NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
आज भी न्याय में देरी का मतलब न्याय न मिलना ही है
आज़ादी के 74 साल बाद भी, न्याय व्यवस्था उचित समयसीमा के अंदर काम नहीं करती है।
ओशी सक्सेना
05 Aug 2021
आज भी न्याय में देरी का मतलब न्याय न मिलना ही है

आज़ादी के 74 साल बाद भी, न्याय व्यवस्था उचित समयसीमा के अंदर काम नहीं करती है। न्याय व्यवस्था पर निर्भर हज़ारों लोग फ़ैसले में देरी होने की वजह से परेशान होते हैं और उन्हें न्याय नहीं मिलता। हाल ही में एक 108 साल के शख़्स की मौत हो गई, और उसने जो 1968 में ज़मीन विवाद का मामला दायर किया था, सुप्रीम कोर्ट में उसकी सुनवाई लंबित ही रह गई। ओशी सक्सेना लिखती हैं कि लंबित मामलों की वजह से निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होता है।

—-

108 साल के सोपन नरसिंह गायकवाड़ ने 1968 में ज़मीन विवाद का एक मामला दायर किया था, हाल ही में उनकी मौत हो गई और सुप्रीम में उनकी सुनवाई तक नहीं हो सकी। यह मामला बॉम्बे हाई कोर्ट में 27 साल तक लंबित रहा और फिर उसे ख़ारिज कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने 12 जुलाई को उनकी अपील पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की, जब उनके वकील ने तर्क दिया कि देरी इसलिए हुई क्योंकि बुजुर्ग याचिकाकर्ता ग्रामीण महाराष्ट्र में रहते थे और उच्च न्यायालय के फैसले के बारे में बहुत बाद में पता चला। कोविड -19 महामारी के प्रोटोकॉल की वजह से भी उन्हें देरी हुई।

गायकवाड़ ने 1968 में एक पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से जमीन का एक भूखंड खरीदा था। उन्हें बाद में पता चला कि मूल मालिक द्वारा लिए गए ऋण की वजह से इसे बैंक के पास गिरवी रखा गया था। जब पिछले मालिक ने पुनर्भुगतान में चूक की, तो बैंक ने गायकवाड़ को सूचित किया।

याचिकाकर्ता के वकील विराज कदम ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया, "दुर्भाग्यवश, जो शख़्स इस मामले को ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक लेकर गया, वह यह सुनने के लिए इस दुनिया में नहीं है कि आख़िरकार इस मामले की सुनवाई करने को कोर्ट राज़ी हो गया है।"

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और हृषिकेश रॉय की पीठ ने 2015 और 2019 में पारित दो उच्च न्यायालय के आदेशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने में दो 1,467-दिन और 267-दिन की देरी को माफ़ करने के आवेदन पर नोटिस जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने आठ सप्ताह के भीतर विरोधी पक्ष से एक प्रतिक्रिया का अनुरोध भी किया।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, "हमें ध्यान देना चाहिए कि याचिकाकर्ता 108 साल के थे, और उच्च न्यायालय ने मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं किया, और अधिवक्ताओं की ग़ैर-मौजूदगी के कारण मामला ख़ारिज कर दिया गया।"

पीठ ने कहा कि जब 2015 में उनका मामला ख़ारिज हो गया था, तब उनके वकीलों को उन्हें ढूँढने में मुश्किल हुई होगी क्योंकि वह ग्रामीण इलाक़े में रहते थे। इसने कदम की इस दलील को नोट किया कि निचली अदालत की डिक्री को पहली अपीलीय अदालत ने उलट दिया था, जबकि बॉम्बे हाई कोर्ट में दूसरी अपील 1988 से लंबित थी।

अदालतों में कई मामले लंबित हैं जो एक दशक या उससे अधिक समय तक अनसुलझे रहते हैं। हर दिन इस ढेर में और जुड़ते जाते हैं, क्योंकि अदालतें उनसे निपटने में असमर्थ होती हैं।

