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भारत
राजनीति
झारखंड : किसान हैं बदहाल सरकार को है सिर्फ निवेश का ख्याल
सरकार ग्लोबल इन्वेस्टर समिट में मस्त ,किसान कृषि संकट से त्रस्त
अनिल अंशुमन
05 Dec 2018
farmers
image courtesy : Indian Express

रांची में आयोजित ग्लोबल एग्रीकल्चर ऐंड फूड समिट के समापन समारोह में राज्य के मुख्यमंत्री ने बोलते हुए अपनी स्थिति तब हास्यास्पद कर ली जब कांग्रेस और कम्यूनिस्टों से पूछने लगे कि किसानों के लिए उन्होने क्या किया है . इतना ही नहीं इनपर 67 साल किसानों को बरगलाने का आरोप लगाते हुए यह भी भूल गए की बीच में अटल जी का भी शासन रहा था . मंच से जिस समय वे मोदी जी के किसान हित के तथाकथित ' अच्छे कार्यों ' की प्रशस्ति गा रहे थे , उस  समय राजधानी दिल्ली में देश भर से आए हज़ारों – हज़ार किसान मोदी जी की किसान और कृषि विरोधी नीतियों के खिलाफ सड़कों पर मार्च करते हुए उनसे अपनी बरबादी का हिसाब मांग रहे थे . “ अयोध्या नहीं , कृषि संकट का समाधान चाहिए “ के नारे लगाते हुए किसान संसद लगाकर जीने का अधिकार मांग रहे थे . 
 
सुखाड़ से त्रस्त इस राज्य के किसानों को तत्काल राहत और आर्थिक सहायता देने की बजाय राज्य के ख़ज़ाने से करोड़ों खर्च कर किसानों की हितैषी सरकार ने 29 व 30 नवंबर को इस ग्लोबल एग्रीकल्चर ऐंड फूड समिट का आयोजन किया . 16 राज्यों के 10000 किसान प्रतिनिधियों के अलावे चीन व इज़राइल सहित 6 देशों के प्रतिनिधियों की भागीदारी दिखाकर 2020 तक किसानों की आय चौगुनी करने का सब्ज़बाग दिखाया . तथाकथित ‘ किसान विशेषज्ञ ‘ विश्व बैंक के प्रतिनिधि , योजना आयोग के सीईओ , बाबा रामदेव व कोकाकोला जैसी कंपनियों के प्रतिनिधियों को भी बुलाया . इस दो दिनी शाही आयोजन में झारखंड के किसानों को हर साल झेलनेवाले सूखा व अकाल और सींचाई जैसे संकटों से निजात पाने के उपायों पर चर्चा करने की बजाय कहा गया कि अब यहाँ के किसान इज़राइल जाकर खेती के गुर सीखेंगे .

सरकार द्वारा कोई कोल्ड स्टोरेज नहीं बनाने के कारण हर साल सैकड़ों किलो टमाटर व चुकंदर सड़कों पर फेंकने को लाचार किसानों से कहा गया है कि अब यहाँ बाबा रामदेव और कोला जैसी निजी कंपनियाँ फूड प्रोसेसिंग का उद्योग व व्यवसाय लगाएँगी . इसी राज्य के बड़कागाँव और गोड्डा इत्यादी जगहों पर लाठी - बंदूक के बल पर किसानों की बहुफ़सली ज़मीनें छीनकर मुख्यमंत्री जी ने राज्य के किसानों से बहुफ़सली खेती की ओर ध्यान देने का आह्वान करने का मज़ाक किया . आदिवासियों – किसानों की पारंपरिक खेती की ज़मीन छीनने के लिए पाँचवी अनुसूची के तमाम नियमों को धता बताकर थोपे गए ‘ भूमि अधिग्रहण कानून ‘ के हो रहे विरोध की तो चर्चा भी नहीं की गयी . बल्कि निवेश के नाम पर सभी देशी – विदीशी कंपनियों को ‘ सिंगल विंडों ‘ सिस्टम से कौड़ी के मोल ज़मीन के साथ साथ बिना शर्त व बेहद कम इन्टरेस्ट पर कर्ज़ और सबसीडी देने की गारंटी की घोषणा की गयी . 
 
2017 के जून माह से अब तक कर्ज़ और कृषि संकट से जूझते हुए आधा दर्जन से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है तो 15 से अधिक गरीब किसान भूख से मर गए . इस विकट स्थिति पर कोई चिंता दिखलाने के बजाय देश के नीति आयोग के सीईओ महोदय ने राज्य की सरकार के विकास के कसीदे पढ़ते हुए कहा कि इस सरकार में झारखंड ने कृषि विकास में लंबी छलांग लगाई है . आयोजन की शुरुआत प्रधान मंत्री जी के भेजे संदेश से हुआ लेकिन इसमें किसानों के संकटों का कोई ज़िक्र तक नहीं था . 
   

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