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भारत
राजनीति
झारखण्ड: धनबाद – चन्द्रपुरा रेलमार्ग बंदी का सच
आग से बंदी का बहाना, कोयला पर निशानाI
अनिल अंशुमन
26 Sep 2018
dhanbad-chandrapura railway line

आखिरकार वही हुआ जिसकी आशंका लोगों ने जतायी थी कि धनबाद से चन्द्रपुरा के बीच हुई रेलबंदी के लिए भूमिगत आग का होना तो एक बहाना है, असली मकसद वहाँ से कोयला को निकालना हैI क्योंकि सरकार ने इस रेलमार्ग में फिर से रेल चलाने की बजाय इसमें कोयला खनन की विधिवत घोषणा कर दी हैI इस तरह सन 2017 में देश की सर्वव्यापी नोटबंदी से पूर्व कोयले की राजधानी कहे जाने वाले झारखंड प्रदेश स्थित धनबाद से चन्द्रपुरा रेलमार्ग पर हुई रेल बंदी ने भी लोगों को नोटबंदी वाला ही मज़ा चखायाI इस क्षेत्र के सभी बाशिंदे और लाखों रेलयात्री जो पिछले एक साल से देश के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर टकटकी लगाए हुए थे कि वहां से मिला आश्वासन पूरा होगा और फिर से रेल चलेगीI वह सब तो नहीं हुआ और रेल मार्ग की ज़मीन पर कोयला खनन का ऐलान हो गयाI लोग ठगे से हैरान हैं कि किस तरह जिस सरकार ने उनकी जान की सुरक्षा की दुहाई देकर रेलबंदी की और जल्द ही वैकल्पिक व्यवस्था के साथ रेल शुरू करने का बार–बार आश्वासन दिया, अब उसी ने अपने सारे आश्वासनों से साफ़ मुकरते हुए कोयला खनन का खेल शुरू कर दिया हैI भविष्य में इस मार्ग पर रेल चालू होने की सारी आशाएं “अच्छे दिन” की भांति अब धूल धूसरित हो चुकी हैं, क्योंकि सरकार के आदेश पर फ़ौरन अमल करते हुए बीसीसीएल ने कोयला खनन की प्रक्रिया शुरू कर दी हैI

धनबाद जं० से चन्द्रपुरा जं० तक के रेल मार्ग जिसे डीसी रेल लाईन भी कहा जाता था, इसके नीचे भूमिगत कोयले में लगी आग को भयावह ख़तरा बताते हुए तथा रेल यात्रियों की सुरक्षा की दुहाई देकर वर्तमान केंद्र सरकार के रेलवे मंत्रालय ने 15 जून 2017 से इस मार्ग पर रेल यातायात बंद कर दियाI रेलवे को प्रति वर्ष 2,500 करोड़ से भी अधिक का मुनाफा देने वाले इस रेलमार्ग पर प्रतिदिन सवारी गाड़ियों समेत 26 जोड़ी मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों से हजारों यात्री सफ़र करते थेI इसके अलावा अनेकों माल गाड़ियों का आवागमन भी होता था I धनबाद से चन्द्रपुरा स्टेशनों के बीच लगभग एक दर्जन से भी अधिक छोटे–बड़े स्टेशन और कतरास जैसा कारोबारी शहर, कई कोलियारियाँ व अन्य छोटे–छोटे शहर पड़ते हैं I जहां से हर दिन हज़ारों छात्र–छात्राएं , डेली मजदूर, कर्मचारी और छोटे–मंझोले कारोबारी से लेकर खुदरा व थोक व्यापारियों के सामानों का आवागमन होता थाI स्टेशनों के आसपास के सभी बाज़ार और वहाँ बसी आबादी की रोजी–रोजगार समेत अधिकांश आर्थिक ज़रूरतें इसी रेल यातायात पर ही निर्भर थीं, लेकिन रेल बंदी ने सबकी कमर तोड़कर रख दीI गरीब व निम्न आय के घरों कि छात्राएं-छात्र जो कम पैसों में धनबाद पढ़ने या कोचिंग इत्यादी करने जाते थे, सबकी पढ़ाई पर आफत आ गयीI वहीं हर दिन सैकड़ों दिहाड़ी मजदूर जो धनबाद व आस-पास के अन्य शहरों व कोलियरियों में इए रेल मार्ग से हर दिन कमाने जाते थे इस रेल के बंद और वैकल्पिक व्यवस्था न होने से, सब छीन गयाI क्योंकि उनके लिए यह रेल ही एकमात्र सस्ता साधन थीI एक विशाल आबादी का पूरा जीवन चक्र जो इस रेलमार्ग के होने से किसी तरह चल रहा था, सरकार के इस फैसले से एकाएक पूरी तरह से चरमरा गयाI यही वजह थी कि रेलबंदी के खिलाफ तथा अविलम्ब वैकल्पिक व्यवस्था की मांग को लेकर महीनों चले जनप्रतिवाद में दल व राजनीति के सभी दायरे पीछे छोड़कर सारे लोग रेल चालू करने की एकजुट लड़ाई लड़ रहे थेI इतना ही नहीं क्षेत्र के सभी विपक्षी दलों के साथ–साथ सत्ताधारी दल के नेता–कार्यकर्त्ता भी समर्थन में सड़कों पर उतर गएI  

