NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
“जो नाटक से नाराज़ है, उसने कभी नाटक देखा ही नहीं है!”
हमने अभिषेक से उनके नाटकों और अन्य विषयों पर बातचीत की है। इस बातचीत को हम दो हिस्सों में पेश करेंगे। आज हम आपके बीच इस बातचीत का पहला हिस्सा साझा कर रहे हैं। इस हिस्से में अभिषेक अपने नाटकों पर हुए हमलों और  कश्मीर की मौजूदा स्थिति पर बात कर रहे हैं।
आईसीएफ़
29 Aug 2019
abhishek and sattyam
फोटो सौजन्य राइट अ प्ले

अभिषेक मजूमदार और सत्यम् तिवारी के बीच बातचीत

अभिषेक मजूमदार मौजूदा भारतीय थिएटर में एक जाना-माना नाम है। निर्देशक और लेखक, अभिषेक भारत के अलावा विदेश में भी थिएटर पढ़ाते हैं। जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं, उसमें इंसान की अभिव्यक्ति की आज़ादी ख़तरे में है। ऐसे में अभिषेक पर और उनके नाटकों पर लगातार हमले भी हुए हैं। हमने अभिषेक से उनके नाटकों और अन्य विषयों पर बातचीत की है। इस बातचीत को हम दो हिस्सों में पेश करेंगे। आज हम आपके बीच इस बातचीत का पहला हिस्सा साझा कर रहे हैं।

इस हिस्से में अभिषेक अपने नाटकों पर हुए हमलों और  कश्मीर की मौजूदा स्थिति पर बात कर रहे हैं।

सत्यम्: मैंने पढ़ा था कि आपका नाटक Pah-la बहुत मुश्किलों के बाद जनता के सामने लाया गया था और ईदगाह के जिन्नात (नाटक), को लेकर भी आपको मुश्किलों का सामना करना पड़ा। थिएटर के इस सफ़र में आपके नाटक, और आप पर निजी हमले हुए हैं। इनकी शुरुआत कब हुई थी?  यह हमले या वैचारिक मतभेद, भारत तक ही सीमित हैं या विदेश में भी ऐसी परेशानियां होती हैं? 

अभिषेक मजूमदार: कई साल पहले जब मैंने द्वीपा  लिखा था, तभी ये सब शुरू हो गया था। द्वीपा  की कहानी है कि एक आदमी और एक औरत एक द्वीप पर फँस गए हैं और रोज़ सुबह उनकी याद्दाश्त चली जाती है। तो वहाँ सर्वाइव करने के लिए वो हर रोज़ एक नया रिश्ता बनाते हैं। नाटक Structuralism पर है जहाँ हम लोग सारे रिश्ते बना रहे हैं, कि ऐसे कर लेंगे तो सब सही हो जाएगा। क्योंकि हम उस ज़मीन को कंट्रोल करना चाहते हैं और एक इंसान के तौर पर उसको कंट्रोल करने के लिए हमें कई चीज़ों के बीच सर्वाइव करना है।

नाटक में औरत उस आदमी को डराने के लिए कहती है कि अगर तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो भगवान नाराज़ हो जाएगा। तो आदमी पूछता है कि यह भगवान क्या चीज़ है? औरत इसको ऐसे समझाती है कि जब तक तुम ज़िंदा हो तभी तक समय चलेगा, तुम्हारे मर जाने के बाद तुम्हारा समय रुक जाएगा और अभी भले ही मैं तुम्हें कोई सज़ा न दूँ लेकिन तुम अगर मेरी बात नहीं मानोगे तो भगवान तुम्हें सज़ा देगा, तो तुम्हें उससे डरना चाहिए।

इस नाटक के दौरान 2014 में किसी ने फ़ोन करके मुझे धमकी दी थी कि आप ऐसा नहीं कह सकते हैं और आपको यह हटाना पड़ेगा। उसपर मेरा यही जवाब था कि नाटक हटाने का तो कोई सवाल ही नहीं पैदा होता, आप मुझे यह बता दीजिए कि आपको इससे दिक़्क़त क्या है? मेरे हिसाब से उनकी परेशानी यह थी कि वे कश्मीर वाले नाटकों से नाराज़ थे और उस समय कश्मीर वाले नाटक चल नहीं रहे थे। तो उन्हें इस बात की नाराज़गी थी कि जिस नाटक पर वे नाराज़ होना चाहते हैं वह नहीं चल रहा है। यह बहुत हास्यास्पद है।

