NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
जटिल चुनावी परिदृश्य में छिपी चिंताएं
परिस्थितियां बहुत आशाजनक नहीं हैं। आत्ममुग्ध प्रधानमंत्री अपनी दम्भोक्तियों में स्वयं को एक अपराजेय महामानव के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। चुनाव आयोग अपनी कार्य प्रणाली के द्वारा खुद पर विपरीत टीका टिप्पणी के ढेरों अवसर प्रदान कर रहा है...।
डॉ. राजू पाण्डेय
10 May 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: Newslaundry

चुनाव धीरे धीरे अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है। प्रधानमंत्री और इस चुनाव में उनके प्रचार अभियान का नेतृत्व करते मीडिया समूह दोनों पुरजोर कोशिश में लगे हैं कि इस चुनाव को व्यक्ति नरेंद्र मोदी पर केंद्रित कर दिया जाए। ऐसा लगने लगा है कि यह हमारे संसदीय लोकतंत्र का चुनाव न होकर किसी ऐसे देश का चुनाव है जहां राष्ट्रपति प्रणाली अस्तित्व में है। इस चुनाव में प्रधानमंत्री के प्रचार की कमान बहुत वफादारी से संभालते मुख्य धारा के मीडिया का एक बड़ा भाग तो इससे भी आगे बढ़ते हुए इसे एक जनमत संग्रह का रूप देने में लगा है- एक ऐसा जनमत संग्रह जिसके नतीजे पहले से तय हैं, मोदी जी की महानता पर जनता की मुहर लग चुकी है और बस उस तिथि का इंतजार है जिस तिथि को इस पूर्व निश्चित परिणाम की आधिकारिक घोषणा होगी। जनता का मूड भांपते एंकर केवल मोदी जी के विषय में सवाल कर रहे हैं। जो जनता टीवी पर दिखाई जा रही है वह मोदी समर्थकों की कल्पना से भी अधिक उनकी दीवानी है और सत्तारूढ़ दल के जिन प्रत्याशियों से सवाल पूछे जा रहे हैं उनका कहना है कि वे बस मोदी जी के प्रकाश से आलोकित हैं, उनके पास अपना ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे वे गर्वपूर्वक जनता के साथ साझा कर सकें। प्रधानमंत्री जी के कुछ साक्षात्कार प्रसारित और प्रकाशित हो रहे हैं। इनका स्वर बहुत अजीब है। लगता है कि ये चुनावों के नतीजे आने के बाद के साक्षात्कार हैं। विजेता महानायक के आभामंडल से चमत्कृत पत्रकार बालसुलभ कौतुक से यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर इतनी अद्भुत विशेषताएं एक साथ इतनी मात्रा में उस महानायक में कैसे उपस्थित हैं। उसका हर विचार युगांतरकारी है। उसका हर कदम आम मानव की सोच से दशकों आगे है। वह न खाता है, न सोता है, न उसे कोई लोभ है- बस दिन रात वह जनता की सेवा में लगा रहता है। प्रश्न कर्ताओं की श्रद्धा और समर्पण से आनंदित हो प्रधानमंत्री उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हैं।

