NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना गंभीर सवालों के घेरे में- सीईसी रिपोर्ट में ख़ुलासा    
सर्वोच्च न्यायालय की सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के लगभग हर पहलू पर अपने अवलोकन दिये हैं। इस परियोजना की वजह से  समृद्ध जैव-विविधता पर होने वाले दुष्प्रभावों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किये जाने पर गंभीर आपत्तियाँ दर्ज  की हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर गहन अध्ययन करते हुए सीईसी ने राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड ( केन्द्रीय बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ) की पूरी कार्य-शैली को कटघरे में खड़ा किया है।
सत्यम श्रीवास्तव
13 Sep 2019
indus river
Image courtesy:NewsX

30 अगस्त को केन वेतबा नदी जोड़ो परियोजना (केन वेतबा रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट) को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी ने अपने अंतिम निष्कर्ष और सिफ़ारिशें पेश की हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट इन निष्कर्षों पर तवज्जो देता है तो यह तय है कि अटल बिहारी वाजपेयी के समय तैयार हुई इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर पूर्ण विराम लग जाना चाहिए। इसका व्यापक असर अन्य नदी –जोड़ो परियोजनाओं पर भी पड़ना तय है।

सीईसी (सेंट्रल इम्पावर्ड कमिटी) के अवलोकनों और इसके द्वारा उठाए गए सवालों पर गौर करें तो देश में परियोजनाओं को लेकर बरती जाने वाली असावधानियाँ व अविवेकपूर्ण ढंग से इन परियोजनाओं को दी जाने वाली ‘हरी झंडियों’ पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट सीईसी के अध्ययन व पड़ताल के आधार पर दिये गए निष्कर्षों को संज्ञान में लेते हुए न केवल इस परियोजना को रद्द करेगा बल्कि परियोजना को तमाम तरह के क्लीयरेंस देने वाली जिम्मेदार संस्थाओं को भी दोषी मानेगा।

सीईसी ने अपने अध्ययन के आधार पर परियोजना के लगभग हर पहलू पर अपने अवलोकन दिये हैं। यह फेहरिस्त लंबी है। इसमें केन नदी में पानी की उपलब्धता के भ्रामक व अस्पष्ट आंकलन से लेकर दो राज्यों के बीच पानी के बँटबारे में मौजूद अस्पष्ट व दोषपूर्ण समझौते, बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए लाभ (सिंचाई) के दावे, परियोजना के उद्देश्यों को लेकर किसी वैकल्पिक तरीके पर विचार न किए जाने की कवायद, लागत –लाभ का भ्रामक और अपूर्ण मूल्यांकन, पन्ना टाइगर रिज़र्व जैसे संवेदनशील वन्य क्षेत्र को लेकर बेहद गैर-जिम्मेदार रवैया, केन घड़ियाड़ अभ्यारण्य पर होने वाले प्रभावों की उपेक्षा, गिद्दों व अन्य प्रकार के सरसृप जीवों के पर्यावास की आपराधिक अनदेखी और समृद्ध जैव-विविधता पर होने वाले दुष्प्रभावों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किये जाने पर तो गंभीर आपत्तियाँ की है हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर गहन अध्ययन करते हुए सीईसी ने राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड ( केन्द्रीय बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ) की पूरी कार्य-शैली को कटघरे में खड़ा किया है। यही वो जिम्मेदार संस्था है जिसने वन्य जीवों के पर्यावास पर इस परियोजना के कारण किसी भी तरह की हानि न होने की पुष्टि करते हुए 23 अगस्त 2016 को अनापत्ति दी।  

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला भी इसी अनापत्ति को लेकर पहुंचा। जिस पर सामाजिक व पर्यावरण कार्यकर्ता मनोज मिश्रा ने सवाल उठाए थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी पड़ताल के लिए ही सीईसी की नियुक्ति की थी। हालांकि ये सारी आपत्तियाँ जो सीईसी ने उठाईं हैं, केन नदी के साफ पानी के नीचे सहज ही दिखलाई दे जाने वाली रेत या पत्थरों की तरह देश के पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय निवासियों को शुरू से ही दिखलाई पड़ रहीं थीं।

सीईसी ने तो केवल परियोजनाओं को स्वीकृति देने में बरती गयी गंभीर और आपराधिक लपरवाहियों को अपनी रिपोर्ट में दर्ज़ किया है पर हमारी स्मृतियों में तत्कालीन जल संसाधन मंत्रालय की मंत्री उमा भारती की वह मूर्खतापूर्ण हठधर्मिता मौजूद है जब उन्होंने इस परियोजना को पर्यावरण स्वीकृति की प्रक्रिया पर 31अगस्त 2017 को यह कहते हुए दबाव बनाया था कि अगर पर्यावरण स्वीकृति देने में ढील बरती गयी तो वह आमरण अनशन करेंगीं।