भोपाल गैस त्रासदी मामला

न्याय व्यवस्था की सुस्ती का एक और उदाहरण भोपाल गैस त्रासदी का मामला है। यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी ने 5 लाख से ज़्यादा लोगों को बर्बाद कर दिया और उसका असर आज भी वहाँ रहने वालों पर पड़ रहा है। यह मामला अदालत में सालों तक खींचा गया मगर सिर्फ़ 7 लोगों को सज़ा सुनाई गई थी, वह भी सिर्फ़ 2 साल की।

कंपनी ने मुआवजे के रूप में $470 मिलियन का भुगतान करके पल्ला झाड़ लिया। हालांकि, कई पीड़ितों को अभी तक इस विपत्ति के कारण हुए निर्विवाद नुकसान के लिए मुआवज़ा नहीं मिला है। एक लंबी और जटिल क़ानूनी लड़ाई शुरू हुई, लेकिन पीड़ित तीन दशक बाद भी न्याय की उम्मीद कर रहे हैं।

जेसिका लाल मामला : सच और न्याय की एक लंबी लड़ाई

जेसिका लाल की हत्या एक हाई-प्रोफाइल मामला था जिसे कोई नहीं भूल सकता। 30 अप्रैल, 1999 की तड़के, एक सेलिब्रिटी बारमेड जेसिका लाल की मनु शर्मा ने भीड़-भाड़ वाली पार्टी में गोली मारकर हत्या कर दी थी। मनु हरियाणा के एक धनी और प्रभावशाली पूर्व कांग्रेसी विनोद शर्मा का बेटा है।

रात के लिए बार बंद होने के बाद शराब परोसने से इनकार करने पर शर्मा ने उसकी हत्या कर दी। पहले मुकदमे के दौरान, जो 21 फ़रवरी, 2006 को समाप्त हुआ, मनु और अन्य को बरी कर दिया गया। अभियोजन पक्ष के गवाह मुकर गए थे, और एक ने बेतुके 2-वेपन थियोरि का भी प्रस्ताव रखा था। कई लोगों का मानना है कि गवाहों पर अपनी कहानी बदलने का भारी दबाव था।

सालों बाद, दिसंबर 2007 में, शर्मा को आख़िरकार उम्रकैद की सजा सुनाई गई। 1 जून, 2020 को, वह तिहाड़ जेल से बाहर चला गया, दिल्ली सरकार के सजा समीक्षा पैनल द्वारा उसे उसके "अच्छे आचरण" के लिए समय से पहले रिहा कर दिया गया।

एनसीएमएससी रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी चेतावनी

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर निराशा ज़ाहिर की कि नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम्स कमेटी(एनसीएमएससी) की 2019 की रिपोर्ट को लागू करने में अभी भी बहुत समय है।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने कहा, "अगर केंद्र और राज्यों पर छोड़ दिया जाए, तो सुप्रीम कोर्ट में कोई काम नहीं होगा। सरकार सबसे बड़ी याचिकाकर्ता है और हर मामले में, कुछ अपवादों के साथ, समय के लिए एक आवेदन होता है।"

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस एके सीकरी के नेतृत्व में एनसीएमएससी के अध्ययन ने न्यायिक सुनवाई को मानकीकृत करने और केस बैकलॉग को कम करने के लिए कदमों की सिफारिश की। नवंबर 2019 में, NCMSC ने पांच-खंड की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी।

जनवरी 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करने को कहा था। पिछले हफ़्ते तक डेढ़ साल बीतने के बाद भी दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने अभी भी अपना जवाब दाखिल नहीं किया है।

नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार, न्यायपालिका को लगभग 3 करोड़ मामलों के बड़े पैमाने पर बैकलॉग से जूझना पड़ता है। प्रति 10 लाख नागरिकों पर 17 न्यायाधीशों के साथ, नागरिकों से न्यायाधीशों का अनुपात अत्यधिक अपर्याप्त है।

भारत में एक जटिल क़ानूनी प्रणाली है। मामलों को अवर से बेहतर अदालतों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, नए तर्क और सबूत पेश किए जाने चाहिए, और तारीखें कभी-कभी एक वर्ष के लंबे अंतराल के बाद दी जाती हैं।

