NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
घटना-दुर्घटना
मज़दूर-किसान
समाज
भारत
राजनीति
झारखंड : लोकसभा चुनाव : प्रवासी मजदूरों का दर्द नहीं बन सका मुद्दा
एक अनुमान में हर वर्ष 4 लाख से भी अधिक युवा अपने यहाँ काम नहीं मिलने के कारण रोज़गार की तलाश में विदेशी मुल्कों में पलायन करते हैं। निर्माण क्षेत्र के विविध कार्यों, ट्रांसमिशन लाईन व टावर लगाने के काम इत्यादि से लेकर कई अन्य क्षेत्रों में महज़ अकुशल कांट्रैक्ट लेबर के रूप में काम करने वाले इन मज़दूरों में अधिकांश के साथ गुलामों जैसा ही बर्ताव होता है।
अनिल अंशुमन
20 May 2019
jharkhnd worker

14 मई को प्रवासी मज़दूर और बगोदर प्रखण्ड ( गिरिडीह ज़िला ) के ढीबरा गाँव निवासी 34 वर्षीय खीरोधर महतो का ताबूत में रखा शव जब गाँव पहुँचा तो उसकी पत्नी, बच्चे व परिजनों का रुदन-विलाप किसी से देखा नहीं जा रहा था। गत 3 मई को पश्चिमी अफ़्रीका के सिएरा लियोन में काम की असामान्य स्थितियों, ख़राब भोजन और अत्यधिक काम से हुई गंभीर बीमारी ने असमय ही उसकी ज़िंदगी निगल ली थी। इन दिनों ऐसे हृदयबिदारक दृश्य का होना इस इलाक़े में एक स्थायी परिघटना बनती जा रही है। जब आए दिन विदेशों में जाकर मेहनत मज़दूरी करने वाले यहाँ के युवाओं की ताबूतबंद लाशों के आने का सिलसिला बढ्ने लगा है। हालांकि क्षेत्र के प्रवासी मज़दूरों की आए दिन की समस्या–सवालों को लेकर केंद्र के विदेश मंत्रालय तक दौड़ लगाने वाले बागोदर के भाकपा माले नेता व पूर्व विधायक विनोद सिंह और उनकी पार्टी ने इसे चुनाव का एक अहम मुद्दा बनाने की भरपूर मुहिम चलायी। अपने चुनावी अभियान में प्रधानमंत्री जी भी यहाँ आए लेकिन ना तो उन्होंने इस मुद्दे को कोई महत्व दिया और न ही उनके प्रत्याशी को कोई मतलब रहा। ऐसे में यहाँ के प्रवासी मज़दूरों के ख़राब हालात के सवालों से सीधे प्रभावित मतदाताओं ने भी अपने इन ला-इलाज सवालों को चुनाव में कितना महत्व दिया, 23 मई का चुनाव परिणाम ही बता सकेगा। 

प्रवासी - 1.jpg
       
झारखंड प्रदेश के उत्तरी छोटनागपुर के गिरीडीह, हज़ारीबाग़, कोडरमा, बोकारो और धनबाद ज़िले ही वो इलाक़े हैं जहाँ से हर साल सबसे अधिक युवा रोज़गार (मज़दूरी) की तलाश में देश के बड़े महानगरों से लेकर विदेश तक जाते हैं। सरकार की ओर से आज तक कोई व्यवस्थित नीति-नियम नहीं होने के कारण तथाकथित वैध-अवैध प्लेसमेंट कंपनियाँ ही एकमात्र ज़रिया बनती हैं। जो इनकी मजबूरीयों और पैसों का भरपूर दोहन कर मलेशिया, अफ़्रीका, अफ़गानिस्तान और सऊदी अरब इत्यादि देशों में अधिक पैसे मिलने की लालच दिखा कर इन स्थितियों में धकेल देती हैं। जिनमें से अधिकतर को अधिक पैसे मिलने की कोई ख़बर तो नहीं आती, बल्कि कुछ महीनों बाद ही उनके द्वारा जैसे तैसे भेजे गए व्हाट्सअप और मोबाईल मैसेज में ‘वतन वापसी की दर्दनाक गुहार' आती है। 2018 में अफ़गानिस्तान में काम कर रहे 6 मज़दूरों को अज्ञात बंदूकधारियों द्वारा अगवा किए जाने की घटना ने लंबे समय तक परेशान रखा। इसी साल के मार्च महीने में मलेशिया गए 48 मज़दूरों के काम की मीयाद पूरी होने पर मज़दूरी मांगने पर मालिक और ठेकेदार ने महीनों बंधक बनाए रखा। सऊदी अरब के रियाद शहर में 41 मज़दूरों के काम के पैसे मांगने पर मालिक ने उनके वीज़ा व सभी काग़ज़ातों को ज़ब्त कर कई महीने फँसाए रखा।         

