NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
झारखंड : आंदोलन से हासिल किया ‘ढिबरा‘ चुनने का अधिकार!
22 अगस्त से ढिबरा(माइका स्क्रैप) पर लगी सरकारी रोक के ख़िलाफ़ गिरिडीह ज़िले के ढिबरा क्षेत्र में स्थानीय भाकपा माले विधायक राज कुमार यादव के नेतृत्व में यहाँ के ढिबरा ग्रामीण मज़दूर आंदोलनरत थे।
अनिल अंशुमन
07 Sep 2019
dibra protest

ढिबरा यानी माइका स्क्रैप (अबरख का टुकड़ा) झारखंड के कोडरमा, गिरिडीह इत्यादि ज़िलों के कई गांवों के हज़ारों ग्रामीणों की कमाई का मुख्य आधार बना हुआ है। यहाँ के ग्रामीण अपनी रैयती- ग़ैर मज़रुवा ज़मीनों से ढिबरा निकालकर व चुनकर स्थानीय छोटे ढिबरा व्यापारियों को बेचकर परिवार का गुज़र बसर करते हैं। पिछले कई महीनों से अवैध क़रार देकर इस पर लगी सरकारी रोक के कारण 50 हज़ार से भी अधिक आबादी को रोज़ी रोटी के संकटों का सामना करना पड़ रहा था ।

फलतः 22 अगस्त से ढिबरा पर लगी सरकारी रोक के ख़िलाफ़ गिरिडीह ज़िले के ढिबरा क्षेत्र में स्थानीय भाकपा माले विधायक राज कुमार यादव के नेतृत्व में यहाँ के ढिबरा ग्रामीण मज़दूर आंदोलनरत थे। 4 सितंबर को गिरिडीह ज़िला मुख्यालय में प्रशासन–वन विभाग के अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों की बैठक में ढिबरा पर लगी रोक हटाने का निर्णय हुआ। साथ ही यह भी तय हुआ कि ढिबरा ले जा रही छोटे व्यापारियों की गाड़ियों को भी वन विभाग-प्रशासन द्वारा नहीं पकड़ा जाएगा।

झारखंड के उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र के कोडरमा व गिरीडीह ज़िलों व इससे सटे कई इलाक़ों में अबरख यानी माइका प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। अबरख के टुकड़ों (माइका स्क्रैप) को ढिबरा कहा जाता है। इस क्षेत्र के अधिकांश ग्रामीण समाज का गुज़र बसर इसी ढिबरा के सहारे होता है। हालांकि ढिबरा के अवैध कारोबार का भी अपना विशाल और एकछत्र वर्चस्व बना हुआ है। जिस पर लगाम लगाने के नाम पर वन और खनन विभाग के साथ-साथ प्रशासन की सारी गाज हमेशा ग्रामीण ढिबरा मज़दूरों और स्थानीय छोटे खुदरा कारोबारियों पर ही गिरती है। हर दिन होने वाले करोड़ों के अवैध ढिबरा कारोबार पर कभी कोई आंच नहीं आती है और वह बदस्तूर जारी है।

माइका  7.jpg

एक समय यह सारा इलाक़ा ‘द ग्रेट माइका बेल्ट‘ कहलाता था। यहाँ के माइका उद्योग और इसके खनन कारोबार से पूरे इलाक़े में चहल–पहल रहती थी। रेडियो सिलोन और विविध भारती के श्रोताओं में चर्चित रहने वाला शहर झुमरी तिलैया शहर का विकास भी इसी माइका उद्योग की बदौलत ही हुआ। सरकार की ‘रहस्यमय‘ नीतियों और उपेक्षाओं के बाद से यहाँ का वैध उद्योग और खनन तो समाप्त ही हो गया, इससे जुड़े सारे मज़दूर और ग्रामीण भी बेकार हो गए। तब से शुरू हुए संस्थाबद्ध अवैध माइका खनन कारोबार करने वालों की हमेशा चांदी रही है। इसे रोकने के नाम पर गाहे ब गाहे छोटे व खुदरा कारोबारियों पर प्रशासनिक कारवाईयों की रुटीन कवायद भी चलती ही रहती है। माइका ढुलाई के लिए सबसे मज़बूत व उपयोगी माने जाने वाले शक्तिमान ट्रक जब सेना से रिटायर किए गए तो उनमें से अधिकांश इसी इलाक़े की शोभा बढ़ा रहे हैं।

