है। अनंतनाग जिला आयोग के पास शोपियां, कुलगाम और पुलवामा का भी अधिकार क्षेत्र होगा। बारामुला आयोग को बांदीपोरा को भी देखना होगा। डोडा का अधिकार क्षेत्र किश्तवाड़, सांबा पर कठुआ, पुंछ पर राजौरी, गांदरबल पर श्रीनगर और रियासी और रामबन पर उधमपुर का अधिकार क्षेत्र होगा। 

खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग के आदेश ने 2019 अधिनियम की धारा 32 को गलत तरीके से उद्धृत किया है, जो कतिपय परिस्थितियों में जिला अधिकारीयों को अन्य जिलों का कार्यभार लेने की अनुमति देता है। इस धारा ने कभी भी सरकार को जिलों को आपस में जोड़ने की अनुमति नहीं दी है। सटीक प्रावधान इस प्रकार से है, “यदि...जिला आयोग के कार्यालय में अध्यक्ष या सदस्य के तौर पर रिक्तियां हैं, तो राज्य सरकार चाहे तो अधिसूचना के द्वारा, निर्देश दे सकती है – (ए) उस अधिसूचना में निर्दिष्ट किसी भी अन्य जिला आयोग में उस जिले के मामले को अपने अधिकार क्षेत्र में निर्देशित कर सकता है; या (बी) उस अधिसूचना में निर्दिष्ट किसी अन्य जिला आयोग के अध्यक्ष या सदस्य अको शक्तियों का प्रयोग करने और उस जिला आयोग के अध्यक्ष या सदस्य के दायित्वों का निर्वहन करने के लिए भी निर्दिष्ट किया जा सकता है।” 

जब नए क़ानून के तहत अभी तक एक भी जिला आयोग काम नहीं कर रहा है, और सभी बीस जिले के आयोगों के सभी पद अभी भी रिक्त हैं, तो ऐसे में सरकार धारा 32 को कैसे लागू कर सकती है और सिर्फ़ दस पदों को भर सकती है और अन्य दस जिलों को पडोसी जिलों के साथ कैसे क्लब कर सकती है?

जिला अधिकारियों को जोड़ने की जरूरत तब पड़ती है यदि जिला आयोग के अध्यक्ष या सदस्य की मौत हो जाती है, या इस्तीफ़ा दे दिया जाता है या सरकार द्वारा पद से हटा दिया जाता है। क़ानून कभी भी यह नहीं कहता कि कोई जिला आयोग चालू न होने पर भी सरकार जिलों को आपस में क्लब कर सकती है।

जम्मू-कश्मीर न्यायपालिका में क़ानूनी विशेषज्ञ और पूर्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी रह चुके सैय्यद नसरुल्लाह इस बारे में कहते हैं, “क़ानून कहता है कि यदि किसी जिले में आयोग के अध्यक्ष पद या सदस्य की रिक्तियां हैं तो सरकार तात्कालिक राहत के तौर पर किसी अन्य जिले के आयोग के अध्यक्ष या सदस्य को संचालन का अधिकार प्रदान कर सकती है। सरकार के द्वारा दस आयोग बनाये गए हैं, लेकिन इनमें से एक भी कार्यशील नहीं है और कोई भी पदाधिकारी कार्यालय में पदासीन नहीं है। एक जिले के एक अध्यक्ष या एक सदस्य का प्रभार दूसरे जिले को सौंपे जाने का प्रश्न ही नहीं खड़ा होता है। सरकार को जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में जिलों की संख्या के बराबर आयोगों को नियुक्त करना होगा।

यहाँ पर यह भी इंगित करने की जरूरत है कि सामान्य प्रशासन विभाग ने एससीडीआरसी एवं अन्य आयोगों को समाप्त करने के लिए एक मानक आदेश जारी किया था, जो निरस्तीकरण से पहले की तारीख थी। इसलिए, पहले से मौजूद राज्य मनाविधिकार आयोग, विद्युत् नियामक आयोग, महिला एवं बाल अधिकार संरक्षण आयोग, विकलांग व्यक्तियों के लिए आयोग एवं राज्य जवाबदेही आयोग को भी बंद करने के आदेश जारी किये थे। इनमें से प्रत्येक में एक ऐसा मामला है जिस पर अलग से विचार करने की आवश्यकता है। 

लेखक श्रीनगर स्थित कॉलमिस्ट, कार्यकर्ता और स्वतंत्र शोधार्थी एवं कुशाग्र फेलो हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

 In Jammu and Kashmir, Consumer Laws Exist Only on Paper

Consumer grievances
consumer protection
Jammu and Kashmir
Article 370
Commissions in Jammu and Kashmir
Pending Cases
justice delivery

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

यासीन मलिक को उम्रक़ैद : कश्मीरियों का अलगाव और बढ़ेगा

आतंकवाद के वित्तपोषण मामले में कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मलिक को उम्रक़ैद

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

कैसे जम्मू-कश्मीर का परिसीमन जम्मू क्षेत्र के लिए फ़ायदे का सौदा है


बाकी खबरें

  • Vinayak Damodar Savarkar
    डॉ. राजू पाण्डेय
    बहस: क्या स्वाधीनता संग्राम को गति देने के लिए सावरकर जेल से बाहर आना चाहते थे?
    19 Oct 2021
    बार-बार यह संकेत मिलता है कि क्षमादान हेतु लिखी गई याचिकाओं में जो कुछ सावरकर ने लिखा था वह शायद किसी रणनीति का हिस्सा नहीं था अपितु इन माफ़ीनामों में लिखी बातों पर उन्होंने लगभग अक्षरशः अमल भी किया।
  • Pulses
    शंभूनाथ शुक्ल
    ‘अच्छे दिन’ की तलाश में, थाली से लापता हुई ‘दाल’
    19 Oct 2021
    बारिश के चलते अचानक सब्ज़ियों के दाम बढ़ गए हैं। हर वर्ष जाड़ा शुरू होते ही सब्ज़ियों के दाम गिरने लगते थे किंतु इस वर्ष प्याज़ और टमाटर अस्सी रुपए पार कर गए हैं। खाने के तेल और दालें पहले से ही…
  • migrant worker
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की हत्या के ख़िलाफ़ 20 अक्टूबर को बिहार में विरोध प्रदर्शन
    19 Oct 2021
    "अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद घाटी की स्थिति और खराब हुई है। इससे अविश्वास का माहौल कायम हुआ है, इसलिए इन हत्याओं की जिम्मेवारी सीधे केंद्र सरकार की बनती है।”
  • Non local laborers waiting for train inside railwaysation Nowgam
    अनीस ज़रगर
    कश्मीर में हुई हत्याओं की वजह से दहशत का माहौल, प्रवासी श्रमिक कर रहे हैं पलायन
    19 Oct 2021
    30 से अधिक हत्याओं की रिपोर्ट के चलते अक्टूबर का महीना सबसे ख़राब गुज़रा है, जिसमें 12 नागरिकों की हत्या शामिल हैं, जिनमें से कम से कम 11 को आतंकवादियों ने क़रीबी टारगेट के तौर पर मारा है। 
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 13,058 नए मामले, 164 मरीज़ों की मौत
    19 Oct 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.54 फ़ीसदी यानी 1 लाख 83 हज़ार 118 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License