आप जितने भी लोग देखेंगे जो नाटकों से नाराज़ हैं, उन्होंने नाटक देखा ही नहीं है। वो नाटक देखने वाले नहीं बल्कि नाराज़ होने वाले लोग हैं। उनको भाजपा ने, आरएसएस ने, बजरंग दल ने, इकट्ठा किया है और उनका काम ही यही है कि वो नाराज़ रहें।

पहले ये होता था कि एक जगह पर जवान लड़के मिलके फ़ुटबॉल खेलते थे, कैरम खेलते थे, या मोहल्ले में अड्डा लगाते थे लेकिन अब जवान लड़के हनुमान वाले स्टिकर लगाने जैसे काम करते हैं। मेरा मानना है कि वो लोग अपना काम कर रहे हैं और मैं अपना काम कर रहा हूँ।

जो लोग विरोध करते हैं और हमले करते हैं, मेरे हिसाब से उनके विचार ऐसे नहीं हैं जिन्हें बहुत गंभीरता से लिया जाए क्योंकि विरोध  और आवाज़ (शोर) दोनों में फ़र्क़ होता है। विपक्ष के पास गंभीर मुद्दे होते हैं। हमारे देश की समस्या यह है कि यहाँ का राइट विंग भी सीरियस राइट विंग नहीं है। अगर यह राइट विंग थोड़ा सही होता तो इसपर बात की जा सकती थी।

लेकिन यहाँ राइट विंग की कोई विचारधारा नहीं है। कांग्रेस की दिक्कत यह नहीं है कि काँग्रेस के पास विचारधारा  नहीं है, उनकी दिक्कत  है कि फ़िलहाल कांग्रेस के पास गुंडे नहीं हैं। बीजेपी के पास अभी गुंडे हैं। ये गुंडों की दिक्कत है, विचारधारा की दिक्कत नहीं है। अगर राइट विंग विचारधारा के लिए बहस करे तो बहुत कुछ सोचना पड़ेगा। ऐसे नहीं हो सकता न कि आपने किसी को भी जा के पीट दिया। कराची बेकरी में आप जा के बोल रहे हैं कि इसका नाम से कराची हटा दो, मेनलैंड चाइना के सामने खड़े हो के बोल रहे हैं कि इसमें चाइना लगा है तो यह रेस्टोरेंट बंद कर दो। यह किसी तरह का राइट विंग थोड़ी हुआ, यह तो गुंडागर्दी हुई, बदमाशी हुई।

सत्यम्: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विरोध के बारे में कुछ बताएं।

अभिषेक मजूमदार: जहाँ तक इंटरनेशनल स्तर की बात है, तो मेरी मुठभेड़ Pah-la को लेकर हुई है।

मुझे बहुत यंग लोग मिलते हैं और पूछते हैं कि सर मैं लिखना चाहता हूँ लेकिन लिखकर क्या होगा? हमारे लिखने, थिएटर करने, गाने से दुनिया में क्या फ़र्क़ पड़ेगा? तो मैं उन्हें कहता हूँ कि यह सवाल उन लोगों से पूछो जो किसी भी तरह के लिटरेचर को बंद कर रहे हैं। उनको पता है कि लिटरेचर से क्या हो सकता है। मेरा नाटक ऐसे हॉल में नहीं चलता है जिसमें हज़ार लोग बैठे हों। मेरा नाटक एक समय पर ज़्यादा से ज़्यादा 300-400 लोग ही देखते हैं। चीन की सरकार इस नाटक का विरोध कर रही है और चीन की सरकार तो ऐसी सरकार है जिससे बड़े- बड़े देश डरते हैं। उनके बारे में हॉलीवुड में कितनी ऐसी फ़िल्में बनती हैं जो उनकी निंदा करती हैं। उन्हें उस बात से दिक्कत नहीं है। उन्हें साहित्य से दिक्कत है क्योंकि उनको साहित्य के बारे में कुछ ऐसा पता है जो शायद हमें भी नहीं पता है।

