NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कैग रिपोर्ट : रेलवे के पास अपने 207 ठेकों के आंकड़े ही नहीं, 172 ठेके बिना लाइसेंस के
कैग ने साल 2014 से लेकर 2017 तक 463 ठेकों के स्थिति की समीक्षा की। कैग ने पाया कि इसमें से 172 ठेकों को रेलवे से कभी लाइसेंस ही हासिल नहीं हुआ। 207 ठेकों से जुड़े आंकड़ें ही नहीं मिले। केवल 84 ऐसे ठेके थे जिनपर रेलवे प्रशासन के पास कुछ आंकड़ें उपलब्ध हैं।
अजय कुमार
25 Jan 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: commons.wikimedia

पीयूष गोयल के पास रेल मंत्रालय है। मौजूदा सरकार में यह एक ऐसे नेता हैं जिनकी मेहनती छवि गढ़ने में मीडिया भी बखूबी भूमिका निभाती है, लेकिन रेलवे की वास्तविक हालत पर मीडिया के पास बात करने का समय नहीं है। उसे छवियां गढ़ने से मतलब है और छवियों के जरिये राजनीति करने वालों से सरोकार है। इन छवियों से इतर अभी हाल में ही रेलवे में काम करने वाले ठेका मजदूरों पर कैग (CAG) ने रिपोर्ट जारी की है, जिनकी संख्या 90 हजार से भी अधिक है। 

भारतीय रेलवे कई तरह के काम करता है। रेलवे के रखरखाव से लेकर रेलवे के सारे जरूरी ढांचे जैसे कि ट्रैक, कोच, स्टेशन, लोकोमोटिव बनाने तक का काम भारतीय रेलवे के जिम्मे है। इन कामों को रेलवे अपने  खुद के विभाग में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट लेबर के सहारे करता है। इसलिए कॉन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन और अबोलिशन) कानून के तहत ठेकेदारों के साथ भारतीय रेलवे की भी जिम्मेदारी तय की गई है कि वह ठेके पर रखे गए लेबरों के हालात पर ध्यान रखे।

कैग ने साल 2014 से लेकर 2017 तक 463 ठेकों के स्थिति की समीक्षा की। कैग ने पाया कि इसमें से 172 ठेकों को  रेलवे से कभी लाइसेंस ही हासिल नहीं हुआ। 207 ठेकों से जुड़े आंकड़ें ही नहीं मिले। यानी केवल 84 ऐसे ठेके थे जिनपर रेलवे  प्रशासन के पास कुछ आंकड़ें उपलब्ध हैं। इसका मतलब यह हुआ कि भारतीय रेलवे के तीस चालीस हज़ार करोड़ के प्रोजेक्ट में ठेकेदारी बिना किसी हिसाब-किताब के काम रही है।

इन 84 ठेकों में 14 ठेकों में ठेके के निर्धारित नियम से अधिक लेबर काम कर रहे हैं। जिनकी संख्या ऐसे ठेकों में 200 से अधिक है। किसी भी ठेके में मजदूरी देने की जिम्मेदारी ठेकेदार की होती है लेकिन यहां पर रेलवे  प्रिंसिपल यानी प्रधान नियोक्ता की भूमिका में हैं इसलिए नियम के तहत मजदूर को मजदूरी देने के समय प्रधान नियोक्ता की तरफ से एक प्रतिनिधि का रहना भी जरूरी होता है। जो ठेकेदार की तरफ से मजदूरों को होने वाली अड़चनों को दूर करे और मजदूरी ना मिलने पर उनकी मजदूरी का भुगतान रेलवे की तरफ से करवाए। इस नियम की जमीनी हकीकत यह है कि  463 ठेकों में से किसी भी ठेके के लिए रेलवे से कोई भी प्रतिनिधि नियुक्त नहीं किया गया है। यानी मजदूरों का कोई सरकारी माई बाप नहीं है। रेलवे ने 2016-17 में ठेके पर काम कराने के लिए 35098 करोड़ का भुगतान किया था। कैग का कहना है कि ठेकेदारों ने इसका 4 प्रतिशत हिस्सा यानी 1400 करोड़ से अधिक की राशि मज़दूरों के हिस्से से मार लिया। यही नहीं रेल मंत्रालय कई हज़ार करोड़ रुपये के कांट्रेक्ट देती है। उन कामों में ठेके पर रखे गए मज़दूरों को शोषण से बचाने के लिए संसद ने जितने भी कानून बनाए हैं, उनमें से किसी का भी 50 परसेंट भी पालन नहीं होता है। बहुतों को न तो मज़दूरी मिलती है, न ओवर टाइम मिलता है, न छुट्टी मिलती है, न छुट्टी का पैसा मिलता है, न उनका प्रोविडेंड फंड कटता है और न ही उनका भविष्य निधि कर्मचारी संगठन में पंजीकरण है।

सैंकड़ों की संख्या में ठेकेदारों ने कैग को रिकार्ड ही नहीं दिए। कैग आंकना चाहती थी कि कितने मज़दूरों को चेक या बैंक से भुगतान हो रहा है। नियम यही है कि भुगतान बैंक या चेक से होगा। 212 कांट्रेक्ट में तो रिकार्ड ही नहीं मिला कि पैसा कैसे दिया गया। मात्र 18 कांट्रेक्ट में वेतन की पर्ची कटी मिली। 169 कांट्रेक्ट में भुगतान नगद किया गया। जबकि यह सरकार कैशलेश इकॉनमी की बात करती है, और यह कहती है कि कैशलेश इकॉनमी के सहारे भ्रष्टाचार दूर करेगी। इसका मतलब यह है कि  रेलवे में जमकर लूट मच हुई है और सरकार का इस तरफ कोई ध्यान नहीं है। 