एक अनुमान में हर वर्ष 4 लाख से भी अधिक युवा अपने यहाँ काम नहीं मिलने के कारण रोज़गार की तलाश में विदेशी मुल्कों में पलायन करते हैं। निर्माण क्षेत्र के विविध कार्यों, ट्रांसमिशन लाईन व टावर लगाने के काम इत्यादि से लेकर कई अन्य क्षेत्रों में महज़ अकुशल कांट्रैक्ट लेबर के रूप में काम करने वाले इन मज़दूरों में अधिकांश के साथ गुलामों जैसा ही बर्ताव होता है। जिन्हें हर दिन काम की असामान्य स्थितियाँ, ख़राब भोजन और अत्यधिक काम का बोझ झेलने पर भी काम की पूरी मज़दूरी भी नसीब नहीं होती। एक छोटे से कमरे में बीसियों की संख्या में रहने वाले इन मज़दूरों से पूरा सीज़न काम करवाने के बावजूद मालिक और ठेकेदार अक्सर पूरी मज़दूरी नहीं देते। यदि किसी ने मज़दूरी मांगने का साहस किया तो उसके सारे काग़ज़ात छीनकर भीषण यातना देना आम घटना हो गयी है। 

हमारे देश के प्रवासी मज़दूरों के इतिहास के संदर्भ में कहा जाता है कि बरसों पहले यूरोप के देशों में गन्ना उगाने के लिए यहाँ के हज़ारों लोगों को ‘गिरमिटिया मज़दूर' बनाकर ले जाया गया। जिससे ‘सस्ता मज़दूर' के रूप में यहाँ के ग़रीब बेरोज़गारों को विदेशों में ले जाकर खटाने का अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ। जहाँ दिन-रात हाड़ तोड़ मेहनत करने वाले इन मज़दूरों को मालिकों द्वारा कभी पूरी मज़दूरी नहीं दी जाती थी और इनके साथ गुलामों से भी बदतर व्यवहार  किया जाता था। 

विशेषज्ञों के अनुसार आज़ाद भारत में 70 के दशक में प्रवासी मज़दूरों की संख्या में काफ़ी तेज़ी आयी। जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन मज़दूरों की उत्पन्न समस्याओं को देखते हुए तत्कालीन केंद्र की सरकार ने 1976 में लोकसभा से एक केंद्रीय श्रम कानून पारित किया था। लेकिन समाधान के लिहाज़ से वह बहुत कारगर नहीं साबित हुआ। अप्रवासन कानून में यथोचित बदलाव लाकर प्रवासी श्रमिकों को नियोक्ता में बदलने और आए दिन विविध उत्पीड़नों का शिकार होने वालों को उचित मुआवज़ा दिलाने का मामला आज भी जैसे तैसे चल रहा है। प्रवासी मज़दूरों द्वारा भेजे गए पैसों का लाभ तो सरकार उठा रही है लेकिन बाहर के श्रम बाज़ारों की नियमित निगरानी और कार्यस्थलों पर हमारे प्रवासी मज़दूरों की दशा–दिशा का समय -समय पर निरीक्षण करने जैसे मामले तो आज भी किसी सरकार की प्राथमिकता हैं। 
बहरहाल, बागोदर–गिरिडीह और झारखंड समेत देश के विभिन्न इलाक़ों से हर साल विदेशों में रोज़गार ढूँढने का सिलसिला कब रुकेगा, ये देश की सरकार पर ही निर्भर है। साथ ही जो लोग वर्तमान में विदेश जाकर काम कर रहें हैं, इनके शोषण-उत्पीड़न और दुर्दशापूर्ण स्थितियों को हल करने के लिए अपने कूटनीतिक प्रभाव और क्षमता का इस्तेमाल कर ज़रूरी कारगर क़दम उठाने का भी दायित्व इस देश की सरकार का ही है। जिस पर मज़बूत इच्छाशक्ति से ज़मीनी तौर पर सक्रिय हुए बिना खीरोधर महतो जैसे इस देश के प्रवासी मज़दूरों की ताबूतबंद लाशों के आने का सिलसिला कभी नहीं रुक सकेगा।