पुन: परीक्षण होते हैं, और बिना किसी ठोस क़ानूनी परिणाम के वर्षों या दशकों बीत जाते हैं। सरकार को इन समस्याओं का समाधान खोजना चाहिए, क्योंकि अनावश्यक रूप से देरी उन लोगों के लिए जीवन को भयानक बना देती है जो न्याय के लिए कभी न ख़त्म होने वाली खोजों को शुरू करने का निर्णय लेते हैं।

(ओशी सक्सेना सिंबायसिस इंस्टीट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड कम्युनिकेशन, पुणे से पत्रकारिता में मास्टर्स कर रही हैं। वह वंचितों की आवाज़ उठाना चाहती हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

सौजन्य: द लीफ़लेट

justice
Bombay High Court
Supreme Court
Covid-19 Pandemic
Bhopal gas tragedy case
National Court Management Systems Committee

Related Stories

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

पंजाब सरकार के ख़िलाफ़ SC में सुनवाई, 24 घंटे में 90 हज़ार से ज़्यादा कोरोना केस और अन्य ख़बरें

जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?

100 करोड़ वैक्सीन डोज़ : तस्वीर का दूसरा रुख़

खोरी गाँव में घरों का तोड़ा जाना शुरू, यूपी सरकार को SC का नोटिस और अन्य ख़बरें

महामारी के दौरान बुज़ुर्गों से बदसलूकी के मामले बढ़े

खाद्य सुरक्षा से कहीं ज़्यादा कुछ पाने के हक़दार हैं भारतीय कामगार

न्यायालय ने मोदी सरकार को गलती सुधारने का मौका दिया: कांग्रेस

स्टरलाइट विरोधी प्रदर्शन के दौरान हुई हत्याओं की जांच में अब तक कोई गिरफ़्तारी नहीं

परिवार के किसी सदस्य के कोरोना से संक्रमित होने पर उम्मीदवार सीए परीक्षा से हट सकते हैं : न्यायालय


बाकी खबरें

  • leather industry
    न्यूज़क्लिक टीम
    बंद होने की कगार पर खड़ा ताज नगरी का चमड़ा उद्योग
    10 Feb 2022
    आगरा का मशहूर चमड़ा उद्योग और उससे जुड़े कारीगर परेशान है। इनका कहना है कि सरकार इनकी तरफ ध्यान नही दे रही जिसकी वजह से पॉलिसी दर पॉलिसी इन्हें नुकसान पे नुक्सान हो रहा है।
  • Lakhimpur case
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर कांड: मुख्य आरोपी और केंद्रीय मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा को मिली ज़मानत
    10 Feb 2022
    केंद्रीय मंत्री के बेटे की ओर से पेश वकील ने अदालत से कहा था कि उनका मुवक्किल निर्दोष है और उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है कि उसने किसानों को कुचलने के लिए घटना में शामिल वाहन के चालक को उकसाया था।
  • uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव : टिहरी बांध से प्रभावित गांव आज भी कर रहे हैं न्याय की प्रतीक्षा!
    10 Feb 2022
    उत्तराखंड के टिहरी ज़िले में बने टिहरी बांध के लिए ज़मीन देने वाले ग्रामीण आज भी बदले में ज़मीन मिलने की आस लगाए बैठे हैं लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
  •  Bangladesh
    पीपल्स डिस्पैच
    बांग्लादेश: सड़कों पर उतरे विश्वविद्यालयों के छात्र, पुलिस कार्रवाई के ख़िलाफ़ उपजा रोष
    10 Feb 2022
    बांग्लादेश में शाहजलाल विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई के बाद, देश के कई विश्वविद्यालयों में छात्र एकजुटता की लहर दौड़ गई है। इन प्रदर्शनकारी छात्रों ने…
  • Newsletter
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    वैश्विक निरक्षरता के स्थिर संकट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ
    10 Feb 2022
    संयुक्त राष्ट्र ने नोट किया कि 'दुनिया भर में 150 करोड़ से अधिक छात्र और युवा कोविड-19 महामारी के कारण बंद स्कूल और विश्वविद्यालयों से प्रभावित हो रहे हैं या प्रभावित हुए हैं'; कम से कम 100 करोड़…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License