NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कौन पहले पलक झपकाऐगा?
आईपीएफटी त्रिपुरालैंड पर कायम है, क्या बीजेपी आंदोलन के इतिहास को समझती हैं?
विवान एबन
27 Mar 2018
Translated by मुकुंद झा
कौन पहले पलक झपकाऐगा?

25 मार्च को, त्रिपुरा के स्वदेशी पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफटी) ने राज्य की मांग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। 18 मार्च को, त्रिपुरा सरकार में वन और जनजातीय कल्याण मंत्री मवाद कुमार जमयतिया ने दिल्ली में नेशनल फेडरेशन फॉर न्यू स्टेट्स (एनएफएनएस) की बैठक में भाग लिया। यह त्रिपुरा में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार के मना करने के बावजूद आईपीएफटी अलग राज्य की मांग कम नहीं हो रही है। भाजपा इन घटनाओं के बारे में असामान्य रूप से परेशान रहीं है। 24 मार्च को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने राज्यसभा को बताया कि एक अलग राज्य की मांग पर नजर रखने के लिए कोई उच्च स्तरीय निगरानी समिति नहीं बनाई गई है। हालांकि, आईपीएफटी के नेता एन सी० देबबर्मा  पिछे भी दावा किया था कि केंद्र सरकार त्रिपुरालैंड के बारे में सकारात्मक हैं ।

' त्रिपुरालैंड ' की मांग त्रिपुरा में सभी आदिवासी स्वायत्त जिला परिषद (टीएडीसी) क्षेत्रों से मिलकर एक अलग राज्य कि मांग है। टीएडीसी क्षेत्र त्रिपुरा के कुल क्षेत्रफल का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हैं और अधिकतर पहाड़ियों से मिलकर बना हैं हालांकि, 'आदिवासी' त्रिपुरा की आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा है। त्रिपुरा के 'आदिवासी' लोगों का इतिहास एक अच्छी कहानी नहीं है। वे मानिकिया वंश के राजाओं द्वारा व्यवस्थित रूप से हाशिए पर कर दिए गए थे। अग्रतला के आसपास के मैदानी इलाकों में बंगाल के लोगों को बसाने वाले सबसे पहले राजा ही थे | इसके बाद में रॉयल कोर्ट की भाषा को कोक-बोरोक से बंगाली में परिवर्तित करने के साथ - साथ उसे  हाशिये पर पहुंच दिया गया। यह तब हुआ था जब त्रिपुरा आधिकारिक तौर पर हिंदू साम्राज्य बन गया। पूजा के पारंपरिक रूपों को भी हाशिये पर धकेला गया था |

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की अवधि कि ओर आगे बढ़ते हुए, बंगाल के बसने वालों को अपनी भूमि का मालिकाना हक़ दे दिया गया था। राजा द्वारा लगाए गए करधन के खिलाफ जनजातीय विद्रोह क्रूरता से दबा दिया गया । इस परिदृश्य में, वामपंथी संगठनों ने त्रिपुरा में आदिवासी लोगों के लिए साक्षरता कार्यक्रमों का आयोजन करना शुरू किया। उन्होंने कोक-बोरोक के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया और आदिवासियों को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित किया। यह भी राजा द्वारा एक ब्रिटिश सहयोग से दबा दिया गया और त्रिपुरा के लिए उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष का हिस्सा बनने की इच्छा नहीं थी। बंगालके विस्थापितों ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया, शायद इसलिए कि वे राजा को क्रोध का सामना नहीं करना चाहते थे,जिन्होंने उन्हें जमीन दी थी ।

