NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
भारत
राजनीति
झारखंड : अपने देस में ही परदेसी बन गईं झारखंडी भाषाएं
अंतर्राष्ट्रीय देशज भाषा वर्ष : कब मिलेगा झारखंडी भाषाओं को संवैधानिक अधिकार ?
अनिल अंशुमन
07 Feb 2019
हो भाषा की मान्यता के लिए आंदोलन

अभी पिछले दिनों झारखंड के आदिवासी बाहुल्य सिंहभूम ज़िले के चाईबासा व चक्रधरपुर में हो समाज के लोगों ने अपनी ‘हो’ भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग पर ‘रेल रोको’ अभियान चलाया। सनद हो कि अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ सबसे पहला विद्रोह (कोल विद्रोह) हो समाज के लोगों ने ही किया था। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी आजतक इनकी भाषा को संवैधानिक दर्ज़ा नहीं मिल सका है। जिससे आज इनकी भाषा के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है। झारखंड प्रदेश की देशज आदिवासी व क्षेत्रीय भाषाओं में अभी तक केवल संताली भाषा को ही संवैधानिक दर्ज़ा मिल सका है। वह भी पश्चिम बंगाल के वामपंथी सांसदों की पहल से ही संभव हो सका। इन भाषाओं की उपेक्षा का ये आलम है कि झारखंड प्रदेश गठन के बावजूद यहाँ के सांसदों, राज्यसभा सदस्यों व राज्य की सरकारों ने इनके संरक्षण और विकास को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई है। फलतः इन भाषाओं के लोगों को अपने न्यूनतम संवैधानिक अधिकार के लिए भी सड़कों पर आवाज़ उठानी पड़ रही है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने देशज भाषा व संस्कृति पर बढ़ते चुनौतीपूर्ण संकटों के मद्देनजर सन् 2019 को ‘देशज ( इंडिजिनस) भाषा वर्ष’ घोषित कर वैश्विक भागीदारी का आह्वान किया है। निस्संदेह यह अपनी देशज भाषायी अधिकारों के लिए लड़ रहे सभी समुदायों का हौसला बढ़ाने वाला है। 29 नवंबर 2018 के भारत सरकार द्वारा देशज भाषाओं की संकटपूर्ण स्थिति पर जारी सर्वेक्षण सूची में झारखंड प्रदेश की लगभग सभी आदिवासी व क्षेत्रीय भाषाओं को ‘कमजोर’ श्रेणी में दिखाई गई है। जो साबित करता है कि किस तरह सत्ता-शासन की घोर उपेक्षा व क्षुद्र राजनीति के कारण आज वे ‘डेंजर जोन’ में जा रही हैं।

bhasha aandolan 2.jpg

30 जनवरी को झारखंड के हो आदिवासी समाज के लोगों को मजबूरन रेल–रोको आंदोलन कर अपनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठानी पड़ी। क्योंकि पिछले कई वर्षों से इस मांग को लेकर स्थानीय से लेकर झारखंड व देश की राजधानी के जंतर-मंतर तक आंदोलनात्मक कार्यक्रम किए जा चुके हैं। जिसका कोई सकारात्मक परिणाम उन्हें आज तक नहीं मिल सका है। हाल ही में राज्य की वर्तमान सत्तारूढ़ भाजपा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जो इसी क्षेत्र से सांसद भी हैं, उन्होंने इस मांग को पूरा कराने का आश्वासन भी दिया था लेकिन कुल मिलाकर मामला जस का तस पड़ा हुआ है।

यह सही है कि किसी भी भाषा या मातृभाषा का आधार जनता होती है लेकिन उसके समुचित संरक्षण और विकसित करने का मुख्य दायित्व सरकार का है। जिसे पूरा करने के सारे नीति निर्देश देश के लोकतान्त्रिक संविधान में स्पष्ट रूप से लिखित हैं। लेकिन यह भी विडम्बना ही है कि जिस झारखंड राज्य गठन के आंदोलन के में यहाँ की देशज भाषा व संस्कृति के विकास का सवाल उसके केंद्रीय मुद्दों में शामिल रहा, राज्य गठन उपरांत बननेवाली पहली एनडीए सरकार द्वारा राज्य में लागू होनेवाले शिक्षा पैटर्न के फैसले ने ही हाशिये पर धकेल दिया। जिसमें सरकार ने ऐलान कर दिया कि पूरे प्रदेश में सीबीएसई पैटर्न की ही पढ़ाई अनिवार्य होगी। राज्य में प्रभावी आदिवासी व क्षेत्रीय भाषाओं को दर किनार कर सीबीएसई पैटर्न की पढ़ाई को ही आधिकारिक शिक्षा पैटर्न बनाया जाना, प्रदेश की व्यापक जनआकांक्षा का सरासर उल्लंघन था। क्योंकि राज्यों के गठन के उपरांत जब दक्षिण के राज्यों समेत पंजाब, असम व पश्चिम बंगाल इत्यादि सभी राज्यों में वहाँ की प्रभावी स्थानीय भाषाओं को ही राज्य की आधिकारिक भाषा की संवैधानिक मान्यता मिली थी। झारखंड प्रदेश के लोगों ने भी आशा की थी कि उनके राज्य में भी उनकी भाषाओं को भी वही दर्ज़ा मिलेगा। लेकिन ऐसा होना तो दूर, यहाँ की सभी आदिवासी-क्षेत्रीय भाषाओं को राज्य में बोली जा रही पड़ोसी राज्य की भाषाओं की श्रेणी में धकेलकर द्वितीय राजभाषा बनाने का नाटक किया गया।  