प्रधानमंत्री के चुनाव अभियान में प्रतिशोध की छाया स्पष्ट दिखती है। प्रधानमंत्री को सुनकर कई बार तो ऐसा लगता है कि हम पंडित नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी या श्री राजीव गांधी के जीवनकाल में हुए किसी चुनाव में भाग ले रहे हैं। उन्होंने अपने भाषणों में एक शीर्ष राजनैतिक परिवार के सदस्यों को जेल के दरवाजे तक पहुंचाने को अपने वर्तमान कार्यकाल की एक बड़ी उपलब्धि बताया है और जनता से यह वादा किया है कि उनके आने वाले कार्यकाल में इन सदस्यों की जगह जेल के अंदर होगी। जिस तरह भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रधानमंत्री जी की लड़ाई का आधार प्रतिशोध है उसी प्रकार उनका दूसरा प्रमुख चुनावी मुद्दा राष्ट्रवाद भी प्रतिशोध की बुनियाद पर ही आधारित है- वे स्वयं को एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जो शत्रु देश से बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, जिसके अनुसार परमाणु बम दीपावली के लिए नहीं बनाए गए हैं। आधुनिक सामरिक परिदृश्य की बहुत साधारण सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी यह समझ सकता है कि युद्ध और विशेषकर परमाणु युद्ध देश को दशकों पीछे धकेल देगा और सामरिक जय पराजय की कसौटी पर परिणाम जितना भी सकारात्मक हो इसमें जनता की हार तय है। यह बहुत चिंतित करने वाला है कि प्रधानमंत्री अपने भाषणों में अपनी प्रतिशोध लेने की योग्यता को आधार बनाकर वोट मांग रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम से जानबूझकर दूरी बनाने वाली और स्वतंत्रता के उपरांत महात्मा गांधी की हत्या के संबंध में अपने रुख के कारण लगभग बहिष्कृत हो चुकी विचारधारा से सहानुभूति रखने वाले प्रधानमंत्री जी की दमित इच्छाओं को समझा जा सकता है। उन्होंने लंबे वैचारिक निर्वासन के बाद वापसी की है किंतु इस वापसी का कारण वे मुद्दे नहीं थे जिन्हें लेकर मोदी जी आज जनता के बीच जा रहे हैं। बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई और भ्रष्टाचार मिटाने की उम्मीद लगाए लोगों ने उनमें कुछ संभावना देखी थी तभी उन्हें चुना था। किंतु प्रधानमंत्री जी ने स्वयं को मिले अवसर का उपयोग मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए जनता को उन मुद्दों पर सोचने के लिए प्रशिक्षित करने हेतु किया जिन्हें लेकर वे आज जनता के बीच जा रहे हैं। उन्होंने सारे आवरण उतार दिए हैं और अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को खुलकर उजागर कर रहे हैं। मोदी जी ने अपना बौद्धिक पोषण जिस विचारधारा से प्राप्त किया है उस विचारधारा को देश आज जिस राह पर चल रहा है उस राह से बहुत शिकायतें हैं। इस विचारधारा के अनुयायियों के न केवल अपने नायक हैं अपितु उनकी दृष्टि में अनेक वर्तमान राष्ट्र नायक खलनायकों का दर्जा रखते हैं। हिंदुत्व की जिस अवधारणा पर वे विश्वास करते हैं उसका हिंदू धर्म से कुछ विशेष संबंध नहीं है। इनकी राष्ट्र की अपनी परिभाषा है जो बहुसंख्यकवाद पर आधारित है और संविधान की बहुत सी बातों को लेकर इनकी घोर असहमति है। इनमें से अनेक संविधान की कथित गलत संरचना को देश की कई मौजूदा समस्याओं के लिए उत्तरदायी मानते हैं। जनता यदि मोदी जी के करिश्मे से प्रभावित होकर उन्हें चुनती है तो राष्ट्र के संचालन का यह मॉडल शायद उसे फ्री गिफ्ट में मिलेगा।

कांग्रेस और उसके शीर्ष नेताओं ने अपने घोषणा पत्र और भाषणों के माध्यम से चुनाव को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य तथा किसानों की समस्या जैसे बुनियादी मुद्दों की ओर ले जाने की पुरजोर कोशिश की है। किंतु मीडिया के समर्थन के अभाव में ये मुद्दे जनता तक पहुंच पाए हैं अथवा नहीं यह कहना कठिन है। रफ़ाल के मुद्दे पर भी मीडिया ने वह चुस्ती और तेजी नहीं दिखाई है जो कभी उसने बोफोर्स मामले में या अन्ना आंदोलन के दौरान दिखाई थी। मीडिया ने पिछले चुनाव में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे नायक गढ़े थे जिनके विषय में तब यह कल्पना करना भी अपराधबोध से भर देता था कि वे एक प्रायोजित मुहिम का हिस्सा हैं जिसका लाभ अंततः मोदी जी को मिलना है।

देश की अधिकांश मीडिया कंपनियों पर व्यावसायिक घरानों का कब्जा है। कहा जाता है कि व्यापारियों के कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते हैं, उनके लिए व्यावसायिक हित सर्वोपरि रहते हैं। चुनाव के पांच चरण पूर्ण होने के बाद भी मीडिया के रुख में कोई खास बदलाव नहीं दिखता है। वह मोदी जी के प्रति यथावत समर्पित है। क्या वह आश्वस्त है कि चुनाव में मोदी जी सफल होंगे? क्या वह व्यक्ति मोदी के प्रति प्रतिबद्ध है या उस विचारधारा के प्रति जिसके लिए मोदी जी की गहरी सहानुभूति है? यदि किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाता है तो क्या मीडिया मोदी जी के स्थान पर किसी नए नायक का सृजन करेगा? क्या मोदी जी चुनाव के ऐसे नतीजों को स्वीकार कर पाएंगे जो उनकी अपेक्षाओं के विपरीत होंगे? क्या विपक्ष ऐसे नतीजों को स्वीकार कर पाएगा जो उसकी उम्मीदों से बिल्कुल उलट होंगे? आने वाले समय में चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की क्या भूमिका होगी? क्या देश के भाग्य में कुछ अप्रत्याशित लिखा है? इन प्रश्नों के उत्तर समय ही देगा।