त्रिपुरा के विलय के समय, राज्य को संपूर्णता में सौंप गया था, तब तक कभी भी अलगाववाद का कोई सवाल नहीं था। हालांकि, तब तक वामपंथियों द्वारा आयोजित साक्षरता कार्यक्रम और साथ ही कोक-बोरोक आदिवासियों की लोक-भाषा बन गई थी, ने त्रिपुर में स्वायत्तता का बीज बोया था। इस नई मिली राष्ट्रीय चेतना से बाहर आने वाली पहली मांग स्वायत्तता थी| इससे ही टीएडीसी के निर्माण हुआ। हालांकि, अल्प आय और साक्षरता स्तर के साथ अल्पसंख्यक आबादी को  संगठित किया, टीएडीसी ने आदिवासी आबादी की स्थिति में सुधार के लिए बहुत कुछ किया।जब एक बार, चुनावी राजनीति में आते है तो संख्याओं का महत्व होता है | भारतीय राजनीति में एक अज्ञात सत्य यह है कि व्यक्ति व्यक्ति के लिए नहीं वो समुदाय के लिए वोट देते हैं। इसलिए, आरक्षित सीटों के बावजूद, त्रिपुरा अभी तक एक भी 'आदिवासी' मुख्यमंत्री को देखने को नहीं मिला है |

यदि कुछ भी, किसी को भी  स्वयं के नेतृत्व वाली सरकार होने का प्रतीकात्मकता समुदाय के उत्थान की भावना को जोड़ता है। बेशक, पहचान निश्चित और एक नहीं होती है, हालांकि, पूर्वोत्तर के अधिकांश हिस्सों में, पहचान भाषा या आदिवासी पहचान पर आधारित है। संभवतः असम के अलावा अन्य राज्यों में धर्म बड़ी भूमिका नहीं निभाता है |इस प्रकार, पहले मौजूदा समुदाय से संबंधित और आधुनिक चुनाव राजनीति की वजह से अभी तक कमज़ोर होने के कारण आदिवासियों में निराशा हुई है। त्रिपुरालैंड के शुरूआती मांगों में स्पष्टता नहीं थी | एक तो लोग यह तय करने में असमर्थ थे कि क्या त्रिपुरालैंड एक सार्वभौम राज्य या भारत के भीतर एक अलग राज्य होगा। त्रिपुरा राष्ट्रीय स्वयंसेवकों (टीएनवी) जैसे समूह ने टीएडीसी बनाने के बाद हथियार छोड़ दिए थे। हालांकि, त्रिपुरा (एनएलएफटी) नेशनल लिबरेशन फ्रंट (एनएलएफटी) सभी त्रिपुरा जनजातीय बल (एटीटीएफ) ने, जो बाद में 'टाइगर' के लिए 'आदिवासी' को अपने नाम पर प्रतिस्थापित किया, जिसने संप्रभुता के लिए हथियार उठाए।

दोनों समूहों ने त्रिपुरा की बंगाली आबादी के खिलाफ जातीय सफाई के दावे किये । इससे अमरा बांग्ला के उत्थान का नेतृत्व हुआ, जो समान था, लेकिन ये आदिवासियों के उनका प्रतिउत्तर था । इस प्रकार, एक सकारात्मक प्रतिक्रिया बनाया गया, जिसमें हिंसा को एक दूसरे के खिलाफ फैलाया गया। हालांकि, हिंसा को रोकने और 19 80 के दशक के दंगों को दोहरा नहीं दिया जाए यह सुनिश्चित करने के लिए वाम सरकार की सराहना की जानी चाहिए। हालांकि, हिंसा ने एक नैतिक रूप से जागरूक क्षेत्र में शांति की कमजोरी का पर्दाफाश किया |  त्रिपुरा में जातीय हिंसा के बाद से, आईपीएफटी भारतीय संघ के भीतर एक अलग राज्य की मांग को आगे बढ़ाने के लिए एक संगठन बनाया|

आईपीएफटी ने 2018 विधानसभा चुनाव में 9 में से 8 सीटों पर जीत हासिल की थी। यह आईपीएफटी के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, अन्यथा ये फ्रिंज खिलाड़ी था। पार्टी का मुख्य मुद्दा त्रिपुरालैंड का निर्माण है। हालांकि, भाजपा ने कभी भी इस मांग का समर्थन नहीं किया है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा द्वारा समर्थन की वजह से एस०एस० अहलूवालिया दार्जिलिंग से निर्वाचित होने के बावजूद वे गोरखालैंड के खिलाफ़ रहे है । उन्होंने बोडोलैंड पर अपने रुख के संबंध में बोडो राजनीतिक दलों के साथ संबंधों में तनाव पैदा कर दिया है। अब, ऐसा प्रतीत होता है कि आईपीएफटी के साथ उनका संबंध निकट भविष्य में असहज हो जाएगा। समस्या यह है कि आईपीएफटी या बीजेपी के लिए एक गलतफहमी या तो आईपीएफटी खत्म हो सकती है या फिर राज्य के लिए एक नया हिंसक आंदोलन बन सकता है।