हर एक घंटे, दिन, सप्ताह और महीने के लिए न्यूनतम मज़दूरी मिलने का कानून है। लेकिन 463 ठेकों में से मात्र 105 में ही न्यूनतम मज़दूरी दी गई है। बहुतों ने तो रिकार्ड ही नहीं दिए। किसी भी प्रोजेक्ट की लागत तय करते वक्त न्यूनतम मज़दूरी को सबसे जरूरी हिस्सा मानकर लागत तय की जाती है। अगर यह पैसा ठेकेदार मार लें और सरकार इसपर कोई ध्यान न दे तो सरकार को भ्रष्टाचारी कहने में क्या गलत है। जनता के पैसे को यहां धड़ल्ले से लूटा  जा रहा है लेकिन इस लूट की खबर को अनसुना किया जा रहा है। 

मात्र 120 कांट्रेक्ट में छुट्टी मिली और छुट्टी के पैसे दिए गए। बाकी में नहीं। कैग ने लिखा है कि 2745 मज़दूरों के 5.46 करोड़ रुपये ठेकेदारों ने मार लिए, 49 ठेकों में न तो छुट्टी मिली और न ही छुट्टी पर काम करने का पैसा। 9 घंटे से ज्यादा या सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम कराने पर ओवर टाइम देना होता है। 30 कांट्रेक्ट में पाया गया कि ओवर टाइम नहीं दिया गया और 1.74 करोड़ रुपये मार लिए गए।

प्रिंसिपल नियोक्ता के तौर पर इन धांधलियों की सारी जिम्मेदारी रेलवे की बनती है। और इस भूमिका को निभा पाने में रेल मंत्रालय पूरी तरह असफल रहा है। इसकी सबसे बड़ी गवाही यह है कि चीफ लेबर कमिश्नर या प्रिंसिपल नियोक्ता के तौर पर रेलवे 72 फीसदी ठेकों का पंजीकरण कराने  में असफल रही है।  अगर मंत्रलाय पंजीकरण करने तक का काम नहीं कर पा रहा है तो इसका सीधा मतलब यह भी है कि सरकार भी धांधली और कालेधन को बढ़ावा दे रही है। 

indian railways
railway minister
Rail workers
rail minister Piyush Goyal
Contract Workers
CAG report

Related Stories

सीवर कर्मचारियों के जीवन में सुधार के लिए ज़रूरी है ठेकेदारी प्रथा का ख़ात्मा

ट्रेन में वरिष्ठ नागरिकों को दी जाने वाली छूट बहाल करें रेल मंत्री: भाकपा नेता विश्वम

केंद्र का विदेशी कोयला खरीद अभियान यानी जनता पर पड़ेगा महंगी बिजली का भार

कोयले की किल्लत और बिजली कटौती : संकट की असल वजह क्या है?

रेलवे में 3 लाख हैं रिक्तियां और भर्तियों पर लगा है ब्रेक

वित्त अधिनियम के तहत ईपीएफओ फंड का ट्रांसफर मुश्किल; ठेका श्रमिकों के लिए बिहार मॉडल अपनाया जाए 

झारखंड में चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था और मरीज़ों का बढ़ता बोझ : रिपोर्ट

भारतीय रेल के निजीकरण का तमाशा

निजी ट्रेनें चलने से पहले पार्किंग और किराए में छूट जैसी समस्याएं बढ़ने लगी हैं!

भारत में नौकरी संकट जितना दिखता है उससे अधिक भयावह है!


बाकी खबरें

  • सबरंग इंडिया
    उत्तर प्रदेश: पेपर लीक की रिपोर्ट करने वाले पत्रकार गिरफ्तार
    02 Apr 2022
    अमर उजाला के बलिया संस्करण ने जिस दिन दोपहर 2 बजे से परीक्षा होनी थी उस दिन सुबह लीक पेपर प्रकाशित किया था।
  • इलियट नेगिन
    समय है कि चार्ल्स कोच अपने जलवायु दुष्प्रचार अभियान के बारे में साक्ष्य प्रस्तुत करें
    02 Apr 2022
    दो दशकों से भी अधिक समय से कोच नियंत्रित फ़ाउंडेशनों ने जलवायु परिवर्तन पर सरकारी कार्यवाई को विफल बनाने के लिए 16 करोड़ डॉलर से भी अधिक की रकम ख़र्च की है।
  • DU
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूजीसी का फ़रमान, हमें मंज़ूर नहीं, बोले DU के छात्र, शिक्षक
    01 Apr 2022
    नई शिक्षा नीति के तहत UGC ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों को कई कदम लागू करने के लिए कहा है. इनमें चार साल का स्नातक कोर्स, एक प्रवेश परीक्षा और संस्थान चलाने के लिए क़र्ज़ लेना शामिल है. इन नीतियों का…
  • रवि शंकर दुबे
    इस साल यूपी को ज़्यादा बिजली की ज़रूरत
    01 Apr 2022
    उत्तर प्रदेश की गर्मी ने जहां बिजली की खपत में इज़ाफ़ा कर दिया है तो दूसरी ओर बिजली कर्मचारी निजीकरण के खिलाफ आंदोलन छेड़े हुए हैं। देखना होगा कि सरकार और कर्मचारी के बीच कैसे समन्वय होता है।
  • सोनिया यादव
    राजस्थान: महिला डॉक्टर की आत्महत्या के पीछे पुलिस-प्रशासन और बीजेपी नेताओं की मिलीभगत!
    01 Apr 2022
    डॉक्टर अर्चना शर्मा आत्महत्या मामले में उनके पति डॉक्टर सुनीत उपाध्याय ने आरोप लगाया है कि कुछ बीजेपी नेताओं के दबाव में पुलिस ने उनकी पत्नी के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया, जिसके चलते उनकी पत्नी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License