15 जून ’17 को हुई रेल बंदी के दूसरे ही दिन पूर्व रेलमंत्री श्री लालू प्रसाद जी ने त्वरित टिप्पणी कर कहा था-  केंद्र की मोदी जी की सरकार ने कोयला खदानों को बेचने के लिए रेल बंद किया हैI वहीं विपक्षी दलों के अलावा कई नागरिक व व्यापारिक संगठनों ने भी भूमिगत आग को रेलबंदी का महज बहाना मानकर कहा था कि सरकार की असल मंशा है यहाँ कोयला खनन करने कीI सबकी ये आशंकाएं यूं हीं नहीं बनीं थी क्योंकि इसी तरह से रेल लाइन के नीचे भूमिगत आग का हवाला देकर सन 2002 में धनबाद–झरिया रेल मार्ग को बंद कर जल्द वैकल्पिक व्यवस्था करने की बात कही गयी थीI लेकिन वह सब तो कुछ हुआ नहीं और रेल बंदी के फौरन बाद बीसीसीएल ने कोयला खनन शुरू कर दियाI इतना ही नहीं कोयला निकलने के बाद इस जमीन को सही सलामत रेलवे को लौटाने का एग्रीमेंट उड़ा दिया गया और सारा कोयला निकालकर कर सिर्फ गड्ढे और अवैध कोयला खनन का रास्ता छोड़ दिया गयाI रेलबंदी की आड़ में सरकार द्वारा फिर की गयी धोखेबाजी ने धनबाद–झरिया रेलबंदी के नाम पर की गयी संगठित धोखेबाजी के ज़ख्म को ताज़ा कर गयीI

गौरतलब है कि काफी पहले से ही रेलवे के द्वारा बिना वैकल्पिक व्यवस्था किये रेलबंदी को लेकर जिस प्रकार चर्चाएँ उछली जा रही थी, उससे लोग काफी क्षुब्ध हो रहे थेI जिसे देखकर 22 मई 2017 को प्रधानमंत्री कार्यालय ने रेल बंदी से पूर्व ठोस विकल्प तैयार करने पर जोर दिया था I इस बाबत इसी वर्ष के अगस्त माह में झारखण्ड के मुख्यमंत्री व रेल मंत्री पीयूष गोयल की उपस्थिति में दिल्ली स्थित पार्लियामेंट भवन में रेल व कोयला मंत्रालय के उच्च अधिकारियों के साथ हुई वार्ता से एक हाई पावर कमिटी भी बनायी गयी थीI जिसे रेल लाईन के नीचे लगी भूमिगत आग से निपटने और वैकल्पिक रेल मार्ग के लिए ज़मीनी अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करने का ज़िम्मा सौंपा गया थाI लेकिन सब कुछ कागज़ी खानापूर्ति में सिमट कर रह गया और कुछ भी अमल में नहीं लाया गयाI सूत्रों के अनुसार अमल में ये दिखा कि 15 जून 2017 को रेलबंदी की घोषणा होते ही तत्कालीन केन्द्रीय कोयला सचिव महोदय आनन-फानन में रांची पहुँच गएI वहाँ उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव के साथ बैठकर रेल लाइन के नीचे कोयला खनन की सारी रणनीति तैयार कर उसकी प्रक्रिया का शुभारम्भ कर गएI उनके निर्देश पर बीसीसीएल ने धनबाद रेल मंडल को पत्र लिखकर डीसी रेल लाईन की ज़मीन हस्तांतरित करने की मांग कीI सरकार का यह सारा कुचक्र उस समय खुल गया जब हाल ही में कोयला मंत्रालय के नए सचिव द्वारा रेलवे बोर्ड को भेजा गया विशेष निर्देश पत्र, जिसमें उन्होंने धनबाद रेलवे के एनओसी नहीं दिए जाने से कोयला खनन में हो रही देरी के लिए काफी नाराजगी जताते हुए फ़ौरन कोयला खनन के लिए दबाव बनाया था, यह सामने आयाI इस पत्र ने यह साबित कर दिया कि रेलबंदी भूमिगत आग के कारण नहीं बल्कि यहाँ कोयला निकालने के लिए की गयी थीI

कैसी विडंबना है कि बात-बात पर ‘सबका साथ, सबका विकास’ का ढोल पीटने वाली सरकार के लिए ज़मीन पर आम जनता का हित कोई मायने नहीं रखताI वो कहती कुछ और है करती कुछ औरI रेलबंदी कर देश के खजाने को सालाना 2500 करोड़ रूपये का नुकसान उठाने के साथ-साथ हज़ारों परिवारों के लाखों लोगों की रोजी-रोटी छीनना पड़े, उसकी नज़र 2 बिलियन टन कोयला निकालने पर ही रहेगीI चर्चा यह भी है कि येन केन प्रकारेण इसमें निजी कंपनियों को भी घुसाया जाएगाI खैर, सरकार आग के बहाने रेलबंदी कर जितना कोयला निकाले लेकिन क्षेत्र की व्यापक जनता भी अब ये कहने लगी है कि इसका हिसाब 2019 के चुनाव में हर हाल में लिया जाएगाI

Jharkhand
Dhanbad-Chandrapura
indian railways
Coal mining

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