मुझे तो कई बार यह लगता है कि मैं तो अपने शौक़ से ही लिख रहा हूँ क्योंकि मेरे पास लिखने के अलावा और कुछ नहीं है। तो वो चीज़ों को बंद करने के चक्कर में पड़े हैं। उन्होंने Pah-la नाटक ख़रीदने की बात कर दी थी और जब मैंने नहीं बेचा तो हाथापाई पर उतर आए। चीन के एजेंट्स ने लंदन में मेरा पीछा किया। लंदन के एक थिएटर में जिसमें एक बड़ा और एक छोटा हॉल है। उसके छोटे हॉल में 80 सीटें हैं और उनमें एक महीना नाटक चला जिसे 2,400 लोगों ने देखा। अगर पूरी दुनिया के 2400 लोगों ने अभिषेक मजूमदार Pah-la नाटक देख ही लिया तो चीन में क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा? उनको ज़रूर किसी बात का डर है। दुनिया भर में साहित्य के ख़िलाफ़ इस तरह की विचारधारा रखने का एक ही उद्देश्य है कि जो लोग पढ़-लिख नहीं पाते हैं, जो सवाल नहीं पूछ पाते हैं, उन सबको पीढ़ी दर पीढ़ी अंधेरे में रखकर अपनी तरफ़ खींचने का एक तरीक़ा है। जिस चीज़ को साहित्य से ख़त्म कर सकते हैं उसको साहित्य से नफ़रत होगी ही, और ऐसा ही हो रहा है।

सत्यम्: आपके नाटक 'ईदगाह के जिन्नात' का विरोध पूरे भारत में अथॉरिटी और आम जनता ने किया, साथ ही मंचन के दौरान हमले भी हुए। आपके नाटक का विरोध किन कारणों से हुआ? आप कश्मीर से 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर की स्थिति को कैसे देखते हैं?

अभिषेक मजूमदार: मैंने कश्मीर सीरीज़ किया था, यह नाटक उसी का दूसरा हिस्सा है। पहला पार्ट रिज़वान है जो आग़ा शाहिद अली की कविताओं से जुड़ा है। और ईदगाह के जिन्नात उन बच्चों की ज़िंदगी पर है जो साल 2007-08 में पत्थरबाज़ी कर रहे थे। यह नाटक कश्मीर के मेन्टल हेल्थ पर है और यंग सीआरपीएफ़ के जवानों के ऊपर भी है। इसका तीसरा हिस्सा 'ग़ाशा' कश्मीरी पंडित और मुसलमानों के रिश्ते के ऊपर है जिसे ईरावती ने लिखा था और मैंने डायरेक्ट किया था।

कश्मीर में मैंने बहुत समय बिताया है, मेरे दोस्त हैं वहाँ, मैं वहाँ आता जाता रहता हूँ, मेरा घर ही है कश्मीर। कश्मीर की सबसे बड़ी प्रॉब्लम उसकी जियोग्राफ़ी है। कश्मीर बहुत सेंसिटिव जगह पर है। दुनिया का कोई भी देश आप नक्शे पर देख लीजिए जिसके दोनों या तीनों तरफ़ ऐसे देश हैं जो कभी दुश्मन रह चुके हैं, वहाँ दिक़्क़त होती है।

कश्मीर को जितना एक्सक्लुसिव हमने बना रखा है उतना कुछ नहीं है। इन सबका इस्लाम के साथ भी कोई कनेक्शन नहीं है क्योंकि दुनिया में लाखों तरह के इस्लाम हैं, हर आदमी अलग-अलग तरीक़े से इस्लाम मानता है और इस्लाम के कई स्कूल भी हैं और कश्मीर का इस्लाम बहुत अलग है। जो लोग इसे इस्लाम से जोड़कर बात कर रहे हैं वे दरअसल ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि लोगों को इस्लाम की समझ बहुत कम है।

कश्मीर में यह सब कॉम्प्लिकेशन इसलिए भी हैं क्योंकि अलक़ायदा जैसे आतंकी संगठनों के बाद दुनिया में इस्लाम की जनरल थ्योरी बन चुकी है जिसे हम इस्लामोफ़ोबिया या इस्लामिक एक्सट्रीमिज़्म कह देते हैं। कश्मीर और फ़िलिस्तीन ने इस थ्योरी की बहुत बड़ी क़ीमत चुकाई है। जबकि यह सब फ़्रीडम मूवमेंट हैं, धार्मिक मूवमेंट नहीं हैं। एक बात यह भी कही जाती है कि पंडितों को भी तो निकाल दिया था। मेरे हिसाब से उस समय पंडितों के साथ जो हुआ था वो बहुत ही ग़लत था लेकिन उस समय ऐसे एक या दो आतंकी संगठन थे जिन्हें पाकिस्तान की मदद मिली थी और 4-5 सालों तक उस हिन्दू और मुसलमान दोनों ही उस दहशत के शिकार रहे थे। लेकिन आप यह कह सकते हैं कि हिंदुओं पर वो दहशत ज़्यादा थी जिसका सिर्फ़ एक ही कारण है- मेजोरिटी और माइनॉरिटी।