त्रिपुरा
त्रिपुरा आदिवासी
आईपीएफटी
एनएलएफटी
एटीटीएफ

Related Stories

बेतुके बयान:मुद्दों से भटकाने की रणनीति तो नहीं ?

"बीजेपी-RSS त्रिपुरा की एक तिहाई जनता पर हमला कर रही है "

लेनिन की सिर्फ मूर्ति टूटी है, उनके विचार नहीं

वाम त्रिपुरा में चुनाव हारा, लेकिन यह वाम की हार नहीं

त्रिपुरा विधानसभा चुनाव: 15% से ज़्यादा वोटिंग मशीनों में ख़राबी

भाजपा बनाम वाम मोर्चा # 2: आदिवासियों को दी गयी भूमि का रिकॉर्ड क्या कहता है?

त्रिपुरा और गुजरात: बच्चों के स्वस्थ्य की एक तुलना

तथ्यों की कसौटी पर खरे नहीं उतरे त्रिपुरा से जुड़े अमित शाह के दावे

माणिक सरकार के भाषण पर रोक, राज्यों के अधिकार पर एक और हमला


बाकी खबरें

  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूक्रेन संकट, भारतीय छात्र और मानवीय सहायता
    01 Mar 2022
    यूक्रेन में संकट बढ़ता जा रहा है। यूक्रेन में भारतीय दूतावास ने मंगलवार को छात्रों सहित सभी भारतीयों को उपलब्ध ट्रेन या किसी अन्य माध्यम से आज तत्काल कीव छोड़ने का सुझाव दिया है।
  • Satellites
    संदीपन तालुकदार
    चीन के री-डिज़ाइंड Long March-8 ने एक बार में 22 सेटेलाइट को ऑर्बिट में भेजा
    01 Mar 2022
    Long March-8 रॉकेट चीन की लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी की अकादमी में बना दूसरा रॉकेट है।
  • Earth's climate system
    उपेंद्र स्वामी
    दुनिया भर की: अब न चेते तो कोई मोहलत नहीं मिलेगी
    01 Mar 2022
    आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कहा है कि जलवायु परिवर्तन से आर्थिक दरार गहरी होगी, असमानता में इजाफ़ा होगा और ग़रीबी बढ़ेगी। खाने-पीने की चीजों के दाम बेतहाशा बढ़ेंगे और श्रम व व्यापार का बाजार…
  • nehru modi
    डॉ. राजू पाण्डेय
    प्रधानमंत्रियों के चुनावी भाषण: नेहरू से लेकर मोदी तक, किस स्तर पर आई भारतीय राजनीति 
    01 Mar 2022
    चुनाव प्रचार के 'न्यू लो' को पाताल की गहराइयों तक पहुंचता देखकर व्यथित था। अचानक जिज्ञासा हुई कि जाना जाए स्वतंत्रता बाद के हमारे पहले आम चुनावों में प्रचार का स्तर कैसा था और तबके प्रधानमंत्री अपनी…
  • रवि शंकर दुबे
    पूर्वांचल की जंग: यहां बाहुबलियों के इर्द-गिर्द ही घूमती है सत्ता!
    01 Mar 2022
    यूपी में सत्ता किसी के पास भी हो लेकिन तूती तो बाहुबलियों की ही बोलती है, और पूर्वांचल के ज्यादातर क्षेत्रों में उनका और उनके रिश्तेदारों का ही दबदबा रहता है। फिर चाहे वो जेल में हों या फिर जेल के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License