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झारखंड : कहीं कमजोर न हो जाये, ‘भाजपा हराओ’ मुहिम!
क्या वजह है कि वर्तमान जन विरोधी सत्ता के विकल्प के तौर पर पेश किए जा रहा विपक्ष के सत्ताधारी दलों का “महागठबंधन”, बतकही और घोषणापत्र में तो जन मुद्दों की बात कर रहा है लेकिन सीट बँटवारे के समय उन्हीं जन मुद्दों को लेकर सबसे अधिक आंदोलनरत रहने वाले वामपंथी दलों को “सीटों के गणित” में सुनियोजित ढंग से बाहर कर दे रहा है।
अनिल अंशुमन
03 Apr 2019
jharkhand mahagathbandhan
Image Courtesy: jagran.com

ख़बरों की मानें तो इस चुनावी महापर्व में झारखंड प्रदेश की सत्ताभक्त मीडिया को तो मानो मुहमांगी मुराद मिल गयी है। क्योंकि राज्य में ‘भाजपा हराओ’ मुहिम का महागठबंधनी कुनबा अभी से ही कुछ बिखरने सा लगा है। कुछ दिनों पूर्व तक मीडिया के जो चुनावी विश्लेषक यह लिख रहे थे कि- यहाँ सीधा मुक़ाबला होगा- लेकिन जब से सीटों के बँटवारे के सवाल पर महागठबंधनी जमात ने वामपंथी दलों को सिरे से नकार कर यह कह दिया कि इन्हें विधानसभा चुनाव के समय सीटें दी जाएंगी। फलस्वरूप वामपंथी दलों को अपना ‘साझा मोर्चा’ बनाकर झारखंड में संसदीय चुनाव लड़ने का ऐलान करना पड़ा। तब से भाजपा विरोधी वोटों के बिखराव को गति देने के लिए तथाकथित चुनाव विश्लेषण पूरे ज़ोरों से फैलाया जा रहा है कि --- तय हो चुके चुनावी परिदृश्य को वामपंथी दलों ने अचानक बदल दिया है और राज्य के वामपंथी दल एकजुट होकर लड़ेंगे। तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया ने वर्तमान चुनावी चर्चाओं से जिस वामपंथ की अपनी खबरों में हाशिये पर रखा था, अचानक उसे ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का महत्व देते हुए लिखा जा रहा है- कांग्रेस ने सूबे में वामपंथी दलों के अस्तित्व को ही नकार दिया है। जबकि राज्य में भाजपा विरोधी मतों का बड़ा हिस्सा वामपंथियों का है।

वैसे मीडिया का उक्त विशलेषण भी कोई हवाई नहीं है। वर्तमान सत्ताधारी दल की देश व जनविरोधी नीतियों और ‘डबल इंजन’ की सरकारों के कुशासन के खिलाफ राज्य में हुए विविध जन आंदोलनों के जरिये ज़मीनी विपक्ष की भूमिका निभाने में वामपंथी दलों की जो प्रभावकारी भूमिका रही है, उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। विशेषकर इस प्रदेश में वर्तमान भाजपा शासन के खिलाफ उभरे व्यापक जन विक्षोभ के स्वर को मुखर बनाने में महागठबंधन के किसी भी “महारथी दलों” की अपेक्षा वाम दलों की सक्रियता अधिक रही है। उदाहरणार्थ- बड़कागाँव-गोला (हजारीबाग–रामगढ़) के विस्थापित किसानों पर गोलीकांड, बालूमाथ-रामगढ़ और जामताड़ा समेत कई स्थानों पर सरकार के राजनीतिक संरक्षण में मुस्लिमों की ‘मॉबलिंचिंग’ के अलावा राज्य में हुईं सांप्रदायिक–हिंसा उन्माद की सैकड़ों घटनाओं जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मुखर प्रतिवाद करने में वामपंथी दलों की सक्रियता अन्य राजनीतिक दलों से अधिक दिखी। रघुवर दास सरकार द्वारा राज्य के किसान-आदिवासीयों की ज़मीन- लूट के लिए लाये गए ‘भूमि अधिग्रहण बिल’, ‘ लैंड बैंक योजना’ समेत सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन और अल्पसंख्यक विरोधी ‘धर्मांतरण बिल’ का मुखर राज्यव्यापी विरोध अभियान संगठित करने में भी इनकी प्रभाकरी भूमिका रही। विशेषकर केंद्र और राज्य सरकार द्वारा तमाम नियम–क़ायदों को धता बताकर झारखंड में कॉर्पोरेट कंपनियों को लूट की खुली छूट की नीति लागू करने तथा विशेषकर राज्य के आदिवासियों व अन्य ग्रामीण गरीबों के विस्थापन–पलायन व इनपर होने वाला सुनियोजित राज्य–दमन, भूख से मौत और अकाल– सुखाड़ इत्यादि अनेकों ज्वलंत सवालों पर भी आदिवासी संगठनों व अन्य सामाजिक जन संगठनों के साथ संयुक्त और स्वतंत्र आंदोलन संगठित करने में वामपंथी दल व उनके संगठन सक्रियता की सबसे अगली पांत में रहे हैं। आलम तो यह भी रहा कि राज्य विधानसभा के अंदर और बाहर सड़कों के सभी ज़मीनी आंदोलन के अभियानों में इन्हीं वामपंथी दलों को ‘विपक्षी महागठबंधन’ ने अपनी हर कार्रवाई में प्रमुखता के साथ शामिल रखा।

