NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
झारखंड : योजनाओं का अंबार, फिर भी किसान क़र्ज़ से लाचार!
बीते 25 दिनों के अंदर झारखंड में तीन किसानों ने क़र्ज़ के चलते आत्महत्या कर ली है। राज्य की सरकार किसानों की हितैशी होने के दावे करती है, लेकिन प्रदेश में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ें कुछ और ही तस्वीर पेश कर रहे हैं।
सोनिया यादव
21 Aug 2019
Farmers suicides in Jharkhand
Farmers suicides in Jharkhand

हमें अक्सर ये सुनने को मिलता है कि भारतीय किसान कर्जे में पैदा होता है और कर्जे में ही मर जाता है लेकिन शायद यही हमारे समाज की सच्चाई भी है। बीते 25 दिनों के अंदर झारखंड में तीन किसानों की आत्महत्या इस बात को न केवल सही साबित करती है अपितु हमारी पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी लगाती है।

राज्य में बीजेपी करी रघुबर सरकार किसानों की हितैशी होने के दावे करती है, लेकिन बीते दिनों प्रदेश में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ें इस बात की तस्दीक करते हैं कि देश के अन्नदाता के हालात चिंताजनक है।

'द प्रिंट' की खबर के अनुसार झारखंड के गढ़वा जिले के किसान शिवकुमार ने 12 अगस्त की रात क़र्ज़ से परेशान होकर अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ फांसी लगा ली। इससे पहले बीते 30 जुलाई को गुमला जिले के शिवा खड़िया नामक किसान ने आत्महत्या की थी। इसके पीछे का कारण भी क़र्ज़ ही था। वहीं इन दोनों से पहले 27 जुलाई को रांची जिले के लखन महतो ने अपने ही कुएं में कूदकर जान दे दी। लखन की पत्नी के अनुसार इसकी वजह भी क़र्ज़ ही था।

हैरानी की बात है कि इस वक्त झारखंड में किसानों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं को मिलाकर कुल 133 योजनाएं चल रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इन सब के बावजूद अगर किसान आत्महत्या करने को मज़बूर है तो इसका जिम्मेदार कौन है और किसानों को लेकर सरकार के दावों में कितनी सच्चाई है?

गौरतलब है कि ये हालात अचानक नहीं बने। राज्य के किसान साल की शुरुआत से ही अपनी परेशानियां बयां करते रहे हैं। शायद आपको याद हो, एक फरवरी को रांची जिले के ही कुडू सब्जी मंडी में दस से अधिक गांवों के किसानों ने टमाटर की सस्ती खरीद के विरोध में सैकड़ों टन टमाटर सड़क पर फेंक दिए थे। उनका कहना था कि उन्हें सब्जी लाने में खर्च हुए किराया भी नहीं मिल रहा था।

डायरेक्टर एग्रिकल्चर की ओर से जारी डेटा के मुताबिक पूरे राज्य में इस साल अब तक मात्र 36 प्रतिशत धान की रोपाई हो सकी है। वहीं मात्र 22 एमएम बारिश हुई है। आठ जिलों में तो 8 प्रतिशत से भी कम बारिश हुई है। ऐसे में किसानों पर इसका असर पड़ना लाज़मी है।

कृषि विशेषज्ञ रविंदर शर्मा ने न्यूज़क्लिक को बताया कि एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक 1995 से 2015 तक पूरे भारत में 3,18,528 किसानों ने आत्महत्या की है। किसानों की इस समस्या से सरकार अवगत है। किसानों के लिए योजनाएं भी बहुत है लेकिन इस वक्त जरूरत है उन योजनाओं के लाभ को सुनिश्चित करने की।

झारखंड में कृषि के क्षेत्र में बीस साल से अधिक काम करने वाली संस्था जीन कैंपेन के दीपक सहाय का कहना है कि यहां के किसान खेती के अलावा जंगल पर भी निर्भर हैं। धीरे-धीरे उनके हाथों से खेतों के साथ-साथ जंगल भी निकल रहे हैं, जिस वजह से वे क़र्ज़ में डूबते जा रहे हैं।

किसानों की आत्महत्या के संबंध में साल 2018 में टीएमसी सांसद दिनेश त्रिवेदी के सवालों का जवाब देते हुए संसद में तत्कालीन कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा था कि 2016 से अब तक किसानों के आत्महत्या से जुड़ा डेटा सरकार के पास नहीं है। एनसीआरबी ने इसे जारी नहीं किया है।