मेरी क़िस्मत अच्छी ही रही कि मैंने वहाँ इतने साल काम किया और बहुत क़रीब से सबकुछ देखा, फ़ौज की तरफ़ भी, बच्चों की तरफ भी। 12-15 साल के बच्चे तो आतंकवादी नहीं हो सकते हैं ना? किसी 5 साल या 12 साल के बच्चे को गोली मारना दुनिया की कोई फ़ौज जस्टिफाई नहीं कर सकती है। ऐसा करना आतंकवाद से लड़ना नहीं होता है। तो इन सब पर जो भी नाटक बने हैं और उनमें जो भी बातें कही गई हैं उसका विरोध भी ज़्यादातर उन लोगों ने ही किया है जिन्होंने नाटक देखा नहीं है।

मुझे बहुत बार यह क्रिटिसिज़्म मिला है कि मैं बहुत ज़्यादा बैलेंस्ड नाटक बनाया है। मैं उस क्रिटिसिज़्म को स्वीकार करता हूँ लेकिन यह भी कहता हूँ कि मैंने उस नाटक में किसी भी चीज़ को ज़बरदस्ती बैलेंस नहीं किया है। मैंने यह नहीं किया है कि किसी एक ने बोल दिया तो अब दूसरे का पक्ष रखा जाए। लेकिन मुझे लगता है कि यह हमारे समय की समस्या है जो हम लोगों ने इस तरह के लोगों को लीडरशिप दे दी है, क्योंकि हम अपने chauvinism में फँसे हैं। वहाँ जो भी रह रहे हैं हम उसे ही मुसीबत में डाल रहे हैं, चाहे वो हमारे सीआरपीएफ़ वाला हो,या वहाँ की ही कोई भी हो। दरअसल वो लोग आपस में नहीं लड़ रहे हैं। हमारे लिए मुद्दा यह नहीं है कि कोई सीआरपीएफ़ का लड़का वहाँ है और कोई 12-18 साल का लड़का उसपर पत्थर फेंक रहा है।

हम इस बात से ख़ुश हो रहे हैं कि मैं किसी काल्पनिक पाकिस्तानी को यह सबक सिखा रहा हूँ। मैं बैठा हूँ बॉम्बे के पिज़्ज़ा हट में और मैं किसी काल्पनिक पाकिस्तानी को सबक सिखा रहा हूँ जो पाकिस्तान के पिज़्ज़ा हट में बैठा है। और मर रहे हैं ये दोनों। इसीलिए इस तरह के नाटक का इतना विरोध हो रहा है। क्या हमारे साहित्य में सवाल नहीं उठाए गए हैं? आजकल लोग अपने आपको सबसे बड़ा इंडियन कह रहे हैं। इंडिया का कॉन्सेप्ट ही 80 साल पुराना है लेकिन लोग ऐसे बात करते हैं जैसे हज़ारों साल पुराना है।

सत्यम्: हिन्दुत्व के शोर के बारे में आपका क्या कहना है?

अभिषेक मजूमदार: 11वीं सदी के रामानुज  एक बार अपने गुरु के पास गए और कहा कि मुझे रामायण सिखाइये, उनके गुरु ने उनको कहा कि रामायण पूरा याद करके आओ। रामानुज 5 साल बाद रामायण का एक-एक श्लोक याद करके गए। गुरु के कहने पर उन्होंने रामायण सुनाई। अगले 5 साल उनके गुरु ने उन्हें 18 अलग-अलग पर्सपेक्टिव से रामायण सिखाई। यह मेरी अपनी बात नहीं है, रामानुज की बात है। तो हिन्दू धर्म की मशाल मोहन भागवत उठाएंगे या रामानुज उठाएंगे? अगर रामानुज भी एन्टी नेशनल है तो फिर मैं भी हूँ। अगर आदिशंकराचार्य भी पूरी तरह हिन्दू नहीं बन पाए, अगर वाल्मीकि भी नहीं बन पाए, तुलसीदास के अलावा कोई भी सही तरीक़े से हिन्दू नहीं बन पाया तो फिर बहुत मुश्किल है। यह सब opportunism है , सीरियस रिलीजन भी नहीं है।