सीईसी ने प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण स्वीकृति की प्रक्रिया पर तो नहीं लेकिन इस जलवायु क्षेत्र की अद्वियता पर अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ‘इस भौगोलिक क्षेत्र में मौजूद जैव विविधतता,नैसर्गिक गुफाएँ, पेड़ों की विशेष प्रजातियाँ, सैकड़ों प्रकार की घास, झरने,केन नदी के किनारे का वेजिटेशन, तमाम जल जीवों आदि के पर्यावास के रूप में जाना जाता है। अगर यह परियोजना स्थापित होगी तो हम इस नैसर्गिक संपदा को हमेशा के लिए खो देंगे।‘

इसके अलावा एक और टिप्पणी यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है जो सीईसी ने राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड द्वारा इस परियोजना को मंजूरी दिये जाने के निर्णय पर सवाल करते हुए की है कि – राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक अन्य फैसले में दिये निर्देश को नज़रअंदाज़ किया जिसमें कोर्ट ने कहा है कि –“किसी भी परियोजना को स्वीकृति देते समय इस बात को अनिवार्य रूप से तवज्जो देना चाहिए कि हमारी एप्रोच इको-सेंट्रिक हो न कि एंथ्रोपोसेंट्रिक। और उस पर तमाम प्रजातियों के मानक नैसर्गिक  हित सुरक्षित हो रहे हैं कि नहीं। क्योंकि सभी प्रजातियों को धरती पर रहने के समान अधिकार हैं”।

यह एक मामूली सी समझ की बात रही है कि यह परियोजना केवल बड़े ठेकेदारों, कंट्रेक्टरों, इंजीनियरों, नौकरशाहों और अंतत: राजनेताओं के बीच ‘धन बनाने’ के लिए लायी गयी है। इतनी समझ तो इन क्षेत्रों के स्थानीय निवासी भी रखते हैं कि केन और बेतवा दोनों नदियां एक ही जलवायु क्षेत्र में आस-पास मौजूद हैं। इस लिहाज से जिस साल उस जलवायु क्षेत्र में जैसा मानसून होगा और जैसी बारिश होगा उसका समान असर दोनों नदियों पर होगा। यानी जब केन में बढ़ आएगी तो बेतवा में भी बाढ़ ही आएगी और केन सूखी होगी तो बेतवा भी सूखी होगी। इसलिए यह बात शुरू से ही अवैज्ञानिक व तथ्यहीन थी कि केन में प्रचुर मात्रा में पानी होगा लेकिन बेतवा सूखी होगी। इसलिए इस परियोजना के माध्यम से ‘नदी-जोड़ो’ के पीछे जो भी तस्ब्बुर थे वो धराशायी हो जाते थे। क्या वाकई इतनी सी बात देश के नीति नियंताओं को समझ में नहीं आ रही थी?

पीपुल साइंस इंस्टीट्यूट से जुड़े पर्यवारणविद रवि चौपड़ा इस तरह की परियोजनाओं को एक ‘लतीफे’ की तरह देखते हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि – ये ख्याल ही बेतुका है कि हिंदुस्तान में नदियों को आपस में जोड़ने से बाढ़ या सूखे जैसी स्थितियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। असल में नदियों को लेकर हमारी समझ साफ नहीं है। नदी-जोड़ो के ख्याल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बात करते हुए वो बताते हैं कि इसका ख्याल सबसे पहले एक एयर पायलेट को 1960 के आस-पास आया था जिसका नाम कैप्टन डसतुर था, जिसे बाद में जाने माने सिविल इंजीनियर के. एल. राव ने ‘गारलेंड कनाल’ के रूप में पेश किया। उनका मानना था कि देश में नदियों की एक मालानुमा संरचना होना चाहिए ताकि पानी को सहेजा जा सके और जरूरत के हिसाब हर क्षेत्र को पानी मुहैया हो सके। इस अवधारणा पर रवि चौपड़ा का स्पष्ट मानना है कि देश में गंगा नाम की जो नदी है वो इसी गारलेंड की भूमिका निभा रही है। इसे ही तो साफ रखने की ज़रूरत है जो सरकारों से हो नहीं रहा है।  

केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में एनडीए की पूर्णकालिक सरकार ने इस ख्याल को ठोस रूप देते हुए सबसे पहले केन-बेतवा को जोड़ने की परियोजना पर काम शुरू किया था। 2005 में इस परियोजना पर मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश की सरकारों के बीच समझौता हुआ था। इन सिफ़ारिशों से एक उम्मीद स्थानीय निवासियों को जागी है कि उनका यह पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और ऐसी विनाशकारी परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। यह बहुत अजीब था कि इतनी महत्वाकांक्षी परियोजना से उन्हें कोई लाभ नहीं था जिन्हें अपने प्राकृतिक संसाधनों से हमेशा के लिए महरूम कर दिया जाना था।

