NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
किसान आत्महत्याएं बढ़ रही हैं, लेकिन सरकार की नीतियाँ तकलीफज़दा किसानों को सहायता नहीं दे पा रही हैं.
जनवरी और अक्टूबर के बीच इस वर्ष 2016 के मुकाबले दस माह के भीतर किसान आत्महत्या की कुल संख्या में सिर्फ 7% की गिरावट आई है
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
15 Nov 2017
Translated by महेश कुमार
farmer suicides

आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि जून और अक्टूबर के बीच महाराष्ट्र में पुनर्गठन ऋण माफी योजना के 'कार्यान्वयन' के बाद 1,254 किसानों ने आत्महत्या की.इन मामलों में आधे से ज्यादा, 691 कृषि सम्बंधित आत्महत्याएं, विदर्भ क्षेत्र से मिलीं, जहाँ हाल ही में कीटनाशक से हुयी कृषि समुदाय के लोगों की मौतें देखी गई थी.

इस साल जनवरी और अक्टूबर के बीच दस महीने में कृषि से जुडी आत्महत्याओं में 2016 की तुलना में केवल 7% की ही गिरावट आईं है. 2016 के शुरुआती दस महीनों में 2,604 आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए गए थे, जबकि इसी समय में 2017 में 2,414 खेती से जुडी आत्महत्याओं के मामले सामने आये.

हालांकि, महाराष्ट्र सरकार की नीतियां, ऋण माफी योजना आदि, व्यथित किसानों के लिए बहुत कुछ नहीं कर पायी. सरकार ने इस साल जून में किसानों की गतिविधियों और संघर्षों के आगे झुक कर एक संशोधित ऋण माफी योजना की शुरूवात की थी. वर्ष 2007-08 की पिछली ऋण माफी योजना के पैकेज का पुनर्गठन कर, सरकार ने इसे 'छत्रपति शिवाजी महाराज कृषि प्रबंधन योजना' (सी.एस.एम.के.एस.वाई.) के नाम से ऋण माफी योजना शुरू की,

सी.एस.एम.के.एस.वाई. स्कीम के तहत "जो किसान 1 अप्रैल 2009 के बाद फसल ऋण या टर्म लोन ले चुके हैं, और 30 जून, 2016 को ऐसे ऋण को चुका नहीं पाए हैं, ऐसे किसानों को कुछ मानदंडों के आधार पर अधिकतम 1.50 लाख रुपये(डेढ़ लाख) रूपए) की ऋण माफी दी जाएगी. यदि क़र्ज़ अदा न करने की राशि 1.50 लाख रुपये से अधिक है, तो किसान को बैंक में इस तरह की मूलभूत राशि का पूरा लाभार्थी हिस्सा जमा करना होगा और उसके बाद ही किसान को सरकार से 1.50 लाख रुपये मिलेंगे."

सी.एस.एम.के.एस.वाई. योजना के तहत 22 सितंबर 2017 तक, 56, 59, 187 ऋण माफी के आवेदन प्राप्त हुए, जो सरकार के नियमों और शर्तों को पूरी तरह संतुष्ट करते थे. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि केवल किसानों के एक छोटे से हिस्से को ही ऋण माफ़ी का हकदार माना गया, जबकि बड़ी संख्या के खातों की अब भी सत्यापित/जांच किया जाना बाकी है.

अमरावती डिवीजन में कपास उगाने वाले किसानों में जहां 2016 में 892 के मुकाबले जनवरी और सितंबर के बीच 907 किसानों ने आत्महत्याएं की थी. आंकड़ों के मुताबिक, अमरावती डिवीजन के तहत आने वाले यवतमल जिले की यवतमल पंचायत से 6104 किसानों ने सी.एस.एम.के.एस.वाई. योजना के तहत कर्ज माफी के लिए आवेदन किया. लेकिन अभी तक केवल 35 किसानों को ही इस योजना का लाभ मिला है. यवतमल जिला देश के आत्महत्या के मानचित्र में सबसे कमजोर जिलों में से एक है.

इस क़र्ज़ माफ़ी का लाभ प्राप्त करने में पश्चिमी महाराष्ट्र के किसानों में भी कोई ज्यादा अंतर नहीं है, जहाँ इस अवधि में आत्महत्या के 80 मामलों की सूचना मिली, जबकि 2016 में ऐसे मामले 68 दर्ज हुए थे. विदर्भ में जनवरी और अक्टूबर के बीच किसानों की आत्महत्याओं के 1,133 मामले देखे गए, जो इस अवधि के दौरान पिछले वर्ष के मुकाबले 1,203 मामले देखे गए जोकि पिछले वर्ष के करीब-करीब बराबर ही हैं.इस बीच, राज्य सरकार का मानना ​​है कि केवल ऋण माफी किसान आत्महत्याओं की संख्या में कमी नहीं ला पायेगा.

राज्य सरकार की लापरवाही के साथ-साथ, किसानों को उनके कृषि के उत्पादों की कम कीमतों का मिलने का भी सामना करना पड़ता है, यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर सरकार ने अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया है.