यह बस गुंडागर्दी है, हम गुंडागर्दी में फँसे हुए हैं। उसको यह लोग सुंदर सुंदर नाम देते हैं। हिंदुत्व पूरी तरह से अपॉर्च्युनिस्ट, कॉरपोरेट गुंडागर्दी का नाम है। इसका hinduism से कोई लेना देना नहीं है। hinduism अपने आप में ही बहुत प्रॉब्लमैटिक है। हर धर्म ही प्रॉब्लमैटिक है। लेकिन फिर भी मेरे विचार से हर धर्म में कुछ ऐसी बातें हैं जो मुसीबत में पड़े इंसान के जीवन में एक राह दिखा सकती हैं। इतना मैं मानता हूँ और मैंने दुनिया में देखा है कि धर्म ग़रीब और अमीर आदमी को मौत के समय एक दिलासा दे सकता है। और मैंने यह भी देखा है कि लोगों के साइकेट्रिस्ट उनको किसी पीर के दरगाह जाने की सलाह देते हैं। और कितने पीर ऐसे हैं जो कहते हैं कि तुम साइकेट्रिस्ट के पास भी जाओ। ऐसा कश्मीर में भी होता है।

मुझे धर्म से बैर है लेकिन अलग तरह का है। मुझे उससे कहीं ज़्यादा बैर इन लोगों से है क्योंकि इन लोगों ने हिन्दू धर्म का बहुत विनाश किया है। मैं अपने आपको हिन्दू नहीं मानता हूँ, मैं नहीं हूँ हिन्दू। आज के समय पर हमारे देश के हिंदुओं को यह नहीं समझ आ रहा कि इस्लाम तो बच जाएगा क्योंकि उसे मानने वाले बहुत लोग हैं, और यह जो लिंचिंग हैं, यह सब क्राइम हैं इससे इस्लाम को कुछ नुक़सान नहीं होगा। लेकिन हिन्दू धर्म का जो विनाश ये लोग कर रहे हैं वो सही नहीं किया जा सकता है। और हिन्दू धर्म को बचाना हिन्दू धर्म के लिए ही बहुत मुश्किल है।

PLAY
Abhishek Majumdar
indian theater
Jammu and Kashmir

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

यासीन मलिक को उम्रक़ैद : कश्मीरियों का अलगाव और बढ़ेगा

आतंकवाद के वित्तपोषण मामले में कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मलिक को उम्रक़ैद

जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती

जम्मू-कश्मीर परिसीमन से नाराज़गी, प्रशांत की राजनीतिक आकांक्षा, चंदौली मे दमन


बाकी खबरें

  • yogi bulldozer
    सत्यम श्रीवास्तव
    यूपी चुनाव: भाजपा को अब 'बाबा के बुलडोज़र' का ही सहारा!
    26 Feb 2022
    “इस मशीन का ज़िक्र जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियानों में हो रहा है उसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इसे स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।”
  • Nagaland
    अजय सिंह
    नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
    26 Feb 2022
    आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
  • women in politics
    नाइश हसन
    पैसे के दम पर चल रही चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नामुमकिन
    26 Feb 2022
    चुनावी राजनीति में झोंका जा रहा अकूत पैसा हर तरह की वंचना से पीड़ित समुदायों के प्रतिनिधित्व को कम कर देता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व नामुमकिन बन जाता है।
  • Volodymyr Zelensky
    एम. के. भद्रकुमार
    रंग बदलती रूस-यूक्रेन की हाइब्रिड जंग
    26 Feb 2022
    दिलचस्प पहलू यह है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ख़ुद भी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सीधे पुतिन को संदेश देने का अनुरोध किया है।
  • UNI
    रवि कौशल
    UNI कर्मचारियों का प्रदर्शन: “लंबित वेतन का भुगतान कर आप कई 'कुमारों' को बचा सकते हैं”
    26 Feb 2022
    यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ने अपने फोटोग्राफर टी कुमार को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान कई पत्रकार संगठनों के कर्मचारी भी मौजूद थे। कुमार ने चेन्नई में अपने दफ्तर में ही वर्षों से वेतन न मिलने से तंग आकर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License