झारखंड में राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (एसएलबीसी) की आखिरी बैठक के बाद जारी आंकड़ों की माने तो झारखंड में अब तक मात्र 18 लाख किसानों को ही किसान क्रेडिट कार्ड बांटा गया है। साल 2018-19 में मात्र छह लाख किसानों ने ही इसका इस्तेमाल किया है। बाकि 12 लाख निष्क्रिय रहे।

19 जुलाई को दैनिक जागरण में छपी खबर के मुताबिक जून माह में कृषि मंत्री रणधीर सिंह ने सुखाड़ को देखते हुए घोषणा किया कि फसल बीमा प्रीमियम का भुगतान सरकार करेगी। इस घोषणा के बाद किसानों ने फसल बीमा नहीं कराया। अगर वो ऐसा करते तो उन्हें अपने हिस्से का प्रीमियम भरना पड़ता। इधर मंत्री ने घोषणा तो कर दी, लेकिन इस संबंध में विभागीय आदेश जारी नहीं किया गया है। किसान बीच में फंसकर रह गया है।

इस वित्त वर्ष में किसानों को 3824.82 करोड़ रुपए ही बांटे गए हैं। यह कुल लक्ष्य का 46 प्रतिशत ही है। सरकार को यह भी नहीं पता है कि इस वित्त वर्ष में कितने किसानों ने किसान क्रेडिट कार्ड के तहत आवेदन दिया है और कितनों को लोन मिला है।

न्यूज़क्लिक ने इस संबंध में राज्य के कृषि मंत्री रंधीर सिंह के विभाग से भी सवाल किए हैं, लेकिन खबर लिखे जाने तक हमें कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है।

यहां साल 2018 में भी किसान सुखाड़ झेल चुके हैं। 2018 में 18 जिलों के 129 प्रखंड को सूखाग्रस्त घोषित किया गया था। वहीं साल 2015 में 15.88 लाख हेक्टेयर खेत में 25.69 लाख मिट्रिक टन धान का उत्पादन किया गया था। जबकि साल 2016 में इतने ही खेत में 49.88 लाख मिट्रिक टन उत्पादन हुआ था।

ठाकुरगांव के किसान रामराज ने न्यूज़क्लिक को बताया कि, यहां ज्यादातर किसान साल में एक ही फसल उगाते हैं, ऐसे में अगर फसल ख़राब हो जाती है तो किसान टूट जाता है, उसके घर में तबाही आ जाती है।

खेती के क्षेत्र में सालों से काम कर रहे विकास भारती संस्था के राजीव पांडेय कहते हैं कि झारखंड के किसानों में आत्महत्या का बड़ा कारण क़र्ज़ है। उन्होंने बताया कि यहां उचित सिंचाई की व्यवस्था का न होना प्रमुख समस्या है।

पलामू के किसान दयाकुमार मे न्यू़ज़क्लिक से कहा कि किसानों के लिए योजनाएं हैं। लेकिन हम उत्पादन और मंडी के बीच बिचौलियों के चक्कर में फंस जाते हैं। बैंक के चक्कर में गरीब किसान कहां समय बर्बाद करने की सोच सकता है, हमारे यहां साहूकार आसानी से ब्याजों पर पैसा दे देते हैं बाद में हमारी फसल का हिस्सा भी लेते हैं। जिससे कई बार छोटे किसानों के हाथों में कुछ नहीं बच पाता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद प्लांडू (रांची) में शोध कर चुके देवेंद्र कुमार के मुताबिक फसल के उचित्त दाम न मिलने की वजह से किसान आत्महत्या की ओर बढ़ रहे हैं। राज्य में सिंचाई और बिजली की उचित्त सुविधा न होना भी एक बड़ा कारण है।

 

गौरतलब है कि झारखंड कृषि बजट 2017-18 के मुताबिक राज्य में कुल कृषि भूमि के 80 प्रतिशत हिस्सों में एकफसलीय खेती होती है। पूरे राज्य में मात्र 13 प्रतिशत सिंचित भूमि (सिंचाई की उचित्त सुविधा) है। सरकार का दावा है कि कुल 30 प्रतिशत हिस्सों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई गई है, साथ ही वह खुद ही ये मानती है कि इन जगहों पर खेती शुरू नहीं हो पाई है।

जाहिर है कि राज्य में किसानों की स्थिति चिंताजनक है। सरकार को किसानों की योजनाओं के लाभ को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। केवल दावों और कागजों से हटकर किसानों की ज़मीनी हकीकत से रूबरू होने की जरूरत है तभी शायद हम किसानों की मनोदशा को समझ सकते हैं और बढ़ती आत्महत्याओं को भी रोकने के लिए सही कदम उठा सकते हैं।