बेकार हो गए स्थानीय मज़दूरों ने मजबूरी में वैध–अवैध खनन से बिखरे पड़े माइका स्क्रैप को चुन कर उन्हें खुदरा व्यापारियों को बेचने का सिलसिला शुरू कर दिया। कहा जाता है कि तभी से माइका स्क्रैप का नाम ‘ढिबरा‘ पड़ गया। ढिबरा चुनकर बेचने के अलावा कई गावों में अपनी रैयती-ग़ैर मज़रुवा ज़मीनों से ढिबरा निकालकर बेचने तथा चोरी–छिपे छोटे पैमाने पर खनन करने का कार्य भी होने लगा। जिसे प्रशासन द्वारा ग़ैर क़ानूनी क़रार दिये जाने के बाद से ढिबरा की ज़ब्ती और इसे चुनने–बेचने वालों की धर–पकड़ की घटनायेँ भी आम हो गईं।

इससे तंग तबाह ग्रामीणों ने अपने परिवार के गुज़र बसर का हवाला देकर सरकार व प्रशासन के आला अधिकारियों से कई बार गुहार लगाकर क़ानूनी रास्ता या प्रावधान सुनिशिचित करने की मांग की। 1980 में प्रशासन ने स्थानीय स्तर पर कुछ दिनों तक लाइसेन्स प्रणाली लागू की लेकिन जल्द ही उसे रोक दिया गया। इस दौरान हर चुनाव में ढिबरा का सवाल एक संवेदनशील मुद्दा बना रहा है। हालांकि बीच बीच में कई बार लोगों को कुछ क्षणिक राहत मिली लेकिन स्थानीय जन प्रतिनिधियों से लेकर सरकार व प्रशासन में से किसी ने भी कोई कारगर या स्थायी प्रावधान नहीं किया।  

माइका 6.jpg

ढिबरा के सवाल पर लंबे समय से आंदोलनरत रहने वाले वामपंथी दल भाकपा माले और इसके विधायक राजकुमार यादव का सरकार व प्रशासन पर खुला आरोप है कि ढिबरा अवैध कारोबार रोकने के नाम पर बड़ी मछलियों को छोड़ निरीह ग्रामीण ढिबरा मज़दूरों व छोटे कारोबारियों को ही निशाना बनाया जा रहा है। 22 अगस्त से तीसरी–गांवाँ में “ढिबरा चुनने का अधिकार दो, वरना जेल दो!” आंदोलन की शुरुआत करते हुए माले विधायक राजकुमार यादव ने अविलंब क़ानूनी प्रावधान बनाने की मांग उठाई।

साथ ही स्थानीय भाजपा सांसद पर ढिबरा मज़दूरों से वादाख़िलाफ़ी कर माफ़ियाओं साथ देने का आरोप लगाया। ढिबरा चुनने पर प्रशासन द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने से ढिबरा बेचकर जीवकोपार्जन करने वाले 2 लाख से भी अधिक ग्रामीण मज़दूरों व छोटे खुदरा व्यापारियों का पूरा रोज़गार ठप्प पड़ गया। 4 सितंबर को गिरिडीह में प्रशासन से वार्ता में माले विधायक ने ढिबरा बंदी से पूरे इलाक़े में उत्पन्न भूखमरी व पलायन की गंभीर स्थिति को दर्शाते हुए आगाह किया कि ऐसे में ही लोग कई तरह के अवांछित-ग़लत कार्यों के लिए भी मजबूर हो सकते हैं। 