कम कृषि मूल्य का उल्लेख करते हुए, अखिल भारतीय किसान सभा के अजीत नवले ने कहा कि पिछले साल की तुलना में कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट आई है.

आगे उन्होंने कहा कि "पिछले साल एक क्विंटल कपास के लिए बाज़ार मूल्य 5,400 रुपये था. इस साल गिरकर वह 3,400 रुपये हो गया जबकि सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,320 रुपये है लेकिन मुश्किल से ही सरकार कुछ खरीद रही है"

उन्होंने आगे बताया कि एक तरफ तो "सोयाबीन की कीमतों में भारी गिरावट आई है और दूसरी तरफ सरकार द्वारा खरीदने की धीमी रफ्तार से गहरा संकट पैदा हो गया है. खरीफ सीज़न में 31 लाख टन सोयाबीन का उत्पादन किया गया है, लेकिन सरकार इसमें से बहुत कम माल खरीदना चाहती है."

सोयाबीन के किसानों को अपने उत्पादों को 3,050 रूपए के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) के मुकाबले 1600 रुपए से 2,200 रुपए प्रति क्विंटल की कीमतों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. महाराष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि नवंबर के पहले सप्ताह तक 10 लाख क्विंटल के निर्धारित खरीद के लक्ष्य के विपरीत सरकार ने मात्र 9 000 क्विंटल सोयाबीन की ही खरीद की है. इस वर्ष में सोयाबीन का अनुमानित उत्पादन 35.74 लाख टन है. किसानों को एम.एस.पी.(समर्थन मूल्य) की तुलना में बहुत ही कम कीमतों पर अपने उत्पाद बेचकर नुकसान उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है. यद्दपि किसान एम.एस.पी. (समर्थन मूल्य) के दामों पर अपने उत्पाद को खरीदने और उसके प्रभावी क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं, लेकिन अफ़सोस यह अभी भी कागज़ात पर ही मौजूद है.

farmer suicide
government policies
Maharashtra
minimum support price

Related Stories

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

महाराष्ट्र : एएसआई ने औरंगज़ेब के मक़बरे को पांच दिन के लिए बंद किया

अगर फ़्लाइट, कैब और ट्रेन का किराया डायनामिक हो सकता है, तो फिर खेती की एमएसपी डायनामिक क्यों नहीं हो सकती?

महाराष्ट्र में गन्ने की बम्पर फसल, बावजूद किसान ने कुप्रबंधन के चलते खुदकुशी की

LIC IPO: कैसे भारत का सबसे बड़ा निजीकरण घोटाला है!

2023 विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र तेज़ हुए सांप्रदायिक हमले, लाउडस्पीकर विवाद पर दिल्ली सरकार ने किए हाथ खड़े

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

अब राज ठाकरे के जरिये ‘लाउडस्पीकर’ की राजनीति

महाराष्ट्र सरकार का एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लेकर नया प्रस्ताव : असमंजस में ज़मीनी कार्यकर्ता


बाकी खबरें

  • farmers
    चमन लाल
    पंजाब में राजनीतिक दलदल में जाने से पहले किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए
    10 Jan 2022
    तथ्य यह है कि मौजूदा चुनावी तंत्र, कृषि क़ानून आंदोलन में तमाम दुख-दर्दों के बाद किसानों को जो ताक़त हासिल हुई है, उसे सोख लेगा। संयुक्त समाज मोर्चा को अगर चुनावी राजनीति में जाना ही है, तो उसे विशेष…
  • Dalit Panther
    अमेय तिरोदकर
    दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन
    10 Jan 2022
    दलित पैंथर महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की एक स्वाभाविक और आक्रामक प्रतिक्रिया थी। इसने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भारत की दलित राजनीति पर भी इसका निर्विवाद प्रभाव…
  • Muslim Dharm Sansad
    रवि शंकर दुबे
    हिन्दू धर्म संसद बनाम मुस्लिम धर्म संसद : नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश
    10 Jan 2022
    पिछले कुछ वक्त से धर्म संसदों का दौर चल रहा है, पहले हरिद्वार और छत्तीसगढ़ में और अब बरेली के इस्लामिया मैदान में... इन धर्म संसदों का आखिर मकसद क्या है?, क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है, या…
  • bjp punjab
    डॉ. राजू पाण्डेय
    ‘सुरक्षा संकट’: चुनावों से पहले फिर एक बार…
    10 Jan 2022
    अपने ही देश की जनता को षड्यंत्रकारी शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति अलोकप्रिय तानाशाहों का सहज गुण होती है किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं।
  • up vidhan sabha
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: कई मायनों में अलग है यह विधानसभा चुनाव, नतीजे तय करेंगे हमारे लोकतंत्र का भविष्य
    10 Jan 2022
    माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर नए political alignments को trigger करेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यह देश-दुनिया का पहला चुनाव है जो महामारी के साये में डिजिटल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License