परिस्थितियां बहुत आशाजनक नहीं हैं। आत्ममुग्ध प्रधानमंत्री अपनी दम्भोक्तियों में स्वयं को एक अपराजेय महामानव के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। चुनाव आयोग अपनी कार्य प्रणाली के द्वारा खुद पर विपरीत टीका टिप्पणी के ढेरों अवसर प्रदान कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बिना प्रक्रियाओं का पालन किए खुद को निर्दोष मान रहे हैं। उनके द्वारा ऐसी शक्तियों के षड्यंत्र की बात कही जा रही है जो इस अत्यंत महत्वपूर्ण समय में फैसलों को प्रभावित करना चाहती हैं। मीडिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा हर वह कार्य कर रहा है जो उसके लिए अकरणीय है। आशा करनी चाहिए कि भ्रम, संदेह और संशय के इस वातावरण के बावजूद कोई ऐसा नतीजा सामने आएगा जिसमें लोकतंत्र की जीत छिपी होगी।

2019 आम चुनाव
General elections2019
2019 Lok Sabha elections
BJP-RSS
Narendra modi
hindutva terorr

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

अब राज ठाकरे के जरिये ‘लाउडस्पीकर’ की राजनीति

जलियांवाला बाग: क्यों बदली जा रही है ‘शहीद-स्थल’ की पहचान

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रीय पार्टी के दर्ज़े के पास पहुँची आप पार्टी से लेकर मोदी की ‘भगवा टोपी’ तक


बाकी खबरें

  • farmers
    शंभूनाथ शुक्ल
    सरकार औपनिवेशक नीतियां न लादे!
    28 Jul 2021
    संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता जा रहा है और सरकार किसी भी सर्वमान्य हल की तरफ़ बढ़ने का संकेत नहीं दे रही है। यह सरकार की ज़िद है और लोकतंत्र-विरोधी काम है।
  • p
    कुमुदिनी पति
    मनोरंजन का कारोबार बनाम पॉर्न का बाज़ार
    28 Jul 2021
    आखिर हम कैसे फर्क करें कि राज का धंधा इरोटिका से जुड़ा था या पॉर्न उद्योग से? हम कैसे समझें कि वह अपनी टीम के साथ जो कुछ कर रहा था वह समाज के लिए अस्वस्थ है या नहीं और कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी…
  • पीपल्स डिस्पैच
    म्यांमार में 4,800 खदान कर्मचारियों की हड़ताल के छह महीने पूरे
    28 Jul 2021
    माइनिंग वर्कर्स फ़ेडरेशन ऑफ़ म्यांमार से जुड़े ये खनिक फ़रवरी में सैन्य तख़्तापलट के बाद से हड़ताल पर हैं। उनकी लंबी हड़ताल ने सैन्य शासन के राजस्व को प्रभावित किया है।
  • neoliberalism
    अजय गुदावर्ती
    नवउदारवाद के तीन ऐसे रास्ते जिन्होंने नए भारत में राजनीति को बदल दिया है
    28 Jul 2021
    आज के नेता विचारधारा की परवाह नहीं करते हैं और एक पार्टी से दूसरी पार्टी में आते-जाते रहते हैं, और फिर भी वे जनता के हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। आख़िर ऐसा क्यों है?
  • सफाइकर्मचारियों की हड़ताल
    अजीत सिंह
    उत्तराखंड में स्वच्छता के सिपाही सड़कों पर, सफाई व्यवस्था चौपट; भाजपा मांगों से छुड़ा रही पीछा
    28 Jul 2021
    उत्तराखंड राज्य के नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में स्वच्छता और सफ़ाई व्यवस्था में लगे हजारों की तादाद में सफ़ाईकर्मी अपना काम छोड़ कर हड़ताल पर हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License