‘कोढ़ में खाज’ डालने का काम किया है यहाँ के राष्ट्रीय के साथ साथ झारखंड नामधारी दलों व उनके नेताओं के रवैये ने। जिन्होंने यहाँ की भाषा के सवाल को फकत कुर्सी पाने और लोगों से वोट झटकने मात्र का एक क्षुद्र जरिया बना रखा है। जो चुनावी राजनीतिक अभियानों के दौरान अपने भाषणों–प्रचारों  में यहाँ की स्थानीय भाषाओं का भरपूर इस्तेमाल तो करतें हैं लेकिन उसके बाद ‘मतलब निकाल गया तो, पहचानते नहीं!’ हद तो ये है कि अभी तक राज्य में आती जाती सरकारों से लेकर वर्तमान की स्थिर सरकार के द्वारा यहाँ की स्थानीय देशज भाषाओं के पठन-पाठन, पुस्तक प्रकाशन व शिक्षकों की नियुक्ति तथा भाषायी अकादमियों के गठन इत्यादी की कोई सुसंगत योजना भी नहीं बनाई जा सकी है। न ही इस सवाल पर विपक्ष में बैठे दल व नेताओं ने इस सवाल को लेकर कोई बड़ा जन दबाव खड़ा किया। वहीं, इन भाषाओं के विकास के नाम पर सक्रिय संगठन और उसके लेखक–कवि–कलाकार–बुद्धिजीवियों का बड़ा हिस्सा अपनी जनता को जागरूक व सक्रिय बनाने की बजाय सत्ता व राजनेताओं की अनुकंपा की आस लगाए बैठा है। जबकि राज्य से लेकर हर जगह झारखंडी भाषा–संस्कृति का झण्डा लहराने वाले प्रोजेक्ट जुगाड़ू सोशल–बौद्धिक एक्टिविस्ट गण साहित्य अकादमी जैसे संस्थानों के फंड आधारित आयोजन के कार्यों को ही भाषा विकास का मुख्य कार्यभार बनाए हुए हैं।

बहरहाल देखने की बात है कि ‘विश्व देशज भाषा वर्ष’ में सरकारें देशज भाषाओं के विकास के नाम पर कैसी खानापूर्ति करती है। साथ ही देशी–विदेशी एनजीओ मार्का साहित्यिक–सांस्कृतिक संगठनों के अनुदानी भव्य आयोजनों में ‘देशज भाषा बचाओ व बढ़ाओ’ के कितने सदकार्य होते हैं? बावजूद इसके, यह भी सच ही है कि इन सारे प्रायोजित ढकोसलों से परे सामाजिक जन जीवन के धरातल पर अपनी निज भाषा–संस्कृति के सांरक्षण और वास्तविक विकास के प्रति लोगों को सक्रिय और जागरूक बनाने का भी मौका आया है!

bhasha andolan
Jharkhand
ho bhasha
rail roko andolan
tribal communities
Indian constitution
आदिवासी अधिकार
आदिवासी समाज
हो भाषा

Related Stories

झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध

अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा वर्ष: हर दो हफ़्ते में एक भाषा पृथ्वी से हो रही है लुप्त

झारखंड रिपोर्ट : ‘संविधान बचाओ’ नारे के साथ मनाया गया सरहुल


बाकी खबरें

  • द लीफ़लेट
    क्या ट्विटर के पास केवल शिकायतों के आधार पर सामग्री को हटाने और यूज़र्स को ब्लॉक करने की शक्ति है?
    01 Apr 2022
    लगता है दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी ने सहनीय सामग्री और ईशनिंदा के बीच के अंतर को धुंधला कर दिया है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1,335 नए मामले, 52 मरीज़ों की मौत
    01 Apr 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 13 हज़ार 672 हो गयी है।
  • शबनम सुरिता
    आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव के पर्यावरण मिशन पर उभरते संदेह!
    31 Mar 2022
    भारतीय आध्यात्मिक योगी जग्गी वासुदेव, जिन्हें ‘सद्गुरु’ के नाम से भी जाना जाता है, वे मिट्टी-क्षरण से होने वाले नुकसान के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़ाने के लिए बाइक से दुनिया की हजारों किलोमीटर की…
  • सोनिया यादव
    जवानों की बढ़ती आत्महत्या का असल ज़िम्मेदार कौन?
    31 Mar 2022
    ये विडंबना ही है कि जवानों की सबसे अधिक हितैषी बनने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में ही जवानों ने सबसे अधिक खुदकुशी की है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1,225 नए मामले, 28 मरीज़ों की मौत
    31 Mar 2022
    देश में कोरोना से अब तक 5 लाख 21 हज़ार 129 लोग अपनी जान गँवा चुके है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License