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भारत
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झारखण्ड : एयरपोर्ट बनाने के लिए तोड़े गए दलितों के घर , 2 लोगों की मौत
ये सभी 105 परिवार बेघर होने के बाद से वहीँ टैंटों में रहने को मजबूर हैं I 6 जनवरी इस दलित गाँव की देवकी देवी की ठण्ड से मौत हो गयी और इसके दो दिन बाद 8 जनवरी को इस गाँव के निवासी पोचा मांझी की भी इसी वजह से मौत हुई I
ऋतांश आज़ाद
22 Jan 2018

झारखण्ड से एक अमानवीय घटना सामने आयी है जहाँ 105 दलितों के घर उजाड़े जाने के बाद 2 लोगों की मौत हो गयी है I अक्टूबर में झारखण्ड के देवघर ज़िले के बाबूपुर गाँव में 105 दलितों और पास ही के गाँव में 28 मुसलमानों के घर उजाड़ दिए गए थे I प्रशासन द्वारा ये कहा जा रहा है कि ये कार्यवाही इसीलिए की गयी है क्योंकि वहाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाया जा रहा है I

लेकिन गाँव वालों का कहना है कि उन्हें न तो पहले इस बात की सूचना दी गयी और न ही उन्होंने गैरकानूनी ढंग से इस ज़मीन पर कब्ज़ा किया हुआ था I पीड़ित परिवार के मनोज ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा “अक्टूबर में जब हमारे घर तोड़े गये तो हमें कोई नोटिस नहीं दिया गया, हम रातों रात बेघर हो गए I हमें न तो कोई मुआवज़ा दिया गया है और न ही हमे फिर से बसाया गया I हमारे और बगल के एक मुस्लिम गाँव के आलावा 20 और गाँव को तोड़ा गया है लेकिन उन सभी को मुआवज़ा मिला है I”

jharkhand

ये सभी 105 परिवार बेघर होने के बाद से वहीँ टैंटों में रहने को मजबूर हैं I 6 जनवरी इस दलित गाँव की देवकी देवी की ठण्ड से मौत हो गयी और इसके दो दिन बाद 8 जनवरी को इस गाँव के निवासी पोचा मांझी की भी इसी वजह से मौत हुई I पोचा मांझी 48 वर्षीय खेत मज़दूर थे और देवकी देवी 45 वर्षीय थीं I जब ये मामला बढ़ने लगा तो सरकार ने कहा कि इन दोनों की मौत बीमारी से हुई है सर्दी से नहीं I सरकार का ये कहना है कि उन्होंने पोचा मांझी को मुआवज़े के 58 लाख रुपये दिए थे , पर सवाल ये उठता है कि फिर हो इस तरह टेंट में क्यों रह रहे थे I एक  स्थानीय संस्था  "दलित अधिकार मंच" ने वहाँ जाकर जब पड़ताल की तो उन्हें मृतकों के परिवारवालों ने कहा कि ये बातें सरासर झूठ है ,इस बातचीत का दलित अधिकार मंच ने विडियो भी जारी किया है I

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इन दोनों गाँवों में ज़्यादातर लोग या तो खेत मज़दूर या दिहाड़ी मज़दूर हैं, इन सभी के पक्के मकानों को तोडा गया है और जनवरी की सर्दी में यहाँ रहना जानलेवा साबित हो रहा है I बताया जा रहा है अक्टूबर में जब ये मकान तोड़े गए तो उसी दिन एक बच्चे की डिलीवरी वहाँ हो रही थी I

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पीड़ित परिवार के मनोज का कहना है कि गाँव वालों की करीब 10 एकड़ खेती की ज़मीन भी ले ली गयी है और उन्हें इसके मुआवज़े के तौर पर बहुत की कम रकम मिली है I दलित अधिकार मंच द्वारा बनाये गए विडियो में इस गाँव वालों की लाचारी साफ़ देखी जा सकती है इसमें से एक औरत का कहना है “जब से घर तोड़े गए हैं एक भी अधिकारी यहाँ नहीं आया है I” दलित अधिकार मंच के सामजिक कार्यकर्ता और पीड़ित परिवार के लोग लगातार इस मामले में अधिकारियों से मिल रहे हैं I उनकी माँग है कि उन्हें फिर से बसाया जाए , उनके नुक्सान की भरपाई की जाए और उन्हें ज़मीन भी दी जाए I इस घटनाक्रम से झारखण्ड सरकार पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं I अगर ज़मीन खाली करनी ही थी तो पहले नोटिस क्यों नहीं दिया गया ? अगर बाकि गाँवों को मुआवज़ा मिला तो इस दलित और मुस्लिम गाँव को क्यों नहीं दिया गया ? इन दो मौतों के लिए कौन ज़िम्मेदार है ? इन लोगों का पुनर्वास कब किया जायेगा ?

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