बहरहाल, प्रशासन ने फ़िलहाल ढिबरा के 15 डंप केन्द्रों को चिन्हित कर वहाँ लगी रोक को शिथिल कर स्थानीय ढिबरा मज़दूरों को तात्कालिक राहत दी है। लेकिन कोपरेटिव बनाकर ढिबरा कारोबार करने का लाइसेंस देने की मांग को नहीं माना है। नि:संदेह यह उसके बूते से बाहर का काम है। क्योंकि इस पर नीतिगत-आधिकारिक फ़ैसला प्रदेश की सरकार और मुख्यमंत्री को लेना है। जो शायद ही संभव हो। क्योंकि इससे संस्थाबद्ध अवैध ढिबरा कारोबार को सीधे नुक़सान पहुंचेगा। जिसमें सत्ता से जुड़े जन प्रतिनिधि, नेता, अफ़सर और माफ़िया-ठेकेदारों की पूरी संगठित चौकड़ी शामिल है।

Jharkhand
Dhibra
CPM
Dhibra Traders
Jharkhand government

Related Stories

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

देशव्यापी हड़ताल को मिला कलाकारों का समर्थन, इप्टा ने दिखाया सरकारी 'मकड़जाल'

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

झारखंड: नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन सत्याग्रह जारी, संकल्प दिवस में शामिल हुए राकेश टिकैत

झारखंड: हेमंत सरकार की वादाख़िलाफ़ी के विरोध में, भूख हड़ताल पर पोषण सखी

झारखंड: राज्य के युवा मांग रहे स्थानीय नीति और रोज़गार, सियासी दलों को वोट बैंक की दरकार

झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध

कोरोना काल में भी वेतन के लिए जूझते रहे डॉक्टरों ने चेन्नई में किया विरोध प्रदर्शन

झारखंड: केंद्रीय उद्योग मंत्री ने एचईसी को बचाने की जवाबदेही से किया इंकार, मज़दूरों ने किया आरपार लड़ाई का ऐलान


बाकी खबरें

  • लव पुरी
    क्या यही समय है असली कश्मीर फाइल को सबके सामने लाने का?
    04 Apr 2022
    कश्मीर के संदर्भ से जुडी हुई कई बारीकियों को समझना पिछले तीस वर्षों की उथल-पुथल को समझने का सही तरीका है।
  • लाल बहादुर सिंह
    मुद्दा: क्या विपक्ष सत्तारूढ़ दल का वैचारिक-राजनीतिक पर्दाफ़ाश करते हुए काउंटर नैरेटिव खड़ा कर पाएगा
    04 Apr 2022
    आज यक्ष-प्रश्न यही है कि विधानसभा चुनाव में उभरी अपनी कमजोरियों से उबरते हुए क्या विपक्ष जनता की बेहतरी और बदलाव की आकांक्षा को स्वर दे पाएगा और अगले राउंड में बाजी पलट पायेगा?
  • अनिल अंशुमन
    बिहार: विधानसभा स्पीकर और नीतीश सरकार की मनमानी के ख़िलाफ़ भाकपा माले का राज्यव्यापी विरोध
    04 Apr 2022
    भाकपा माले विधायकों को सदन से मार्शल आउट कराये जाने तथा राज्य में गिरती कानून व्यवस्था और बढ़ते अपराधों के विरोध में 3 अप्रैल को माले ने राज्यव्यापी प्रतिवाद अभियान चलाया
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक हज़ार से भी कम नए मामले, 13 मरीज़ों की मौत
    04 Apr 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 12 हज़ार 597 हो गयी है।
  • भाषा
    श्रीलंका के कैबिनेट मंत्रियों ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दिया
    04 Apr 2022
    राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के कारण पैदा हुए आर्थिक संकट से सरकार द्वारा कथित रूप से ‘‘गलत तरीके से निपटे जाने’’ को लेकर मंत्रियों पर जनता का भारी दबाव था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License