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झारखंड रिपोर्ट : युवा आदिवासी पत्रकार की हत्या से उठते सवाल !
14 दिसंबर की सर्द शाम को युवा आदिवासी पत्रकार अमित टोपनो की हत्या के खिलाफ “ जस्टिस फार अमित “ के लिए प्रदेश की राजधानी रांची की सड़कों पर काली पट्टी बांधकर विरोध प्रकट करते हुए कैन्डल मार्च निकाला गया ।
अनिल अंशुमन
15 Dec 2018
प्रदर्शन

14 दिसंबर की सर्द शाम को युवा आदिवासी पत्रकार अमित टोपनो की हत्या के खिलाफ “ जस्टिस फार अमित “ के लिए प्रदेश की राजधानी रांची की सड़कों पर काली पट्टी बांधकर विरोध प्रकट करते हुए कैन्डल मार्च निकाला गया । विडम्बना है की चंद दिनों पूर्व ही पत्रकारों पर हुए पुलिस लाठी चार्ज के खिलाफ सभी मीडीयाकर्मी व पत्रकार संगठनों ने जो सरगर्मी दिखाई थी , जाने क्यों इस हत्या पर सब खामोश रहे । अधिकांश अखबारों के लिए तो शुरू में यह हत्या ख़बर भी नहीं बनी । ऐसे में नागरिक व मानवाधिकार के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता , फिल्मकार , बुद्धिजीवी और विभिन्न आदिवासी व सामाजिक जन संगठनों के सदस्यों तथा आदिवासी छात्र – युवाओं ने इस प्रतिवाद कार्यक्रम के ज़रिये नागरिक समाज से अमित टोपनो की हत्या कांड पर सबसे संज्ञान लेने की अपील की है । कार्यक्रम में शामिल विभिन्न जन संगठनों का साझा मोर्चा एआईपीएफ ने सरकार से हाई कोर्ट के न्यायाधीश की निगरानी में इस हत्या की न्यायिक जांच व दोषियों को अविलंब सज़ा देने की मांग की है । 

अमित टोपनो कुछ माह पूर्व ही खूंटी में चर्चित हुए पत्थलगड़ी अभियान समेत कोचांग दुष्कर्म कांड की सबसे विश्वसनीय रिपोर्टिंग से मीडिया जगत में चर्चा में आए थे । खूंटी में वीडियो वोलंटरी का काम करते हुए वे स्थानीय वेब पोर्टल न्यूज़ कोड के संवादता रहे । जिसके बंद हो जाने के बाद आर्थिक तंगी के संकटों से जूझते हुए वे रांची में ओला कैब के ड्राइवर की नौकरी कर रहे थे । अनुमान के अनुसार 8 नवंबर को इनकी हत्या कर लाश को डोरन्डा थाना के घाघरा बस्ती के पास फेंक दिया गया था । 9 दिसंबर की सुबह जब स्थानीय लोगों ने देखा तो पुलिस को सूचना देकर बुलाया । लाश की तत्काल कोई शिनाख्त न कर पाने के कारण पुलिस ने उसे लावारिस घोषित कर पोस्टमार्ट्म के लिए भेज दिया था । उधर अमित के रात में घर नहीं पहुँचने और मोबाइल बंद मिलने के कारण 8 दिसंबर की रात से ही घर के लोग और मित्रगण सभी चिंतित थे । अज्ञात लाश मिलने की खबर सुनकर घर के लोग आशंका लिए रिम्स पोस्टमार्ट्म रूम पहुंचे जहां अमित की बहन ने उनकी शिनाख्त की । फिर भी अमित की लाश लेने के लिए उन्हें घूस देना पड़ा ।
     
अमित टोपनो को साहस भरी रिपोर्टिंग के लिए आदिवासी समाज का  उभरता हुआ होनहार पत्रकार माना जाता था । वे अपने खर्चे से दुर्गम आदिवासी इलाकों के सुदूर गांवों तक जा जाकर विकास की रौशनी से वंचित जीनेवाले लोगों की पीड़ा और उनके सवालों की वीडियो बनाकर जारी करते थे । आदिवासी समुदाय के विभिन्न सामाजिक सवालों पर भी बढ़ चढ़ कर सक्रिय रहते थे । पत्थलगड़ी के सवाल पर जब प्रदेश की सरकार और आदिवासी समाज का टकराव खड़ा हुआ तो खूंटी के इलाकों में होनेवाले राज्य का दमन और उस समय की ज़मीनी हक़ीक़त की जानकारी अमित की ही रिपोर्टिंग से ही मिलती थी । देश भर में चर्चित हुए कोचांग सामूहिक दुष्कर्म कांड के कई अदृश्य पहलुओं का खुलासा अमित की रिपोर्टिंग ने की थी । साथ ही जंगल क्षेत्र में सत्ता – प्रशासन साँठ गांठ से चल रहे कई अवैध कारोबारों को उजागर करनेवालों में अमित सबसे अधिक सक्रिय थे ।

आज खूंटी और राजधानी के आदिवासी समाज के लोग अमित की की इस प्रकार की गयी हत्या से काफी आशंकित हैं । पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अमित के सिर में गोली मारने के आलवे अन्य शरीर पर और कोई निशान नहीं होने की रिपोर्ट से सबका का यही शक है कि हत्या सुनियोजित तरीके से कहीं और की गयी है । रांची में जिस ओला कैब को अमित चला रहे थे उसकी भी अबतक बरमदगी नहीं हुई है । हालांकि स्थानीय प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि वे इस मामले पर कोई कसर नहीं रखेगा । लेकिन अमित के परिजनों और मित्रों का कहना है कि यह साफ तौर पर सुनियोजित ह्त्या है इसलिए हमारी मांग है कि इस हत्या की गहराई से जांच पड़ताल कर दोषी को जल्द से जल्द पकड़ा जाय । राज्य के मीडिया जगत में अमित की हत्या को महत्व नहीं दिये जाने से भी आदिवासी समाज के लोग मर्माहित और क्षुब्ध हैं । सबको यही लग रहा है कि अमित के आदिवासी होने के कारण ही किसी ने संज्ञान नहीं लिया है । मुख्य धारा के समाज से आनेवाले पत्रकारों पर हुए छोटे हमले तक को बड़ी सुर्खियों में लाया जाता है लेकिन अमित टोपनो की हत्या जैसी संगीन घटना को कोई महत्व दिया गया ।
 
14 दिसंबर के प्रतिवाद कैन्डल मार्च में शामिल मानवाधिकार , आदिवासी व सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने मीडिया के सामने आदिवासी हित की दुहाई देनेवाली राज्य सरकार की और चुप्पी पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि वह राज्य के लोगों को सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल है । वर्तमान सरकार का शासन अराजक और दमनकारी हो गया है । ऐसे में राज्य का नागरिक समाज अब और तमाशाई नहीं बना रहेगा । आनेवाले दिनों में अमित टोपनो की हत्या समेत राज्य में बढ़ रही अन्य हत्याओं के साथ साथ बढ़ते महिला उत्पीड़न , लोगों की सामाजिक सुरक्षा , भूमि लूट और सरकार की दमनकारी नीतियों जैसे सवालों पर बड़ा जन दबाव खड़ा कर सरकार को घेरा जाएगा । 

Jharkhand
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