विडम्बना है कि भाजपा–राज के खिलाफ मजबूत विपक्ष खड़ा करने के लिए वामपंथी दल जिस ‘महागठबंधन’ के साथ हर कदम पर पूरी मजबूती से खड़े रहे, ऐन चुनाव के मौके पर उसके ‘महारथी दलों’ के नकारात्मक और अपमानजनक रवैये ने प्रदेश के सभी वामपंथी दलों को बेहद निराश किया है। फलतः राज्य की 3 प्रमुख लोकसभा सीटों पर वामदलों की ओर से संयुक्त वाम उम्मीदवार खड़े किए गए हैं। जो इनके सघन कामकाज, संघर्ष और प्रभाव के प्रमुख इलाके माने जाते हैं। जिसमें सीपीएम– राजमहल (संथाल परगना ), सीपीआई– हजारीबाग तथा भाकपा माले– कोडरमा सीट शामिल है। इसके आलवे सीपीआई ने चतरा व दुमका तथा भाकपा माले ने पलामू सीट से भी अपने प्रत्याशी दिये हैं। वामदलों ने स्पष्ट कहा है कि भाजपा को हराने के लिए जहां पिछले चुनावों में उनका अच्छा प्रदर्शन और जनता के ज्वलंत सवालों पर प्रभावकारी सक्रियता रही है, सिर्फ उन्हीं सीटों पर वे चुनाव लड़ेंगे और बाकी सीटों पर महागठबंधन को अपना सक्रिय समर्थन देंगे। क्योंकि वे कतई नहीं चाहेंगे कि ‘भाजपा हराओ’ मुहिम कहीं से भी कमजोर हो और वोटों का बिखराव हो। बावजूद इसके कि सीट बंटवारे में महागठबंधन ने उन्हें समुचित सम्मान नहीं दिया है। यही रणनीति बिहार में भी अपनाई गई है।

हमारे लोकतन्त्र की सार्थकता जनता की जागरूक सक्रियता पर निर्भर होती है। जन मुद्दों पर जनता की सक्रियता ही उसकी लोकतान्त्रिक चेतना का व्यावहारिक रूप होता है। वामपंथी दलों व संगठनों को जन मुद्दों के संघर्षों का प्रणेता माना जाता है। सवाल उठता है कि क्या वर्तमान ‘लोकतन्त्र का महापर्व’ जन मुद्दों से परे रखकर और महज ‘वोट के लिये’ इस्तेमाल करके मनाया जाएगा? अन्यथा क्या वजह है कि वर्तमान जन विरोधी सत्ता के विकल्प के तौर पर पेश किए जा रहा विपक्ष के सत्ताधारी दलों का “महागठबंधन”, बतकही और घोषणापत्र में तो जन मुद्दों की बात कर रहा है लेकिन सीट बँटवारे के समय उन्हीं जन मुद्दों को लेकर सबसे अधिक आंदोलनरत रहनेवाले वामपंथी दलों  को “सीटों के गणित” में सुनियोजित ढंग से बाहर कर दे रहा है। इतना ही नहीं महागठबंधन के वर्तमान प्रतीक युवा नेता ने तो वामपंथ के गढ़ केरल राज्य की एक सीट से अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर भी दी है। ऐसे में चर्चित हिन्दी जनकवि धूमिल जी की आशंका सच न साबित हो जाए कि – लोकतन्त्र एक तमाशा है, जिसकी जान मदारियों की भाषा है!

(लेखक सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं।)

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