Jharkhand government
Jharkhand
General elections2019
Labour Laws
unemployment
UNEMPLOYMENT IN INDIA
RURAL Unemployment
Unemployment under Modi govt in India

Related Stories

भारत में हर दिन क्यों बढ़ रही हैं ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाएं, इसके पीछे क्या है कारण?

झारखंड:  रेलवे ठेकदार द्वारा खोदे गड्ढे में डूबकर गांव की 7 बच्चियों की मौत

मेघालय और झारखंड में खदान दुर्घटना में आठ लोगों की मौत, चार लापता

झारखंड: सत्ता से बेख़ौफ़ कार्टूनिस्ट बशीर अहमद का जाना...

झारखंड : विवादित विधानसभा भवन में लगी आग

झारखंड : छात्रा का विवादित कमेंट, कोर्ट की सज़ा और हिन्दू संगठनों की चेतावनी!  

झारखंड : लिंचिंग को ललकार

राम के नाम पर दुनिया में कर दिया बदनाम

झारखंड: बिरसा मुंडा की मूर्ति तोड़े जाने से झारखंडी समाज में आक्रोश

झारखंड विधान सभा चुनाव 2019 : भूख से मरनेवालों की बढ़ती कतार !


बाकी खबरें

  • HATHRAS
    सरोजिनी बिष्ट
    हाथरस कांड का एक साल: बेटी की अस्थियां लिए अब भी न्याय के इंतज़ार में है दलित परिवार
    28 Sep 2021
    मुख्यमंत्री योगी ने पीड़िता के परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया था, इसी के साथ कनिष्ठ सहायक पद पर परिवार के एक सदस्य को नौकरी और हाथरस शहर में ही एक घर के आवंटन की घोषणा भी की गई।…
  • Akhlaq
    मुकुल सरल
    दादरी लिंचिंग के 6 बरस: तुम भी कभी मिले हो? मिलना कभी ज़रूर/ कैसे है जुड़ता-टूटता अख़लाक़ का बेटा
    28 Sep 2021
    उत्तर प्रदेश में दादरी के बिसाहड़ा गांव के अख़लाक़ हत्याकांड को आज पूरे 6 बरस हो गए हैं। 28 सितंबर, 2015 को गोमांस की अफ़वाह फैलाकर जुटाई गई एक उग्र भीड़ ने उन्हें घर में घुसकर पीट-पीटकर मार डाला था…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 6 महीने बाद कोरोना से रोज़ाना हो रही मौत का आंकड़ा 200 से नीचे आया
    28 Sep 2021
    देश में 24 घंटो में कोरोना के 18,795 नए मामले दर्ज किए गए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 36 लाख 97 हज़ार 581 हो गयी है।
  • US
    शिव इंदर सिंह
    अमेरिका में मोदी का क्यों हुआ विरोध?
    28 Sep 2021
    अमेरिका व अन्य देशों में किसान आंदोलन के हक में तथा मोदी सरकार की नीतियों को लेकर पहले भी प्रदर्शन होते रहे हैं। इसी कारण से भारतीय मूल के कई अमेरिकी नेताओं ने भी समय-समय पर मोदी सरकार के कामों और…
  • Photo Essay: Kashmir’s Walnut Industry is on the Decline
    कामरान यूसुफ़
    फ़ोटो आलेख: ढलान की ओर कश्मीर का अखरोट उद्योग
    28 Sep 2021
    कश्मीर में अखरोट उगाने की प्रक्रिया में मशीनीकरण की कमी है, इससे पैदावार कम होता है और फ़सल की गुणवत्ता भी ख़राब हुई है, लिहाज़ा कश्मीर के अखरोट उत्पादकों को इस समय निर्यात में गिरावट का सामना करना…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License