पत्थर खदान मजदूर संघ, पन्ना के कार्यकर्ता युसुफ बेग ने इस खबर पर खुशी जताई है और कहा है कि ‘सीईसी की रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि देश में इंजीनियरों से लेकर मंत्रालयों और उसकी समितियों में बैठे लोगों में काबिलियत नहीं है। जो बातें हम आंदोलन के माध्यम से लंबे समय से उठा रहे हैं वही बातें आज सीईसी ने कही हैं।‘

हालांकि इस रिपोर्ट में इस समृद्ध क्षेत्र में रह रहे आदिवासियों व जंगल निवासियों के लिए कुछ नहीं कहा गया और ये शायद सीईसी के दायरे में नहीं था लेकिन अभी भी ये मूल सवाल ज्यों के त्यों बने हुए हैं कि पन्ना टाइगर रिजर्व से विस्थापितों को सही पुनर्वास नहीं मिला है।

इस बात से भी स्थानीय लोगों में खुशी है कि केन-बेतवा से पन्ना टाइगर रिजर्व का एक तिहाई हिस्सा डूब जाने वाला था शायद वो बच जाएगा जिसका सीधा प्रभाव उनकी बस्तियों पर पड़ेगा और उन्हें विस्थापित नहीं होना पड़ेगा। ज्ञात हो कि इस डूब क्षेत्र की भरपाई के लिए पन्ना टाइगर रिज़र्व के दायरे को बढ़ाने की योजना थी और उसका बफर ज़ोन व्यापक किया जाना था। इसके लिए लगभग 2 गाँव, नगरों को विस्थापित किया जाना था।

एक सवाल जो सीईसी ने नहीं उठाया वो है इस पूरे इलाके में वन अधिकार कानून का लंबित क्रियान्वयन। सौर, कोल, मवासी आदिवासी समुदाय आज भी इस कानून के क्रियान्वयन की राह देख रहे हैं ताकि उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने की सांवैधानिक गारंटी मिले। इस पहलू पर और विस्तार से समझने की गंभीर ज़रूरत है जिसे संभवतया अगले लेख में उठाया जा सकता है।

बहरहाल, अब यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के पास है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस रिपोर्ट को शब्दश: संज्ञान में लेता है तो यह इस तरह के मूर्खतापूर्ण नियोजन के लिए जिम्मेदार संस्थाओं के लिए गंभीर सबक होंगे।

Ken-Betwa River Link Project
CEC
Supreme Court
Central Board of Wildlife

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • women in politics
    तृप्ता नारंग
    पंजाब की सियासत में महिलाएं आहिस्ता-आहिस्ता अपनी जगह बना रही हैं 
    31 Jan 2022
    जानकारों का मानना है कि अगर राजनीतिक दल महिला उम्मीदवारों को टिकट भी देते हैं, तो वे अपने परिवारों और समुदायों के समर्थन की कमी के कारण पीछे हट जाती हैं।
  • Indian Economy
    प्रभात पटनायक
    बजट की पूर्व-संध्या पर अर्थव्यवस्था की हालत
    31 Jan 2022
    इस समय ज़रूरत है, सरकार के ख़र्चे में बढ़ोतरी की। यह बढ़ोतरी मेहनतकश जनता के हाथों में सरकार की ओर से हस्तांतरण के रूप में होनी चाहिए और सार्वजनिक शिक्षा व सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हस्तांतरणों से…
  • Collective Security
    जॉन पी. रुएहल
    यह वक्त रूसी सैन्य गठबंधन को गंभीरता से लेने का क्यों है?
    31 Jan 2022
    कज़ाकिस्तान में सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CSTO) का हस्तक्षेप क्षेत्रीय और दुनिया भर में बहुराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बदलाव का प्रतीक है।
  • strike
    रौनक छाबड़ा
    समझिए: क्या है नई श्रम संहिता, जिसे लाने का विचार कर रही है सरकार, क्यों हो रहा है विरोध
    31 Jan 2022
    श्रम संहिताओं पर हालिया विमर्श यह साफ़ करता है कि केंद्र सरकार अपनी मूल स्थिति से पलायन कर चुकी है। लेकिन इस पलायन का मज़दूर संघों के लिए क्या मतलब है, आइए जानने की कोशिश करते हैं। हालांकि उन्होंने…
  • mexico
    तान्या वाधवा
    पत्रकारों की हो रही हत्याओंं को लेकर मेक्सिको में आक्रोश
    31 Jan 2022
    तीन पत्रकारों की हत्या के बाद भड़की हिंसा और अपराधियों को सज़ा देने की मांग करते हुए मेक्सिको के 65 शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License