Jharkhand government
farmer suicides
Raghubar Das
Randhir Kumar Singh
Jharkhand
Governmnet Schemes

Related Stories

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

झारखंड: नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन सत्याग्रह जारी, संकल्प दिवस में शामिल हुए राकेश टिकैत

झारखंड: केंद्रीय उद्योग मंत्री ने एचईसी को बचाने की जवाबदेही से किया इंकार, मज़दूरों ने किया आरपार लड़ाई का ऐलान

बाघमारा कोल साइडिंग में छंटनी का विरोध कर रहे मज़दूरों पर प्रबंधन ने कराया लाठीचार्ज

भारत बंद अपडेट: झारखंड में भी सफल रहा बंद, जगह-जगह हुए प्रदर्शन

झारखण्ड: आदिवासियों का कहना है कि सरना की पूजा वाली भूमि पर पुलिस थाने के लिए अतिक्रमण किया गया

नेपाल में झारखंड के 26 मजदूर कोरोना जैसी बीमारी से ग्रस्त, वापस लाने के लिए बस की व्यवस्था की गई

झारखण्ड में सब इंस्पेक्टर रूपा तिर्की की मौत की सीबीआई जांच के लिए आदिवासी समुदाय का विरोध प्रदर्शन   

झारखंड: निजीकरण के ख़िलाफ़ असरदार रही बैंक हड़ताल, समर्थन में केंद्रीय ट्रेड यूनियनें भी उतरीं!

झारखंड, बिहार: ज़ोरदार रहा देशव्यापी रेल चक्का जाम


बाकी खबरें

  • cartoon
    भाषा
    आईएमए का उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से कांवड़ यात्रा की इजाज़त नहीं देने का आग्रह
    13 Jul 2021
    एक पत्र में महामारी की तीसरी लहर को लेकर चिकित्सा विशेषज्ञों की चेतावनी की ओर मुख्यमंत्री का ध्यान दिलाते हुए, आईएमए के राज्य सचिव अमित खन्ना ने उनसे कांवड़ा यात्रा के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं देने का…
  • पड़ताल: पंजाब में गहराता बिजली संकट और चुनावी वायदे
    शिव इंदर सिंह
    पड़ताल: पंजाब में गहराता बिजली संकट और चुनावी वायदे
    13 Jul 2021
    बिजली संकट ने खेती व् औद्योगिक क्षेत्र को गहरी चोट दी है। लोग अकाली दल द्वारा उनके राज में प्राइवेट कंपनियों के साथ किये गये बिजली समझौतों की आलोचना कर रहे हैं साथ ही कप्तान अमरिंदर सरकार की भी…
  • वर्ष 2020 में दुनिया में भूखे और कुपोषितों की संख्या में ख़तरनाक वृद्धि देखी गईः यूएन रिपोर्ट
    पीपल्स डिस्पैच
    वर्ष 2020 में दुनिया में भूखे और कुपोषितों की संख्या में ख़तरनाक वृद्धि देखी गईः यूएन रिपोर्ट
    13 Jul 2021
    ये रिपोर्ट कोविड-19 महामारी, जलवायु परिवर्तन और संघर्षों को दुनिया में बढ़ती भूख के प्रमुख कारणों के रूप में रेखांकित करती है और दुनिया की सरकारों से सामाजिक खर्च बढ़ाने, खाने वाली चीज़ों को उपजाने के…
  • इतिहासकार की हिरासत को लेकर व्यापक आलोचना के बाद इजिप्ट ने ज़मानत पर रिहा किया
    पीपल्स डिस्पैच
    इतिहासकार की हिरासत को लेकर व्यापक आलोचना के बाद इजिप्ट ने ज़मानत पर रिहा किया
    13 Jul 2021
    बर्लिन स्थित अलेक्जेंडर वॉन हंबोल्ट फ़ाउंडेशन में इजिप्ट की एक इतिहासकार और पोस्ट डॉक्टरल फेलो आलिया मोसलम को ज़मानत पर रिहा करने से पहले उन्हें हवाई अड्डे पर 17 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया…
  • सुप्रीम कोर्ट
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा-बिहार में कानून का नहीं बल्कि पुलिस का राज है, विपक्षी हुआ हमलावर
    13 Jul 2021
    बिहार में विपक्षी वाम दल माले ने कहा पुलिस राज संबंधित सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने बिहार सरकार की पोल खोल दी है। जबकि राजद ने कहा बिहार पुलिस वह हर काम करती है जो किसी सभ्य समाज की पुलिस के लिए अपराध…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License